Wednesday, August 17, 2022
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शुभम नेगी की कविताएँ इंद्रधनुषी चेतना का प्रसार एवं मनुष्यता की फिसलन की चिंता हैं

देवेश पथ सारिया


युवा कवि शुभम नेगी की कलम नई है, शुभम अपनी लेखनी के माध्यम से समाज के लिए कुछ सकारात्मक रचना चाहते हैं। शताब्दियों से हेय दृष्टि से देखे गए समलैंगिक समाज का संघर्ष बयान करती हुईं, पक्ष रखती हुईं कुछ महत्वपूर्ण कविताएँ शुभम ने लिखी हैं। सशक्त काव्य अभिव्यक्ति द्वारा एलजीबीटीक्यूआईए+ विमर्श को जो कवि हिंदी साहित्य की मुख्यधारा में ला रहे हैं, उनमें आर. चेतनक्रांति और धर्मेश जैसे कवियों के साथ शुभम नेगी का नाम लिया जा सकता है:

“वे आदमी जिनकी मुस्कुराहटें शोकगीत हैं
वे आदमी जिनके मुँह में जुराबें ठुंसी हैं
वे आदमी जिनके कमरों को
मुँह-ज़बानी याद हैं सुसाइड लेटर

वे आदमी।

शायद दिखें तुम्हें अब साक्षात्
तुम्हारी गलियों, दुकानों, घरों, दफ्तरों,
पूजाघरों में वे आदमी
जब पाएँगे अपनी शक्लें वे आदमी
तो हत्याओं की रपट होगा साहित्य”

भारत में बहुत से लोग अब भी नहीं जानते कि जून का महीना एलजीबीटीक्यूआईए+ प्राइड मंथ के तौर पर मनाया जाता है। जो इस बारे में जानते हैं और इस आंदोलन के पक्ष में हैं, वे चेतना का प्रसार करते हैं। लेकिन प्रतिबद्धता दर्शाने के किसी भी मौके के बीतते ही सब कुछ पहले जैसा होने लगता है। ‘तीस जून’ कविता में शुभम इसी चेतना दीप के बुझने के बारे में बात करते हैं।

शुभम अपनी कविताओं में गाँवों में व्याप्त पिछड़ी सोच की बात करते हैं। आज भी स्थानीय समाचार पत्रों में ख़बर आती है: “सरपंच पति ने क्रिकेट टूर्नामेंट का उद्घाटन किया।” और इस पर कोई आपत्ति नहीं होती। किसी को कुछ खटकता नहीं। ‘पंचायत का चुनाव’ कविता शृंखला के माध्यम से शुभम नेगी स्त्री और दलित विमर्श की बात करते हैं। तमाम विमर्शों के मूल में मनुष्यता है। शुभम के कवि के अंतर्मन में मुख्य चिंता मनुष्य मात्र के संघर्ष एवं फिसलन की है जो ‘मैं गिरा हूँ माँ की कोख से’ कविता में चीन्ही जा सकती है:

“रस्साकशी है
मेरे शिशु शरीर की पहली स्मृति
इंसान से पहले बनाया गया मुझे
रस्साकशी के बीच की गाँठ
दो गुट खींचते रहे अपनी-अपनी सीमाओं तक”

तकनीकी एवं वैश्वीकरण के प्रसार ने सतही स्तर पर जितनी नज़दीकियाँ उत्पन्न की हैं, उससे अधिक अवसाद को जन्म दिया है। महामारी काल ने अवसाद में अनिश्चितता संलग्न कर स्थितियाँ और भी अंधकारमय कर दी हैं। ‘टिंडर’ कविता एकाकीपन में प्रेम तलाशने के संघर्ष का दृश्य रचती है। प्रेम के टिंडर युग में कितनी अकेली रूहों की उम्मीद ‘स्वाइप’ की हलचल में अटकी है:

“कितने स्वाइप पहले डूबा था सूरज
कितने स्वाइप पहले ढुलक गयी थीं आँखें देह से
कितने स्वाइप से है गले में उफनती उदासी
कितने स्वाइप हुए आलिंगन की अर्जी लिखे
सेकंड ही थे समय की इकाई कितने स्वाइप पहले”

शुभम नेगी अपनी कविताओं के माध्यम से एक संदेश देने का प्रयास करते हैं। भविष्य में उनके सामने एक चुनौती परिदृश्य को ठहर कर देखने और गहराई में पड़ताल करने की रहेगी। धैर्य इस प्रतिभाशाली कवि के कविता कर्म को और निखारेगा।

