कविता

सुधाकर रवि की कविता अपने समय से जुड़ने की एक ईमानदार कोशिश है

अंचित


अच्छी कविताओं की निर्मिति में तीन चीज़ें लगती हैं – विचारधारा, भाषा, और जीवन दृष्टि. अच्छी कविताएँ हमेशा वैसी होती हैं, जिनसे अपना दुःख, अपनी करुणा ख़ुद ब ख़ुद जुड़ भी जाती है.

सुधाकर की इन कविताओं को पढ़ते हुए मुझे बार बार यह ख़्याल आता रहा. उम्र के लिहाज़ से सुधाकर रवि उस पीढ़ी के बिलकुल पास ठहरता है जिनको मिलेनीयल्स कहा जाता है.

उसकी जीवन दृष्टि उस दुनिया में विकसित होती है, जहाँ पूँजीवाद का पलड़ा शायद अभी तक के इतिहास में सबसे भारी है और शोषक ताक़तें अपने क्षद्म प्रपंचों से लगभग पूरी दुनिया की आबादी को अपने वश में कर चुकी हैं. लड़ी जा रही लड़ाई में रात का सबसे काला हिस्सा हमारे सम्मुख है और इसी अंधेरे में कवि ने अपना पक्ष चुना है ।

नए सदी के सबसे नए आदमी ने प्रतिरोध के लिए दुनिया का सबसे पुराना तरीक़ा चुना है – प्रेम, और मुझे अंग्रेज़ी शब्द ज़्यादा पसंद है तो, एम्पथी.(empathy). कवि को समग्रता से देखना होता है. पूरी दुनिया को अपनी अंजुली में भर लेने की कोशिश करनी होती है.

कन्फ़ेशन कविता की पूरी सीरीज़ इसी वृहत्तर को एक साथ देखने की कोशिश लगती है. यह नया कवि इतिहास में सिर्फ़ तफ़री नहीं करता बल्कि उसका प्रभाव भी अपने ऊपर महसूस करता है. “जादू” है यह उसको पता है, “जादूगर” है यह भी पता है.

उसको पता है कि

“नफरत का चूल्हा कई आँच वाला होता है
किसी आंच पर देश चढ़ा दो
किसी आंच पर धर्म. “

बग़दाद से कलकत्ता और विस्थापित इराक़ी यहूदियों पर लिखी उसकी कविता, हिंदी में अनुवाद की हुई कविताओं और हिंदी में इराक़ और मध्य एशिया पर लिखी हुई कविताओं से अपना जुड़ाव स्थापित करती है पर एक बिलकुल नयी जगह लेकर जाती है- एक नए संदर्भ की तरफ़, वैश्विक परिपेक्ष्य में एक बिलकुल नयी जगह- दूसरे देश में जो एकदम नयी पीढ़ी रह रही है,जिसका जन्म यहीं हुआ है – उसकी पड़ताल करने की कोशिश.  इस लिहाज़ से हिंदी कविता भी एक कदम आगे बढ़ती है.

कन्फ़ेशन नम्बर तीन एक बिलकुल अलग कविता है. भोजन और लालसा के बीच घूमती हुई – स्मृति और विस्मृति के बीच घूमती हुई और कहन बिलकुल अलग. अपनी बात कहने का एक अलग तरीक़ा. भाषा जब कहन से लिपटती है तो एकदम नयी हो जाती है.

“डर लगता है बस उस बूढ़े, दढ़ियल दोस्तोयेव्स्की से
आदमी के गुजर जाने के बाद भी
ना जाने कब वापस खींच लाए अपने किसी नॉवेल में
और गर्दन पर रख
कलम की नोंक
पूछने लगे कि बता
तू काफ़िर है या रसूल?”

हिंदी कविता में भाषा को अब जिस नयी जगह चलना है, सुधाकर रवि ने उस रास्ते पर चलना शुरू कर दिया है और तराशने का काम कवि तेज़ी से सीख रहा है. कवि और कविता दोनों के लिए यह बड़ी बात है. मुझको हमेशा कविता से भावुकता की माँग रहती है. हालाँकि समकालीन कविता में इसको कोई बहुत अच्छी चीज़ नहीं समझा जाता पर यही तो है वह चीज़ जो कवि की जीवन दृष्टि को पाठक के अपने अनुभवों से जोड़ती है.

