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कविता

बसंत त्रिपाठी की कविताएँ सत्ता-संस्कृति की चीरफाड़ की बेचैन कोशिश हैं

मृत्युंजय त्रिपाठी


बसंत त्रिपाठी की इधर की कविताएँ शोषण के नए रंग-रूप, सत्ता के नए आकार-प्रकार और [कवि] कर्ता की इनके बीच की भूमिका को तलाशने की बेचैन कोशिश हैं। यह बेचैनी ही इन कविताओं की जान है। ज़रूरी नहीं कि बसंत जी की कविताओं से पाठक को अपने दौर की कोई मुकम्मल पहचान मिले, कई बार तो यह सम्भव भी नहीं होता, पर इन कविताओं से गुजरना हमारे दौर के रोगों के बहुत से लक्षणों से क्रमशः मिलना है।

मसलन उनकी एक कविता ‘इस सदी को’ को पढ़ते हुए समझा जा सकता है कि कवि इस दौर में पूँजी के भयावह प्रभावों को दर्ज करने की कोशिश कर रहा है। पुराने भाष्यों, सिद्धांतों और विचारों की जगह पर कवि इस दौर को सांस्कृतिक लक्षणों के जरिये समझने की वकालत करता है। अतृप्ति, स्मृतिहीनता, असुरक्षा, भय, असमानता, कुरुचि आदि सांस्कृतिक लक्षण इस सदी को पहचानने में मददगार हैं। नयी सदी में जो बदलाव हमने देखे, उनकी व्याख्या अलग-अलग अनुशासनों में अलग-अलग तरह से हुई/हो रही है पर कविता में उसकी व्याख्या कैसे हो? इसी चुनौती को आत्मसात करती हुई यह कविता कुछेक प्रतिनिधि प्रवृत्तियों के सहारे नयी सदी के सांस्कृतिक परिदृश्य का खाका खींचने की कोशिश करती है।

इस सिलसिले में कविता पहली प्रवृत्ति ‘अतृप्ति’ को दर्ज करती है और यह बताती है कि यह ‘अतृप्ति’ मनुष्यों को वैसे ही बंजर बना देती है जैसे जमीन में मौजूद क्षार। नयी सदी में बाजार का अप्रतिम फैलाव हुआ है, उसने हमारे जीवन की सबसे एकांत जगहों तक में अपना जाल बिछा दिया है। साथ ही असमानता की बढ़ती खाई इतनी चौड़ी हो गयी है जहां एक किनारे से दूसरा किनारा तक नहीं सूझता। असमानता की खाईं के अमीर छोर पर बैठे लोगों के लिए ‘अतृप्ति’ का मतलब बेतहाशा मुनाफा है। वे ‘मुनाफे’ से कभी तृप्त नहीं होते। उन्हें हर चीज़ से मुनाफ़ा चाहिए। उनकी इस ‘अतृप्ति’ की आग में जाने कितने जल-जंगल, जीव-जंतु नष्ट हो गए। यह अतृप्ति अब हमारी पृथ्वी को लील जाने, उसे पूरी तरह बंजर बनाने के लिए आमादा है। दूसरी तरफ असमानता की खाईं के गरीब छोर पर बैठे इंसान के हाथ में पैसा भले ही न हो पर उस के लिए भी बाजार का पूरा जलवा ओ जलाल स्क्रीन के जरिये खुला हुआ है। ऐसे में उसके पास अपने श्रम की अमानवीय बिक्री ही एक तरीका है जिससे वह उस प्रलोभन की दुनिया को कम से कम छू सकेगा। इस अमानवीय बिक्री के चलते वह अपने मानवीय सारतत्व से अलगाव झेलता है, उसका जीवन क्षार हो जाता है। कविता में आगे बढ़ते हुए हम देखते हैं कि यह कविता ‘अतृप्ति’ की इन भूमिकाओं के अलावा मध्यवर्गीय ‘अतृप्ति’ पर भी बात करती है। लगातार एक होड़ में होना और असम्भव ऊँचाइयाँ चढ़ कर उपरले वर्ग में पहुँच जाने की चाह, मध्यवर्गीय इंसान के जीवन में ‘आशंका की तरह बजती आशंका’ ले आते हैं।

