समकालीन जनमत
जनमत

निर्धन निर्माण अभिकरणों का योगदान और बेरोजगारी    

पुरानी हिंदी फिल्मों का नायक अपनी मॉ, भाई-बहन या पत्नी की चिकित्सा के लिए किसी माफिया से पैसा लेता था। पैसे देने के बदले माफिया सरदार नायक से कुछ गैर-कानूनी काम करा कर फांस लेता था, जिससे मुक्त होने के लिए वह (नायक) पूरी जिंदगी लड़ता रहता था। इसी लड़ाई – झगड़े में पूरी फिल्म निकल जाती थी। गरीबों – मजदूरों के साथ भी यही होता है। उनकी संताने जन्मना गरीब और लाचार हुआ करती हैं, जिससे मुक्त होने में उनकी पूरी जिंदगी निकल जाती है।

प्राकृतिक आपदा, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संकट हो या आर्थिक संकट, हर स्थिति में हताहत गरीबों और मजदूरों को ही होना होता है, क्योंकि वे रोज कमाने-खाने वाले वर्ग से वास्ता रखते हैं। उनके पास इतनी आर्थिक-सामाजिक सुरक्षा नहीं रहती कि वे हफ्ता भर बिना रोटी की चिंता किए, निर्विघ्न सांस ले सकें। खेती में काम करने वाले मौसमी मजदूरों को मौसमी भूख की आदत पड़ जाती है। माड़, नमक का पेय पीकर सो जाने की आदत छह साल के बच्चे से लेकर साठ साल के अधेड़ तक में पाई जाती है। भूखमरी के कारण इस तबके के लोगों की औसत आयु देश के औसत आयु (68.7 वर्ष) से कम होती है। अर्थात रोटी के अभाव में गरीब किसानों और मजदूरों में भूखे रहने का ‘शीतल-अभ्यास’ हो जाता है। जैसे ही कमाना यानी काम का मिलना बंद होता है, वैसे ही फॉके  शुरू हो जाते हैं। काम के न मिलने और फॉके के दिनों की संख्या में समानुपातिक संबंध होता है। लेकिन काम न मिलने की संख्या तथा शिक्षा और स्वास्थ्य में व्युत्क्रमानुपात का संबंध होता है। यही कारण है कि बेगारी की बढ़त, वंचितों-गरीबों-मजदूरों के बच्चे मीड-डे मिल वाले सरकारी विद्यालयों की ओर आकर्षित होने का कारण बनती।

भूख का यह व्याकरण प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में बहुत खूबसूरत मगर दयनीय तस्वीर को नुमाया करता है। मनुष्य को ऑकड़ों में दर्शाना मनुष्यता का अपमान करना है, मगर अर्थशास्त्र और सांख्यिकी के पास मनुष्य समाज के विकास और (अ)विकास नापने का दूसरा बेहतर तरीका जब नहीं जब तक नहीं आ जाता, तब तक ऑकड़े ही सारी दास्तान सुनाते रहेंगे।

बहरहाल बात भूख और ऑकड़ों की हो रही है। भूख के ऑकड़े बहुत दिलचस्प हैं। सन 2012-17 के दौरान प्री-प्राइमरी स्कूलों में सकल नामांकन अनुपात (Gross Enrolment Ration–GER) इन स्कूलों की कुल संख्या का मात्र 13 प्रतिशत था, जो काफी कम माना जा सकता है। ये ऑकड़े दर्शाते हैं कि प्री-पाइमरी स्कूलों के प्रति लोग आकर्षित नहीं हुए। क्योंकि ये स्कूल आंशिक ही सही भूख निवारण कार्यक्रम से  पूरी तरह नहीं जुड़ते। किंतु इसके उलट इसी समयकाल में प्राथमिक विद्यालयों में सकल नामांकन अनुपात (Gross Enrolment Ration – GER) 115 प्रतिशत की बढ़त हुई। यह अतिशय नामांकन की स्थिति है, जिससे दो निष्कर्ष प्राप्त होते हैं –

