Monday, January 17, 2022
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अणु शक्ति सिंह की कविताएँ स्त्री जीवन की जटिलताओं का मार्मिक विस्तार हैं

निरंजन श्रोत्रिय

स्त्री के एकाकीपन के अनेक संस्तर होते हैं-जटिल और पीड़ादायक। एक अनचाहे शून्य से भरी हुई स्त्री एक सुलगता सवाल है जिसे हल भी उसे ही करना है। युवा कवयित्री अणु शक्ति सिंह की कविताएँ औरत के इसी अकेलेपन और उदासी की व्यथा-गाथा है। कवयित्री ने इसके लिए नागर संवेदनों को चुना क्योंकि यही जीवन उनके करीब है। स्त्री के इस अकेलेपन में वेदना, शोक, कसक, नॉस्टैल्जिया, प्रेम और धोखा सब कुछ है।

अणु शक्ति ने इन कविताओं में प्रमुखतः एकल मातृत्व (सिंगल मदर या मदरहुड) को केन्द्रीय विषय बनाया है। सिंगल मदर को लेकर लिखी गई ये कविताएँ समकालीन हिन्दी कविता के लिए एक दस्तक भी हैं। ‘अकेली माँओं को मरने की इजाज़त नहीं’ अकेली माँ की दास्तान है। उसके लिए जिजीविषा किसी दूसरे के लिए शिफ्ट हो चुकी है- ‘वह सोचती है/ इन रेखाओं को लम्बा होना ही था/ बगल में सोते बच्चे की खातिर।’

हालांकि यह बात एकल पिता के लिए भी लागू होती है। ‘मेरे पुत्र के पिता’ कविता दरअसल विच्छेद का दंश झेलती स्त्री की खूबसूरत प्रेम कविता है। इसमें नॉस्टैल्जिया अपने पति के लिए एक प्रेम और सखा भाव के साथ आता है। यहाँ प्रतिशोध और अवसाद के बजाए त्रासदी है-‘तुम मेरे पति थे कभी/ मेरे पुत्र के पिता रहोगे सदैव।’

‘प्रेमरत स्त्रियाँ’ प्यार में डूबी स्त्रियों का बखान है। रेखांकित करने योग्य यह कि ये स्त्रियाँ ‘प्यार अंधा होता है’ जैसी घिसी उक्तियों के बजाय ‘मायोपिक हो जाती हैं’ जैसी नई वैज्ञानिक शब्दावली के साथ हैं। अंधत्व की जगह धुँधला विवेक है जो कि एक व्यावहारिक यथार्थ है। ‘मार्च क्लोजिंग के इंतज़ार में’ एकदम नया विषय है। यह कविता थोड़ी अंडरटोन अवश्य है लेकिन काव्य-उपादानों और बिम्बों के संयोजन से नितांत नई भाषा गढ़ती है। एकाउंट की भाषा का जीवन क्षणों ये यह तादात्म्य और समांतरता देखते बनती है-‘लग गया हो उम्मीद पर उम्मीद से ज़्यादा टैक्स।’ ‘अबोला’ भी नॉस्टैल्जिया को केन्द्र में रखकर रची प्रेम कविता है जिसमें छूटे और छूटते हुए को पुनः पा लेने का एक बेचैन प्रश्नाकुल मन है-‘क्या तुम तब भी गुनगुनाओगे ?’ फिल्मी गीतों और दृश्यों के माध्यम से प्रेम और बेचैन का एक जीवंत दृश्यबंध इस कविता के जरिये रचा गया है। ‘तत्वमसि’ व्यक्तित्वांतरण को केन्द्र में रखकर लिखी गई प्रेम कविता है। यहाँ एक खिलंदड़ा भाव भी है लेकिन सावधान पाठ के बाद यह प्रेम में अपूर्णता की व्याप्ति की कविता हो जाती है। प्रेम आपके आधे को पूरा तो करता ही है लेकिन वह दो व्यक्तित्वों की परस्पर आवाजाही भी तो हो सकता है।

‘बीतना एक भारी दिन का’ में भी रिश्तों के टूटन की छाया है जब बच्चा स्कूल से घर के बजाय ‘डे केयर’ लौटता है। दुःख और छटपटाहट का यह अनवरत सिलसिला जब दिनचर्या ही बन जाए तो -‘एक भारी दिन खत्म होता है/ दूसरे की नींव डाल कर।’ यह कविता अपने विक्षोभ से पाठक को जकड़ लेती है।

