जयप्रकाश नारायण
ईरान पर अमेरिकी-इजरायली संयुक्त हमले के 118 दिन बाद आशा और उम्मीद भरी सूचना आयी । जब, वार्ता में शामिल तीनों पक्ष अमेरिका, ईरान और पाकिस्तान द्वारा घोषणा की गयी कि समझौते के मुद्दों पर एक हद तक सहमति बन गई है तथा 19 जून को स्विट्जरलैंड की राजधानी जिनेवा में इस पर हस्ताक्षर होंगे ।
कई दिन पहले से खबर आ रही थी, कि सभी पक्ष 14 सूत्रीय समझौते के करीब हैं। दो दिन पहले पाकिस्तानी पीएम शाहबाज शरीफ ने घोषणा की कि 24 घंटे के अंदर समझौता हो जाएगा। इसके बाद ईरानी विदेश मंत्री अरागची ने भी कहा कि वार्ता निर्णायक दौर में है। हम हर पहलुओं को ध्यान में रखकर वार्ता कर रहे हैं ।उन्होंने कहा कि ईरान अपनी संप्रभुता, एकता और स्वायत्तता की हिफाजत करते हुए एक सम्मानजनक समझौते की उम्मीद करता है। ईरानी पक्ष से आई खबर से उम्मीद बनी थी कि शांति करीब है । चूंकि, दुनिया में एक-दो राष्ट्रप्रमुख ऐसे हैं, जिनकी बातों पर अब यकीन नहीं किया जाता। उसमें अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक हैं। इसलिए ट्रंप के डील की घोषणा को शक की नजर से देखा जा रहा था। इजरायली मोसाद के षड्यंत्रकारी और धोखेबाज अतीत को देखते हुए इरान इन पर यकीन नहीं करता है।
लेकिन 15 जून को जिस डील का एलान हुआ है, उसके बाद विश्व मंच पर न युद्ध के पहले का अमेरिका बचा है न ईरान। आश्चर्य है, साढ़े तीन महीने में ही विश्व शक्ति संतुलन इस कदर बदल जायेगा, शायद किसी को भी ऐसी कल्पना नहीं रही हो।
युद्ध और शक्ति संतुलन यहां एक बात स्पष्ट है कि अमेरिका ईरान के बीच 19 जून को जिनेवा में होने वाले समझौते के समय राजनीतिक वातावरण और शक्ति संतुलन सर्वथा बदला हुआ होगा। इस समय अमेरिकी लाॅबी हताशा और अराजकता का शिकार है। वहीं एकजुट ईरान दृढ़ता के साथ वार्ता के मंच पर अपनी शर्तों को लागू कराने में कामयाब होता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी डायनासोर यूएई से लेकर कुवैत, कतर, बहरीन, सउदी अरब, जार्डन, इजरायल तक जगह-जगह घायल और छितराया हुआ है। पश्चिम एशिया का अमेरिकी ब्लॉक बिखर गया है। वहीं भारी कीमत चुकाने के बाद भी ईरान और इरानी धुरी का मनोबल बढ़ा हुआ है। राष्ट्रपति ट्रंप चाहे जो भी डींग हांके, उन्हें सभी पैमाने पर पीछे हटना पड़ा है। वे घोषित लक्ष्य की तरफ एक इंच भी आगे नहीं बढ़ सके। वहीं युद्ध का पलटवार यह हुआ कि महाबली अमेरिका की अजेयता पर प्रश्न चिन्ह लग गया है । जिस इसराइल को अजेय, अभेद्य तथा स्मार्ट टेक्नोलॉजी वाला मुल्क माना जा रहा था, आज इजरायली साख और आतंक पश्चिमी एशिया में खत्म होता दिखाई दे रहा है। अनेक भू-राजनीति विशेषज्ञ इस बात का दावा करने लगे हैं, कि दुनिया बहु ध्रुवीय हो चली है और अमेरिकी वर्चस्व के अंत की घोषणा अमेरिका के हाथों लिखी पटकथा द्वारा हो रही है।
