समकालीन जनमत
ज़ेर-ए-बहस

सभी आवाज़ों को मजबूत करना, सभी गीतों को ताकत देना तथा सवाल खड़े करना ही कला का सच्चा काम है: टी.एम. कृष्णा

टी. एम. कृष्णा


(अवधेश जी द्वारा मुझे हिन्दी में बोलने के लिए बोला गया है लेकिन मेरा हिन्दी तो बहुत खराब है मैं हिंगलिश बोलूँगा। आज के सेशन में थोड़ा बातचीत भी है और थोड़ा गाना भी तो दोनों करूंगा। आई होप आप लोग सब घर में हैं, ठीक-ठाक हैं। कोरोना का कोई इफेक्ट नहीं है आप सबको। प्लीज टेक केयर। इस पीरियड में बहुत सारी फेसबुक लाइव हो रहा है बहुत सारा जूम्स हो रहा है। थोड़ा टायर्ड भी हो रहा है, ये बहुत ज्यादा ही हो रहा है लेकिन फिर भी इंपोर्टेंट कनवरसेशन तो चाहिए। )
समकालीन जनमत के फेसबुक लाइव में कुछ इसी अंदाज़ में कर्नाटक संगीत के प्रसिद्ध गायक टी. एम. कृष्णा ने अपनी बात-चीत शुरू की। मिलीजुली भाषा में कही गई उनकी बातों को हिन्दी में हूबहू आपके सामने लाने का प्रयास किया गया है। इस प्रयास में वाक्य भले बदल गए हों लेकिन मंतव्य को जस का तस प्रस्तुत करने की कोशिश की गई है। इस लेेेख में टी. एम. कृष्णा की प्रस्तुतियों के दो वीडियो हैं, मीरा का एक भजन और एक तमिल गीत ।


आज जब देश में चारों ओर उथल-पुथल मची हुई है और सरकारें मूक दर्शक बनी हुईं हैं तो एक सचेत नागरिक के रूप में हमें इस पर गंभीरता से बात करने की जरूरत है। मैं कर्नाटक संगीत का कलाकार हूँ और मेरी कल्चर में गहरी रुचि है तो सबसे पहले मैं कला की दुनिया के बारे में अपनी बात रखूँगा। आज की तारीख में प्रवासी मजदूरों और उनके जीवन की दुश्वारियों के बारे में बहुत जरूरी सवाल उठाए जा रहे हैं। मजदूरों की घर वापसी कठिनतम हो चली है। वे रास्ते में भूख, बीमारी, थकान से मर रहे हैं और किसी सरकार को कोई चिंता नहीं है। एकदम यही हालात कला की दुनिया के भी हैं लेकिन इसके बारे में कोई खास बातचीत नहीं हो रही है। आज की डेट में आर्टिस्टों का कोई परफॉर्मेंस नहीं हो रहा है। यहाँ जब मैं आर्टिस्ट कह रहा हूँ तो उसमें मूर्तिकार, चित्रकार, शिल्पकार आदि सभी शामिल हैं।

हमारे देश में बहुत बढ़-चढ़ कर कहा जाता है कि हमारे लिए संस्कृति (कल्चर) बहुत महत्वपूर्ण है। हमारी विविधता भरी संस्कृति की खूब तारीफ भी होती है, कहते हैं कि देखो हमारा देश कितना सुंदर है और कितने सारे रंग हैं यहाँ। अभी नहीं बहुत सालों से हम यही बोले जा रहे हैं लेकिन सच्चाई यह है कि हमें न कला की कोई चिंता है न कलाकारों की, यहाँ तक कि इनमें सामान्य रुचि का भी अभाव है। यह बहुत कड़वी लेकिन सच्ची बात है ।

