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‘ हम 26 जनवरी तक का इंतजाम करके आए हैं, अब हम जाने वाले नहीं हैं ’

नीलिशा


 

04-12-2020

मेरी शिफ्ट खत्म होने की वाली थी और मैं ऑफिस लौटने की तैयारी कर रही थी, तभी मुख्यालय से आदेश आया कि किसान आंदोलन कवर करने के लिए तुरंत जल्दी-जल्दी टिकरी बॉर्डर पहुंचो। गाड़ी में पीछे बैठे हमारे कैमरापर्सन तपाक से ड्राइवर से बोले, ‘चल, भइया दौड़ा ले, अब तो 12 बजेंगे। सेंट्रल दिल्ली से डेढ़ घण्टे में हम टिकरी बॉर्डर पहुंच गए।

दिल्ली पुलिस की इंटरनेशनल बॉर्डर जैसी बैरिकेडिंग हमें दूर से ही दिखाई देने लगी। मैंने ड्राइवर और कैमरापर्सन से कहा, ‘शायद किसानों का प्रदर्शन यहीं चल रहा होगा।’ मैंने बैरिकेड पर खड़े दिल्ली पुलिस के जवान से पूछा, ‘क्या किसान यहीं पर आंदोलन कर रहे हैं। हमें कवरेज के लिए जाना है।’ उसने कहा, ‘हां, आगे किसान बैठे हैं, लेकिन आपको गाड़ी यहीं पर खड़ी करनी होगी।’ मैंने कहा, ‘आप लोगों की गाड़ी तो खड़ी है। हम भी अंदर कहीं सुरक्षित जगह पर गाड़ी लगा लेते हैं।’ जवान ने हाथ से इशारा करते हुए कहा, ‘ठीक है, अंदर की तरफ लगा लीजिये, लेकिन इसके आगे एक और बैरिकेड है, आप उसके आगे गाड़ी से नहीं जा सकती हैं।’

हमने आगे जाकर गाड़ी लगाई। फिर वहां से आगे बढ़ गए। आगे गए तो देखा कि मोटे-मोटे रस्सों से बंधे बैरिकेड्स लगाए गए थे और इनके ऊपर तार बांधे गए थे, जिससे कि किसान अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर पार करके दिल्ली में घुसपैठ न कर सकें। बैरिकेड से पहले बड़ी संख्या में दिल्ली पुलिस के जवान तैनात थे। हम किनारे से निकलकर किसानों तक पहुंचे। तब तक रात के दस बज चुके थे। किसान अपनी ट्रॉली में रजाई-कंबल ओढ़कर लेट गए थे। मैंने एक किसान से पूछा, जो शायद पंजाब से थे, ‘क्या आप लोगों ने खाना खा लिया।’ इस पर उन्होंने जवाब दिया, ‘हां जी। खाना खा लिया। आप लोग थोड़ा पहले आते तो आप लोगों को भी खाना खिलाते। हम तो शाम होते ही खाना बना लेते हैं, क्योंकि रात में ज्यादा काम हो नहीं पता है।’ मैंने मुस्कुराते हुए कहा, ‘शुक्रिया, वैसे मैं खुद के खाने के लिए नहीं पूछ रही थी। मैं आप लोगों के लिए पूछ रही थी।’

तभी एक किसान भाई बाहर निकलकर आए और बोले, ‘आप ही बताइए हम क्या करें। सरकार कह रही है कोरोना है, आंदोलन मत करो। डरा-डराकर लोगों को मार रही है। आपको कहीं कोरोना दिख रहा है। हमारे तो पूरे गांव में किसी को भी कोरोना नहीं है। सब झूठ है। सब बकवास है।’ मैं उनकी बातों को गौर से सुन रही थी। अचानक से हवा और ठंडी हो गई। उन सज्जन ने अपना कम्बल कानों पर और कस लिया। बाकी किसान भाई भी रजाइयां ओढ़े बैठे थे। इधर हमारी बातें चल रही थीं तभी एक सरदार जी स्टील की टंकी में चाय लेकर आए और सबको बांटने लगे।

उन्हें चाय बांटते देख हमारे कैमरापर्सन उन्हें अपने कैमरे में रिकॉर्ड करने लगे। तभी चाय वाले सरदार जी को नजर मेरी माइक आईडी पर पड़ी और वह बहुत तेजी से चीखे, ‘कौन हैं आप लोग? कौन से चैनल से हैं ?’ मैंने उन्हें शांत करते हुए चैनल का नाम बताया। चैनल का नाम सुनते ही वह और भड़क गए। बोले, ‘आप लोग तो…… किसानों को खालिस्तानी कहते हैं। हम खालिस्तानी हैं क्या ? डिलीट कीजिए ये वीडियो। कोई रिकॉर्डिंग नहीं होगी यहां पर।’ मैंने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह नहीं माने। सरदार जी की ऊंची आवाज सुनकर वहां और लोग इकट्ठे हो गए। मैंने सरदार जी से कहा, ‘वीर जी, हम लोग आपकी बात सुनने और जनता तक पहुंचाने के लिए आए हैं।’ लेकिन वीर जी हमारी बात सुनने को तैयार नहीं थे। इतने में एक शख़्स बड़बड़ाते हुए आया और उसने मुझे धक्का दे दिया। मैंने कहा, ‘वीर जी, पहले इन्हें समझा लीजिए, फिर मैं आपसे बात करूं।’ मेरी बात पर उन्होंने उस शख्स को पीछे किया।