युद्ध और पश्चिम एशिया इस युद्ध ने पश्चिम एशिया में न सिर्फ राजनीतिक संतुलन डगमगा दिया, बल्कि खाड़ी के मुल्कों के राजनीतिक और नागरिक चेतना को पूरी तरह से बदल दिया है। युद्ध के पहले जहां अवाम में एक हद तक शिया बहुल ईरान के प्रति नकारात्मक माहौल था। वही अब ईरान के पक्ष में हमदर्दी बढ़ गई है। अभी तक अमेरिका जीसीसी के मुल्कों का संरक्षक और संचालक था । अब अमेरिका के इस स्थिति को धक्का लगा है। आम पश्चिम एशियाई नागरिक समझने लगे हैं कि अमेरिकी छतरी के नीचे उसकी सुरक्षा संभव नहीं है । चूंकि जीसीसी मुल्क अभी भी मध्ययुगीन बादशाहत के अधीन शासित हैं । जो अवाम की लोकतांत्रिक चेतना से डर कर अमेरिकी छतरी के नीचे सुरक्षित महसूस करते थे । लेकिन अमेरिकी संरक्षण में गाजा में इजरायली बर्बरता ने मुस्लिम अवाम की चेतना में गुणात्मक बदलाव किया है। यही कारण है की धुर ईरान विरोधी देश भी अब अपनी स्थिति बदलने लगे हैं । अमेरिकी दबाव में एक-एक करके खाड़ी के मुल्क अब्राहम एकार्ड पर हस्ताक्षर कर रहे थे। यह प्रक्रिया रुक गई है । हो सकता है कि यह उलटी दिशा में मुड़ जाए । जो खबरें छनकर आ रही है, वह कुछ और ही संकेत दे रही है। ख़बर है कि कटृर ईरान विरोधी यूएई ईरान को खुश करने के लिए 30 अरब डालर की सुरक्षा रकम देने जा रहा है। संभवत 20 अरब डॉलर दिया जा चुका है। वही कतर और सऊदी अरब ने अपनी पोजीशन बदल ली है। तुर्किए प्रो ईरान पहले से था। सिर्फ जॉर्डन, बहरीन और कुवैत जैसे देश हैं, जो अभी अमेरिका-इजरायल के साथ खड़े हैं। ओमान, यमन के हूती और लेबनान का हिजबुल्ला पहले से ही ईरानी धुरी के साथ थे। वार्ता में ईरान द्वारा लेबनान और गजा के पक्ष में दृढ़ निर्णय लेने के कारण इन मुल्कों में ईरान की प्रतिष्ठा बढ़ी है। स्पष्ट है कि खाड़ी बदल रही है । अवाम की चेतना के बदलने और नये विश्व व्यवस्था के संकेत से खाड़ी के भू-राजनीति पर असर पड़ा है।
ईरानी युद्ध रणनीति अमेरिकी-इजरायली हमले में पहली पंक्ति के नेतृत्व के मारे जाने के बाद ईरानी पलटवार ने अरब राष्ट्रवाद को नया आयाम दिया। पिछले 80 वर्षों में इजराइली अमेरिकी गिरोह ने जिस तरह से खाड़ी में मुस्लिम मुल्कों के आत्मसम्मान को रौंदा है । लाखों फिलिस्तीनियों की हत्या की । उन्हें दरबदर किया और शरणार्थी बनकर जीने के लिए मजबूर किया है। लेबनान सीरिया मिश्र पर हमले करके उनके क्षेत्रों को हड़प लिया है। उससे अवाम के अंदर इस दुष्ट गिरोह के खिलाफ जनआक्रोश पल रहा था। ईरानी एक्सिस के प्रतिरोध ने जनआक्रोश को मुखर होने का मौका दिया। जिससे विभिन्न देशों के अवाम का युद्ध विरोधी आक्रोश सड़कों पर फूट पड़ा। आईआरजीसी