क- प्राथमिक विद्यालयों के प्रति लोगों में अतिरिक्त दिलचस्पी।

ख- प्राथमिक विद्यालयों की कम संख्या।

बहरहाल इस मुद्दे पर बाद (अथवा स्वतंत्र आलेख) में बात करेंगे। ऊपर के दृष्टांत जता जाते हैं कि भूख और पढ़ाई की इस जुगलबंदी से गरीबों – मजदूरों के बच्चे एक टाइम फॉका करने से भले बच जाएं, लेकिन पढ़ाई और भविष्य के सुनहले मार्ग पर चलने से उन्हें पूरी तरह वंचित होने से कोई नहीं रोक पाता। बेरोजगारी, भूख, अशिक्षा और श्रृणात्मक विकास में फंसी यह आबादी गरीबी रेखा के नीचे सांस लेती है, जो कुल आबादी की लगभग 22 प्रतिशत ( Around 22% Indians live below poverty line, by Samrat Sharma, Financial Express, September 21, 2010) बैठती है।

हालांकि यह ऑकड़ा बारह साल पुराना है। 12 जुलाई 2019 की खबर के अनुसार भारत की बड़ी आबादी गरीबी रेखा से बाहर आई है। (India lifted 271 million people out of poverty in 10 years : UN, PTI updated on 12 July 2019, Business Line)। लेकिन ऑकड़ों से वंचितों का जीवन में कोई सुधार नहीं दिखता। हर साल अधिक पानी बरसने से इनको बेमियाद भूख, रोग और मौत का सामना करना पड़ता है। बरसात के समय में सैकड़ों – हजारों लोग समुचित जल-निकासी का प्रबंध न होने के कारण जान से हॉथ धो बैठते हैं।

कोरोना जैसी महामारी ने देश की आबादी के विभेदीकरण को साफ-साफ जाहिर कर दिया है। एक ओर सुविधाभोगी वर्ग राशन-पानी संग्रहित करके अपने – अपने घरों में सेल्फकोरेंटाइन का लाभ लेते हुए अच्छे दिनों का इंतजार करने में लगा हुआ है। दूसरी ओर देश की अर्थव्यवस्था की धूरी और राष्ट्र निर्माण का अग्रेता मजदूर वर्ग अपने पैरों के भरोसे हजारों मिल लंबी सड़क को नापते हुए अपने गॉव-घर के लिए चल निकला है। अब तक कई सौ मजदूर रास्तों में दम तोड़ चुके हैं। सोच कर दिल बैठ जाता है कि वह परिस्थितियॉ कैसी रही होंगी, जब सेर – दो चावल और पाव – दो पाव दाल के भरोसे पूरा परिवार इतनी लंबी यात्रा अपनी शारीरिक शक्ति के भरोसे निकला होगा।

गौरतलब है कि इन मजदूरों के साथ छोटे-छोटे बच्चे हैं, जो नन्हें – नन्हें पैरों से हजारों मिल लंबी सड़कों को नाप रहे हैं। बच्चे भी दो तरह के हैं। एक इसी उम्र के वे भाग्यशाली बच्चे, जो सुविधाभोगी परिवारों में जन्म लिए हैं। वे दूसरी तरह की आजमाइश करते पाए जाते हैं – वे घर में बोर होते दिखाई पड़ते हैं। उनके भविष्य की चिंता उनके विद्यालयों के साथ – साथ उनके माता-पिता दोनों को है। ऑनलाइन कक्षाओं के माध्यम से उनके भविष्य की क्षतिपूर्ति की जा रही है। दूसरे वे बच्चे, जो निहंग परिवारों में पैदा हुए हैं। गरीबी की जकड़बंदी उन्हें पढ़ने का अवसर नहीं देती है। उनकी पढ़ाई की चिंता किसी को नहीं है। वे कोराना से ऑख मिलाते हुए रात दिन चलते हुए अपने गॉव-घर पहुंचने की जल्दी में हैं।

सार्वजनिक शिक्षा तंत्र के कमजोर होने से यह दयनीय और विरोधाभासी चित्र दिखाई पड़ता है। शिक्षा से वंचना का यह दृश्य विकसित देशों में नहीं दिखाई पड़ता है। वहॉ की सरकारें ‘सार्वजनिक शिक्षा का संकुचन’ (Reduction of Public Education) नहीं करतीं । सार्वजनिक शिक्षा संकुचन से मानव निर्माण का हित प्रभावित होता है। शिक्षा में पूंजीवाद (निजीकरण) के प्रवेश होने से गरीब परिवार के बच्चों का भविष्य जोखिमभरा हो जाता है। शिक्षा के माध्यम से जीवन में सकारात्मक बदलाव के हौसले पस्त होने लगते हैं। शिक्षा के निरंतर मंहगे होने के कारण कभी – कभी विश्वास करना मुश्किल हो जाता है कि प्राथमिक शिक्षा अब भी मौलिक अधिकार रह गया है अथवा नहीं !