‘एकल माँ-बाप के बच्चे’ भी उसी व्यथा का मार्मिक विस्तार है। बच्चों का अधूरा अभिभावक संसार उन्हें किस कदर बचपन विहीन कर देता है, यह कविता उसी यथार्थ को अभिव्यक्त करती है। समय से पहले ही बड़े हो जाने की मजबूरी कविता में ठोस ब्यौरों के साथ आती है-एक मार्मिक अनुभूति से आपको झिंझोड़ती! ‘चालू औरत’ पुरूष प्रधान समाज द्वारा स्त्रियों की ‘मॉरल पुलिसिंग’ करती प्रवृत्ति पर सीधा प्रहार है। औरत के स्वातंत्र्य, स्वायत्तता और अस्मिता को प्रचलित मानकों के नीचे कुचलने की साजिशों को यह कविता बेनकाब करती है।

‘मित्र पत्नी’ मज़ाहिया अंदाज़ में लिखी कविता जरूर है जो हमें गुदगुदाती है लेकिन कहीं न कहीं पुरूष दृष्टि का पता भी देती है। ‘ऑफिस बॉय’ कविता में हमारी दफ्तरी कार्यशैली, अहं और पदानुक्रम की मनोवैज्ञानिक पड़ताल की गई है। हमारे सिस्टम में यह प्रताड़ना एकदिशीय ही होती है। ‘घर से लौटना’ कविता में नगरीय विस्थापन की विवशताएँ और दर्द है। हमारे सम्बन्धों की ऊष्मा और आत्मीयता किस कदर कंक्रीट जंगल में फैले आर्थिक जंजाल में दम तोड़ रही है, यह कविता उसका सच्चा बयान है।

युवा कवयित्री अणु शक्ति सिंह की ये कविताएँ दाम्पत्य जीवन की जटिलताओं, स्त्री के अकेलेपन और छीजते रिश्तों से उपजी उदासी की मार्मिक कविताएँ हैं। एकाकीपन और टूटन की इस अभिव्यक्ति में स्त्री की वेदना तो उभरती है लेकिन इस ‘विपत काल’ के लिए उनमें कोई गुस्सा या घृणा नहीं है। मुझे गोविन्द निहलानी की फिल्म ‘दृष्टि’ की डिम्पल कापड़िया का वह संवाद याद आता है-‘मैं नफरत करने में माहिर नहीं।’

अणु शक्ति सिंह की कविताएँ

  1. अकेली माँओं को मरने की इजाज़त नहीं

आधी रात के बाद भी
नींद आँखों के दूर बहुत दूर है…
बुखार में तपता हुआ बदन
दर्द से अकड़ते हुए
पुकारना चाहता है कई-कई नाम

रात इतनी सूनी है कि
मन का स्वर भी कुंद हो जाता है

ऐसे ही सूने पलों में
सबसे करीब लगती है
मोबाइल फोन की चमकती स्क्रीन
दुनियादारी में मशगूल हो जाना
दर्द को भुलाने का बेहतरीन नुस्खा है।

स्क्रीन पर कई खबरें चमकती हैं
पहली खबर है एक माँ की
जिसे कैंसर लील गया था नींद में
और बगल में सोती रही थी
तीन साल की छोटी बच्ची…

सिहर उठती है फोन थामी उँगलियाँ
खबर पढ़ रही एकल माँ की
सहम कर अपना हाथ देखती है
ज़िन्दगी की रेखा खूब लम्बी है
यह सुकून की बात है…

वह सोचती है
इन रेखाओं को लम्बा होना ही था
बगल में सोते बच्चे की खातिर
ईश्वर एकल माँओं को मरने की इजाज़त नहीं देता
उसे भी बनाए रखना है संतुलन!

2. मेरे पुत्र के पिता

मेरे पुत्र के पिता
कई साल बीत गए हैं
उस दिन को
जब मैं और तुम
आखिरी बार साथ बैठे थे…

पूर्वोत्तर की चढ़ाइयों में महीनों बिताकर तुम
लौटे थे महीने भर की छुट्टी पर
मैंने सूटकेस खोलकर
सबसे पहले निकाला था
तुम्हारा ऑलिव ग्रीन यूनीफॉर्म
तमाम विरोधाभासों के बावजूद
तुम उस यूनीफॉर्म में
भले लगते थे मुझे…

