समकालीन जनमत
ज़ेर-ए-बहस

महामारियां अवसाद बुनती हैं!

महामारियां और आपदाएं जीवन-जगत को आकार प्रदान करती हैं; उनकी मानसिकता के ढांचे को तोड़कर नए ढांचे का निर्माण करती हैं –आपदाएं नवीन और परिवर्तनकामी होती हैं। वे कुछ ऐसा लेकर आती हैं, जिससे मनुष्य-समाज अपने-आप को ऐसे चौराहे पर खड़ा पाता है, जहाँ उसे कुछ भी नहीं सूझता – मगर रास्ता तो निकालना होता है और प्राय: निकलता भी है। कोरोना ऐसा ही एक विषाणु है, जिसने धरती के जीव-जगत को न सिर्फ तबाह किया, बल्कि उसकी मानसिकता और जिंदगी की रवायत को बदल कर रख दिया है। कोराना ने जिस तरह से पूरी दुनिया की जान सांसत में डाला हुआ है, उतना बड़े से बड़े तानाशाह भी नहीं कर पाए। प्रकृति ने हर बार की तरह इस बार भी प्रमाणित कर दिया कि उससे अधिक ताकतवर कोई नहीं !
कोरोना की वजह से लाखों लोग, जिन्हें हमारे बीच रहना था, छोड़कर जा चुके हैं। यह साल पूरी दुनिया के लिए विलाप का काल रहा। बहरहाल कोरोना अपनी करामात दिखाता रहा और दुनिया की शक्तियां असहाय देखती रहीं (इसके अलावा चारा ही क्या था ?) रिश्ते–नाते दरकते रहे और आदमी निर्मिमेष तकता रहा। बच्चों–औरतों, बुजुर्गों और दलितों-आदिवासियों पर जुल्म होते रहे और सक्षम लोग अक्षम बने देखते रहे। क्या – क्या न हुआ इन दिनों – इंसानियत की चादर तार-तार हो गई !
दुनिया के हर हिस्से में कोरोना का असर हुआ, मगर जिस तरह से इसने भारत में असमानता का सृजन किया उतना किसी दूसरे देश (भारत में असमानता के कई स्तर हैं – अमीर-गरीब, उच्च जाति-निम्न जाति और स्त्री-पुरूष) में देखने को नहीं मिला। उदाहरण देने की जरूरत नहीं, अति-अमानवीय स्थितियों को सभी ने देखा और देख रहे हैं – दया धर्म वाले देश में भिखारियों का सड़क और चौराहे से गायब हो जाना कोई छोटा-मोटा परिवर्तन नहीं है। बड़े घरों के बच्चे आनलाइन शिक्षा के माध्यम से अपने जीवन का स्वर्णिम विकास कर रहे हैं, जबकि ग्रामीण भारत और मजदूर घरों में पलने वाले बच्चों ने पढ़ाई –लिखाई से अपने आपको मुक्त कर लिया है। आनलाइन शिक्षण माध्यम स्वयं में इतना महंगा और अपने चरित्र में इतना शहरी है कि सुदूर गांव और जंगल में रहने वाले गरीब किसानों और आदिवासियों के बच्चों की पहुंच से यह बहुत दूर है। निश्चित ही देश का भविष्य मध्यवर्गीय और उच्च मध्यवर्गीय घरों में पलता है, कोरोना ने उनके भविष्य को भी अवरूद्ध कर दिया है, यही बच्चे आगे चलकर देश की जिम्मेदारी उठाएंगे। उम्मीद है कि सब कुछ बहाल होते ही उनके सपनों की राहें पहले की तरह आसान हो जाएंगी।
कोरोना से उत्पन्न परिस्थितियों ने देश की सामाजिक मानसिकता में बदलाव कर दिया है। दया – धर्म के नाम पर चलने वाली संस्थाएं अब थम चुकी हैं। मोटर-गाड़ी और बैंक बैलेंस में लगा रहने वाला वर्ग लॉक-डाउन की घोषणा होने के पूर्व घरों में राशन – पानी रख कर इत्मीनान कर लिया – उसके लिए कुछ समय तक लाक डाउन परिवार के बीच क्वालिटी टाइम बिताने और मन-पसंद गीत सुनने का जरिया बना। वह अपने समय का उपयोग योग करने और स्वास्थ्य निर्माण में करने लगा, हालांकि कुछ महीने बाद ही उसे भी अहसास होने लगा कि कोरोना गरीब – अमीर में फर्क करने वाला रोग या संक्रमण नहीं है। इस अहसास के बाद भी भारत का खाया-पीया अघाया वर्ग गरीबों के प्रति किसी भी तरह की संवेदनशीलता प्रदर्शित में सर्वथा असफल रहा।
