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कविता

रोज़ी कामेई की कविताएँ सभ्यता को स्त्री की नज़र से देखने का प्रस्ताव हैं

बसंत त्रिपाठी


रोज़ी की कविताओं का संसार एक स्त्री की असंख्य उलझनों, सपनों और उम्मीदों में डूबते-उतराते निर्मित हुआ है.

प्रेम इन कविताओं के केन्द्र में है. लेकिन इस प्रेम में भी स्त्री-जीवन के सपनों और उलझनों का ताना-बाना है. दुनिया का साहित्य प्रेम में समर्पण को महिमामंडित करने के असंख्य काव्यात्मक और दार्शनिक उक्तियों और विचारों के उदाहरणों से भरा पड़ा है. लेकिन ज़रूरी नहीं कि एकनिष्ठता और समर्पण का वही रूप स्त्रियों द्वारा रचे साहित्य में भी उसी तरह दिखे.

भाव और विचार सार्वभौम नहीं बल्कि परिवर्तनशील और जीवन-समाज सापेक्ष होते हैं. निजी अनुभव और सोच के बिंदु उसे नए ढंग से गढ़ते और विकसित करते हैं. रोज़ी जब मृत्यु-शय्या पर पड़े प्रेमी के लिए ‘जलता हुआ कोयला’ हो जाने की इच्छा प्रकट करती है तो अनायास लगता है कि यह प्रेम कविता होते हुई भी बहुत अलग है. इसी तरह बिछुड़े हुए प्रियतम से अपना भुला-बिसरा सबकुछ ले जाने की बात कहती है. यहाँ तक कि माँ और पिता पर कविता लिखते हुए भी वह उनके दिल और चेहरे में दिखती-छिपती पीड़ा की रेखाओं को याद करती हैं. अव्यक्त यातना को इतनी संजीदगी से समझ और रख पाने की उत्कट इच्छा हम रोज़ी की इन कविताओं में देख सकते हैं.

रोज़ी की कविताओं में इंतज़ार का कभी खत्म न हो पाने वाला संसार है. और उस पर कथित पुरुषत्व का दंभ छाया हुआ है. अपनी दो पंक्तियों की छोटी-सी कविता में इस इंतज़ार की तड़प और खीझ का जो रूप उन्होंने रचा है वह सचमुच व्यथित करता है और सभ्यता को स्त्री की नज़र से देखने का प्रस्ताव भी करता है –
स्त्री की दिन भर की थकान पर भी रहता है
एक दंभी पुरुष के स्वाभिमान का वर्चस्व !!

रोज़ी ने अपनी इन कविताओं के अलग से शीर्षक नहीं दिए हैं. जाहिर है कि ये एक ही मूड की कविताएँ हैं. उनकी भाषा बेहद आत्मीय है. कभी कभी रोमेंटिक स्पर्श लिए हुए भी है. जैसे कॉफी के गहरे रंग का कारण इसमें अपनी स्याह रातों के गम और विस्तार पाती यादों की जड़ों का घुलना बताना. इसमें भी स्त्री का अंदरुनी संसार झलक जाता है. वे किसी वर्ग या समुदाय की बजाय समूची स्त्री को एकनिष्ठ जैविक और साथ ही सामाजिक इकाई की तरह देखती हैं. जिसका ताल्लुक स्त्री-विमर्श के घोषित एजेंडे से भी है. फिर भी ये देखना होगा विमर्श के दायित्व में अपनी आवाज़ मिलाने के साथ उन्होंने इन कविताओं में स्त्री-जीवन के उन सार्वभौमिक पहलुओं और द्वंद्वों को रेखांकित किया है जो कम या अधिक रूप में स्त्रियाँ अलग-अलग तरह से अनुभव करती हैं. ऊपर जिस दो पंक्तियों की कविता को उद्धृत किया गया है उसमें रोज़ी ने तीखे शब्दों में लगभग अनुभूत और प्रतिकार शैली में अपनी राय रखी है. वहीं दूसरी ओर उनकी शैली में एक भिन्न मुहावरा भी है. इसे इस छोटी-सी कविता में देख सकते हैं :
एक रूठी लड़की की कविता में होती है
उदास शामों में ठंडी होती चाय की प्याली
टूटे हुए तारों की हृदयस्पर्शी उदास धुनें
जलते-बूझते कोयले की असहनीय पीड़ा
जूड़े में खुंसी चम्पा की मृत्यु का दर्द
और एक शिशु की बेहद मीठी किलकारी
जो धारण कर लेती है टुकड़ों में विभक्त ‘अभाव’ !!