कला के लिए हम क्या करते हैं ? इस पर आप बहुत ज़ोर देकर सोचेंगे तो पाएंगे कि कला के नाम पर कुछ सरकारी आयोजनों में प्रस्तुतियाँ (परफॉर्मेंस) करवा दी जाती हैं, कुछ सरकारी बिल्डिंगों में पेंटिंग करवा दी जाती है और कुछ अवार्ड आदि दे दिये जाते हैं बस। इसके बाद कला की दुनिया में क्या हो रहा है ? लोग कैसे जी रहे हैं ? इससे किसी को मतलब नहीं है। ज़्यादातर लोग समझते हैं कि कला की दुनिया बहुत रिच (अमीर) है। वहाँ बहुत पैसा है और सब ठीक-ठाक है। दरअसल जब वे कला के बारे में सोचते हैं तो उन्हें सिर्फ बालीवुड याद आता है और उसमें भी अमिताभ बच्चन याद आते हैं या फिर शास्त्रीय संगीत और नृत्य के चित्र उभरते हैं लेकिन सच्ची बात है कि दुनिया में और भारत में भी कला की दुनिया का एक बड़ा हिस्सा हाशिये पर है और हम उसकी तरफ देखते ही नहीं। कला और कलाकारों का यह बड़ा वर्ग गांवों में रहता है, छोटे शहरों में रहता है और इनके पास ही सच्ची कला है। इनके पास कला और जीवन की विविधता है। बड़े शहरों में भी बहुत सारे कलाकार हैं जिनका काम सीजनल है और जीने की स्थितियाँ बहुत ही कठिन हैं। हमको-आपको यह बात समझनी होगी कि जो बहुत सारा परफॉर्मेंस आर्ट हम देखते हैं वो सीजनल है। वह मंदिर का कोई फंक्शन हो सकता है या कोई त्योहार हो सकता है। ऐसे समय में ही हाशिये के इन कलाकारों को दो या तीन महीने के लिए काम मिलता है, इसके बाद कुछ नहीं होता। ठीक यही स्थिति शिल्पकारों की भी है।

कहने का मतलब यह है कि कला की दुनिया एक मार्जिनल दुनिया है। यहाँ बहुत पैसे की तो बात छोड़िए पैसा ही नहीं है; जैसे प्रवासी मजदूर दिहाड़ी पर खटते हैं वैसे ही कला की दुनिया भी दिहाड़ी मजदूरी पर चलती है। आज़ादी के समय से ही बहुत सारी कलाओं और कलाकारों को उपेक्षित रखा गया है। अब हमें सच्चाई को स्वीकार करते हुये उन्हें मान्यता देनी होगी।

दूसरी बात जो मैं कहना चाहता हूँ वह यह कि आज तक जिन कला रूपों को हमने महत्व दिया है समान्यतः वह जाति आधारित हैं। मैं अपनी बात को थोड़ा और स्पष्ट करता हूँ। दरअसल हमारे देश में उन्हीं कलाओं व कलाकारों को प्रतिष्ठा मिली जिन्हें अपर कास्ट ब्राहमिनिकल मॉडल ने महत्व और सम्मान दिया। आज से नहीं बहुत सालों से यही हो रहा है, आप देख लीजिये अवार्ड्स उन्हीं को मिलते हैं, सरकार ने जो भी कालेज फ़ाउंडेशन आदि बनाए उन सबमें इन्हीं का प्रभुत्व है | अपर कास्ट एलीट लोगों की रुचि जिन कलाओं में है, जिनका वे अभ्यास करते हैं वही सबसे महत्वपूर्ण हो जाती हैं। हम समझते हैं कि कला का क्या है वह तो सबसे अलग एक दुनिया है। उसमें एक्चुअल पॉलिटिक्स और एक्चुअल सोसाइटी है ही नहीं लेकिन यह बात पूरी तरह से झूठ है। कला की दुनिया एक पॉलिटिकल (राजनीतिक) दुनिया है, कलाकारों में बहुत से समाज और संस्कृति के राजनीतिज्ञ हैं। यह बात सभी कलाकारों को अच्छे से समझ लेनी चाहिए और उन कलाकारों को तो विशेष तौर से जिनके जीवन में प्रिविलिजेज़ हैं जैसे कि मैं खुद। मैं एक अपर कास्ट मेल (पुरुष) हूँ। मेरी कला बहुत सम्मानित है। आप सब जानते हैं कि कर्नाटक संगीत का भारतीय संगीत में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। क्या है कि जिस संगीत या कला को एलीट लोग सम्मान देते हैं बाकी समाज में उसे आटोमेटिक सम्मान मिलने लगता है और उसके कलाकार स्वतः सम्माननीय हो जाते हैं।

