समकालीन जनमत
शख्सियत स्मृति

भुलाए नहीं भूलेगा यह दिन

संतोष सहर

 

यह एक अविस्मरणीय दिन था। पिछले एक दिसम्बर (1997) को सीपीआइ-एमएल के महासचिव कॉ. विनोद मिश्र, नागार्जुन से मिलने दरभंगा स्थित उनके पुत्र के निवास स्थान पर पहुंचे। एक इतिहास जाग्रत हो उठा। जनता के नेता ने जनकवि का, समाज के बदलाव की अग्रणी धारा के दो प्रतीकों ने एक-दूसरे का दिल से सम्मान किया – “अन्तर आनन्द मुक्ति बन बाहर आता है।”

कमरे में चौकी पर बैठे थे नागार्जुन। पीठ के पीछे खुली खिड़की से जाड़े की गुनगुनी धूप आ रही थी। बाहर गौरैया चहचहा रही थी। तभी पहुंचे कॉ. विनोद मिश्र, कवि से मिलने कवि के पास। समय ठिठका-सा रहा, शब्द चूक-से गए। नागार्जुन ने वीएम के चेहरे को कांपती उंगलियों से टटोला। देर तक नाक, कान, ठुड्डी को छूते रहे। उनकी भाव विह्वल आंखें चमक से भर गईं। इस क्षण को स्मृति में सहेज लेने के लिए आतुर लोगों से कमरा ठसाठस भर गया। सभी रोमांचित। बाबा ने वीएम को अपने नजदीक चौकी पर बिठा लिया।

स्वास्थ्य कैसा है अब ? “देह को तो पहले ही धुन कर रख दिया था ” – फिर हंसी, बच्चों जैसी, बाबा नागार्जुन की। फिर बोले – ‘पत्रकार आते रहते हैं; पूछते हैं – समाजवाद का पतन हो गया, सोवियत रूस ढ़ह गया, अब समाजवाद के बारे में आपकी क्या राय है ?’ मैं कहता हूं उनसे – जब तक गरीब के पीठ पर फ़टी हुई गंजी रहेगी समाजवाद प्रासंगिक रहेगा। मैं निराश नहीं हूं कामरेड, निराश नहीं हूं।’ कह कर चुपा जाते हैं। आवाज गूंजती रहती है देर तक – सबके मन में।

‘जमींदार के बच्चे माले को बदनाम करते रहते हैं’ – नागार्जुन गुस्से में हैं। फिर यकीन से बोलते हैं – युवा पीढ़ी और भी बड़े-बड़े काम करेगी। हम लोगों से भी ज्यादा, दोगुना-चौगुना तक।’ वीएम कहते हैं – आपकी कविताओं से हमारे लोगों को बहुत प्रेरणा मिलती है।’ बाबा की आंखों की चमक बढ़ जाती है।

वे हमारे पुरोधा हैं। साधिकार बोलते हैं – ‘यहां जो महिलाएं हैं उनकी हालत अच्छी नहीं, उनके बीच काम होना चाहिए।’ वीएम कॉ. पारस जी (रामनरेश राम) का परिचय कराते हैं – ‘भोजपुर के हैं।’ यह सुनते ही नागार्जुन पूछ बैठते हैं – ‘अपने के कहां के हईं ?’ सब हंस पड़ते हैं। हंसते हुए बताते हैं बाबा – ‘ बहुत दिनों तक बक्सर और छपरा की जेलों में रहा, साथियों के बीच। भोजपुरी वहीं आ गई।’ वीएम उन्हें बताते हैं कि सहार के हैं जहां बथानी टोला जनसंहार हुआ। बाबा गंभीर हो जाते हैं – ‘एजेंटों का काम था यह। जो श्रीमंत हैं, भूपति हैं, उनका मुकाबला करना होगा। एक-एक आदमी तक अपनी बात पहुंचानी होगी। पार्टी के खिलाफ बहुत दुष्प्रचार फैला रखा है सबों ने। उस दुष्प्रचार के जाल को काटना होगा।’ फिर वीएम से कहते हैं – ‘आपको दस दिन घूमना चाहिए इधर। लौकहा और जयनगर तक गाड़ी जाती है।’ फिर मनमोहन अधिकारी (नेकपा-एमाले के नेता) के बारे में कुछ बोलते हैं। नेपाल के एक कवि आए थे कापड़ी जी, पिछले दिनों। उनकी बात करते हुए बोलते हैं – ‘लोग भाषा को भी लौंग-इलायची की तरह इस्तेमाल करते हैं जबकि भाषा एक्सप्रेशन के लिए है।’ बताते हैं – ‘पुरानी दिल्ली वालों की अपनी भाषा है – जाटों और पंजाबियों वाली, नई दिल्ली वालों की कोई भाषा नहीं।’

