कद से बड़े कैनवास : श्वेता राय के चित्र

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राकेश कुमार दिवाकर

उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में मुहम्मदाबाद छोटा सा शहर है. उस छोटी सी जगह से एक लड़की का आधुनिक कला जगत तक का सफर कई मायनों में असाधारण है. कदम दर कदम चुनौतियों से जुझती श्वेता राय के कैनवास का कद आज निस्संदेह श्वेता से बड़ा है. पुरुषवादी सामंती मानसिकता वाला एक पिछड़ा समाज लड़कियों के लिए एक कैदखाने की तरह होता है. वहां से किसी लड़के को भी कला की आधुनिक दुनिया में पहुंचना बहुत दुष्कर कार्य होता है और लड़की का पहुंचना तो एक कल्पनातीत आश्चर्य की तरह है.

30 वर्षीय श्वेता राय के पिता भुनेश्वर राय व्यवसायी तथा मां कुन्ती देवी गृहणी हैं. उनकी प्राथमिक शिक्षा आदर्श शिशु मंदिर तथा राजकीय बालिका उच्च विद्यालय से हुई. वहां उनका जुड़ाव संभावना कला मंच से हुआ. कला गुरु राजकुमार सिंह की प्रेरणा से श्वेता ने महात्मा गांधी काशी विद्या पीठ वाराणसी से कला में स्नातक तथा सर जे जे स्कूल आॅफ आर्ट्स मुम्बई से स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की. इनकी शादी बृजनाथ राय से हुई जो भारतीय सेना में हैं. श्वेता फिलहाल मुम्बई में रहकर चित्रकारी कर रहीं हैं.

गलाजत भरी वर्जनाओं और बेटी, बहन, बहू, पत्नी, माँ की कठीन जिम्मेदारियों के आगे बेबस हो जाना बहुत स्वभाविक है मगर उस बेबसी के भीतर मौजूद बेचैनी को कैनवास पर चित्रित कर देना श्वेता राय हो जाना है.  श्वेता के तुलिका संचालन में, बेचैन कर देने वाली गति में वही क्षोभ, गुस्सा और बेचैनी है जिसमें सुखद सृजन के रंगीन सपने बसे हुए हैं. यही ताकत श्वेता के बोल्डनेस का भी राज है.  बड़े आकार के कैनवास पर एकदम आत्मविश्वास के साथ वह तरह तरह की आकृतियाँ गढ़ती हैं और फिर रंगों को बेबाकी से लगाती हैं और तब तक लगाती हैं जब तक कि वे बोलने न लगें. माध्यम की व्याकरणिक सीमा में रहना श्वेता को पसंद नहीं है. वह एक के ऊपर कई माध्यम का प्रयोग कर डालती हैं. इसलिए उनके अधिकांश चित्र मिश्रित माध्यम के हैं.

उनकी आकृतियों में बड़ी-बड़ी आंखें जैसे सपनों से लबरेज हैं. उनके एक चित्र में, परी सरीखी एक स्त्री एक पौधा लिए उड़ सी रही है, उसके पीछे एक विमान जैसी धूसर पीली रंग की आकृति है पृष्ठभूमि गहरा नीला और काला है जो अत्याधिक गहराई उत्पन कर रहा है. उस आकृति के हाथ में जो पौधा है वह सपनों का पौधा भी हो सकता है और जिम्मेदारियों पौधा भी.  इस चित्र की वर्णयोजना इतनी लयात्मक है कि नजर हटती ही नहीं और बोल्ड मगर गतिशील लयात्मक स्ट्रोकस् तो जैसे जादुई हैं. आम तौर पर बोल्ड स्ट्रोकस् लयबद्ध नहीं होते लेकिन श्वेता के यहाँ वे लयबद्ध हैं. लगता है जैसे वे ब्रस और स्पेचुला के अलावे हाथ से भी लीप डालती हैं जैसे औरते गोबर- मिट्टी से घर आंगन लीपती हैं.

एक दूसरा चित्र जिसकी पृष्ठभूमि में भी नीले रंग की ही एक अलग छटा है, उसमें दो लाल रंग की स्त्री आकृतियाँ है. उसमें एक आकृति जैसे दूसरे को उड़ना सीखा रही है. सीखने वाली आकृति के बकायदा पंख भी निकले हैं तथा हाथ में एक फूल है. सिखाने वाली आकृति के गर्भ में जैसे कोई सपना पल रहा है.

कैनवास के नीचे की तरफ से कई फूल खिले हैं और पीछे विशाल आसमान है जैसे अनंत आसमान के क्षितिज से होड़ करने की तैयारी हो रही है। पृष्ठभूमि में नीले रंग की छटा की प्रमुखता के साथ हरे रंग की झलक भी मिलती है और गुलाबी रंग की भी। तीनों प्राथमिक रंग के बीच वाले वितान को जैसे श्वेता छूती हैं.

 

माध्यम के व्याकरण के साथ ही वह तकनीकी का भी नया व्याकरण गढ़ती हैं. संयोजन तो उनके लिए बस एक खेल है. श्वेता राय के चित्र शायद विभिन्न स्तर के कायदे-कानून को एक विस्तार देते हैं. चाहे वह कला- स्कूल के कायदे-कानून हों या समाजिक ताने-बाने के. इसके गवाह उनके चित्र हैं.

श्वेता राय

श्वेता जोर देकर कहतीं हैं मेरे चित्र आंतरिक भावना की अभिव्यक्ति है. वह सही भी कहतीं है मगर वो आंतरिक भावनाएँ भी बाहरी दुनिया से ही बनती- बिगड़ती हैं। जब वे अभिव्यक्त होती हैं तो वह बाहरी दुनिया को प्रभावित भी करती हैं. श्वेता के चित्रों के साथ भी यही है.

अग्र भूमि में यदि उनकी अनुभूति, उनकी प्रतिक्रिया, उनके सपने हैं तो साथ ही पृष्ठभूमि में राजनीतिक समाजिक स्थिति भी दर्ज हो चुकी हैं. अगर श्वेता की कोई आकृति उड़ान भरती है तो निस्संदेह वह यर्थाथ की जमीन से हीं कल्पना के आसमान की क्षितिज छूना चाहती है. आखिर वह “कनक तिलियों ” से टकराती भी हैं और उसे तोड़ना भी चाहती हैं.

 

आधुनिक कला बाजार की भयभीत कर देने वाली चमक, या निगल जाने वाली खोह में, सलामत बच कर अपनी पहचान बनाने के लिए जिस बोल्डनेस और आत्मविश्वास की जरुरत है वह श्वेता में मौजूद है. यह उनकी बड़ी विशेषता है.
आधुनिक कला-जगत में श्वेता की हिस्सेदारी निसंदेह बहुत उत्साहित करने वाली है. उम्मीद है श्वेता राय जैसी बोल्ड चितेरी इसे बखूबी मजबूती और स्थायित्व प्रदान करेंगी.

 

[author] [author_image timthumb=’on’][/author_image] [author_info]लेखक राकेश कुमार वरिष्ठ चित्रकार हैं. आरा (बिहार) में रहते हैं और जन संस्कृति मंच से जुड़े हैं. [/author_info] [/author]

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