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साहित्य-संस्कृति

“ अरुण प्रकाश ने अपने युग की छोटी-छोटी अनुगूँजों को अपनी रचनाओं में सहेजा ”

बेगूसराय। जनवादी लेखक संघ, बेगूसराय जिला इकाई द्वारा हिन्दी के लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार अरुण प्रकाश के स्मृति-दिवस पर बिहार राज्य अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ भवन में सेमिनार का आयोजन किया गया। सेमिनार का विषय था- ‘अरुण प्रकाश का साहित्यिक अवदान’। इसकी अध्यक्षता अभिनंदन झा ने की जबकि डॉ० निरंजन कुमार ने संचालन किया।

चर्चित रंगकर्मी कुॅंवर कन्हैया के जनवादी गायन से कार्यक्रम की शुरुआत की गयी।

युवा पत्रकार पुष्पराज ने सेमिनार में विषय-प्रवर्तन करते हुए कहा कि अरुण प्रकाश बिहारी माटी के गौरव और बेगूसराय जनपद की शान हैं। हिन्दी कहानी में फणीश्वरनाथ रेणु के बाद अरुण प्रकाश की कहानियों में अपनी माटी की सोंधी गंध महसूस की जा सकती है। ऐसे रचनाकार का स्मरण कर हमें अपनी सांस्कृतिक विरासत का सम्मान करना चाहिए।

मुख्य वक्ता के रूप में ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय दरभंगा के पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो० डॉ० चन्द्रभानु प्रसाद सिंह ने कहा कि अरुण प्रकाश का कविता संग्रह ‘रक्त के बारे में’ 1973 में प्रकाशित हुआ था। उस संग्रह की हर कविता और उनकी जो 12 कहानियाँ चर्चित हुईं, उनका मैं प्रथम पाठक था। वे अपने से वरिष्ठ के प्रति अत्यधिक सम्मान का भाव रखते थे। उन्होंने ही कविवर रामेश्वर प्रशांत जी से मेरा परिचय कराया था।

उनका कहना था कि अरुण प्रकाश का जीवन जैसे अनिश्चित मार्ग में बढ़ता रहा, वैसे ही उनका लेखन भी अनिश्चित पथ पर चलता रहा। कविता लिखते हुए आगे बढ़े तो कहानी के साथ -साथ फिल्मों की पटकथा लिखते हुए, दूरदर्शन के ‘परख’ के 450 से ज्यादा स्क्रिप्ट लिखे। कहानीकार स्वयं प्रकाश,अरुण प्रकाश और उदय प्रकाश समानांतर कहानी की त्रयी हैं। पंजाब में खालिस्तानी आतंकवाद के समय जब बिहार के मजदूर पंजाब छोड़कर भाग रहे थे , उसी समय अरुण प्रकाश ने ‘भैया एक्सप्रेस’ कहानी लिखी। उन्होंने क्रोनी कैप्टीलिज्म के दौर में शासन से भ्रष्टाचारियों के गठजोड़ को समझ लिया था, जिसे वे ‘बेला एक्का लौट रही हैं’ कहानी में दर्ज करते हैं। उन्होंने ‘इंडियन एक्सप्रेस समूह’ के लिए 5 वर्ष तक बिजनेस कॉलम लिखा। वे सरकार के द्वारा सड़कों की विकास-योजनाओं को जन विरोधी मानते थे। अपने समय की छोटी-छोटी अनुगूँजों को सहेजना साहित्य की जिम्मेदारी है। एक साहित्यकार के रूप में अरुण प्रकाश ने अपनी इस जिम्मेदारी का बखूबी निर्वाह किया।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी के हिन्दी प्राध्यापक डॉ० रामाज्ञा राय ‘शशिधर’ ने कहा कि मनुष्य विरोधी मूल्य समाज में बिखरे पड़े हैं। सत्ता का अमानवीय चरित्र जनजीवन को त्रस्त कर रहा है। संगठित संघर्ष की कमजोर उपस्थिति के दौर में छोटे, असंगठित और व्यक्तिगत संघर्ष जारी है। अरुण प्रकाश की कहानियों में इसके शब्द-चित्र मिल जाते हैं। उनकी कहानियाँ किसी एक शैली में नहीं बॅंधी हैं, बल्कि हर का अलग और स्वतंत्र व्यक्तित्व नई भाषा, नई संरचना और आंतरिक गतिशीलता के सहारे निर्मित किया गया है।

जनवादी लेखक संघ, बिहार के सचिव कुमार विनीताभ अरुण प्रकाश केन्द्रित आलेख का पाठ करते हुए कहा कि यद्यपि अरुण प्रकाश ने अपने लेखन की शुरुआत कविता से की थी, तथापि कालांतर में उनकी ख्याति एक कुशल गद्यकार के रूप में हुई। उन्होंने अपने अहर्निश संघर्षों और सकारात्मक सरोकारों के बूते लेखन के क्षेत्र में फर्श से अर्श तक की यात्रा की। उनका जन्म बेगूसराय जिलान्तर्गत तेघरा प्रखंड के निपनियाॅं गाँव में हुआ था। वे प्रसिद्ध समाजवादी नेता और राज्यसभा के भूतपूर्व सदस्य रुद्र नारायण झा के ज्येष्ठ पुत्र थे। उन्होंने स्नातक प्रबंध, विज्ञान और पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा की शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने कुछ वर्षों तक हिन्दुस्तान उर्वरक कारखाना, बरौनी में अतिथिशाला- प्रबंधक के पद पर कार्य किया, फिर हिन्दी अधिकारी होकर दिल्ली चले गए। वे बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार थे।