सवाल उठता है कि आजादी के इतने साल बाद भी वंचितों को आजादी का अहसास क्यों नहीं हो पाया ? वह कौन सी काली परछाई है, जो उन्हें कल्याणकारी राज्य से लाभ लेने और विकास के अवसर तक पहुंचने से रोकती है ? सवाल का दूसरा हिस्सा यह हो सकता है कि क्या भारत की बड़ी आबादी को भूखे और अशिक्षित होते उसे भूख मुक्त और पूर्ण शिक्षित राष्ट्र घोषित किया जा सकता है ? उत्तर ना में है। इतनी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद दुनियॉ में भारत के विकास की तकरीरें अक्सर सुनाई पड़ती हैं। विचारणीय है कि उन तकरीरों में वंचितों के भूख, अशिक्षा और उनकी बेरोजगारी को क्या और कैसा स्थान प्राप्त होता है ? सोचने की बात तो यह भी है कि बदसूरती में खूबसूरती की कल्पना कैसे की जा सकती है ?

सारे प्रश्न गोल-गोल घूमकर निर्धनता वाले चौखटे में गिरते हैं। निर्धनता आदमी को गरिमाहीन और अवसर से दूर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह भारत के लगभग तीस करोड़ आदमियों (स्त्री-पुरुष, बच्चे, वृद्ध एवं तृतीय लिंगी) के साथ नाकारात्मक भूमिका निभा रही है। निर्धनों को हमेशा संकटापन्न स्थितियों में रहना पड़ता है। इसीलिए कोरोनाकॉल में सबसे ज्यादा परेशान, दरबदर और मौत का शिकार निर्धनों को होना पड़ा है। जब हम सो रहे होते हैं तब हजारों निर्धन मजदूर भारत के सड़कों पर पैदल चल रहे होते हैं। इस लेख के लिखते समय कई लोग सैकड़ों मिल चलकर थक गए होंगे और जहॉ जगह मिला होगा, सो गए होंगे। इतनी गहरी नींद सोए होंगे कि मुर्दा और जिंदा का फर्क मिट गया होगा। बड़ों के साथ बच्चे बिना – खाए पीए सो गए होंगे। लब्बो-लुआब यह कि यह सब पूंजी के असमान वितरण और भारतीय समाज की विसमतामूलक संरचना के कारण हो रहा है।

लैमार्क (Jean-Baptiste-Lamarck-1744-1829) का सिद्धांत सही साबित हो रहा है कि किसान का बच्चा किसान, मजदर का बच्चा मजदूर और डॉक्टर का बेटा डॉक्टर बनता है (Inheritance of acquired characteristics)। जैव – विकास में लैमार्क का सिद्धांत अस्वीकृत हो चुका है, मगर समाज में यह सिद्धांत पूरी ठसक से लागू हो रहा है क्योंकि मनुष्य का समाज अप्राकृतिक संयोजनों (association of unnatural factors) से निर्मित होता, जहॉ डॉक्टर अपने बेटे को डॉक्टर बनाने के लिए हर कोशिश करते पाया जा रहा। वकिल अपने बेटा-बेटी को बड़ी फीस देकर मंहगे विधि महाविद्यालयों में भेज रहा है, ताकि संतान आने वाले समय में बड़ा वकिल बने अर्थात मुअक्किलों से बड़ी आमदनी हासिल कर सके। पैसे वाले मॉ-बाप ने किसान-मजदूर के बच्चों से दूरी बना लिया है। पैसे-वालों के बच्चे मोटी फीस वाले शिक्षा के दुकानों पर जा रहे हैं। किसान-मजदूर के बच्चे प्राथमिक पाठशालाओं में जाते हैं (जिसमें बहुजनों की संख्या सर्वाधिक होती है)।

भारत के हर गॉव और शहर में एक ही उम्र के बच्चे दो अलग-अलग स्कूलों में महज इसलिए जाते हैं, क्योंकि उनकी आर्थिक हैसियत अलग – अलग है। सरकार ने प्राथमिक पाठशालओं के अध्यापन पर ध्यान देने से अपने को लगभग मुक्त कर लिया है। अध्यापकों और अध्यापन सुविधाओं की कमी के कारण सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ने और पास होने वाले बच्चों की स्थिति कुपोषित मॉ के गर्भ से पैदा होने वाले कमजोर शिशु की तरह होने लगे हैं। अर्थात अमीरों के बच्चे अमीर होते जाते हैं और गरीबों-मजदूरों, दलितों तथा आदिवासियों के बच्चे निर्धन से अति निर्धन होते जा रहे हैं।