हमारे मुल्क में पूँजी ने नयी सदी में पुरानी स्थापित सत्ताओं के साथ बढ़िया गठजोड़ क़ायम किया है। इस पूँजी ने अपने साथ पाखंड और अवैज्ञानिकता की सत्ता और पितृसत्ता व स्त्री-द्वेष के साथ एक गहरा तालमेल विकसित किया है। और यह सब मिलकर शोषण की एक नयी संस्कृति बनाते हैं जहाँ ग़रीब लोग मुनाफे के पेड़ की खाद बनकर रह जाते हैं। इसी को हमारे हुक्मरान विकास कहते हैं। अपहरण, आत्महत्या और बलात्कार के नए-नए क्रूरतम रूप इन्हीं राजनीतिक-अर्थशास्त्रीय गतिविधियों के उत्पाद हैं जिन्हें आज हम रोज़-ब-रोज़ झेल रहे हैं। दशकों पहले ‘इतिहास के अंत’ की जो बात की गयी थी, अब इस सदी में मुख्यधारा राजनीति ने भी उसे त्याग दिया है।

लेकिन इतनी सारी मुश्किलों के बीच भी लोगों का लड़ना कविता में एक दूसरा ध्रुव बनाता है। संकेत में ही सही कविता दर्ज करती है कि यह सदी इन सब मुश्किलों के साथ ही विभिन्न वंचित तबकों के आंदोलनों की भी सदी है।

राजनीतिक-सांस्कृतिक रूप से सचेत बसंत की कविताएँ पाठक को बहुत सारे बिंबों के जरिये सत्ता की संस्कृति की पहचान कराने की कोशिश हैं। हाँ, इन कविताओं को पढ़ते हुए कई बार यह लग सकता है कि कल्पना सिर्फ़ बिंबों तक महदूद हो गयी है, कविताओं में कई बार संरचना टूटी-बिखरी दीख सकती है पर क्या यह भी हमारे वक़्त का एक आइना नहीं है?

 

 

बसंत त्रिपाठी की कविताएँ

1. इस सदी को

इस सदी को समझने के लिए
नहीं चाहिए बहुत सिद्धांत
बहुत रौशनी
या भाष्य कई कई

इसे तो उस अतृप्ति से भी जाना जा सकता है
जो लगातार
सबके भीतर जमा हो रही
जमीन में क्षार की तरह

जीभ पर रखते ही बैंगन की सब्ज़ी
टीस सी उठती है
और याद आता है दस साल पुराना बिछड़ चुका स्वाद
वह भी इस सदी को समझने का एक पैमाना है

असुरक्षा जो हर वक्त
आशंका की तरह बजती रहती
संपन्नताएँ जो भय पैदा करतीं
बात बेबात झुंझलाना जो बढ़ता ही जाता
इन सबसे भी पहचानी जा सकती है यह सदी

धन को बुरी नज़र से बचाने के लिए
बिक रहे धनरक्षक यंत्रों
शक्तिवर्धक औषधियों फ्रेंडशिप के विज्ञापनों
और पिज्जाहट की रौनक से भी पा सकते हैं इस सदी का हाल
यह सदी जो मनोवैज्ञानिकों की समृद्धि
और कुपोषण से ग्रस्त लोगों की वृद्धि का अकल्पनीय द्वैत है

पीपल के पत्तों की तरह
काँप रहे हैं गरीब गुरबे
नीम की पत्तियों की तरह
झर रहे दिन रात
खाद में तब्दील हो रहे रोज़ ब रोज़
जिसे चूसकर बढ़ रहे हैं धनकुबेर
उन पन्द्रह करोड़ धनकुबेरों की
एक अरब लोगों पर बरसती व्यंग्यात्मक मुस्कुराहट से भी
जान सकते हैं सदी की चाल

केवल विकास दर के बढ़ते ग्राफ से नहीं
अपहरण आत्महत्याओं और बलात्कार के तरीकों से भी
यह सदी दर्ज़ हो रही है इतिहास में
इतिहास के अंत के भाष्यकारों से नहीं
इतिहास में शामिल होने
और उसे बदल डालने की इच्छा से भी
आप जान सकते हैं इस सदी को

इतना इतना भरम
इतनी इतनी जुगत
बाढ़ की तरह बढ़ आई कुरुचियाँ
सारा कुछ इर्द गिर्द,
जिसका भी चेहरा छुओ
पानी की एक धार छूटती है
गर्म और नमकीन
वह या तो पीड़ित है या चिह्नित

भरमाने और उलझाने वाले सिद्धांतों से नहीं
असंतोषों के फूटते सैलाब से भी
जान सकते हैं इस महान सदी को।