कई बार ऐसा होता है कि आदमी कला विशेष को न पसंद करता है, न समझता है फिर भी वह उस कला और कलाकार को इज्जत देता है; तो आप सोचिए कि कला विशेष को यह मान-मर्यादा कहाँ से मिल रही है ? इसका स्रोत क्या है ? दरअसल यह मान-मर्यादा कला से नहीं आ रही है बल्कि प्रभुत्वशाली उच्च वर्ग से आ रही है। कला जिस जगह प्रतिष्ठित है वहाँ से आ रही है। अब आप समझिए 99% कला प्रतिष्ठा के इस दायरे से बाहर है। 99% कलाकार इस दुनिया से बाहर हैं, न हमें उनका नाम पता है न उनकी कला का रूप पता है। यही है कला की सच्ची दुनिया, अब इसमें कोरोना वाइरस को जोड़ लीजिये और सोचिए कि वास्तविक हालात क्या होंगे ? हम लोग तमिलनाडु में 22 मार्च से प्रवासी मजदूरों के साथ काम कर रहे हैं। हमने बीस हजार प्रवासी मजदूरों के साथ काम किया और उनको सहायता पहुँचाई। इसमें झारखंड, उड़ीसा, वेस्ट बंगाल, अरुणाचल प्रदेश से लेकर बिहार तक सब जगह के लोग थे, पिछले दो महीनों में उन्होंने घोर कष्ट सहा है। खुशी बस इतनी है कि अब इसमें से अधिकांश लोग अपने घर पहुँच गए हैं।

इसके साथ ही हमने छोटे शहरों और बड़े शहरों में बैक स्टेज रहने वाले कलाकारों (जिनका कोई नाम भी नहीं जानता) के साथ भी काम किया। बहुत सारे कलाकारों को कोई मानदेय नहीं मिलता और कार्यक्रम सारे रद्द हैं। अब स्थिति यह है कि इनकी इनकम जीरो हो गई है, एकदम वैसे ही जैसे कि प्रवासी मजदूरों की। मैं फिर कह रहा हूँ कि प्रवासी मजदूरों और कलाकारों में कोई अंतर नहीं है, दोनों दिहाड़ी पर ही काम करते हैं। हमारी फाउंडेशन ने देश भर के 1500 आर्टिस्टों के साथ कुछ काम किया है लेकिन यह संख्या नगण्य है। आगे कलाकारों का जीवन कैसे चलेगा यह एक बहुत बड़ा सवाल है ? एक महीना के लिए कुछ सपोर्ट कर सकते हैं दो महीना के लिए कुछ सपोर्ट कर सकते हैं उसके बाद क्या होगा ? इसका कोई उत्तर मेरे पास नहीं है।

हम सोचते हैं कि कला एक लग्जरी है। सरकार से बात करिये तो वह कहेगी कि समाज के लिए कला कोई जरूरी चीज नहीं है, वह तो लग्जरी (विलासिता की वस्तु) है। ‘है तो ठीक नहीं है तो ठीक’ लेकिन यह बहुत बड़ा झूठ है। हम स्वास्थ्य सेवाओं में बदलाव, शिक्षा तथा रोजगार के लिए एक सांस्कृतिक मानसिकता के साथ ही काम कर रहे हैं। क्या बिना कल्चर के यह काम किया जा सकता है ? आर्ट क्या है ? इसका जबाब बहुत ही आसान है – कला संस्कृति का प्रतिबिंब है ( Art is a reflection of culture )। संस्कृति (कल्चर) में जो कुछ सुंदर होगा वह कला (आर्ट) में आपको दिखाई देगा, साथ ही संस्कृति की कुरूपता भी उसमें दिखाई देगी; तो हमें समाज में परिवर्तन लाने के लिए, नई सोच पैदा करने के लिए, नई आदतों को व्यवहार में लाने के लिए कला और कल्चर के साथ काम करना पड़ेगा। इसको छोड़कर आप आगे नहीं बढ़ सकते, लेकिन दुर्भाग्य से हमारे देश में हमेशा से यही हो रहा है। हमको समाज में कला और कलाकार की भूमिका ही समझ में नहीं आ रही है।