  अमीरों के किशोर होते जहॉ ऊंची फीस वाले चिकित्सा, प्रौद्यगिकी या विश्वविद्यालय का हिस्सा बनने के लिए दूसरे शहर, राज्य या देश की यात्रा करते हैं, वहीं किशोर होते ही गरीबों-मजदूरों, दलितों तथा आदिवासियों के बच्चे मजदूरी करने के लिए दूसरे शहर, राज्य या देश की यात्रा करते हैं। एक ही देश के भिन्न-भिन्न आर्थिक धरालत पर पनपने वाले दोनों वर्गों के युवा विकसित और विकासशील देशों की तरह परस्पर भिन्न दिशा में गति करते हैं। हमारे देश में दो सर्वथा भिन्न दिशा की यह गति आजादी के पहले से ही चली आ रही है, जो अब और वेग से चल रही है।

निर्धन होना अभिशाप है। यह ऐसी स्थिति है, जिसके रहते मनुष्य का मनुष्य हो पाना लगभग नामुमकिन है। एडम स्मिथ ने सही कहा है, “कोई भी ऐसा समाज कभी सुखी और संपन्न नहीं हो सकता, जिसके अधिकांश सदस्य निर्धन और दयनीय हों।” *1

निर्धनता सरंचनात्मक होती है। पूंजी के घटते क्रम को देखते हुए तीन तरह के निर्धन निर्धारित किए गए हैं –

क- पूर्णत: निर्धन

ख- बहुत निर्धन

ग- निर्धन

निर्धनों की तरह धनवानों का भी निर्धारण किया गया है –

क – इतने निर्धन नहीं

ख- मध्य वर्ग

ग- उच्च मध्य वर्ग

घ- धनी

ङ – बहुत धनी

गरीबी रेखा ‘निर्धन’ और ‘इतने निर्धन नहीं’ वाले समूह के मध्य पाई जाती है। यह बहुत जादुई रेखा है, जिसके निर्धारण की लंबी कथा है। हमारा उद्देश्य बेरोजगारी पर चर्चा करना है परंतु निर्धनता और बेरोजगारी की मिलावट इस तरह की  है, जैसे पानी में शक्कर। बेरोजगारी शक्कर है और निर्धनता पानी तथा अशिक्षा, बेकदरी, भूखमरी और भविष्य की अनिश्चितता वह शर्बत है, जिसे हर निर्धन को पीना पड़ता है। अर्थात निर्धन होना नकदी या पूंजी का अभाव मात्र नहीं है। यह इस सबसे कहीं अधिक है। सरकारों द्वारा लोककल्याणकारी कार्यक्रमों की कटौती के कारण गरीब की जेब हमेशा खाली रहती है।

गरीबी रेखा के नीचे के गुजर कर रहे लोगों की क्षमता जिस तरह कैंसर या ऐसी ही कुछ मंहगे रोगों से मुक्त होने की नहीं होती है, उसी तरह वे रोजगार की सीढ़ी तक पहुंचने लायक शिक्षा हासिल नहीं कर पाते। यह उपलब्धि लोक – (अ)कल्याणकारी सरकारें चिकित्सा की तरह शिक्षा को भी निजी प्रबंधनों को सौंप कर अर्जित करती हैं। हालांकि भारत जैसे करामाती देश अपने विवेकहीन और लक्ष्यहीन विकास से कुछ चमकीली छवियॉ भी अर्जित करते हैं। भारत सॉफ्टवेयर कंप्यूटर के क्षेत्र में दुनियॉ भर में वाहवाही लुटता है। भारत के प्रौद्योगिकीविद करोड़ों की आय करते हैं, जो आए दिन अखबारों की सुर्खियॉ बनती हैं। मगर कभी दबी-दबाई ऐसी खबरें भी साया होती हैं, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था की निर्थकता उजागर होने से बच नहीं पाती।

अब इसी खबर को लें, ‘पत्नी और बेटी को हॉथगाड़ी पर बैठा 800 किमी सफर तय किया।‘ *2 हमारे देश का विकास हर वक्त वाइनरी रच रहा होता है। जिस तरह हमारे देश में निर्धनों के कई स्तर हैं, उसी तरह देश की अर्थव्यवस्था भी बहुरेखीय है, जिनमें मदारी की रस्सी की तरह हर वक्त एक प्रकार का तनाव कायम रहता है।