साहित्य का स्त्रोत यहीं है, और यह भावुकता प्रेम लेकर आती है जो कवि को दुनिया से जोड़ती है क्योंकि कवि को जिस शत्रु से लड़ना है, जिसके ख़िलाफ़ उसको अपने भीतर आस्था पैदा करनी है, वह एक निजी स्मृति से शुरू तो होगा लेकिन सामूहिक होता जाएगा, जाता है.

सुधाकर रवि की इन कविताओं में मुझको कई संस्कृतियों की छायाएँ मिलीं, अपनी परम्परा से जूझना मिलना, अपनी जगह खोजने की भूख मिली और अपने समय की कविता के साथ जुड़ने की समझदारी मिली. बहुत गर्व, ईर्ष्या और प्रेम के साथ रवि का स्वागत

 

 

सुधाकर रवि की कविताएँ

 

1. कन्फेशन

कन्फेशन नम्बर एक

दुनियाँ के कई पवित्र शहरों में
एक पवित्र शहर है जेरुसलम
कई धर्मो का जन्मस्थल
कई कहानियों का कब्रगाह
हर दिन धमाकों से हिलता हुआ जेरुसलम
यहूदी मुसलमान के खून से सना हुआ जेरूसलम

बगदाद का आसमान छोड़
कलकता का आसमान
कब प्यार लगने लगता है
नही जानते इराकी यहूदी
एक समय था जब कलकता में
व्यापार खूब फला फूला
अब तो कलकत्ता में अब हाथ पर
गिने जाने जितने ही बच गए हैं यहूदी
बड़ा बाजार इलाके में बने यहूदियों के उपासनागृह
की देखभाल करते हैं कलकत्ता के मुसलमान.
ये मुसलमान ईस्टर के पहले रंग-पुताई करते हैं
पुराने बने यहूदियो के बेकरी में केक तैयार करते हैं
एक ही बर्तन में खाते,
एक ही स्कूल में पढ़ते
यहूदियों और मुसलमानों के बच्चे
फलीस्तीन-इजरायल के बारे में क्या सोचते होंगे?

कलकता के संभ्रांत हिन्दू
कलकता के यहूदियों से उतनी ही नफरत करते हैं
जितनी वे करते हैं इजरायल की तारीफ

नफरत का चूल्हा कई आँच वाला होता है
किसी आंच पर देश चढ़ा दो
किसी आंच पर धर्म.

कन्फेशन नम्बर दो

मैं अक्सरहाँ अपनी प्रेमिका के उसके
कॉलेज से छूटने के इंतज़ार में
पटना हाई कोर्ट के आस पास भटकता रहता हूँ
यूँही एक दिन मैंने कोर्ट की दीवार से पूछ लिया
क्यों जी अंदर बैठे साहब ठीक से न्याय करते हैं न?
दीवार ने फिर एक जादूगर की कहानी सुनाई
कि बहुत साल पहले
एक जादूगर ने एक मोटी दीवाल बनाई
बहुत ही गद्देदार
और फिर उसने पूरे नगर में यह खबर फैलाई
उस दीवाल में जादू है
जादू यह कि
दीवार सारे लोगों के बहते आंसू सोख लेता है
फिर भी तनिक सा गीला नही होता है.
सारे नगरवासी खुश हुए कि
जादूगर ने एक बेहतरीन जादू दिखाया
कोई कहता है कि आज
उस दीवार के एक तरफ कश्मीरी पंडित रोते हैं
दूसरे तरफ गुजराती मुसलमान
और एक शरारती बच्चे ने दीवार पर लिख दिया है
भारत का संविधान.

कन्फेशन नम्बर तीन

प्राग की मछलियां जितनी छोटी होती हैं
उतनी ही होती हैं स्वादिष्ट,
छोटी मछलियों को खाने में एक सुविधा रहती है
कांटा गले में फँसता नही है
और आंखों की रौशनी के लिए लाभदायक होती हैं.

वैसे काबुल की मछलियां जल्द पकड़ में आती तो नही
पर हल्की आंच पर पकाने के बाद
शुद्ध मक्खन में डुबो कर
खाने का स्वाद
पकड़ने के मेहनत को जाया नही होने देती

हंगरी के समुद्री तट की मछलियां
शोरबे के साथ खाएं या
अदरक और काली मिर्च के सॉस के साथ
वोदका के साथ
धीमी आवाज में बजते रूसी गीत सुनते हुए
खारापन और तीखापन का फ्यूज़न
अलग आनंद देता है

मछलियां खत्म हो जाती हैं
पानी सूख जाता है,
इतिहास में बरकरार रहती है
मछलियों की गंध.