कभी तुम्हारा कॉलर ठीक करते हुए
कभी क्रीज बिठाते हुए
मेरा प्यार उमड़ आता था
हरे रंग से नहाए उस कैमोफ्लॉज पर
हम दोनों के बीच का सारा प्यार
मैं उँडेल देती थी तुम्हारी पोषाक पर
मोड़ने से पहले चूम लेती थी
कंधे के स्ट्रैप,
तुम्हारी जैतूनी बेल्ट और
तुम्हारी टोपी
कि मेरी अनुपस्थिति में
मेरा नेह तुम्हारे इर्द-गिर्द घूमता रहे

अब यह बात पुरानी हुई
अब हम बात नहीं करते हैं
अदालती सम्मन भेजा करते हैं
तारीखों पर तारीख की दुहाई देकर
एक-दूसरे की जीत की
खुशियाँ मनाया करते हैं
पर वह कल से पहले तक की बात थी…

तुम मेरे पति थे कभी
मेरे पुत्र के पिता रहोगे सदैव
उससे पहले सैनिक हो
वही सैनिक जिसकी जैतूनी पोषाक
मुझे सबसे अधिक इंद्रधनुषी लगती थी
मेरे प्रिय सैनिक
हम समानान्तर चल रहे दो लोग हैं
जिन्हें अब कभी नहीं मिलना है
किंतु मेरा नेह मेरी संवेदनाएँ
इस विपत काल में
अचानक ही तुम्हारे साथ हो गई हैं…

मुझसे कह रही हैं
सब इंतजार करेंगे
तलाक के कागजों पर अदद हस्ताक्षर भी
उत्साह बढ़ाने के तमाम शब्द
कहीं लुप्त हो गए हैं
अब बस यही दुआ बची है कि
तुम प्रखर रहना
प्रखर लौटना अपने घर
हर बार छुट्टी में…
वह घर जो कभी मेरा था
वहाँ जाने कौन तुम्हारे सूटकेस खोलता होगा…
तुम्हारा लौटना जरूरी है
मेरे कहीं भी होने से ज्यादा, बहुत ज्यादा।

3. प्रेमरत स्त्रियाँ

प्रेम में रत स्त्रियाँ
मायोपिक हो जाती हैं
कि धुंधला जाती हैं
दूर की सभी बातें
और उन्हें दिखती हैं
सिर्फ़ वे चीजें जो सामने हो…

निकट दृष्टि दोष से व्याप्त प्रेमिल आँखें
हर बिम्ब को दोहरेपन में देखती हैं…
आँखें मीचते हुए
सब साफ देखने की कोशिश में
नहीं दिखती हैं वे तमाम चीजें
जिनका प्रेम से वास्ता नहीं…

आधी नज़रों से दुनिया देखती इन आँखों में
भर जाती है झुंझलाहट और ईर्ष्या
हर बार
जब भी उनके बिम्ब के मध्य खड़ा दिखता है
कोई प्रतिरोध…
संभवतः अतिशयोक्ति हो किन्तु
साफ-साफ न देख पाने का यह दर्द करीबन
उतना ही कष्टप्रद है
जितना डिमेन्शिया…

प्रेम पीड़ित स्त्रियाँ चाहती हैं उपचार मगर
आँखों पर चढ़ा प्रेम का चश्मा
इतना कारगर नहीं होता कि
मुकम्मल कर पाए
छः बाय छः की नज़र…।

4. मार्च क्लोजिंग के इंतज़ार में

उस महीने जब पेड़ से पत्ते बिखर रहे होते हैं
कुछ टूटता जाता है हमारे अंदर भी
मार्च की बीतती अफरा-तफरी में
दिन कुछ अजीब-सा होता जाता है
जैसे खीरे की जड़ में कुछ कड़वा-सा रह जाता है
छूट जाते हैं मोह के रास्ते
नेह के दरवाजे किर्र-किर्र करने लग जाते हैं।
सब पा लेने की ज़िद में
बहुत कुछ छूटता जाता है…
जैसे निवेश की कोई पर्ची भरने को रह गई हो
लग गया हो उम्मीद पर उम्मीद से ज़्यादा टैक्स
इसी महीने जब अकाउंट्स वाले
सब निबटा रहे होते हैं…
हमारे भीतर का भी कुछ जल रहा होता है
पार्क में जलाए जा रहे सूखे पत्तों के साथ…।

5. अबोला

नीम अकेलेपन में
जब मैं खो चुकी होऊँगी
दूर जा चुकी होऊँगी
सारे खयालों से
किसी फिल्मी सीन में
अपने आप को ढूँढ रही होऊँगी
तब क्या तुम्हें मेरी याद आ रही होगी ?
कुछ गाने बज रहे होंगे
कुछ तेज, कुछ धीमे
तुम भी कुछ गुनगुना रहे होगे
पर मैं नहीं होऊँगी …
तुम्हें सुनने को
क्या तुम तब भी गुनगुनाओगे ?