तभी हमने देखा एक व्यक्ति यह सारा घटनाक्रम अपने मोबाइल में रिकॉर्ड कर रहा है। उसे रिकॉर्ड करते देख मैंने गुस्से से कहा, ‘आप वीडियो क्यों बना रहे हैं। यहां पर कुछ बात हो रही है और आप वीडियो बना रहे हैं।’ मुझे ऐसा कहते देख मुझसे बहस करने वाले सरदार जी ने उसे बहुत जोर से डांटा और कहा, ‘आप वीडियो क्यों बना रहे हैं? आप कौन हैं ? घर-परिवार में कोई बेटियों से बात करता है तो क्या आप वीडियो बनाते हैं ? आप कौन हैं और कहां से आए हैं ? सरदार जी के ऐसा कहने के बाद वह व्यक्ति कुछ नहीं बोला और वहां से चला गया। इसके बाद सरदार जी बोले, ‘आप लोग बहुत गलत बातें दिखाते हैं। अगर आप सारा दिन हमें खालिस्तानी और पाकिस्तानी दिखाते रहेंगे तो लोगों के बीच हमारी क्या इमेज बनेगी। हम किसान लोग हैं और अपना हक मांगने के लिए यहां डटे हुए हैं। लेकिन कोई नहीं, लीजिए चाय पीजिए।’ मैंने मुस्कुराते हुए कहा, ‘नहीं वीर जी, शुक्रिया। आप लोग पीजिए।’ माहौल देखते हुए आगे की बातचीत संभव नहीं थी। मैंने बॉस को फोन किया और उन्हें पूरी बात बताई। बॉस ने कहा, ‘तुरंत वहां से लौटो और सुबह जाना।’ घर वापस लौटते हुए सरदार जी को बातें मेरे दिमाग में चल रही थी…..। सरदार जी गलत नहीं कर रहे थे।

05-12-2020

सरकार के साथ किसानों की वार्ता जारी थी। शाम के छह बजे। हम पहुंचे गाजीपुर बॉर्डर। यहां पर भारतीय किसान यूनियन का जमावड़ा था। एनएच-24 फ्लाईओवर के नीचे किनारे की तरफ चादर बिछाकर बैठी दो महिलाएं छोटे गैस चूल्हे पर आलू-गोभी की सब्जी पका रही थीं। पास में ही प्लेट कुछ पकौड़ियां रखी हुई थीं। उन महिलाओं से मैंने कहा, ‘आप लोगों ने पकौड़ियां बनाई हैं। वाह !’ मेरे ऐसा कहने पर वह कुछ पकौड़ियां उठाकर मुझे देने लगीं। मैंने कहा, ‘आप लोग खाइये। हम तो आप से बात करने आए हैं।’ मैंने पूछा, ‘आप लोग किसके साथ आई हैं।’ मुझे लगा ये किसी किसान परिवार की महिलाएं हैं। अपने पति के साथ आई होंगी। मेरा ऐसा पूछना ही था कि तभी पास में ही चादर बिछाकर बैठे दो व्यक्तियों में से एक ने कहा, ‘अरे ये भाकियू की पदाधिकारी हैं।’ मैंने कहा, ‘अच्छा……’ ‘अच्छा आप सब लोग साथ में हैं। कहाँ से आए हैं आप लोग। कितने लोग हैं?’

मेरी बात सुनते ही उन्होंने कहा, ‘हम इलाहाबाद से आए हैं। वहां से हम 250 लोग आए हैं। अपनी-अपनी गाड़ियों में। सरकार ने ट्रेनें बंद कर रखी हैं। वरना और भी बहुत से किसान आते।’ मैंने कहा, ‘तो आप लोग अपना राशन भी साथ में लाए हैं।’ वह बोले, ‘दाल-चावल, आटा, सब्जी सब लाए हैं। हम 26 जनवरी तक का इंतजाम करके आए हैं। अब हम जाने वाले नहीं हैं।’ मैंने कहा,’ यहां पर लंगर भी तो बंटता है। वह क्यों नहीं खाते?’ वह मुस्कुराते हुए बोले, ‘हम लंगर नहीं खाते…. अपना पकाकर खाते हैं।’ हालांकि वह खुद नहीं खाना बना रहे थे, महिलाएं बना रही थीं, जो भारतीय किसान यूनियन की पदाधिकारी थीं। मैंने उनकी धोती-कुर्ता, गेरुआ जैकेट और सिर पर शिखा देखी तो कहा, ‘अच्छा तो आप पंडित जी हैं। तभी लंगर नहीं खा रहे हैं।’ इस पर वह गर्व से बोले, ‘हां, हम शुक्ला हैं।’ मैंने कहा, ‘सरयूपारी के शुकुल हैं।’ वो बोले, ‘हां, जी वैसे शुक्ला तो कान्यकुब्ज भी होते हैं।’ मैंने उनसे कहा, ‘आपकी तरफ कान्यकुब्ज कहां होते हैं, वो तो कानपुर, अवध रीजन में होते हैं। वह अपनी शिखा पर हाथ फेरते हुए गर्व से बोले, ‘जी मैडम।’ यह कहते ही उन्होंने सामने रखी प्लेट की एक पकौड़ी उठाई और मुंह में रख ली। इधर ये दो व्यक्ति चादर बिछाए बैठे पकौड़ी का मजा ले रहे थे और उधर वो दो महिलाएं अपने सामने प्लेट में पकौड़ी रखकर बैठी तो थीं, लेकिन पकौड़ी खाने की बजाय सब्जी-दाल बनाने में व्यस्त थीं।