2. संपर्क अभियान

सूचना क्रांति के महायुग में
संपर्क से तय होती है
वस्तुओं की गुणवत्ता

लोग पहले पैरों से चलते थे
दुपहियों तिनपहियों बसों और रेल से
कोई कोई वायुयान से भी

कई बार इच्छाएँ आकांक्षाएँ
डाकिया ले आता था
उसे आप जानते थे
आपको याद होगा
उसने अपनी बेटी के विवाह की
सूचना भी आपको दी थी

अब इच्छाएँ आकांक्षाएँ
दूसरों के इच्छित अनिच्छित संसार में
हथगोलों की तरह गिरती हैं
यह बात और है कि दूसरे भी
आपके साथ यही करना चाहते हैं

सूचनाओं की गत्यात्मकता पर रिझने वाले
अक्सर यह भूल जाते हैं
कि एक वाचाल और निष्ठुर आदमी की इच्छा
कमज़ोर और चुप्पे आदमी से
कई करोड़ गुना ज्यादा आक्रामक और मारक है

सूचनाओं का बोझ उठाए
दौड़ती भागती तरंगें
इतनी शालीन और निस्पृह भी नहीं हैं
वे अक्सर किसी की चाकरी में हैं

अचानक उसके परों पर सवार
लोकप्रियता के आसमान में
भ्रमण हेतु निकल आता है कोई
अभी-अभी जवान हुए देवदूत की तरह

अच्छा है कि वे अदीष्ट हैं
वरना आसमान देखने के लिए कोई सिर उठाता
तो उसे दिखाई पड़ते
संपर्क अभियान के रथ में जुते
तेजी से भागते
अरबों अरब साँप ।

 

3. दुनिया की महान उपलब्धियों के लिए एक शोकगीत

खालीपन दौड़ता है पसलियों के बीच धड़कते नन्हे से दिल में
दिन की रफ़्तार रातों में घुलती चली जाती है
हर बार आशंकाएँ चील की तरह झपट्टा मारती है
हर बार छूट जाता है आदमी अपनी परछायी के साथ
बिल्कुल अकेला

नमकीन रौशनी में चमकते थे जो लिपे-पुते चेहरे
अँधेरे के आँचल में सिर छुपाए देर तक सुबकते हैं
मृत्यु दिन-ब-दिन आसान हुई जाती है
बेकारों की टोली से कम होते जाते हैं कुछ चेहरे
ज़िन्दगी मिट्टी का ढेला

शेयर बाजार का साँड़ हुँकारता है किसानों की हड्डियों में
कम्प्यूटर की मंदी में अर्थहीन हो जाती है खाद की तेजी
जीवन भर थक-हारकर कमाता है किसान एक मजबूत फंदा
बँधा था जो आस की रस्सी से, टूट जाता है वह
ज़िन्दगी का रेला

4.सरकार

दोपहर का सूरज
ठीक सिर के ऊपर
ताप भी पैंतालिस डिग्री पार

लोग इस प्रचंड सूरज को झेल रहे हैं
सिर्फ इसलिए कि
विकल्प नहीं है इसका
फिर जाड़े में वह राहत भी तो देता है

लेकिन यही बात हमेशा
सरकार पर लागू नहीं होती ।

5. लोकतंत्र का धुआँ

एक लोकतंत्र है
जो खाली टिन के डिब्बे में
पड़े कंकड़ की तरह बजता है
खड़ँग्… खड़ँग्…

एक लोकतंत्र है
जो रायफल में भरी गोलियों की तरह धमकाता है
चोप्….

एक लोकतंत्र
अभी-अभी बिछायी गयी कोलतार की सड़क से उठकर
नमस्कार करवाता है

एक लोकतंत्र प्रधानमंत्री की मुस्कुराहट में मटकता है
एक लोकतंत्र कल मतदान की मशीनों में बंद हुआ है

एक लोकतंत्र में हत्यारे ही चुने जाते हैं बहुमत के साथ
एक लोकतंत्र में आतंकवादी और मुसलमान
एक ही कौम के रूप में चिह्नित किये जाते हैं

एक लोकतंत्र…
एक लोकतंत्र…
एक लोकतंत्र…

एक और लोकतंत्र है
जो आदिवासियों की भूखी आँतों से निकलकर
सड़क पर गिरता है
धडाम्….।

6. उन कायरों के नाम खत, जो धर्म-रक्षा की खातिर बंदूक सँभाले हुए हैं

कायरो,
कितना डरते हो तुम कथित ईश्वर की बनाई दुनिया में
कथित ईश्वर के लुप्त हो जाने के भय से
तुम्हारी सोच का दायरा
एक पागल कुत्ते की रैबीज़ जितना ख़ौफनाक है