ने इसराइल पर हमले के साथ-साथ अरब देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर हमले किये थे । जिसमें कतर बहरीन कुवैत यूएएई जार्डन सऊदी अरब के अमेरिकी सैन्य ठिकाने हैं। ईरान ने इन देशों के अवाम के नाम संदेश जारी करते हुए कहा कि हमारे ऊपर इन देशों केअमेरिकी सैन्य अड्डों से हमले किए गए । इसलिए हमने उन्ही ठिकानों पर जबावी हमला किया है। अगर आगे भी इन देशों के अमेरिकी सैनिक अड्डों से हमारे ऊपर हमला हुआ तो हम जबाब देंगे। अमेरिका के खिलाफ ईरानी कार्रवाई से अरब राष्ट्रवाद को नया आवेग मिला। इस नई स्थिति से इन मुल्कों के बादशाहों को पीछे हटना पड़ा।ऐसा लगता है कि खाड़ी की अवाम इस दिन का इंतजार कर रही थी। जब कोई अमेरिका और इजरायल के द्वारा किए गए इस्लामिक मुल्कों के अपमान का बदला लेने के लिए आगे आए।जनदबाव के कारण जीसीसी के मुल्क सीधे ईरान पर हमले से बचने लगे। जबकि ईरानी हमले से कतर में गैस उत्पादन बंद हो गया और यूएई का पर्यटन उद्योग ठप हो गया।
इस युद्ध में तकनीक और हथियार आपस में टकराते रहे थे । यही नहीं भारी भरकम और महंगे हथियारों के मुकाबले छोटे हथियार ज्यादा कारगर सिद्ध हुए। यूक्रेनी ड्रोन ने युद्ध में रुस के खिलाफ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हल्के और सस्ते ड्रोन से युद्ध का चरित्र ही बदल गया। छोटी मिसाइल रोधी सिस्टम और हल्के ड्रोन ईरान के मुख्य शस्त्र बन गये। ईरान ने इस तकनीक का दक्षता पूर्वक प्रयोग किया ।अमेरिका के भारी भरकम हथियार युद्ध के लिए इतने महंगे साबित हुए कि अमेरिका में आर्थिक संकट बढ़ गया । वहां महंगाई का नया दौर शुरू हुआ। इस युद्ध में अर्थव्यवस्था की गाड़ी को पंचर करने के नये मोर्चे खोले गए। इसके लिए ईरान ने अपनी भौगोलिक स्थिति का भरपूर लाभ उठाया।
होर्मुज की नाकेबंदी ईरानी हुर्मुज में सैन्य रणनीति की दृष्टि से बरतरी की स्थिति में है। ईरान ने होर्मुज को बंद करके दुनिया में तहलका मचा दिया। इसका कारण था दुनिया के कच्चे तेल की 20% से ज्यादा और 60 % गैस आपूर्ति इसी रास्ते से होती है । ईरान ने होर्मुज नाकेबंदी को बतौर हथियार इस तरह से प्रयोग कि अमेरिकी रणनीतिकार हतप्रद रह गए। हूतियों ने लाल सागर में अवरोध खड़ा करके अमेरिकी लाॅबी को नई चुनौती दे डाली । ऐसा लगता है कि अमेरिकी रणनीतिकारों ने इस सूरते हाल की कल्पना नहीं की थी । घबराहट में अमेरिका ने समुद्री नाकेबंदी की कोशिश की। लेकिन वह ईरानी रणनीति का जवाब नहीं था । एक हफ्ते में ही दुनिया में तेल और गैस के लिए हाहाकार मच गया । चारों तरफ अफरा-तफरी थी । भारत पर इसका तत्काल असर हुआ । क्योंकि 20% तेल के साथ 60% से ज्यादा गैस हम फारस की खाड़ी से मंगाते थे।मजबूर होकर रुसी तेल आयात करने के लिए अमेरिका से इजाजत मांगनी पड़ी । अमेरिका ने भारत को 30 दिन तक तेल आयात की छूट दे दी। हमें दुनिया के मंच पर शर्मिंदा होना पड़ा और संप्रभुता को लेकर सवाल खड़े हो गए।