एक और बात; मैं यह सारी बातें प्रतिरोध की कला के बारे में नहीं कर रहा हूँ, समान्य कलाओं के बारे में कह रहा हूँ। उदारवादियों की एक बड़ी समस्या है, जब मैं कला कहूँगा तो वो कहेंगे कि प्रतिरोध की कला के बारे में बोल रहा है, बहरहाल वह दूसरी समस्या है। प्रोटेस्ट आर्ट भी कला का एक रूप है। दरअसल आदर्श रूप में देखें तो सवाल करना ही सारी कलाओं का काम है। कुछ कला रूप सीधे सवाल करते हैं तो कुछ अपने भीतर सवालों को समेटे रहते हैं। ध्यान से देखेंगे तो उसकी मधुरता, लय, ताल सब में आपको सवाल मिलेगा, बस हमको अपने सोचने के तरीके को बदलने की जरूरत है। जब मैं कहता हूँ कि हम कला से समाज में परिवर्तन ला सकते हैं, तो उसका अर्थ सभी कलाओं से है प्रोटेस्ट आर्ट मात्र से नहीं। जिसे हम पारंपरिक कला कहते हैं उसका काम भी परिवर्तन लाना ही है।

हमें कला को समाज की मूलभूत जरूरत के रूप में महत्व देना होगा तथा सरकार और शासन में इसे मनुष्य की मूलभूत अवश्यकता के रूप मे स्थापित करना होगा। अब आपको पता है या नहीं, हमारे देश में बहुत सालों तक कल्चर मिनिस्टर ही नहीं था। प्रधानमंत्री ही संस्कृति मंत्री थे। आज भी कल्चर मिनिस्टरी (संस्कृति मंत्रालय) एक बैक स्टेज मिनिस्टरी है, उनका काम है संगीत नाटक अकादमी आदि को चलाना और कुछ कार्यक्रम आदि करवा देना। इस मंत्रालय के पास कोई विजन नहीं है और न ही कोई नई सोच। इनके पास दो काम हैं, एक तो अवार्ड के लिए संस्तुति देना; दूसरा संबन्धित महाविद्यालयों की देखभाल करना। इसे भी ये लोग ठीक से नहीं कर पाते तो आप सोचिए इन हालातों में हम देश और उसकी सोच को कैसे बदल पाएंगे ?

हम आज देश में चारों तरफ हिंसा देख रहे हैं। यहाँ तक कि लोगों की सोच में हिंसा रच-बस गई है। पूरे देश को रिलीजन, कास्ट, जेंडर, (धर्म, जाति, लिंग) के आधार पर बांटने की राजनीति ही मुख्य हो गई है। इस देश की नींव बदली जा रही है, इसे देखकर हमें डरना चाहिए। हम सोचते हैं कि दक्षिणपंथी लोग ही ऐसे हैं लेकिन ऐसा नहीं है, सब लोग इसी तरह से सोच रहें हैं। हम रिएक्ट ही करते हैं एक गुस्से के बदले दूसरा गुस्सा, एक हिंसा के बदले दूसरी हिंसा। बदलाव लाने के लिए हमको दिल को बदलना होगा (अपनी समझ बदलनी होगी)। जब हम इस सच्चाई को स्वीकार करेंगे कि समाज में भेद-भाव है, जब हम यह महसूस करेंगे कि अमुक व्यक्ति को हमने सिर्फ इसलिए सम्मान नहीं दिया क्योंकि वह एक महिला थी और जब हम यह महसूस करेंगे कि हम सब बराबर हैं तब बदलाव आएगा। जब तक दिल में यह सोच पैदा नहीं होती तब तक बदलाव संभव नहीं है। यह सोच आएगी कैसे? इसके लिए हमें कल्चर बदलना होगा। घर में, स्कूल में हर जगह का कल्चर बदलना होगा। कल्चर में यह बदलाव लाने के लिए हमें समाज में कला को प्रमुखता देनी होगी साथ ही कलाकारों को बृहद सामाजिक भूमिका में शामिल करना होगा।