विचार किया जाए कि अगर शिक्षा समृद्धि का पासबुक है तो क्यों जन-कल्याणकारी सरकारें वह पासबुक गरीब जनता तक पहुंचने नहीं देतीं। इस उत्तर की तह में उतरने के लिए इस तालिका का सहारा लेना पड़ेगा-

तालिका संख्या – एक

चुने हुए एशियाई देशों में व्यस्क साक्षरता दरें

1960 1980 1992
भारत 28 36 50
दक्षिण कोरिया 71 91 57
हांगकांग 70 90 100
थाईलैंड 68 86 94
चीन अनुपलब्ध 69 80

स्रोत – world development report(s) 1980, 1983, human development report 1994 (साभार भारत विकास की दिशाएं, द्वारा अमर्त्य सेन

ऑकड़े पुराने जरूर हैं, मगर हालिया तस्वीर इससे बहुत बेहतर नहीं है, इसलिए ऑकड़े तथ्यों को समझाने में मदद करते नज़र आते हैं। हॉ यह जरूर है कि इस सारणी में भारत के अतिरिक्त जिन देशों का जिक्र किया गया है, उनके ऑकड़े अब तक काफी सकारात्मक चुके हैं। इतने साल बाद भी भारत के ऑकड़े बहुत सकारात्मक नहीं हो पाए हैं। आज की बात न भी करें, तो भी सारणी के अनुसार सन 1992 तक की बहुत तो हो ही सकती है।

ऊपर की पंक्तियों में सॉफ्टवेयर से ऊपजी भारतीय समृद्धि की चर्चा की गई है। सॉफ्टवेयर कंप्यूटर ने कंप्यूटर तकनीकी और प्रौद्योगिकी के प्रति युवकों बहुत दिनों तक बहुत आकर्षित किया। इस प्रौद्योगिकी के बदौलत कुछ तकनीकी प्रधान नगरों का ने जन्म लिया। इस तरह की समृद्धियॉ विवेकहीन तथा भ्रमयुक्त समृद्धियॉ मानी जा सकती हैं, जो एक तरफ महान प्रगति की ओर इशारा करती हैं परंतु, जिसके प्रकाश से बहुसंख्यक आबादी अछूती रह जाती है। इस तरह की विषमतामूलक समृद्धियॉ अपनी गति में चंद लोगों की अमीरी के साथ बहुसंख्यक आबादी के लिए गरीबी का तोहफा साथ ले आती हैं।  इसीलिए कुछ अर्थशास्त्री इसे ‘लक्ष्यहीन विपुलता’ कहते हैं। क्योंकि इस तरह के आर्थिक विकास में खपने के लिए युवाओं को अधिक सालों तक चलने वाली मंहगी शिक्षा से गुजरना पड़ता है, जिसे गरीब परिवार के बच्चे हासिल नहीं कर सकते। भारत जैसे भारी भरकम आबादी वाले देश के लिए प्राथमिक शिक्षा को व्यवहारिक और सक्षम बनाए बिना सुंदर छवि करना मुमकिन नहीं है। हम यह भी जानते हैं, “जिन देशों में सामाजिक प्रगति की प्रेरणा का स्रोत आर्थिक संवृद्धि रहा है, उसमें भी प्राथमिक शिक्षा के (संवृद्धिपूर्व) व्यापक प्रसार का महत्तव स्वयंसिद्ध सा लगता है। जिन आधुनिक उद्योगों के उत्कर्ष के सहारे इन देशों में समृद्धि संभव हुई है उनमें कारीगरों का प्राथमिक शिक्षा से सम्पन्न होना तो अत्यंत ही आवश्यक होता है – यदि माध्यमिक शिक्षण भी हुआ हो तो सोने पर सोहागा हो जाता है।” *3