जन संस्कृति मंच के राज्य सचिव दीपक सिन्हा ने कहा कि अरुण प्रकाश का साहित्यिक अवदान विपुल है, जिनमें प्रमुख हैं- ‘भैया एक्सप्रेस’, ‘जलप्रांतर’, ‘मंझधार किनारे’, ‘लाखों के बोल सहे’, ‘विषम राग’, ‘स्वप्न घर’, ‘नहान’ (कहानी संग्रह), पूर्व राग, कोंपल कथा (उपन्यास), ‘गद्य की पहचान’, ‘उपन्यास के रंग’, ‘कहानी के फलक’ (आलोचना) , ‘रक्त के बारे में’ (कविता संग्रह)। इसके अलावा हिन्दी से अंग्रेजी में आठ पुस्तकों का अनुवाद किया। पहले नव जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा, फिर जन संस्कृति में निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

रंग अभियान के निर्देशक अनिल पतंग ने कहा कि अरुण प्रकाश साहित्य अकादमी की पत्रिका ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ के कई वर्षों तक संपादक रहे। वे हिन्दी अकादमी दिल्ली से ‘साहित्यकार सम्मान’ और ‘कृति पुरस्कार’, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद से ‘रेणु पुरस्कार’ बेगूसराय प्रशासन से ‘दिनकर राष्ट्रीय सम्मान’ सहित अनेक सम्मानों से सम्मानित हुए।

जनपद के चर्चित रंगकर्मी रवि रंजन ने कहा कि अरुण प्रकाश अनेक धारावाहिकों, वृत्तचित्रों तथा टेली-फिल्मों के लेखन से सम्बद्ध रहे। उन्होंने मुझे लिखने के लिए प्रेरित किया।मैंने खगड़िया गोलीकांड के बाद अरुण प्रकाश जी को ढोलक बजाते भी देखा। पंजाब के प्रसिद्ध संस्कृतिकर्मी गुरुशरण सिंह की टीम के एक कलाकार को खालिस्तान समर्थकों ने गोली मारकर पेड़ में टाॅंग दिया था। शहीद कलाकार की पत्नी आई थीं और बेगूसराय से फर्टिलाइजर तक पैदल जुलूस के बाद पंजाब से आए कलाकारों का नाटक हुआ था। इस अभियान का नेतृत्व अरुण प्रकाश ने किया था।

अरुण प्रकाश के अनुज तथा प्रसार भारती से अवकाशप्राप्त संगीत- नाटक निर्देशक चंद्रप्रकाश झा ने कहा कि मेरे पिता की मौत के बाद मेरे बड़े भाई को विरासत में तीन अलमीरा किताबें मिली थीं। पिताजी ने उन किताबों को पढ़ कर राजनीति की। बड़े भाई उन किताबों को पढ़कर साहित्यकार बने। वे स्वाभिमानी थे।सादगी पसंद थे। उन्हें दिखावा पसंद नहीं था।

अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए अभिनन्दन झा ने फर्टिलाइजर संस्थान में नौकरी के दौरान अरुण प्रकाश के साथ अपने सरोकारों की विस्तार से चर्चा करते हुए हिन्दी साहित्य और बेगूसराय के सांस्कृतिक परिदृश्य में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका का स्मरण दिलाया। इस मौके पर ‘समय सुरभि अनंत’ के संपादक नरेंद्र कुमार सिंह, पत्रकार प्रवीण प्रियदर्शी, साहित्यकार मुकेश कुमार, अवध बिहारी, उपेन्द्र राम, प्रभा कुमारी, दीपक कुमार, भुवनेश्वर प्रसाद सिंह, संजीव फिरोज, विनोद बिहारी आदि ने अपने उद्गार व्यक्त करते हुए अरुण प्रकाश के साहित्यिक अवदान को महत्वपूर्ण बताया।

कवयित्री और नगर निगम के वार्ड नं० 35 की पार्षद शगुफ्ता ताजवर ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर संस्कृतिकर्मी देवेंद्र कुॅंवर, केदार नाथ भास्कर, चंदन वत्स, कमल वत्स, कर्मचारी महासंघ के जिला मंत्री मोहन मुरारी, अनिल गुप्ता, रामानंद सागर, शंकर मोची, किसान सभा के सचिव दयानिधि चौधरी, बेगूसराय के पूर्व उप प्रमुख सूर्य नारायण रजक, बी० एस०एस०आर० यूनियन के राज्य नेता आर० एस० राय, नवनीता कुमारी, महमूद आलम, मो० शाहरुख़ समेत कई साहित्यप्रेमी मौजूद थे।

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