सामान्यतः हम पाते हैं कि सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में सीधे तौर पर वही कलाएं और कलाकार शामिल होते हैं जो समाज के उत्पीड़ित व वंचित समुदाय से आते हैं। दरअसल उनके पास अपने अधिकारों को स्थापित करने, उनकी मांग करने तथा समाज और सत्ता को सवालों के कटघरे में खड़ा करने का यही एक मात्र रास्ता है। वे अपने जीवन की मूलभूत जरूरतों के लिए, मनुष्य होने की गरिमा को पाने के लिए कला का इस्तेमाल करते हैं और यह वैश्विक स्तर पर हो रहा है चाहे आप अफ्रीकन-अमरीकन म्यूजिक को ले लीजिए या फिर अपने यहाँ दलितों के आर्ट व महिलाओं के संघर्ष को ले लीजिये। आप देखेंगे कि जब लोगों को दबाया जाता है, उनका शोषण किया जाता है तो इसके विरुद्ध उनके साहित्य, कला, नाटक आदि में स्वाभाविक रूप से एक प्रतिक्रिया पैदा होती है, लेकिन जो हम जैसे शास्त्रीय संगीत के लोग हैं वे सवाल नहीं करते। वैसे शास्त्रीय संगीत ही एक झूठा शब्द है। क्या शास्त्रीय ? कैसे तय होगा किसमें शास्त्र है किसमें शास्त्र नहीं है ? मैं तो कहता हूँ हिन्दुस्तानी बोलो, ख़याल बोलो, ध्रुपद बोलो, कर्नाटक संगीत बोलो, शास्त्रीय या देशी संगीत क्या है ? मेरे ख़याल से इनके पीछे एक राजनीति है और इन शब्दों के गहरे राजनीतिक अर्थ हैं।

मैं अपनी बात पर वापस आता हूँ कि शास्त्रीय संगीत में हम सवाल नहीं करते क्योंकि यह एलीट क्लास की कला है जिसका कि अपना एक अलग कम्फर्ट जोन (सुविधा क्षेत्र) है। समाज में इस कला की बड़ी इज्जत है। हमें मालूम है कि सुनने- देखने वाले सब एक ही तरह के लोग हैं और एक से माहौल के आदी हैं तो हम उनको एक ही तरह का नृत्य-संगीत देते हैं। यही कारण है कि शास्त्रीय संगीत या नृत्य में गंभीर राजनीतिक-सामाजिक विमर्श तथा सवालों का प्रायः अभाव होता है। हमें इस सब को बदलना है। जब हम सामाजिक बदलाव की कलाओं को सम्मान देने लगेंगे तभी परिवर्तन संभव होगा और अभी इसके लिए बहुत काम किया जाना बाकी है।

मैंने छः साल की उम्र से कर्नाटक संगीत सीखना शुरू किया था और बारह वर्ष की उम्र में स्टेज पर कार्यक्रम देने लगा था। अपनी संगीत यात्रा शुरू करते हुये मैंने सोचा कि कर्नाटक संगीत बहुत ऊंचा है बहुत सुंदर है। अन्य कलाकारों की तरह मैं भी पैसे और परफार्मेंस के पीछे लगा रहा, यह तो बहुत बाद में मैंने सोचना शुरू किया कि यह संगीत या नृत्य आता कहाँ से है ? यह कला क्यों और कैसे आई ? मनुष्य ने इन तमाम सुंदर कलाओं को क्यों खोजा ? क्यों सृजित किया ? पेंटिंग, प्लास्टिक आर्ट, लोक संगीत, भक्ति संगीत व अन्य तमाम कलाओं के सृजन का मूल क्या है ? इन्हें क्यों होना चाहिए ? दरअसल यह सब बदलाव का माध्यम हैं जैसे जब हम कोई सुंदर संगीत सुनते हैं या सिनेमा अथवा नाटक देखते हैं तो हमारे अंदर एक बदलाव आता है। हमारी भावनाएं पहले से कुछ भिन्न व बेहतर हो जाती हैं। कला हमको हमारे स्व से मुक्त करके जीवन को एक अलग नजरिए से देखने का अवसर देती हैं।