कन्फेशन नम्बर चार

किसी भीड़ भरे पार्क में तुम्हें चूमते हुए
मुझे कभी डर नही लगा
कई बार बिना डरे बेटिकट
यात्राएं की हैं
देर रात घर जाते हुए भी
चोर, बदमाश का डर नही रहा कभी

डर लगता है बस उस बूढ़े, दढ़ियल दोस्तोयेव्स्की से
आदमी के गुजर जाने के बाद भी
ना जाने कब वापस खींच लाए अपने किसी नॉवेल में
और गर्दन पर रख
कलम की नोंक
पूछने लगे कि बता
तू काफ़िर है या रसूल?

ईसा मसीह रुख़सत होने से पहले
अपनी कील ठुकी देह पर
लादते रहे सारे आदमियों के पाप का बोझ
कि वियतनाम में भी वही थे और ईरान ने भी
क्रीमिया में भी वही लड़ रहे थे और कोलंबिया में भी
लेबनान, सूडान, जॉर्डन में सारी गोलियां उन्होंने चलाई

मसीहाई आग पर चलने या
पहाड़ पर समाधि लेने से नही आती
मसीहाई आती है
अपने समय के
हर हत्या, हर शोषण, हर जुर्म
के पापों का भागीदार खुद को मान
कन्फेस करने से.

 

2 . गांव

मैं गांव को नहीं जानता.
मैं उस लड़की को जानता हूं जो गांव में रहती है.
मुझे नहीं पता कि उसका गांव कैसा दिखता है.
मुझे नहीं पता कि उसके गाँव में मकान किस तरफ हैं
और खेत किस तरफ.
लेकिन सभी गांवों से गुजरते हुए
मुझे लगता है कि उसका गांव
ऐसा ही दिखता होगा.
उसके घर के आगे ऐसे ही
एक गाय बंधी हुई रहती होगी.
मुझे सभी गांवों से प्यार नहीं है.
मुझे उस एक लड़की से प्यार है
जिसे मैं सभी गांवों में ढूंढता हूँ.
सभी गांवों में उस एक लड़की के दिख जाने से
सभी गांवों के प्रति प्रेम अनायास ही चला आता है.

 

3 . सड़क
एक लड़की एक सड़क पर से रोज गुजरती है.
उसी सड़क पर से एक लड़का भी रोज गुजरता है.
दोनों एक ही सड़क पर से अलग-अलग समय पर गुजरते हैं.
दोनों के गुजरने की बात
सड़क को मालूम है. उन दोनों को नहीं मालूम है.
कुछ महीने बाद, उसी सड़क पर से गुजरते हुए
लड़की को मालूम है कि लड़का उससे प्यार करता है.
लड़के को भी पता है कि लड़की उससे प्यार करती है.
दोनों को पता है कि दोनों एक दूसरे से प्यार करते हैं.
सड़क को नहीं पता कि दोनों प्यार करते हैं.
सड़क को दोनों का अब एकसाथ गुजरने की बात पता है बस.

 

4 . एक साथ
(विनोदकुमार शुक्ल को पढ़ते हुए)

“पहले लिखना आया होगा या पढ़ना?”
“पहले लिखना आया होगा, पढ़ना बाद में आया होगा”.
“फिर पहली बार लिखते हुए कैसे पता चला होगा कि क्या लिख रहे हैं?
यह तो पढ़ कर ही पता चला होगा”
“हो सकता है कि पढ़ना लिखने के तुरंत बाद आया हो”
“ऐसा नही हो सकता कि पढ़ना पहले आया हो और लिखना बाद में?”
“लिखना बाद में आया होगा तो पहली बार क्या पढ़ा गया होगा.
पढ़ने के लिए कुछ लिखा भी तो होना चाहिए”
“फिर तो जरूर पढ़ना-लिखना एक साथ आया होगा”
“हां, ऐसा ही हुआ होगा. जैसे दो लोग प्रेम में एक साथ आते हैं.”
“या दो लोगों में प्रेम एक साथ आ जाता है”.