शुभम नेगी की कविताएँ

1. हत्याओं की रपट

वे लड़के
जो लड़कों के हाथ थामना चाहते थे
जो लड़कों की पलकों को चुम्बन से
सौंपना चाहते थे सदाबहार सपने

वे लड़के जिनके प्रेम ने बोयी
संकरी सलाखों की विषैली फसल
वे लड़के जो किताबी प्रेम-कहानियों में ढूँढते फिरे
उनके लिए आरक्षित कोना
वे लड़के जिनके लिए कोई कोना नहीं था

वे लड़के
जो पकड़े गए बिस्तर पर लड़के के साथ
वे लड़के जिनकी पिंडलियों पर नील हैं
वे लड़के जो मुँह में जुराबें ठूँस चीखे हैं
वे लड़के जिनसे कहा गया- बेटा समझो
वे लड़के जिन्हें समझा नहीं गया

वे लड़के
जो लड़के थे
पर लड़के नहीं थे

वे लड़के
जो आदमी बने, मर्द नहीं

वे आदमी
जिनकी पलकों की अंदरूनी सतह फफूँद है
वे आदमी जो बीवियों के नाम
धोखे लिखने पर मजबूर हैं
वे आदमी जिनका परिवार
उनकी देह के अभिनय का पुरस्कार है

वे आदमी जिनके मुँह, कान, आँख, नाक नहीं हैं
वे आदमी जिनकी शक्लों पर डाका पड़ा है

वे आदमी जिनकी मुस्कुराहटें शोकगीत हैं
वे आदमी जिनके मुँह में जुराबें ठुंसी हैं
वे आदमी जिनके कमरों को
मुँह-ज़बानी याद हैं सुसाइड लेटर

वे आदमी।

शायद दिखें तुम्हें अब साक्षात्
तुम्हारी गलियों, दुकानों, घरों, दफ्तरों,
पूजाघरों में वे आदमी
जब पाएँगे अपनी शक्लें वे आदमी
तो हत्याओं की रपट होगा साहित्य
इंसान के सबसे भद्दे अपराध का ब्यौरा
और गोष्ठियाँ क्या होंगी
साक्षात्कार, शोकसभाएँ, या कटघरे?

2. मैं गिरा हूँ माँ की कोख से

ठीक-ठीक कहाँ कहा जा सकता है
कि गिरता हुआ आदमी
टकरा ही जाएगा फ़र्श से कभी

हो सकता है
गिरना एक सतत प्रक्रिया हो!

सब जन्मते हैं
मैं गिरा हूँ माँ की कोख से

नहीं मिली किसी गोद की नागरिकता
गिरता रहा शरणार्थी बन
इस गोद से उस गोद

कोख से गिरा
पंचायत की सभाओं में अटका

रस्साकशी है
मेरे शिशु शरीर की पहली स्मृति
इंसान से पहले बनाया गया मुझे
रस्साकशी के बीच की गाँठ
दो गुट खींचते रहे अपनी-अपनी सीमाओं तक

फिसल जाते हैं जैसे
फिसलते आदमी को बचाते लोग
मेरे होने भर ने धकेला है
अम्मा-दादा, बुआ और उनके परिवार को
गमगीन गहराइयों में

भाई और मेरा साथ
गिरती दो जानों का पकड़ा हाथ है

इतना गिरा हूँ
इतना गिर रहा हूँ
इतना गिरना है अभी और कि सोचता हूँ
क्यों नहीं गिरा दिया गया मुझे
गर्भ में ही!

3. टिंडर

चेहरों की कतार में राह ढूँढती
उँगलियाँ निढाल हो चली हैं
स्क्रीन के उधर भी कार्यरत कोई उँगली
कब आकर प्रवेश लेगी
इनके मध्य की रिक्तता में?