हम इस लेख में शिक्षा की बात कर रहे थे। शिक्षा सामाजिक परिवर्तन करने का सबसे बढ़िया माध्यम है। हमारे देश में यह काम दो तरह से किया जाता है – बड़े घर के बच्चों के लिए बेहतरीन सुविधाओं वाले स्कूल और निम्म परिवार के बच्चों के लिए मामूली स्कूल। निम्न परिवार के बच्चों को स्कूलों में दोपहर का भोजन मिलता है । मगर इन स्कूलों और मिड-डे-मिल के बंद होने से बच्चों के सामने पेट भरने की समस्या उत्पन्न हो गई – गरीब घरों में एक और भूखे पेट का इजाफा हो गया है। गरीबों और ग्रामीणों ने इस समस्या की मुक्ति बाल मजदूरी और बाल-विवाह में तलाशा है। इंडियन एक्सप्रेस ने लॉक-डाउन के दौरान बाल मजदूरी और अवयस्क विवाह के विरोध में दर्ज़ हुई शिकायतों पर एक सर्वे में पाया कि अप्रैल और अगस्त में बाल – विवाह के दस हजार मामले प्रकाश में आए। ये विवाह लड़कियों से मुक्ति प्राप्त करने के लिए संपन्न हुए थे। लड़कियां अमूमन निहायत ही गरीब परिवार से ताल्लुक रखती थीं। इस सर्वे के अनुसार आने वाले महीनों में बच्चों को जोखिम भरे कामों से भी गुजरना होगा। आर्थिक गतिविधियों के बहाल होते ही सस्ते श्रम की तलाश में बिचौलिए जब गाँव का रूख करेंगे तो उनकी निगाह इन बच्चों पर पड़ेगी, लिहाजा भूख से लड़ रहे बच्चों को शहर का रास्ता पकड़ना होगा। अगर आप महानगर की ओर जाने वाली बसों में झांकें तो पता चलेगा कि बच्चे काम की तलाश में शहर की ओर जाने भी लगे हैं (आदिवासी गांव से अवयस्क बच्चों की आमद शहर की बढ़ चुकी है)। निश्चित ही महामारियां मनुष्यता का गला घोटकर आगे बढ़ती हैं। अकाल और महामारी मासूमियत का अपहरण कर लिया करती हैं।
कोविड काल में गरीब और अमीर के अंतर का रंग पहले से ज्यादा गाढ़ा हुआ है। इस दौर में जहाँ अमीरों ने सुविधा का लाभ लेते हुए अपने आपको पूरी तरह घर में कैद कर लिया, वहीं भूखे नंगे और निहंग मजदूर हजारों कोस दूर अपने घर की ओर निकल पड़े। रास्ते में कितनों ने दम तोड़ दिया। अमीरों ने सड़क पर चलते मजदूरों को कोरोना फैलाने वाले कारक के रूप में देखा और मजदूरों ने सदा की भाँति इस बार भी अमीरों और सुविधाभोगी वर्ग से कोई उम्मीद नहीं किया। भारत में दो तरह के नागरिक हमेशा से रहते आए हैं – ऐसे समय में उनकी बेरूखी उजागर हो जाया करती है।
इतना ही नहीं, मानवतश्करी और अंगों के व्यापार को भी महामारी से उपजी निर्धनता, बेरोजगारी और भूख से बल मिला। शवों के व्यापार की परिकल्पना सामने आई। गृह मंत्रालय ने इसे एक गंभीर समस्या के रूप में दर्ज़ किया और इससे निपटने के लिए सभी राज्यों से मिलजुल कर एक नेटवर्क बनाने पर भी जोर दिया। मगर वे राज्य जहाँ इस महामारी की मार अधिक पड़ी थी, उन राज्यों में इस दिशा में सार्थक कदम नहीं उठाया गया – (in the face of such an enormous challenge, the state remains slow footed. Despite advisories from the ministry of home affairs to create a network of anti-human trafficking units to tackle the lockdown surge, several states – including Maharashtra, Uttar Pradesh, Chhattisgarh, Haryana, Uttarakhand, Mizoram and Nagaland – have not sate up even one, Indian express, the editorial page, page – 8, date – 16 October, 2020)।