रोज़ी की ये कविताएँ दिनचर्या की आदतों और आकांक्षाओं से निर्मित हुई हैं. चाहे वह ठंडी होती चाय की प्याली हो या टूटे हुई तारों की उदास धुनें, चाय की चुस्की या शक्कर की मिठास, स्वेटर के फंदें हों या स्त्री के बूढ़े होते सपने; सबकुछ जैसे उनके जीवन के भीतर से गुज़र कर कविता में प्रकट होता है. यह उनकी नितांत निजी अनुभवों की सामाजिक अभिव्यक्ति है.

ऐसी अभिव्यक्ति, जिसमें निजता और सामाजिकता के बीच की रेखा मिट गई है. एक दूसरे से एकाकार हो गई हैं. इसलिए उनकी कविताएँ इतनी पारदर्शी और साथ ही अंतःस्थल में मची खलबली का काव्यात्मक रूपांतरण प्रतीत होती हैं. वे कहती भी हैं :

तुम ढूंढ़ना मुझे मेरी ही कविताओं में
तमाम उदासी के बीच मेरी एक हँसी
खामोशी भरे शब्दों में मेरा वजूद भी
एक मौन के साथ तुम्हें वहीं मिलेंगे

रोज़ी संभावनाशील कवयित्री हैं. यद्यपि कविता के अंत में अपने आत्मकथ्य में उन्होंने कहा है कि वे ‘छोटी-मोटी कविताएँ यूँ ही लिखती हैं. लेकिन साथ ही स्वार्थ भरे संसार में कविताओं के प्रति जो आस्था व्यक्त की है. इससे यह पता चलता है कि कविता उनका शौक नहीं स्वभाव है. कविता की दुनिया में उन्हें मज़बूती से आगे बढ़ना चाहिए. रोज़ी की इन कविताओं के पाठक उनकी अगली कविताओं का इंतज़ार ज़रूर करेंगे.

 

रोज़ी कामेई की कविताएँ

1.
दरवाज़ा बंद करते जाना……..धड़ाक…. !
शांति है यहाँ अब ……. बिल्कुल
असमय चले गए …… जल्दी थी !
ठहर कर जाते …… पता तो लगता तुम्हें तुम्हारे महक से दमकता है मेरा कमरा ।

तुम्हारी चाय की प्याली, देखो !
सजाए है मेरे होठों की नरमाहट
तुम्हारे होठों की तपस
मेरे ह्रदय में सुलगती जाती है ।

अगली बार आ रहे हो न ?
ठंडी लगती है मुझे
थोड़ी गर्माहट लाना –
कमबख्त कमरे में सीलन है ।
अच्छा सुनो !
अब की बार आए हो तो
लेते जाओ अपना भूला – बिसरा
सब कुछ… हाँ सब कुछ …. अब कुछ न रहे – न मेरा तुझमें, न तेरा मुझमें !!

2.
मृत्यु शय्या पर पड़े प्रेमी ने पूछा –
आखिरी इच्छा क्या है? तुम्हारी प्रिय !

प्रियतम बोली –
बन पाऊँ तो बन जाऊँ
आधे-अधूरे जलता छूट गए – कोयले की तरह
बुझ सकूँ तो बुझ जाऊँ
आखिरी बार तुम्हें फिर से थोड़ी ऊष्मा देकर
बचा सकूँ तो बचा लूँ
तुम्हारी गर्मी, तुम्हारा स्पर्श, तुम्हारी साँस

और इसी तरह हमेशा ही –
बचाती रहे ! मेरी देह तुम्हारी देह को !!