तभी उनकी नजर कॉ. मीना (महिला नेत्री) पर पड़ती है। हुलस उठते हैं। इशारे से बुलाते हैं, पूछते हैं – ‘क्या नाम है ? कहां की हो ?’ परसा (छपरा) की हैं और मुजफ्फरपुर में काम करती हैं, यह सुनकर बताते हैं – ‘परसा में राहुल जी रहे थे बहुत दिनों तक। मठ भी है उनका। मुजफ्फरपुर के भूपति बहुत बदमाश हैं। खटमल हैं। खटमल जब पड़ जाएं चारपाई में तो उसे पानी में डुबोया जाता है। पानी में डुबो दो, पानी में, उनको।’ – कहकर ठहाका लगाते हैं।

 

अब चलने की बात होती है। लेकिन बाबा का मन नहीं भरा है। सोच रखा था फुरसत में बात होगी। वीएम उनसे दिल्ली आने की बाबत पूछते हैं। बाबा को सआदतपुर की याद आती है। कॉ. नियोगी का नाम लेते हैं। बताते हैं मार्च तक दिल्ली आएंगे। अब सब विदा ले रहे हैं। कॉ. विनोद मिश्र हाथ मिलाते हैं। चौकी पर बैठे वयोवृद्ध जनकवि अटेंशन की मुद्रा में आ जाते हैं। ये लो, उनका दांया हाथ ऊपर उठ रहा है, कोहनी से मुड़ा, मुट्ठी बंधी और लाल सलाम! ऐसे दिख रहे हैं जैसे दीवार से कोई पोट्रेट लगा दिया गया हो – अविचल, चित्रलिखित। यह लाल सलाम कवि, क्रांतिकारी, कम्युनिस्ट नागार्जुन का है। सर्वहारा के नेता विनोद मिश्र के लिए है यह लाल सलाम। सभी विस्मित हैं। सभी भाव की धारा में बह रहे हैं। सबके हाथ उठ रहे हैं ऊपर की ओर – कॉ. वीएम, कॉ. पारस जी, कॉ. रामजतन शर्मा, रामजी भाई, मदन कश्यप, मीना शशि, प्रभात चौधरी – सबके। ठसाठस भरे कमरे में मौजूद सबका हाथ कवि नागार्जुन को लाल सलाम पेश कर रहा है। गजब की शांति है। कई पल गुजर गए। सालों, दशकों तक अविचल, निष्कंप तना रह सकता है यह हाथ। उपस्थित लोगों के दिल और आंखों में तो कैद हो ही चुका है यह दृश्य, कोई तो कैद कर ले इसे कैमरे में।

लेकिन अभी कहां ? कामरेड के लिए खासतौर से मखाना भुनवाया है नागार्जुन ने। चाय-पान भी है। सब बाहर बरामदे में दरी पर बैठते हैं। सामने वाले घर के बरामदे में रखी चौकी पर भी लोग बैठे हैं। पोती समिधा का कंधा पकड़ नागार्जुन बाहर आते हैं।उन्हें कुर्सी पर बिठाया जाता है। इसबार शशि (महिला नेत्री) पर नजर पड़ती है। नाम पूछते हैं। कहते हैं हंसते हुए – ‘सबको दो – तीन नाम रखना चाहिए।’ नागार्जुन की स्मृति बिल्कुल साफ है। रह-रह कर बहुत कुछ याद आता रहता है। ‘बाबा’ कहते सुन कर उनको सचमुच का साधु बाबा माने बैठी श्रद्धालु बुढ़िया ने उन्हें केंकड़ा खाते देख कर क्या कहा, यह भी। टोपी मंगा कर लगाते हुए कहते हैं – ‘नाक, कान सबके लिए अलग-अलग कपड़ा रखना पड़ता है, बच्चों की तरह।’ पूछते हैं, ‘भागलपुर की तरफ पार्टी का कामकाज हो रहा है या नहीं ? होना चाहिए। बताते हैं कि वहां डोमन शर्मा ‘समीर’ हैं। संथाली और मुंडा साहित्य में अच्छा काम हो रहा है।

इस बीच उन्हें वसन्तपंचमी 12 फरवरी को दरभंगा में होने वाले जन संस्कृति मंच के कार्यक्रम के बारे में बताया जाता है। फिर इलाहाबाद में जसम के हुए सम्मेलन की सूचना मिलने न मिलने पर बात चलती है। नागार्जुन कहते हैं – ‘एक पता डाकिए का होता है, घर बदलने पर उसमें कुछ गड़बड़ी हो जाती है। लेकिन एक पता दिल का होता है, वह नहीं बदलता, उसे नहीं बदलना चाहिए।’ एक बार फिर ठहाका लगाते हैं। अचानक पूछते हैं – ‘त्रिलोचन कहां हैं, उनको बुलाइये।’

वीएम दोबारा विदा लेते हैं। बाबा पूछते हैं, बारह फरवरी को आइएगा ना ? वीएम बताते हैं – ‘कार्यक्रम तो जसम का है।’ अपने गठीले मजबूत हाथों से बाबा का हाथ पकड़ते हैं। पतली-पतली हथेलियों वाला हाथ, जो बाबा नागार्जुन का, हमारे समय के सबसे बड़े कवि का है। यह हाथ उठने की शक्ति खोने से पहले भविष्य को आगे धकेल देने के लिए लपकता है। यह अब भी वीएम के साथ जुड़ा हुआ है, समाजवाद के पक्ष में उठा हुआ है।

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