डी डॉलराइजेशन इस युद्ध ने तेल आयात के लिए डॉलर की जगह वैकल्पिक मुद्रा के लिए दरवाजे खोले। ईरान ने युवान में तेल निर्यात का फैसला लिया। यह चीन के लिए अवसर था। जिससे डॉलर के मुकाबले युवान वैकल्पिक मुद्रा बना। अमेरिकी ज्ञान तकनीक आधुनिक एफ-35 लड़ाकू विमान और थाड मिसाइल से ज्यादा शक्तिशाली पेट्रोल डॉलर है। जिसके द्वारा अमेरिका दुनिया को कंट्रोल करता है। युद्ध में अमेरिकी नाभि के अमृत “पेट्रोल डॉलर ” पर हमला मारक साबित हुआ। जिससे अमेरिकी साम्राज्य हिल गया। पूंजी की ताकत उसकी नाभि में छिपे ‘मुनाफा ‘ नामक अमृत को अगर सुखा दिया जाए, तो वह अपने आप मुरझा जायेगी। परिणाम स्वरूप डीडारलाइजेशन की मार से अमेरिका को युद्ध विराम का एलान करना पड़ा। सच तो यह है कि अमेरिका हार चुका था। यही से अमेरिकी बादशाहत ढलान पर सरपट फिसलने लगी है।
खाड़ी में बदलता शक्ति संतुलन ईरान अमेरिका में युद्ध विराम से खाड़ी में शक्ति संतुलन बदल जाएगा । अभी तक अमेरिका की खाड़ी रणनीति के केंद में था इसराइल । जिसको केंद्र कर खाड़ी के देशों के साथ अमेरिकी संबंध बनते-बिगड़ते थे। पिछले 50 वर्षों से अमेरिका ईरान के विरुद्ध आर्थिक, राजनीतिक युद्ध छेड़े हुए है। वह ईरान को अलगाव में डालने की रणनीति पर अमल करता रहा है । एब्राहम एकॉर्ड द्वारा अमेरिका खाड़ी में अपनी स्क्रिप्ट को नया रूप दे रहा था। युद्ध शुरू होने के पहले सऊदी अरब अब्राहम एकार्ड पर साइन करने वाला था। युद्ध के दौरान अमेरिका ने पाक पर भी दबाव डाला कि वह एकार्ड में शामिल हो जाए। जिससे पाकिस्तान ने इनकार कर दिया ।
इसराइली मार्ग के आखिरी अवरोध हटाने के चक्कर में अमेरिका वह गलती कर बैठा जिसने खाड़ी सहित दुनिया में नये शक्तियों के लिए दरवाजे खोल दिए । जो पिछले एक दशक से विभिन्न तरीके से अपनी दावेदारी पेश कर रही थी। उन्होंने इस युद्ध में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विशेषज्ञों के अनुसार चीन नई सुपर पाॅवर बनने की स्थिति में पहुंच गया है। युद्ध के दौरान चकित कर देने वाली उसकी तकनीकी क्षमता का बार-बार एहसास विश्व को हुआ। चीनी और रूसी सहयोग के कारण ईरान युद्ध जारी रख सका। समझौते के बाद ईरान खाड़ी का सुपर पाॅवर बनने जा रहा है। भौगोलिक विस्तार, बौद्धिक सम्पदा, सभ्यतागत ताकत और दृढ़ साम्राज्यवाद विरोधी राष्ट्रवाद की अवस्थिति ने ईरान को खाडी का नेता बना दिया है। सऊदी अरब, यूएई से लेकर जॉर्डन तक कोई भी ईरान का विकल्प बनने की स्थिति में नहीं है। इसलिए आने वाले समय में ईरान विश्व बिरादरी का महत्वपूर्ण अंग होने के साथ खाड़ी का नेतृत्व भी कर सकता है।