 

5 . उदासियों के नाम

किताबों के हजारों पन्ने
उसने इसलिए पढ़ें कि
वह उनमें उदासियाँ ढूंढना चाहता था,

वह घंटों गिरते पत्ते
इस उम्मीद में देखता कि
झड़ते पत्ते देख
उसका दिल टूटेगा

वह चाहता कि एक दिन में
बारह बार प्यार करे
और उसका दिल एक दिन में
बारह बार ही टूटे

जीवन में उसके
कई प्रेमिकाएं आईं
लेकिन किसी भी प्रेमिका का
वह पहला प्रेमी नही था।

उसका कंधा इतना चौड़ा कि
एक साथ तीन-तीन प्रेमिकाएं
उस पर सिर रखकर
अपने पहले प्यार के असफलता
पर रो सकती थीं,
और इतना गद्देदार कि
आंसू रिस-रिस कर
दिल में जमा होता रहा

वह चाहता कि किसी का
पहला प्रेमी बने
उसका दिल उतनी ही
ईमानदारी से टूटे,
लेकिन तब मुमकिन नही
जब नसों में खून से ज़्यादा
प्रेमिकाओं के आंसू दौड़ रहें हो।

 

6 . नदी
१.

पितरों के पिंड हाथ में उठाए लोग
खोजते रहते हैं तपती रेत में नदी
विष्णु के पैर में फट पड़ती हैं दरारें
कृष्ण के चरण स्पर्श कर, यमुना तो पा जाती है मोक्ष
जानकी के श्राप से धंसी रहती है फल्गु जमीन के भीतर ही
बिना पानी के नही मिल पाता पितरों को रत्ती भर मोक्ष
यह नदी होने का सौभाग्य भी है और श्राप भी
कि पानी पर तैरता रहता है राम सेतु का पत्थर
लेकिन सरयू में डूब जाते हैं मर्यादा पुरुषोत्तम राम

२.
नदी किनारे ही मानव ने बसाई थी अपनी बस्ती
नदी किनारे ही किया था सभ्यता का निर्माण
और धीरे-धीरे फैलता गया पूरे
धरा पर उनका संसार
पर आज नदी
दूर भागती जा रही है इसानों से
सूखती जा रही है,
नदी सूखती जा रही है.

या विलीन होती जा रही है
सभ्यता ?
क्या इंसान में इंसान
शेष बचा है ?

३.
एक लड़की ने बांग्ला में पूछा कि
‘क्या नाम है?’
मैंने बिना समझे सकुचाते हुए कहा
‘ठीक हूँ’

फिर दोनों चुप रहें,
खोजने में एक-दूसरे को
समझ में आने वाले शब्द।

एक भाषा जानते हुए
आप प्यार नहीं कर सकते,
एक भाषा जानकर आप सिर्फ
यह बता सकते हैं कि
नदी का रंग नीला है या मटमैला।

नदी कहाँ ज़्यादा
गहरी है , कहाँ कम
कई भाषाएं जाने बिना संभव नही।

 

7 . पतझड़ के जुर्म से

पतझड़ के जुर्म से
दहक उठी है
पलाश  के दिल में आग
क्या जुर्म होने पर
तुम्हारे दिल में
दहकती है वह आग
यदि नहीं, तो क्या
आप जिन्दा हैं ?
जुर्म के बाद
दिल की आग
दहक उठे
यह पलाश  के
फूलों से सीखो

 

 

8 . अपराध बोध

किसी से ऊंची आवाज में बात कर लेने के बाद
अपना मन ही फिर अपना नही रह पाता,
झगड़ा हो जाए तो रात की नींद गायब ही
महीनों से पड़े पुराने अखबार को रद्दी में बेचने में
पुल के नीचे बहते नाली को नदी कहने में
या मंदिरों के सामने सिर झुकाए लोगों को
बिना सिर झुकाए चुपचाप देखने में
अब अपराध बोध आ जाता है.

बहुत देर कोशिश के बाद भी याद नही आता
काई पर फिसलन की तीव्रता, पके गूलर की गंध
शहतूत का स्वाद, दोनों हाथों से लट्टू नचाने का हुनर
कुँए की गहराई लौटते प्रतिध्वनि का
समय अब कहाँ याद है
स्मृति का विलोप कर देना भी अपराध ही है.

जाड़ों की धूप, बाल्टी भर गुनगुना पानी, खुशबूदार साबुन
के बावजूद न नहाने की इच्छा, सोते हुए बिता देना शाम
सीढ़ी चढ़ने का आलस,

इतने दोषों के बावजूद अपराध बोध देह में
तब एकदम सुई जैसा चुभता है, जब तुम पूछती हो
कविता लिखनी छोड़ दिए क्या.