कायरो,
क्या तुम बता सकते हो
कि किस ईश्वर के आख्यान में डूबकर
अपनी नसों में भरते हो यह घृणा ?
वैसे मेरा निजी अनुभव तो यही है
कि ईश्वर का नया नागर संस्करण
एक ध्वजा है जो घृणा सिखाता है
और हत्या के लिए उकसाता है

तुम बहुसंख्या के धर्म में धार्मिक बाना पहनकर रहते हो कायरो,
इतिहास में झूठ का पुलिंदा बाँधकर
अल्पसंख्यकों की असुरक्षा के भयभीत तर्कों पर सवार होकर
दिखावे की सहिष्णुता में आक्रामकता की मूँछ उमेठकर
जाति में वर्चस्व के छीजते भय की सामंती आशंकाओं
और सन्निपाती इच्छाओं से लैस
तुम अँधेरे से निकलते हो
रोशनी पर हमला करने के लिए

कायरो, तुम्हारा वह जहरीला टैंक
जो तुम्हें ईंधन उपलब्ध कराता है
बदल नहीं पाएगा दुनिया का हत्यारा पृष्ठ
क्या इतिहास से तुम कोई सबक नहीं लेते हो ?
क्या तुम देखते नहीं कि दुनिया के तमाम तानाशाहों की कब्रें
सूखी पत्तियों से ढँकी सुनसान पड़ी हैं?
सिराई गई हड्डियों को मछलियों-झींगों तक ने कुतर दिया है
और सभ्यता घूम-घामकर, भटक-बहककर
विचारकों के पास ही पहुँचती है आखिरकार

इसलिए कायरो,
अपने तानाशाहों की चरण पादुकाएँ देखना बंद करो
तानाशाहों के पक्ष में लिखीं चमकीली इबारतें
एक दिन अपनी चमक खो देंगी
तब तुम्हारे द्वारा की गई हत्याओं के पृष्ठ
तृण-पात की तरह उड़ेंगे
तब लिखा जाएगा कि तुमने इतिहास के एक कालखण्ड में
धूप के कत्ल की वाचाल कोशिश की थी ।

7. गिरना

चीज़ें अपनी गति से
लगातार गिरती रहती हैं
पीला पत्ता लहराकर चक्करदार गिरता है
पत्थर सीधी रेखा में
झट से

जंगल में काटा गया पेड़
ऐसे गिरता है
जैसे छापामार युद्ध का सैनिक कोई

मुख्यमंत्री के चरित्र के गिरने का ग्राफ
प्रधानमंत्री जैसा नहीं होता
न उनके सचिव एक जैसे गिरते हैं
और मंत्रियों का तो कहना ही क्या
उनका चेहरा कदमों पर इतना गिरा होता
कि मंत्रीत्व-काल में
कभी ठीक से दिखाई नहीं पड़ता पूरा

विपक्ष को तो पूरे पाँच साल
इसका अफसोस रहता है
हाय! मैं वैसा क्यों न गिर सका?

कारपोरेट घरानों के मालिक की निष्ठा
दलाल की तरह गिरती है
पुरानी इमारतों को बिल्डर ऐसे गिराता है
जैसे पहलवान अपने प्रतिद्वंद्वी को

शेयर बाज़ार तो धड़ाम से गिरता है
जब अमेरीकी पूँजी अपनी आँखें तरेरता है
उसके ठीक अगले दिन
वित्तमंत्री का बयान मय चेहरे के
अखबारों के मुख-पृष्ठ पर गिरता है

देशभक्त आजकल देश से गिरकर
भक्त पर अटके हुए हैं
और बाबाओं की तो अब रहने दें
वे जब तब धर्म की गंधाती व्यापारिक नाली में
गिरते ही रहते हैं
अब तो क्रांतिकारिता भी फेसबुक पर लाइक की आस में
हर सुबह गिर पड़ती है

गिरने का कारोबार उठान पर है अब
जो जितना गिरता है
उसकी आभा उतनी ही निखरती है ।

 

8. हिंदी प्रदेश

घर की बुनियाद हिलने लगी है
रंग-रोगन, पलस्तर और सजावट की
साँस उखड़ गई है
नृंशसताएँ अपने नंगेपन के साथ ठीक सामने हैं
कोई उजाड़ पास खड़ा मुस्कुरा रहा है
लगता है कि वह जल्द ही
अपनी विजय पताका फहराएगा
बस कुछ ऐसा ही लगता है
जब भी मैं सैद्धांतिक महानता से लिथड़े
अपने हिंदी प्रदेशों को देखता हूँ