कहने का अर्थ यह कि कला मनुष्य जाति के लिए एक अवसर है। मैं एक गाना सुनता हूँ और कुछ देर के बाद उस गाने में डूबकर खुद को भूल जाता हूँ , संगीत और मैं एक हो जाते हैं। जीवन में कभी न कभी हम सभी को यह अनुभव होता है और ऐसा सिर्फ संगीत में ही नहीं होता, संगीत के बाहर की दुनिया में भी यह अनुभव बार-बार घटित होता है। आप भूल जाते हैं कि आप कौन हैं। ‘मैं’ गायब हो जाता है, सिर्फ संगीत या दृश्य बचा रहता है या कहें कि दोनों एकमेक हो जाते हैं। यह एक बहुत बड़ा भावनात्मक अनुभव है जो हमारे दिल, हमारी अस्मिता हर चीज से बड़ा है, यह हमें बदल देता है भले ही यह परिवर्तन अस्थायी हो लेकिन यह मानव जाति की बहुत ही महत्वपूर्ण खोज है। कला हमें बदलाव का अवसर उपलब्ध कराती है। परिवर्तन की आकांक्षा से ही मानव जाति ने नृत्य का, संगीत का आविष्कार किया है। कला एक प्रतिरोध है, कला एक सवाल है और यही कारण है कि हम उसे सेलिब्रेट करते हैं। समाज में कलाओं और कलाकारों की महत्वपूर्ण जगह होनी चाहिए क्योंकि उनका काम एक सामाजिक-राजनीतिक काम है।
कलाकारों को मालूम होना चाहिए कि समाज में उनकी बड़ी भूमिका है, वे सिर्फ तालियों के लिए काम नहीं कर रहे हैं। मैं नहीं कहता कि वे मेरी तरह बोलें या राजनीतिक हों लेकिन उन्हें अपनी भूमिका के बारे में गहराई से सोचना होगा। हम सभी जानते हैं कि एक कविता ने, एक नाटक ने, एक गीत ने इतिहास बदल दिया है तो कलाकार के अंदर समाज को बदलने की क्षमता होती है। आज भारत में जो समय चल रहा है, उसमें सच्ची कला को ताकतवर बनाना, उसको सेलिब्रेट करना एक जरूरी कार्यभार है। कितनी बड़ी विडम्बना है कि जो कलाकार हमारे समाज को बदलने की क्षमता रखते हैं वे हाशिये पर हैं। एक समाज चेतस व्यक्ति के रूप में हमारा कर्तव्य है कि हम इन कलाकारों को मजबूती दें। हमारा वर्तमान राजनीतिक ढांचा और उसमें काम कर रही सरकार की सोच विविधता विरोधी है। वे साफ तौर पर कहते हैं कि हम हिंदुस्तान की डाइवर्सिटी को नहीं चलने देंगे। जब वे कहते हैं कि हमें डाइवर्सिटी (विविधता) चाहिए तो सरासर झूठ बोलते हैं। उनकी वास्तविक सोच है कि संगीत, कला, कलाचार सब एक तरह का होना चाहिए। दरअसल वे पूरे समाज की चिंतन प्रक्रिया को रोक देना चाहते हैं। दरअसल वे एक विविधता रहित फासीवादी समाज बनाना चाहते हैं और उनका यह प्रयास आज से नहीं है बल्कि उनके जन्म से है। एक हमीं लोग हैं जो विविधता को स्थापित करने का काम ठीक से नहीं कर पा रहे हैं। हमें इस स्थिति पर गंभीरता से सोचना चाहिए, क्योंकि वे तो बहुत सालों से एक सजातीय संस्कृति, हिन्दू राष्ट्र, हिन्दू संगीत, हिन्दू नाटक या एक शब्द में कहें तो हिन्दू कलाचार के अजेंडे पर काम कर रहे हैं। यह उनका ड्रीम प्रोजेक्ट है लेकिन हमने भारत की सच्ची आत्मा, जो विविधता मे बसती है, उसको बचाने का अपना जरूरी कार्यभार नहीं निभाया। हमको अपनी इस गलती को स्वीकार करना चाहिए और उनके प्रतिक्रियावादी जाल में न फँसते हुये सच्चे सांस्कृतिक कार्य को आगे बढ़ाने का उत्तरदायित्व लेना चाहिए। हमारा सबसे जरूरी काम सभी आवाज़ों को मजबूत करना है, सभी गीतों को ताकत देनी है तथा सवाल खड़े करने की क्षमता को ताकतवर बनाना है। यही कला का सच्चा काम है।

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