देखना यह है, कि अमेरिका, इजरायली अनिवार्यता से कितना बाहर निकल पाता है। अगर इसराइल को ईरानी एक्सिस के साथ किसी समझौते के लिए मजबूर होना पड़ता है। तो उसी क्षण से इजराइल को अपने हद में रहना होगा। उसे साम्राज्यवादी लठैत और विस्तारवादी नीति को तिलांजलि देकर पड़ोसी मुल्कों के साथ समन्वय, सहयोग और संसर्ग में ही अपने अस्तित्व को तलाशना होगा। हालांकि यह सब अभी भविष्य के गर्भ में है। लेकिन परिस्थितियां इसी दिशा में आगे बढ़ रही है। हां,300अरब डॉलर के ईरानी निवेश का टुकड़ा फेंक कर अमेरिका एक बार फिर ईरानी नेतृत्व को अपने जाल में फसाना चाहता है। देखना यह है कि वर्तमान ईरानी रीजीम इस खतरनाक चाल से कैसे बाहर निकलता है । चाहे जो हो। इतिहास बहुध्रुवीय दुनिया के रास्ते पर आगे बढ़ चुका है।
समझौता या एमओयू जो खबरें आ रही है उसमें स्थाई युद्ध बंदी होगी। ईरान के संप्रभुता का सम्मान होगा और उसके आंतरिक मामले में दखलअंदाजी बंद होगी। उस पर लगाए गए सभी प्रतिबंध हटाए जाएंगे। ज़ब्त संपत्ति वापस होगी। होर्मुज को खोल दिया जाएगा। बाद के दिनों में ओमान और ईरान मिलकर संयुक्त योजना बनाएंगे। लेबनान को भी एक समझौते में शामिल किया जाएगा। अमेरिका समुद्र ब्लॉकेड हटा लेगा। समझौते को अंत में सुरक्षा काउंसिल द्वारा अप्रूव किया जाएगा। ईरान के साथ आगे परमाणु ऊर्जा या यूरेनियम संवर्धन पर वार्ता जारी रहेगी। यह सब ऐसे मुद्दे हैं जो बता रहे हैं कि अमेरिका को पीछे हटना पड़ा है । अमेरिका अपने घोषित चार लक्ष्यों में से एक भी हासिल नहीं कर सका है ।जहां तक परमाणु हथियार निर्माण का सवाल है। उसने हमेशा एटॉमिक पावर बनने से इनकार किया है। खाड़ी से संबद्ध सभी देश ईरान के पुनर्निर्माण में मदद करेंगे। अमेरिका 300 अरब डॉलर के निवेश का आश्वासन दिया है। समझौते के जो बिंदु सामने आ रहे हैं । उससे स्पष्ट है कि ईरान को पीछे नहीं हटाया जा सका है और अमेरिका सफलता नहीं मिल सकी है ।
ईरान को तबाह और बर्बाद करने के संकल्प के साथ युद्ध में उतरा अमेरिका इज़राइली गठजोड़ खाड़ी के मुल्कों का नेतृत्व ईरान के हाथ में सौंप कर वापस जा रहा है ।
यही नहीं इस युद्ध ने अमेरिकी बादशाहत पर प्रश्न लगा दिया है और सुदूर पूर्वी एशिया में बैठा भावी महाशक्ति पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना मुस्करा रहा है। पेरिस में चल रहे जी-7 देशों के मध्य घुमा फिरा कर चीनी महाशक्ति को चुनौती देने की रणनीति जिस तरह से बार-बार चर्चा के केन्द्र में आ जा रही है, उससे यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है।
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