समकालीन जनमत
ख़बर

पटना में चौथा गोरख पांडेय स्मृृृति आयोजन : गोरख के गीतों-कविताओं का पाठ और गायन

मुल्क को फासीवादी शक्तियों से बचाना जरूरी: प्रेम कुमार मणि

पटना. ‘‘ कोई भी देश वहां के लोगों से बनता है। आजादी के आंदोलन के दौरान हमारे नेताओं, विचारकों और साहित्यकारों ने एक ऐसे देश का सपना देखा था, जहां किसी तरह का शोषण, अन्याय और असमानता न हो। लेकिन आज हमारे मुल्क में कई तबके असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। मुल्क बहुत ही मुसीबत की घड़ी में है, इसे फासीवादी शक्तियों से बचाना जरूरी है। शाहीनबाग से लेकर मुल्क के अन्य हिस्सों में औरतों ने आंदोलन का जो परचम उठा लिया है, वह लोकतंत्र और संविधान प्रदत अधिकारों का आंदोलन है।’’

हिरावल, जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित चौथा गोरख पांडेय स्मृृति आयोजन का उद्घाटन करते हुए कथाकार और विचारक प्रेम कुमार मणि ने ये विचार व्यक्त किए। प्रेमचंद रंगशाला परिसर में आयोजित इस आयोजन का थीम  ‘ उठो मेरे देश ’ था, जो गोरख पांडेय की एक लंबी कविता का शीर्षक भी है।

अपने वक्तव्य में प्रेम कुमार मणि ने कहा कि गोरख बेहद संवेदनशील कवि थे। उन्होंने दबे-कुचले, शोषित और मेहनतकश लोगों के पक्ष में कविताएं लिखीं। वे नई खूबसूरत दुनिया बनाना चाहते थे।
संचालन जसम के राज्य सचिव सुधीर सुमन ने किया।

उद्घाटन के बाद शाहीन ने गोरख पांडेय की गजल ‘ हम कैसे गुनाहगार हैं, उनसे न पूछिए/ वे अदालतों के पार हैं उनसे न पूछिए ’ को गाकर सुनाया। हिरावल की प्रीति प्रभा और ब्यूटी ने लोकगीत ‘ छापक पेड़ छिउलिया ’, विजेंद्र अनिल के जनगीत ‘ हम तोसे पूछी ला जुल्मी सिपहिया ’ और गोरख पांडेय के मशहूूर जनगीत ‘ गुलमिया अब हम नाहि बजइबो, अजदिया हमरा के भावेला ’ को गाकर सुनाया।

इस मौके पर 25 कवियों ने अपनी कविताओं का पाठ किया। देश भर में राज्य प्रायोजित उन्माद और नफरत की घटनाओं के खिलाफ ज्यादातर कवि संवेदित दिखे। शायर संजय कुमार कुंदन ने अपनी गजल में कहा- हम सब तो खड़े हैं मकतल में/ क्या हमको खबर इस बात की है। उन्होंने यह भी कहा कि कातिल तारीख की गुंबद से अब नफरत को देते हैं सदा/ गर यूं ही हम छाया रहा उनका नशा, हम सब कातिल कहलाएंगे। सुधाकर रवि ने अपनी कविता में कहा- मसीहाई आग पर चलने या पहाड़ पर समाधि लेने से नहीं आती।

नताशा ने अपनी कविता ‘इन दिनों’ में कहा कि इन दिनों मेरा नाम पूछोगो-/शाहीनबाग बताउंगी। अंचित ने कहा कि कवि होने का समय चला गया, कविता होने का समय आ गया है। कवि और कथाकार रणेंद्र ने आदिवासियों के हक-अधिकार से जुड़ी अपनी कविताओं का पाठ किया, तो मंजरी ने स्त्री आजादी के पक्ष में आवाज बुलंद किया।

आयोजन में प्रशांत विप्लवी, राखी सिंह, परितोष, ओसामा खान, नरेंद्र कुमार, प्रत्युषचंद्र मिश्र, राकेश दिवाकर, सुमन कुमार सिंह, राजेश कमल, रघुनाथ मुखिया, उत्कर्ष, शशांक मुकुट शेखर, अरविंद पासवान के साथ युवराज, मंजरी, राज भूमि, शारीक असीर जैसे नए कवियों ने भी अपनी कविताओं के जरिए आज के समय, समाज, राजनीति पर कई कोणों से सवाल उठाए तथा आजादी, प्रेम-भाईचारा, बेहतर समाज और दुनिया के सपनों को अभिव्यक्ति दी।

इस मौके पर हिरावल के कलाकारों ने गोरख पांडेय की लंबी कविता ‘स्वर्ग से विदाई’ का सामूहिक पाठ किया। आयोजन का समापन उनके ही एक लोकप्रिय गीत ‘वतन का गीत’ के गायन से हुआ। संतोष झा, सुमन कुमार, मृत्युंजय आदि गायन में शामिल थे। इस मौके पर संजय उपाध्याय, सत्येंद्र जी, मार्तंड प्रगल्लभ  आदि भी मौजूद थे।

Related posts

Fearlessly expressing peoples opinion

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More

Privacy & Cookies Policy