6. तत्वमसि

कभी-कभी मैं चाहती हूँ ‘तुम’ हो जाना
जब मैं ‘तुम’ बन जाऊँ, तुम ‘मैं’ बन जाना
जब तुम ‘मैं’ बन जाओगे
थोड़े-से झक्की भी हो जाओगे
थोड़े निर्भीक थोड़े आशिक
जब तुम ‘मैं’ बन जाओगे
प्यार करना भी सीख जाओगे
तब पता है मैं क्या करूँगी ?
मैं ‘तुम’ बनकर खुद पर हँसूँगी
दूर से तुम्हें देखूँगी
और पलट कर खो जाऊँगी
किसी भीड़ में
जहाँ मुझे वापस ‘तुम’ न होना पड़े।

7. बीतना एक भारी दिन का

सर पर लोहे के भारी हथौड़े-सा बजता हुआ
खत्म होता है एक भारी दिन…
अपने आखिरी लम्हों में
आँखों के किनारे नमी छोड़ता हुआ

भारी दिन औचक ही भारी नहीं होता
कई दिन और महीनों का बहुत कुछ
इकट्ठा हो जाता है अचानक उस दिन
जब हँसने की तमाम कोशिशें दब जाती हैं
गुमनाम लांछनों के आगे

अथाह कामों के बीच
गाड़ी के शोर में
कभी तेजी से बीतता दिन…

कभी बस सरकता दिन
स्कूल बस से घर आने की जगह
डे केयर रवाना हो चुके बच्चे की चिन्ता में
इस कदर भारी होते दिन को थम जाना था
उतार देना था दिमाग से तमाम बोझ
रूक जाना था समय की डोर को पकड़ कर
दे देना था अभयदान चिंता मुक्ति का…
किन्तु धरती की धुरी तक कौन पहुँचा है?
एक भारी दिन खत्म होता है
छूसरे की नींव डाल कर…।

8. एकल माँ-बाप के बच्चे

कुछ बच्चे सीख लेते हैं
समय से पहले समझदार हो जाना
पार कर लेना अक्ल की वह महीन धारी
जिसे बचपन से ढका रहना था…
इन बच्चों में कुछ होते हैं
एकल माँ-बाप की संतान
कभी ममता से वंचित
कभी पितृत्व रहित
इन बच्चों में छुपा बैठा होता है
कोई समझदार वयस्क …

ऊँघती माँओं के कमरे की बत्ती बन्द कर देना
बीमार पिता को सुबह की चाय दे जाना
कहना सो जाओ कुछ मिनट
कि मैं रख लूँगा अपना खयाल
लगा लूँगी अपना बस्ता
कि तुम्हें हो थोड़ा आराम

न जाने कहाँ कि ज़िद पाले ये बच्चे
बन जाते हैं नमक की पोटली-से
पिघल जाते माँ की तकलीफ देखकर
घुल जाते उनके आँसुओं मंे
ठीक वैसे ही
जैसे माँएँ घुलती हैं बच्चे की चिन्ता में

जाने कहाँ से सीख जाते हैं ये बच्चे
उम्रदराज हो जाना अपने ही पालकों से

जैसे वडर््सवर्थ की कविता के बच्चे
होते हैं अपने ही जनक के पिता…।

9. चालू औरत

लोराती हुई आँखों को
जबरदस्ती सुला कर
हर सुबह वह उठती है
सूजी हुई आँखों के साथ

घर के काम निबटाते
लंच बॉक्स पैक करते
स्कूल-बैग लगाते
देख लेती है अड़ोस-पड़ोस के
सारे अच्छे पिताओं को
अपनी संतानों के हाथ पकड़े
बस के इंतजार मंे
हँसते-गाते

गेट खोलते हुए वह देखती है
कई जोड़ी आँखें
वह खींचती है अपना शॉटर््स
तनिक और नीचे
ताकि बचा सके अपने पैरों को
लोलुप नज़रों से और
अपने चरित्र को किसी अतिरिक्त प्रमाणपत्र से…

वह चरित्र जिस परित्यक्ता होने का
लाल ठप्पा दूर से ही टहकता है
इस कदर कि निगाहें बचा कर
उसके भरे-पूरे शरीर पर
नज़र गहा रहे मर्द कहते हैं अपनी पत्नियों से
‘चालू औरत है,
इससे और इसके बच्चे से दूरी बरतना’।