एक के बाद एक
मैं पछाड़ रहा हूँ चेहरों को बाएँ
या दाएँ धकेल रहा हूँ
ऊपरी तल पर स्वप्न-सीढ़ियों से

क्लब की रंगीन रोशनी से ढककर अपना अवसाद
नदी के बैकग्राउंड में सुखाकर व्याकुल डबडबाहट
जबरन ठूँसकर थोड़ी कलात्मकता, थोड़ी वाकपटुता
(और कुछ ‘थर्स्ट ट्रैप’)
बीस-बाईस किलोमीटर के दायरे में
हताश हाथों से बाँटता फिरता हूँ
अपना आवेदन-पत्र

कितने स्वाइप पहले डूबा था सूरज
कितने स्वाइप पहले ढुलक गयी थीं आँखें देह से
कितने स्वाइप से है गले में उफनती उदासी
कितने स्वाइप हुए आलिंगन की अर्जी लिखे
सेकंड ही थे समय की इकाई कितने स्वाइप पहले

मैच-सूची में पड़े
एक सौ तेईस नामों की भीड़ का
क्यों नहीं समझ पाया मैं व्याकरण?
या क्या रखते हैं सभी प्रेमी
दूसरे की भाषा का शब्दकोश?

मेरी तर्जनी और मध्यमा के मध्य
आकर इस कलम के साथ
कब घुलेगा कोई हाथ
जिसकी लिखावट यही हो

कहाँ लिखा है भला
कि सब अभागों को
मिल ही जाएगा अंत में प्रेम?

4. फोटो-जर्नलिस्ट
(दानिश सिद्दीक़ी के लिए)

जिसने सिर्फ़ चोटिल पीठ नहीं दिखाई
दर्ज किए लाठियों के चेहरे भी

हमारी वातानुकूलित हवा में
अस्पताल से लाकर रख दी जिसने
मरते मुँह से छूटी अंतिम आह!

हम पर ओढ़ाई
बॉर्डर पार कर आई शरणार्थी महिला के
ज़मीन सहलाते हाथ की ठंडी छुअन जिसने

उसकी हत्या कर दी गयी।

हम सबकी नज़र
उसकी रील की तहों में रखी थी
उसका क़फ़न
हमारी आँखों पर फैलता सफ़ेद मोतिया है

किसी दृश्य को देख उसने
रोने से पहले, तस्वीर खींची
डरने से पहले तस्वीर खींची
खींच ली तस्वीर भागने से पहले
मरने से पहले तस्वीर खींची

राजधानी की सड़क पर उसने
खींची तस्वीर उस बन्दूक की
जो उसी के माथे पर तनी थी

धमाकों के शोर में से भी
जब उठती रही अविराम
कैमरे के शटर की आवाज़
तब हमने जाना कि तमाम बड़े धमाकों से
अधिक बलवान है
कैमरे पर की गई
तर्जनी की हल्की चोट

5. क्रम-विकास

हमारे पास
दूसरे के हिस्से की ऑक्सीजन है

हमारी लाइटों में चमकता है
बेगाना सूरज
हमारे सपने रंगीन फ़िल्में हैं
गंगा में बहती लाशें बेरंग
रंगों की चोरी की ख़बर
अखबार के पांचवें पन्ने पर पड़ी है
बेतरतीब

हमारी देहरी लक्ष्मण-रेखा है
पराये दुख अंदर नहीं आ पाते

हमारे हाथों में शक्ति है
किसी को बचाने
या मरता छोड़ देने की

क्रूरता के क्रम-विकास में
हम ईश्वर हो गए हैं।

6. साक्षात्कार

दो लड़कियों का प्रेम
धरने का पर्यायवाची था

आलिंगन में चिपकी उनकी देहों के मध्य
तैनात था
पृथ्वी के एक गोलार्द्ध का अंधकार

वे जहाँ गयीं
उनका प्रेम रिसा
समाज की भावनाएँ आहत हुईं
उनका अस्तित्व एक संग्राम था
उनके चुम्बन
संग्राम में उठे नारे

उनके प्रेम में प्रकृति का वास था
पहाड़ की चोटियों ने चोटियों में उनकी
गुंथे बर्फ़ीले रेशों के गजरे
उनके आपसी स्पर्श की आंच पर
गर्म हुए मरुस्थल
समंदर पर उड़ते पंछियों ने
किया उनकी स्वप्न-कथा में
संगीत-निर्देशन

उनके प्रेम में प्रकृति का वास था
हालांकि हवाला प्रकृति का ही देकर मारा गया उन्हें

उनकी हत्या पर निकली चीखें
क्रांतियों का आव्हान करते नगाड़े हैं

काश कविताएँ होना चाहतीं
दो प्रेमियों की हत्या पर
बिलखते पहाड़ के आंसुओं का साक्षात्कार
काश!