इसकी खड़ी भाषा में
सांस्कृतिक रूप से उन्नत
और उम्रदराज भाषाओं की फुफकारें हैं
अनगिन भाषाओं की चीत्कारें
और दम तोड़ती चीखें भी

गीता प्रेस की केसरिया किताबों से
अपनी खुराक पाकर पल बढ़ा प्रदेश
थोड़ा फूलकर अँगरेजी में पुट्ठे खुजाता है
अकसर रेबेन का चश्मा आँखों पर चढ़ाए
हर नागरिक नियमों को धत्ता बताता
दंबगई को स्वाभाविक प्रकृति प्रदत्त अधिकार मानता
भावुक होकर लोकगीत में भाव बहाता है
यही तबका तो बनता है इस विशाल प्रदेश का निकृष्ट राजदूत

इसका एक और अलक्षित उपेक्षित तबका है
जो धर्म की ध्वजा लोकरीत में लहराता है
चुप रहता है मेहनत करता है
कारखानों से हकाल दिया जाता है
सब्ज़ी और फलों के ठेले लगाता है
पंजाब में खेत गोड़ता है
दक्षिण में तार बिछाता है
मुंबई में आटो चलाता है
यानी हर जगह दुरदुराया जाता है

तीज-त्योहार, हारी-बीमारी, शादी–बिहाव में
जब लौटता है देस
महुआ, हँड़िया, ठर्रा खेंचकर
मगही, छतीसगढ़ी, मैथिली, भोजपुरी में
मोटी गालियाँ बकता है
जो गालियाँ कम
लोक की कलपती आत्मा अधिक लगती है

ओ मेरी जनता, मेरे प्रिय जन,
मैं तुमसे कहता हूँ – सांप्रदायिकता के विरुद्ध
गोलबंद हो जाओ
तुम्हें मेनीफेस्टो पढ़कर सुनाता हूँ
लेनिन, फिदेल और चेग्वेरा के किस्से बाँचता हूँ
संविधान की याद दिलाता हूँ
लेकिन जहाँ तुम रहते हो
मेरी आवाज़ वहाँ पहुँचने के बहुत पहले ही
दम तोड़ देती है

तब मैं तुम्हारे उस भद्रजन को ढूँढ़ता हूँ
जिसके बारे में कहा जाता है
कि वे साहित्य, संस्कृति और कला को ज़िंदा रखते हैं
लेकिन वे तो सोशल मीडिया की क्रांति में व्यस्त हैं
या फिर मार्केज में ही खोये हैं दिन रात

तो ओ मेरे जन,
मैं तुम्हें ही देखता हूँ आशा से
तुमसे प्यार करता हूँ
तुमसे कुढ़ता हूँ, चिढ़ता हूँ,
तुम्हें बुलाता हूँ
लेकिन तुम आओ भी तो क्योंकर भला ?
तुम अचीह्नी नज़र से देखते हो मुझे
सर खुजाते हो
और गाड़ी पकड़कर चले जाते हो
पंजाब, हैदराबाद, बंगलोर, चेन्नई या दिल्ली !

 

 

(कवि बसंत त्रिपाठी, 25 मार्च 1972 को भिलाई नगर, छत्तीसगढ़ में जन्म. शिक्षा-दीक्षा छत्तीसगढ़ में ही हुई। महाराष्ट्र के नागपुर के एक महिला महाविद्यालय में अध्यापन के उपरांत अब इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी अध्यापन. कविता, कहानी और आलोचना में सतत लेखन. कविता की तीन किताबें, कहानी और आलोचना की एक-एक किताब के अलावा कई संपादित किताबें प्रकाशित.

सम्पर्क: 9850313062, ई-मेल [email protected]

 

टिप्पणीकार मृत्युंजय त्रिपाठी समकालीन हिंदी कविता का चर्चित नाम हैं। प्रकाशित किताबें:  ‘हिंदी आलोचना में कैनन निर्माण की प्रक्रिया का अध्ययन’ और ‘रसयात्रा’ नाम से प. मल्लिकार्जुन मंसूर की आत्मकथा का हिंदी अनुवाद. जन संस्कृति मंच से सम्बद्ध हैं। दिल्ली के अम्बेडकर विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं। सम्पर्क: [email protected])

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