10. मित्र-पत्नी

घर से निकलते हुए
मैं अक्सर ठिठक जाता हूँ
जिस वक्त मैं बाहर निकलता हूँ
ठीक उसी वक्त वह बालकनी में होती है
भीगे कपड़े फटकारती हुई…
उसके धुले कपड़े की गंध
भर जाती है मेरे नथुनों में
मदहोश मैं सोचता हूँ कि क्या
उसकी गंध भी ऐसी ही होगी
मैं घड़ी देखता हूँ
मुझे देर बस होने वाली है
वह नीचे झाँकती है
और मैं कनखियों से उसे वापस देखता हूँ
मैं और उसका पति
हम दोनों साथ चल पड़ते हैं
मित्रों की भार्याएँ यूँ ही दूर से रिझाती हैं।

11. ऑफिस बॉय

जब भी वह मुझे ‘यस सर’ कहता है
मेरा सीना फूल जाता है
सुबह जब मैं उसकी बनाई चाय को
वापस लौटाता हूँ
रोमांचित हो उठता हूँ
मुझे याद आती है बीती शाम
जब मैं बॉस के केबिन से
टका-सा मुँह लेकर लौटा था..
मैंने झपटे में देखा था
वह ऑफिस बॉय मुस्कुरा रहा था
मुझे याद आता है
मैं भी तो हुक्त चलाने के काबिल हूँ
मैं उसे तीखी, नमकीन, मीठी चाय बनाने को कहता हूँ
वह हतप्रभ मुझे देखता है…
मैं कहता हूँ ‘गेट लॉस्ट’
वह मुँह लटका कर चला जाता है
मैं संतोष से भर जाता हूँ।

12. घर से लौटना

हर बार घर से लौटते वक्त
माँ पकड़ाती है मुझे
ठेकुए और मठरी का डब्बा
और पिताजी देते हैं
स्नेह का आलिंगन
मैं माँ से डब्बा लेते वक्त देखता हूँ
उसकी उँगलियों की पोर को
जो हो चली हैं
आगे से थोड़ी खुरदरी
शायद सालों पहले
हुई थी उसकी आखिरी देखभाल
पिता से आलिंगन लेते वक्त
मैं महसूस करता हूँ बिछड़ जाने का दुख
मैं रो उठता हूँ अंतर्मन में
मैं फैसला लेता हूँ
अब इस बार
अकेला नहीं जाऊँगा
इस खयाल के साथ ही
मुझे आता है एक और खयाल
दो कमरों के मकान में
कहाँ किसको रख पाऊँगा
मेरी निजता का क्या होगा
क्या होगा आधुनिक सज्जा का
क्या माँ की सूती साड़ी
पिताजी का पुराना पायदान
उसमें खप पाएगा ?
सप्ताहांत की छुट्टियाँ
यूँ ही बर्बाद हो जाया करेंगी
मैं अंदर तक डर जाता हूँ
भूल जाता हूँ
जो भी कुछ पल पहले सोचा था
उठाता हूँ मठरी का डब्बा
और पिता के आलिंगन से
निकल पड़ता हूँ
मेरी मंथर गति त्वरित हो जाती है
मैं वापिस आना चाहता हूँ
अकेला, निरा अकेला।

विद्यापति पुरस्कार 2019 से पुरस्कृत कवयित्री अणु शक्ति सिंह, जन्मः 19 अगस्त 1985, सहरसा (बिहार), शिक्षाः माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से पत्रकारिता स्नातक. प्रकाशन – दो उपन्यास शर्मिष्ठा और स्टापू , भिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। सम्पर्क: singh.shaktianu19@gmail.com

टिप्पणीकार निरंजन श्रोत्रिय ‘अभिनव शब्द शिल्पी सम्मान’ से सम्मानित प्रतिष्ठित कवि,अनुवादक , निबंधकार और कहानीकार हैं. साहित्य संस्कृति की मासिक पत्रिका  ‘समावर्तन ‘ के संपादक . युवा कविता के पाँच संचयनों  ‘युवा द्वादश’ का संपादन  और शासकीय महाविद्यालय, आरौन, मध्यप्रदेश में प्राचार्य  रह चुके हैं. संप्रति : शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गुना में वनस्पति शास्त्र के प्राध्यापक।

संपर्क: niranjanshrotriya@gmail.com)

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