 

9. ठंड

रात ज़्यादा लंबी होने लगी है इन दिनों
तुमने सीख लिया है देर रात तक जगना
मेरी नींद तुम्हारी नींद से ज़्यादा लंबी हो गई है, और
तुम्हारे ख्याब मेरे ख्वाब से ज़्यादा बड़े.

भोर में अब कान ठंडा होने लगा है
मेरी हथेलियां खोजने लगी है
तुम्हारे गर्म हथेलियों का स्पर्श.
मन को अब ज़्यादा अखरता है तुम्हारा दूर होना.

जाड़ों में तुम्हारी तस्वीरें ज़्यादा अच्छी हो जाती हैं
और तुम्हारे लिए मेरी पुकार ज़्यादा भारी
जल्दी थम जाता है शहर का शोर
शाम देर तक घूमना अब नहीं हो पाता
इस मौसम में बढ़ जाता है मेरा आलस.

सर्दियों से कई नापसंद के बाद भी
अहसान है इसका मुझ पर कि
सर्दियों के मौसम में ही
तुमने मुझे पहली बार देखा था.

 

10 . चुप्पी

रात के दूसरे पहर
कुत्तों का जोर जोर भूंकना
उतना डरावना नहीं होता
जितना डर किसी के रोने पर लगता है

कहीं कोई रिक्शा वाला
फिर तो नहीं पीटा गया
कहीं प्रदेश कमा घर लौट रहे ,
मजदुर का बटुआ तो नहीं मार लिया गया।

लेकिन आज न कुत्ते भूंकते
न कोई आज रोता है ,
न ही किसी घर में औरत पीटी जाती है
आज सिर्फ हवाओं के
चलने की आवाज आ रही है ।

सच को सच बोलने पर
मार दिया जाना
आम होता जा रहा देश में
और जितना भारी अपराध होता है
किसी को मार देना
उतना ही अपराध है
किसी के मार देने पर चुप रह जाना

हवाएं किवाड़ पीट रही है
रात के अँधेरे में भी दिख जाता है
हर दरवाजों पर लगा खून ,
हर घर में रहते हैं
ये चुप रह जाने वाले हत्यारें ।

 

11  . मगध के सूदखोर

कोई मुल्क याद किया जाता है
उसके वीर योद्धाओं के कारण
या उसके विशाल पहाड़ों , रंगीन मौसमों के कारण
या फिर कर्णप्रिय संगीत , मनमोहक गीतों के कारण
सुन्दर स्त्रियाँ भी किसी देश को याद रख पाने का अच्छा बहाना होती हैं,
लेकिन मगध देश का नाम सुन
याद आते हैं मुझे
वहां के सूदखोर.
दो चव्वनी कमाने में हाथ खुरदुरे हो जाते हैं ,
एड़िया फट जाती हैं ,
रात भर देह के टूटने का दर्द सो अलग
लेकिन पल भर में एक चव्वनी से हज़ार चव्वनी
बनाने का हुनर जानते हैं मगध के सूदखोर
लाशों पर मंडरा रहे गिद्ध की आखों में
देखें तो थोड़ी बहुत ममता भी देख जाये
लेकिन गिद्ध से भी ज्यादा निर्दयी होते हैं
मगध के सूदखोर.

 

 

(कवि सुधाकर रवि
पता – दक्षिणी दौलतपुर, राजाबाजार
जहानाबाद – 804408 (बिहार)
मो. – 8804335009
ईमेल – [email protected]

अध्ययनरत – बी एड
पत्र–पत्रिकाओं में कविताएँ एवं आलेख प्रकाशित व आकाशवाणी, पटना से रचनाएँ प्रसारित.सृजनात्मक लेखन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत.

टिप्पणीकार अंचित
जन्म : 27.01.1990
शिक्षा : पटना यूनिवर्सिटी से स्नातकोत्तर। पीएचडी का काम जारी।
सम्प्रति : पटना यूनिवर्सिटी में स्नातकोत्तर विभाग में सहायक प्राध्यापक(गेस्ट).
दो कविता संग्रह प्रकाशित – ‘साथ असाथ’ और ‘शहर पढ़ते हुए’ (2018) । एक ईबुक संग्रह , ऑफ़नोट पोअम्ज़ (2017)। विभिन्न अनुवाद के कार्य। जयराम रमेश द्वारा लिखित इंदिरा गांधी की जीवनी का हिंदी में अनुवाद।
सम्पर्क : [email protected])

 

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