3.
मेरी माँ
घंटों धागों में उलझी
माँ..
असंख्य पीड़ाएँ बुनती है ।।

बुनते- बुनते कुछ बुदबुदाती
जो न शब्द बन पाए और न ध्वनि
कितनी पीड़ाएँ ऐसी रही उनकी
जो धागों के साथ सिमटती चली गई।।

धागों के फेर में फंसी पीड़ाएँ
व्याकुल हैं बाहर आने को
पर माँ खूब भली-भांति जानती है
उन पीड़ाओं को कैसे बुनना है।।

चटक रंगों में पीड़ाएँ
मुँह फुलाए
बेबस सी जान पड़ती हैं।।

कभी उलझ पड़ती है उनके संग
माँ…
खूब आँख खपाकर फिर सुलझा लेती
एक अनवरत द्वंद है ..
माँ और धागों के बीच।।

धागों में कसती पीड़ाएँ
जानती हैं
कैसे लेना है आकार।।

माँ भी कभी हार नहीं मानती
सालों से उलझती धागों के संग आखिर
पीड़ाओं की मेखला तैयार कर लेती हैं।।

अब उनकी पीड़ाएँ भी
उम्र के फेर में उलझ रही हैं
धागे आकार लेकर
चटख हो रहे हैं
और
माँ
बूढ़ी …।।

4.
कल्पना करती हूँ
आज पिताजी होते तो
उनकी चेहरे की झुर्रियाँ
कैसी होती !!
उन झुर्रियों की रेखाओं में
कौन-सी रेखाएँ मेरे लिए होती
दुःख की, तकलीफ की, पीड़ा की
वे तमाम अनकहे शब्द और ध्वनि
जो रेखाओं में तब्दील होती गई !!
कल्पना करती हूँ
आज पिताजी होते तो
उनकी चेहरे की झुर्रियों में से अपनी
पीड़ाओं की रेखाएँ पहचान जाती मैं
उनकी आँख के नज़दीक पसरी वही
रेखाएँ बिल्कुल मुरझाई-सी मिलती
जो बरसों पहले मुझसे बिछड़ते वक़्त
बहुत गहरी और सख्त हो चली थी !!

5.
वो आखिरी पड़ाव ही था
जहाँ कुछ देर खिलकर
दम तोड़ दी नन्ही कली ने
हज़ारों कोशिशों के बावजूद
बचा न पाई अपनी जान
आखिरी सांस तक मौन
चुप्पी साधे विह्वल भाव से
करती रही इंतज़ार उसका
जो आने का वादा कर उससे
भुला चुका था कब से उसे
जड़ों के अंदर अपने प्राण
रोज़ सींचती रही वह पगली
जिस वादे पर भरोसा कर
उसकी आँखें नम-नम हो रहती
उसे गुमान था अपने इंतज़ार पर
अपने आज तक खिले रहने का
पर उस पगली को क्या मालूम था
मिट्टी में दफ्न धुंधले वही वादे सारे
जड़ों में उसके रोज़ जाने कब से
करते रहे थे मृत्यु का संचार !!

6.
भीड़ बहुत है मेरे आसपास
हर किस्म की भीड़ हैं यहाँ,
इंसानों की भीड़ से ज़्यादा
मुझे प्रिय हैं
‘शब्दों की अथाह भीड़’
जो ढूँढ लेती हैं हर बार मेरी अभिव्यक्ति !

7.
बारिश का गीलापन एक भय है
प्रेम की अतिरिक्तता का,
बारिश का गीलापन एक मुक्ति है
तुम्हारे और मेरे बीच पंक्तियों के संतुलन का।
निःशेष उठती तमाम धीमी-धीमी भाप,
उस लज्जित मंज़र की साक्षी हैं।

8.
एक रूठी लड़की की कविता में होती है
उदास शामों में ठंडी होती चाय की प्याली
टूटे हुए तारों की हृदयस्पर्शी उदास धुनें
जलते-बूझते कोयले की असहनीय पीड़ा
जूड़े में  खुंसी चम्पा की मृत्यु का दर्द
और एक शिशु की बेहद मीठी किलकारी
जो धारण कर लेती है टुकड़ों में विभक्त ‘अभाव’ !!