7. पंचायत के चुनाव – 1

लाउडस्पीकर चिल्लाये –
दें अपना कीमती वोट
प्रधान पद के लिए
चैनसिंह को
रामलाल को
देशराज को

जब हम थक गए
लाउडस्पीकरों पर
कई चुनावों से चिपके
पुरुष नाम सुनकर
तो हमने औरत के लिए
कर दी सीट आरक्षित

अगली बार
लाउडस्पीकर चिल्लाये –
दें अपना कीमती वोट
प्रधान पद के लिए
घरवाली को
चैनसिंह की
रामलाल की
देशराज की।

8. पंचायत के चुनाव – 2

स्कूल के आंगन में
रखा रात ने कदम
वोटों की गिनती शुरू हुई

मर्द महफ़िल में थे स्कूल की
महिलाएँ महफ़ूज़ मकानों में अपने
औरतों को रहना था
चिड़ियाघरों में सुरक्षित
जब खुले घूम रहे थे
गांव के सारे गीदड़

घोषणा हुई विजेता की—
नई प्रधान- लछमी देवी

स्कूल के कानों ने
जब सुना लछमी का नाम
तब गांव की नई प्रधान
लछमी देवी के कान
महफ़ूज़ थे मकान के अंदर
चेहरे, स्तनों, और योनि के साथ
और उसके हाथ
बेल रहे थे रोटियाँ
उनके लिए जो आकर बताएंगे उसे
चुनाव का नतीजा
और कहेंगे—
दाल में नमक कम है

9. पंचायत के चुनाव – 3

जब ब्राह्मणों का सरदार
जीता पंचायत का चुनाव
फड़फड़ा कर उड़े
पूरे गांव की तरफ़
न्यौते विशाल समारोह के

कहीं मुँडेरों पर बैठे, कहीं बैठकों में
गांव भर में उड़ते न्यौते
दलितों के घरों के बीस गज पीछे रुके
और लौट आये वहीं से सन्देशा देकर

समारोह में सभी सवर्ण
जब बैठक में बैठे थे
तब खड़े थे सारे दलित
एक अदृश्य दीवार के पीछे
अपने-अपने डब्बों में भरवाते हुए
अपने-अपने हिस्से का
‘प्रसाद’

उनके साथ कतार में
खड़ी थीं उनकी उँगलियाँ
और वोट के निशान
जिन्होंने आज चुना था
अपना नया प्रधान

10. अम्मा का स्पर्श

अम्मा का स्पर्श पाते ही पृथ्वी
बन जाती है एक विशालकाय गुल्लक

करेले की धराशायी बेल को
बाँस की टेक लगाती है अम्मा
लकड़ी के बल सीधी करता है
करेला कमर को अपनी
उसके पोरों से रिसती कड़वाहट पर
मरहम है अम्मा का सहलाता स्पर्श

बुहारकर कच्चा फ़र्श
गोबर से लीपती है अम्मा
उनकी छुअन से उतरता है पारा
कथन से चलती हैं हवाएँ
नृत्य-मुद्राओं में ढलते उनके हाथ
बनाते हैं तरह-तरह के शीत डिज़ाइन
जिन पर सूरज नहीं कड़कता

मंदिर में पसरे
धूप के धुएँ को धुनकर बने हैं
अम्मा के कपड़ों के सुरभित रेशे
आँगन में उगी तुलसी
उनकी छुअन से बनी है दिव्यात्मा
अँजुरी में भरकर ओस नित सुबह
पृथ्वी देती है उनके चरणों में अर्घ्य

उनकी गोद की ओट में छुपी बैठी हैं
मुझे थामती थपकियाँ
मेरी पलकों को मूँदते खुरदुरे हाथ
भुला देते हैं मुझे इंसान होना
मैं बन जाता हूँ फूल
सोता हूँ पंखुड़ियाँ समेट
मुझे तितलियों के स्वप्न आते हैं

11. तीस जून
(जून को क्वियर प्राइड मन्थ के तौर पर मनाया जाता है)

कितनी कंपनियों की
महीने भर से अटकी साँस
छूटकर आकार ले रही है
एक भद्दे प्रिज़्म का
देखो! उनकी ज़ुबानों पर चिपके सात रंग
प्रिज़्म में लौटकर
समेट रहे हैं पंख अपने

क्रान्तिकारी कवि ठूँस रहे हैं सरपट
इन्द्रधनुषी कविता से जुटाई वाह
सब नारे डकार बन गए हैं
अभी थे, अभी ग़ायब!