मैंने पंडित जी को फिर डिस्टर्ब किया, ‘आप लोगों का आंदोलन कब तक चलेगा।’ वो बोले, ‘जब तक बिल वापस नहीं होगा। तब तक बैठेंगे। हम पूरा सामान लेकर आए हैं, इस बार खाली हाथ नहीं जाएंगे।’ मैंने उनसे कहा, ‘आपने वोट तो इन्हीं को किया होगा फिर नाराजगी किस बात की।’ यह सुनकर पंडित जी के चेहरे के भाव बदल गए। गुस्से से बोले, ‘इस कीचड़ के फूल को वोट देकर गलती कर दी। इस बार गलती नहीं दोहराएंगे।’ कुछ और किसान भी आकर हमारी बातें सुनने लगे। उनमें से एक बहुत जोर से बोला, ‘अब हम भी न फूल को वोट नहीं देंगे और न किसी को देने देंगे।’ पंडित जी और जोश में आ गए और अपना दर्द गणित के रूप में हमें समझाने लगे। बोले, ‘मैडम जी, पहले हम अपनी तीन एकड़ की खेती का गेहूं बेचते थे तो एक तोला सोना खरीद लेते थे, लेकिन अब तो रोटी चलानी भी मुश्किल हो रही है।’ पंडित जी की बातों में दम था।

मेरा मन उनसे और बात करने को था, लेकिन कहीं और भी कवरेज के लिए जाना था। इसलिए हमने पंडित जी और बाकी किसानों से इस उम्मीद के साथ विदा ली कि सरकार से वार्ता का कुछ सकारात्मक परिणाम निकलेगा। जाते-जाते मेरी नजर फिर उन पकौड़ियों की तरफ गई, जाते-जाते मैंने उसमें से दो पकौड़ी उठा लीं। एक अपने लिए और एक अपने कैमरापर्सन के लिए।

06-12-2020

यूपी-दिल्ली बॉर्डर एनएच-24 के फ्लाईओवर पर किसानों की सभा चल रही थी। सरकार के खिलाफ जबरदस्त नारेबाजी से हो रही थी। किसान फ्लाईओवर पर बैठे थे और पुलिस के जवान ऊँचे-ऊँचे डिवाइडरों पर। हम सभी रिपोर्टर्स किनारे पर खड़े बतिया रहे थे कि तभी एक व्यक्ति आया और हमें खाली कप पकड़ाकर उसमें चाय डालने लगा। मैंने कहा, ‘ भाई, बस थोड़ी ही देना।’ इसके बाद डिवाइडर पर बैठे पुलिस के जवानों को भी इसी तरह से कप पकड़ाकर चाय देता हुआ आगे बढ़ गया।

किसान एनएच-24 फ्लाईओवर पर बैठे थे और सड़क जाम कर रखी थी। लेकिन जब कोई एम्बुलेंस आती खुद से ही सारे बैरिकेड खिसका देते। एक व्यक्ति बैरिकेड के पास ही बैठा रहता। एक बार मैंने देखा कि एक चैनल की ओबी वैन को आते देख वह व्यक्ति तेजी से उठा और उसने बैरिकेड खिसका दिया। मैंने कहा, ‘ये क्या कर रहे थे तो बोला एम्बुलेंस को रास्ता दे रहा था।’ मैंने कहा,’ अरे भाई ये एक चैनल की गाड़ी थी।’ वैसे तो इनके गांवों में न तो चैनल जाते हैं और न ही एम्बुलेंस। फिर ये कैसे पहचान पाएं। मै यह सोच ही रही थी कि तभी एक मदर डेयरी का ट्रक आ गया। इसे किसानों ने रोक लिया। उन्हें क्या पता कि यह भी जरूरी सेवाओं में आता है।

इसके बाद हम गाड़ी में बैठे और बात कर रहे थे कि इस बार ये आंदोलन लंबा चलेगा। तभी हमारे ड्राइवर साहब बीच में बोल पड़े, ‘अरे मैडम जी, ये सब धान काटकर गेहूं लगा आए हैं। अब ये दो महीने तक फ्री हैं। ‘

 

[युवा पत्रकार नीलिशा दिल्ली में रहती हैं  ⌉

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