कोरोना कुछ दूसरे तरह से भी असमानता को प्रदर्शित होने का अवसर मुहैया कराया – पहले बाल अधिकार संरक्षण संगठन और स्कूलों के अध्यापक तथा विद्यार्थियों का प्रत्यक्ष संपर्क हो पा रहा था, जिससे किसी न किसी रूप में बाल मजदूरी और बाल विवाह पर थोड़ा बहुत अंकुश लगा हुआ था। लॉकडाउन लगने से यह संपर्क टूट गया। कोराना के पहले कक्षाओं में छद्म ही सही पर छात्र- छात्राओं में समानता जैसी स्थिति दिखाई पड़ रही थी; लॉक-डाउन लगने के बाद यहाँ लैंगिक भेद-भाव का स्थितियाँ दिखाई पड़ने लगीं – जिन निम्न मध्यवर्गीय घरों से भाई-बहन दोनों विद्यालय जाते थे, ऑनलाइन क्लास में अब केवल भाई भाग लेने लगा; लड़कियों को शिक्षा के गलियारे से बाहर निकलना पड़ा। अब वे घर – गृहस्थी का होलटाइमर हो गईं। लॉक-डाउन का असर दिहाड़ी पर पलने वाले परिवारों पर सबसे ज्यादा पड़ा। रोज मजदूरी करने वाले परिवारों के लिए ऑगनबाड़ी केंद्र किसी वरदान से कम नहीं थे। मगर लॉक-डाउन के दौरान जब बच्चों को प्रशिक्षित करने वाले ये केंद्र बंद हुए, तो इससे जहाँ एक ओर बच्चों के माता-पिता के लिए मुश्किलों में इजाफा हुआ, वहीं बच्चों में कुपोषण के लक्षण दिखाई पड़ने लगे। यदि इस महामारी के असर का आकलन जातिवादी नजरिए से करें तो बड़ा साफ दिखता है कि सार्वजनिक हित के संगठनों के कमजोर होने से पिछड़ी जाति, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और सीखने की प्रक्रिया पर बहुत नाकारात्मक असर पड़ा है। कुछ दिन पहले केरल राज्य की एक दलित परिवार लड़की ने एंड़्रायड मोबाइल के अभाव में आनलाइन क्लास से वंचित होने के कारण अवसाद में आकर आत्महत्या कर लिया । निश्चित ही इस महामारी ने देश, विशेष रूप से वंचित तबके को जहाँ आधारहीन बनाया है, वहीं सबमें अवसाद का सृजन किया है। मीडिया की पहुंच न होने के कारण आदिवासी समुदाय की खबरें सबसे कम सामने आईं, जबकि सबसे अधिक वंचित लोग वहीं रहते हैं, इस महामारी से सबसे अधिक प्रभावित भी यही तबका हुआ है।
दलित और आदिवासी गांवों में स्कूल और कॉलेज पहले ही कम थे और जो थे, वे न्यूनतम सुविधाओं के अभाव से जूझ रहे थे – सामान्य सहूलियतों से लेकर अध्यापकों तक की कमी। अर्थात असमान शिक्षा की स्थिति कोरोना के पहले भी थी; इसके आने के बाद (कोरोना के) परिस्थितियां और भी खराब हो गईं (जैसाकि ऊपर दर्शाया गया है)। इन क्षेत्रों में स्कूल और कॉलेज पूरी तरह बंद हैं। मध्यवर्ग के बच्चे ऑनलाइन शिक्षा से जुड़ कर थोड़ा बहुत ज्ञानार्जन कर रहे हैं, और उम्मीद कर रहे हैं। लॉकडाउन खुलने के बाद वे फिर से अपने सपनों के रथ पर सवार होंगे, मगर दलित-आदिवासी परिवार के बच्चों के सपने रेत हो चुके हैं – विकल्पहीन हो चुके हैं।
भारत के अंदर कई-कई भारत हैं – आर्थिक समृद्धि में अमरीका से टक्कर लेते हुए नागरिकों का भारत, सोमालिया की बराबरी करते हुए जीवन की साधारण सहूलियतों से जूझते नागरिकों का भारत और बच्चों तथा महिलाओं का भारत। हर भारत की अलग – अलग परेशानियॉ हैं और अलग-अलग दास्तान हैं। वैसे तो हर तरह के भारत के सपनों की चौड़ाई कम हुई है, परंतु यह कमी सबसे अधिक वंचित तबकों (दलित-आदिवासी) में दर्ज़ हुई है!

(जनार्दन हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज, उ.प्र. में सहायक प्राध्यापक हैं।)

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