तितलियाँ फिर पहन रही हैं
कैटरपिलर का बेरंग बदन
फूल ज़मीन में धँसकर
फिर से बन रहे हैं
आँसू की कोई बूँद

कुछ लड़कों की पिण्डलियों पर
उभर रहे हैं निर्मम नील वापिस
ट्रांस महिलाओं के टखनों से
फिर सिले जा रहे हैं चौराहे

कोर्ट के अँधेरे में पड़ी
वैवाहिक समानता की चमचमाती याचिकाओं पर
फिर पटकी जा रही है
टोकरी भर धूल

एक जुलाई की सुबह का अलार्म सुनकर
सब फिर सो रहे हैं
गहरी, अनभिज्ञ नींद में

12. जंगल की आग

जब जंगल से धुआँ उठता है
क्या करता है गाँव?

घर की ओर कुलाँचें मारती आग को देख
भेजते हैं कुछ लोग घर की तरफ़ से
लपटों की दूसरी सेना
उधर से आती आग
इधर से जाती आग के आगे
रख देती है हथियार घर से कुछ दूर

जंगल सारा जलता है
जीव जाते हैं सारे मर
पर सीना ताने खड़ा रहता है
एक वीरान विजयी घर

कुछ-कुछ तो भूल जाते हैं
थ्री-स्टार एसी की ललित लोरियों में
आग की पत्थर-दिल परिभाषा

कुछ हैं, जिनकी आँखें
घुमाकर एड्जस्ट करती हैं लेंस; बनती हैं कैमरा
ढूँढती हैं माचिस की तीली के निशान
बारूद की बदबू ओढ़े हाथ
अपने जलते घर पर फूँक बरसाते बेचारे से
ख़ुद ही का घर फूँक डालने का कारण पूछती हैं
ये आँखें करती हैं
जल-भुन चुके मुर्दों द्वारा
ख़ुद को जला-भुना देने के पीछे की
गहरी साज़िश का पर्दाफ़ाश!

जब जंगल से धुआँ उठता है
क्या-क्या नहीं करता गाँव!

पर कुछ हाथ हैं ऐसे
जो धुएँ की शंख-ध्वनि पर
हड़बड़ी में टटोलते हैं हरी टहनियाँ
उन्हें परचम की तरह लहराते
लपटों में इधर से उधर भागते हैं
और वहीं ठोक-पीटकर आग को
युद्ध का पटाक्षेप करते हैं

ये हाथ अपना घर जलने के ख़िलाफ़ नहीं
जलने की समूची प्रक्रिया के ख़िलाफ़ हैं
मैं चाहता हूँ ऐसा हाथ होना

ऐसा ना भी हो पाया तो
हे मेरी कविताओं!
तुम मंचों, पत्रिकाओं, संग्रहों से उतरकर
हरे पौधों की टहनियाँ बनना
जलते जंगल की जान बचाते
किसी निडर हाथ में आ जाने को

 

 

कवि शुभम नेगी, जन्म: 4 दिसम्बर 1997, बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश। शिक्षा: इंजीनियरिंग, आई आई टी वाराणसी, 2018 में। कॉलेज में नुक्कड़ नाटकों का लेखन, निर्देशन, और अभिनय। अभी डाटा साइंटिस्ट के तौर पर मुम्बई में कार्यरत। राजेंद्र यादव हंस कथा सम्मान-2022 में विशेष ज्यूरी अवार्ड से पुरस्कृत। कविताएँ सदानीरा, बहुमत, चकमक, पोषम पा आदि में प्रकाशित हैं। ईमेल: shubhu.negi30@gmail.com

देवेश पथ सारिया कवि, गद्यकार और अनुवादक हैं। उनका प्रथम कविता संग्रह ‘नूह की नाव’ (2021) साहित्य अकादमी, दिल्ली से प्रकाशित हुआ है एवं उनकी ताइवान डायरी शीघ्र प्रकाश्य है। उन्होंने ताइवानी कवि ली मिन-युंग के कविता संग्रह ‘हक़ीक़त के बीच दरार’ का हिन्दी अनुवाद किया है। देवेश‌ की कविताएं लगभग सभी प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं और वेब माध्यमों पर प्रकाशित हैं। संपर्क : deveshpath@gmail.com

 

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