यह साधारण समझ की बात है कि लक्ष्य तक पहुंचने के लिए गाड़ी को हर तरह से सक्षम होना होता है – मजबूत इंजन, ईंधन से भरी हुई टंकी और गोटेदार टायर से लेकर दुर्घटना से बचने के लिए लाइट और चालक तक के सक्षम होने से गड्डी लक्ष्य तक पहुंच पाती है। विकास रूपी गाड़ी में सहायक सभी अवयवों के सही और संतुलित हुए बिना ‘संवृद्धि’ तक की यात्रा नही हो सकती है। मगर भारत के कहानी और इसका विकास ‘रहस्यवाद’ की तरह है, “आज भी भारत शिक्षा और साक्षरता के उस स्तर को नहीं छू पाया है जिस स्तर पर ये देश (तालिका में दर्शाए देश) अपनी विकास-यात्रा को आरंभ करने से तत्काल पूर्व पहुंच चुके थे। आज के भारत और 1960 के कोरिया या 1980 के चीन के बीच तुलना हमारे इस कथन को और भी अर्थपूर्ण बना देती है। इतना समय व्यतीत हो जाने पर भी हम उस साक्षरता स्तर तक नहीं पहुंच पाए हैं, जहॉ पर ये देश अपने बाजार आश्रित आर्थिक विकास कार्यक्रम प्रारंभ करने से पूर्व पहुंच चुके थे।” *4

देश की प्राथमिक शिक्षा उत्क्रमणीय दिशा में प्रगति कर रही है। आजादी के बाद हर व्यक्ति तक शिक्षा पहुंचाने के लिए जिस व्यवस्था को सबसे मजबूत और विश्वसनीय होना चाहिए था, वह साल दर साल अव्यवस्थित और अविश्वसनीय होती चली गई। सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था के धाराशायी होने से शिक्षा जैसे मानवीय विकास के अहम क्षेत्र में पूंजीवादी जमातें पैर जमाती चली गईं। फलस्वरूप ग्रामिण भारत की तस्वीर दिन प्रति दयनीयता के आख्यान रचने लगे।

शिक्षा के अभाव के कारण गॉव बेरोजगार उत्पादन के केंद्र के रूप में पहचान पाने लगे। सन सत्तर से ही गॉवों से जो पलायन जोर पकड़ा, वह आज तक नहीं थमा। हम जानते है अशिक्षित मजदूर अपने जीवन के दस – पंद्रह साल तक ही ठीक से मेहनत कर पाता है। जैसे ही उसका शरीर मेहनत करने से चुकने लगता है, वैसे ही वह श्रम आधारित संस्थानों के लिए बोझ समझा जाने लगता है। शिक्षा मनुष्य के मस्तिष्क को तकनीकी कौशल और श्रम से जोड़ कर प्रगति का मार्ग प्रशस्त करती है। हमारे देश में अभी तक श्रमिकों के मस्तिष्क का सही इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। वे पूरी जिंदगी शारीरिक परिश्रम करते मृत्यु का वरण करते हैं। यही कारण है कि मजदूरों के परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी मजदूरी की परंपरा पाई जाती है।

मजदूरों की निर्धनता का एक दूसरा पहलू भी है, जो कम दिलचस्प नहीं । जिस तरह रोगियों का बढ़ना चिकित्सकों का सौभाग्य माना जाता है। वैसे ही मजदूरों के लिए निर्धनता भले अभिषाप हो, मगर उनका होना कई व्यवस्थाओं के लिए आनंद का विषय हुआ करता है। क्योंकि निर्धन मानवाकृतियॉ कभी – कभी बहुत काम का साबित होती हैं। इनके माध्यम से करुणा का आख्यान गढ़ा जाता है। इनकी अशिक्षा, बेरोजगारी और भूख का उपयोग कई बार सांप्रदायिक हिंसा से लेकर विशेष आयोजनों में भी होता है।

मेहनत करने के बाद भी निर्धनता का विलोपन न होना अप्राकृतिक है। अप्राकृतिक निर्धनता का सर्जन शक्तिशाली संस्थाओं द्वारा होता है, जिसे वह अपनी जन-विरोधी और गैर-कल्याणकारी नीतियों के माध्यम से अमली-जामा पहनाते हैं। शक्तिशाली संस्थाओं के अतिरिक्त कभी-कभी सांप्रदायिक हिंसा, युद्ध और नकारात्मक पूंजीवाद के निर्माण से भी निर्धनता के अवसरों का विस्तार होता है। हमारे देश में निर्धनता का फसल रोपने और सहेजने वाले सभी अभिकरण पूरी शक्ति से कार्यरत हैं।

 

संदर्भ

*1 – भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास, राष्ट्रीय अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद – 2006 (कक्षा 11 की पाठ्यपुस्तक),पृ. 62

* 2 (जनसत्ता 16 मई 2020, पृ. 8)

*3 – सेन अमर्त्य, भारत: तुलनात्मक दृष्टि से, भारत विकास की दिशाएं, राजपाल एंड संस, संस्करण वर्ष 2014, पृ. 44

*4 – वही।

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