9.
और अंत में,
समाज के बनाए नियमों का निर्वाह करते
स्वतंत्रता और स्वच्छन्दता का फ़र्क करते
उपेक्षित और कुंठित होने का बोझ उठाए
ज़िम्मेदारियों और लाज-शर्म का गहना ओढ़े
ज़िन्दगी की धूप-छाँव में निरंतर आकार लेते
बेहद परिपक्व होकर वक़्त से बहुत पहले ही
एक स्त्री के अंतहीन सपने बूढ़े हो जाते हैं !!

10.
स्त्री की दिन भर की थकान पर भी रहता है
एक दंभी पुरुष के स्वाभिमान का वर्चस्व !!

11.
उस माँ की छवि ज़ेहन में हमेशा रहती है
जिनकी कीमती सोने की ज़ेवरों ने ले ली
आज कागजों के रूप में डिग्रियों का स्थान
उन्हीं की मुस्कुराहटों पर आज हमारी तमाम
सपने हर रिक्त स्थान में रंग भरती जाती है !!

12.
मोह कभी गया ही नहीं था
हां
कुछ और क्या ??
तेरा मोह
जब भी गिनी अपनी उंगलियां
तुम्हारी भी साथ होती हमराही
चाय की चुस्की के संग रोज़ तुम
शक्कर की मिठास सी घुलती जाती !!

13.
कॉफी का रंग
इतना गहरा क्यों होता है …
पता है ??
मैंने घोल रखी हैं
अपनी सारी स्याह रातों के गम
और
विस्तार पाती यादों की जड़ें।

14.
तुम ढूंढ़ना मुझे मेरी ही कविताओं में
तमाम उदासी के बीच मेरी एक हँसी
खामोशी भरे शब्दों में मेरा वजूद भी
एक मौन के साथ तुम्हें वहीं मिलेंगे

15.
जानते हो तुम्हारे जाने के बाद क्या हुआ?
एक गहरी साँस ली, थोड़ा मुस्कुराई
फिर
तुम ज़िन्दगी में इस तरह उतरते चले गए
जिस तरह
कलम अपना स्याह कागज़ पर हमेशा के लिए
अपना वज़ूद छोड़ता जाता !!

 

 

रोज़ी के अपने शब्दों में उनका परिचय

(देश का पूर्वोत्तर राज्य इम्फाल मेरा घर है। बचपन से पढ़ने-लिखने का शौक था साथ ही हिंदी भाषा के प्रति अतिरिक्त प्रेम बचपन से ही रहा है। कविताएँ मुझे ज़्यादा आकर्षित करती हैं क्योंकि मुझे लगता है कि कविताओं के माध्यम से हम अपनी संवेदनाओं, भावनाओं को सहज अभिव्यक्ति दे सकते हैं। छोटी-मोटी कविताएँ यूँ ही लिखती हूँ। कविताएँ इसलिए भी लिखती हूँ क्योंकि मैं चाहती हूँ कि मेरी संवेदनाएँ-भावनाएँ उन शब्दों के रूप में इसी दुनिया में मेरे साथी बन मेरे आसपास विचरण करते रहें जिनमें इस स्वार्थ भरे संसार के बीच हरसंभव सच्चाई और ईमानदारी के बचे रहने की संभावनाएं बनी रहेंगी।

‘हिंदी उपन्यासों में पूर्वोत्तर भारत का आदिवासी समाज’ विषय पर पीएचडी कर रही हूँ।

संपर्क: [email protected]

 

टिप्पणीकार बसंत त्रिपाठी, 25 मार्च 1972 को भिलाई नगर, छत्तीसगढ़ में जन्म. शिक्षा-दीक्षा छत्तीसगढ़ में ही हुई। महाराष्ट्र के नागपुर के एक महिला महाविद्यालय में अध्यापन के उपरांत अब इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी अध्यापन. कविता, कहानी और आलोचना में सतत लेखन. कविता की तीन किताबें, कहानी और आलोचना की एक-एक किताब के अलावा कई संपादित किताबें प्रकाशित.

सम्पर्क: 9850313062, ई-मेल [email protected])

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