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कविता

दिनेश कुमार शुक्ल ने किया अपनी कविताओं का लाइव पाठ

समकालीन जनमत से मजदूर दिवस के लाइव कार्यक्रम की दूसरी कड़ी में आज 1 मई को सांय 4 बजे से हिन्दी जगत को ‘जाग मेरे मन मछंदर’ और ‘प्रेम की पाती’ जैसी माइल स्टोन रचनायें देने वाले कवि दिनेश कुमार शुक्ल लाइव हुए | उन्होंने शुरुआत कवित्त छंद में लिखी कविता ‘खोलो आँख’ से की | यह कविता मनुष्य के अंतर्जगत और प्रकृति के साथ उसके अभिन्न सम्बन्ध को बयान करती है:

खोलो आँख खोलो आँख

आँखों की अपार पारदर्शिता के रंग रंगी

व्योम की है नीलिमा हरीतिमा धरा की है

वाणी है विद्रोह ज्यों मघा के मेघ की हो झड़ी

गूँज रही सोंधी-सोंधी गंध उर्वरा की है

जीवन है अग्नि का अपार पारावार

इसे पार करने की एक युक्ति

कविता की है |

खोलो आँख खोलो आँख

दृष्टि से तुम्हारी बदलेगा दृश्य

गहरी हजारों साल नींद जड़ता की है |

दिनेश कुमार शुक्ल अद्भुत कविता पाठ के धनी हैं । उनकी वाणी में ध्रुपद गान में बजने वाले मृदंग जैसी गूँज है । उनके मुंह से कविताओं को सुनते हुए नाद सौन्दर्य को सहज ही महसूस किया जा सकता है ।

अपनी अगली कविता ‘भाई कवि’ में कवि ने रचना और रचनाकार के सम्बन्ध को एक अलग ही नजरिये से देखा है । यहाँ रचयिता की आँख रचना से ज्यादा महत्वपूर्ण है –

‘रचना से बड़ी है रचयिता की आंख

जहाँ कभी डूबता है सत्य

कभी सत्य उतराता है’

कविता को सुनते हुए सहज ही दिनेश जी के प्रिय मित्र कवि गोरख की पंक्तिया दिमांग में कौंध उठती हैं : ‘ये आंखे हैं तुम्हारी तकलीफ का उमड़ता हुआ समंदर..’ जिससे कवि को दुनिया को बदल देने की प्रेरणा मिलती है । तमाम रचनारत कवियों के लिए कवि का यह सन्देश एक चुनौती है कि जनता की आँखों में उमड़ने वाली तकलीफ का सच उनकी आँखों में उतरायेगा या डूबेगा ?

जनमत के फेसबुक पेज पर यह लाइव कविता-पाठ जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा था श्रोताओं की फरमाइश भी उसी क्रम में बढती जा रही थी । बार –बार प्रेम की पाती और जाग मेरे मन मछंदर जैसी कविताओं के पाठ की मांग होने लगी थी । इसी बीच दिनेश जी ने एक और बहुत ही महत्वपूर्ण कविता का पाठ किया जिसका शीर्षक है – आगमन | यह कविता साम्राज्यवाद और फासीवाद के खतरे को बहुत बारीकी से उकेरती है | आज के समय में यह कविता पंक्ति दर पंक्ति महसूस की जा सकती है –

‘जंगी बेड़ों पर नहीं न तो दर्रा खैबर से

आएंगे इस बार तुम्हारे भीतर से वे

धन धरती ही नहीं तुम्हारा मर्म

तुम्हारे सपने भी वो छीनेंगे इस बार…’

इस कविता के बाद श्रोताओं की भारी मांग पर कवि ने ‘प्रेम की पाती’ कविता का सुन्दर गीतात्मक पाठ किया | यह कविता कवि कर्म की रूप रेखा और उसकी प्रतिबद्धता को बड़ी ही सहजता से कहती चलती है लेकिन अंतर्वस्तु में देखें तो कवि को बड़ी चुनौती और उतरदायित्व का भार भी सौंपती चलती है । सबसे आखीर में उन्होंने ‘जाग मेरे मन मछन्दर’ कविता का पाठ किया जो कि उनके प्रिय मित्र व कवि गोरख पाण्डेय की स्मृति में लिखी गई है । यह कविता लोकतंत्र की त्रासदी की कविता है जिस पर अलग से एक पूरा अध्याय लिखा जा सकता है ।

इस पूरी प्रस्तुति को समकालीन जनमत के पेज पर जाकर अथवा नीचे दिए गए लिंक पर जाकर देखा सुना जा सकता है.

Gepostet von Samkaleen Janmat am Freitag, 1. Mai 2020

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