” सर्वहारा क्रांति का इतिहास ही ऐसे मार्क्सवादी नेताओं को जन्म देता है, जो संघर्षों की आँच में अपनी प्रतिष्ठा अर्जित करते हैं, जो वैचारिक संघर्षों की प्रक्रिया में तपकर विकसित होते हैं। ऐसे ही महान नेता सर्वहारा क्रांति के इतिहास को आगे बढ़ाते हैं।”
— स्वदेश भट्टाचार्य (शंभू जी)
शंभू जी ने विनोद मिश्र के लिए लिखे गए अपने स्मृति आलेख में ये बातें कही थीं। आज उनके लिए भी इससे बेहतर कुछ नहीं कहा जा सकता।
क्रांतिकारी नेतृत्व और इतिहास के पारस्परिक संबंध की उनकी यह समझ ही उनकी विरासत है। यह क्रांतिकारी आंदोलन को व्यक्ति-मोह और व्यक्ति-पूजा से बचाती है। इतिहास के साथ व्यक्ति की मुठभेड़ को समझने के लिए उसके वैचारिक संघर्ष पर ध्यान देने की जरूरत रेखांकित करती है।
7 मार्च 1942 को जन्मे स्वदेश भट्टाचार्य का निधन 30 अक्टूबर 2026 को पटना में हुआ। वे 84 वर्ष के थे। कैंसर से उनका इलाज चल रहा था। वे भाकपा (माले) लिबरेशन के संस्थापक नेताओं में थे। निधन के समय पार्टी की पोलित ब्यूरो के सदस्य और केंद्रीय संगठन विभाग के प्रभारी थे।
स्वदेश भट्टाचार्य का निधन भारतीय वामपंथ की उस पीढ़ी के एक महत्वपूर्ण प्रतिनिधि का जाना है, जिसने नक्सलबाड़ी आंदोलन के उभार, उसके दमन, बिखराव और फिर उसके पुनर्गठन की कठिन ऐतिहासिक प्रक्रिया में अपनी जिंदगी लगाई। वे उस वैचारिक संघर्ष के सहभागी थे, जिसमें क्रांतिकारी विरासत को बचाने और उसे बदलती ऐतिहासिक परिस्थितियों के अनुरूप विकसित करने की चुनौती शामिल थी।
यह इसी वैचारिक संघर्ष का नतीजा है कि आज क्रांतिकारी वाम लोकतंत्र की रक्षा के लिए चल रहे संघर्ष का युवा चेहरा बन गया है। यह उस दौर में हुआ है, जिसमें शासक वर्ग नक्सलबाड़ी की विरासत के पूर्ण सफाए का सपना देख रहा है। लेकिन उसे भी मालूम है कि यह सपना कभी पूरा नहीं हो सकता। क्रांति की आकांक्षा अब भूमिगत नहीं रह गई है। वह दिमागों में जगह बना चुकी है।
1972 में चारु मजूमदार की मृत्यु के बाद भाकपा (माले) गंभीर संकट के दौर से गुजर रही थी। 28 जुलाई 1974 को सुब्रत दत्त (जौहर), विनोद मिश्र और स्वदेश भट्टाचार्य के नेतृत्व में पार्टी की केंद्रीय कमेटी का पुनर्गठन इसी संकट से निकलने की एक महत्वपूर्ण कोशिश थी। इस कमेटी के वे अंतिम जीवित सदस्य थे। 1974 से 1980 तक उन्होंने बिहार में पार्टी के राज्य सचिव की जिम्मेदारी निभाई। जौहर की शहादत के बाद विनोद मिश्र के नेतृत्व में पार्टी को नए सिरे से संगठित करने की लंबी प्रक्रिया चली। स्वदेश भट्टाचार्य इसके सक्रिय सहभागी रहे। बाद के वर्षों में उन्होंने केंद्रीय संगठन के निर्माण और विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे केंद्रीय संगठन विभाग और वित्त के प्रभारी भी रहे।
उनके राजनीतिक जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि उन्होंने क्रांतिकारी विरासत के प्रति प्रतिबद्धता को पुरानी कार्यनीतियों के यांत्रिक अनुकरण का पर्याय नहीं बनने दिया।
विनोद मिश्र के नेतृत्व में भाकपा (माले) ने भारत के धधकते खेतों-खलिहानों में जारी सामंती शोषण के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष के दायरे से आगे बढ़कर व्यापक जनांदोलनों, किसान-मजदूर संगठनों और लोकतांत्रिक राजनीतिक हस्तक्षेप का रास्ता विकसित किया।
स्वदेश भट्टाचार्य इस बदलाव को क्रांतिकारी विरासत से विचलन नहीं, बल्कि उसे आगे बढ़ाने की ऐतिहासिक जरूरत के रूप में देखते थे। अपने संस्मरण में वे विनोद मिश्र की जिस संगठनात्मक संस्कृति का उल्लेख करते हैं, उसमें असहमति को सुनना, वैचारिक बहस को जगह देना, सामूहिक निर्णय का सम्मान करना और सिद्धांतों के प्रति दृढ़ रहना शामिल है। यह उनके अपने राजनीतिक संस्कारों का भी परिचायक है।
विनोद मिश्र के सर्वहारा जनजागरण के सपने को समझने के लिए स्वदेश भट्टाचार्य की एक महत्वपूर्ण वैचारिक अंतर्दृष्टि को रेखांकित करना जरूरी है। वे भगत सिंह और आंबेडकर की विरासत को एक-दूसरे का पूरक मानने वाली राजनीतिक दृष्टि रखते थे। उनके लिए भगत सिंह की क्रांतिकारी परंपरा और आंबेडकर का सामाजिक न्याय, जाति-विरोध तथा लोकतांत्रिक अधिकारों का संघर्ष भारतीय समाज के रूपांतरण की एक व्यापक परियोजना के दो जरूरी आयाम थे। यह महज दो प्रतीकों को एक साथ रख देने की बात नहीं थी। इसमें भारतीय क्रांति के सामाजिक आधार और उसके लोकतांत्रिक चरित्र को व्यापक बनाने की संभावना निहित थी।
2017 में भोजपुर में रिवोल्यूशनरी यूथ एसोसिएशन की एक बैठक में उन्होंने भगत सिंह और आंबेडकर से प्रेरित युवाओं को एक साझा लोकतांत्रिक संघर्ष की परंपरा में रखा था। उन्होंने आंबेडकर की मूर्तियों पर हमलों को केवल एक महापुरुष या समुदाय के अपमान का मामला नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला बताया। उनके लिए आंबेडकर की विरासत को स्वीकार करना सामाजिक न्याय के प्रश्न को क्रांतिकारी राजनीति के केंद्र में रखने की जरूरत से जुड़ा था। यह दृष्टि उनकी पार्टी के कामकाज में भी दिखाई देती है। दलितों और भूमिहीन गरीबों के अधिकारों, जातिगत उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष, खेत मजदूरों के संगठन और व्यापक लोकतांत्रिक आंदोलनों में पार्टी की सक्रिय भागीदारी इसी दिशा के व्यावहारिक रूप हैं।
इस दृष्टि का एक अंतरराष्ट्रीय आयाम भी था। साम्राज्यवाद-विरोध, दक्षिण एशिया के देशों के बीच बराबरी और जनता के स्तर पर एकजुटता तथा आतंकवाद के नाम पर किसी समुदाय को निशाना बनाने की राजनीति का विरोध उनके सार्वजनिक वक्तव्यों में दिखाई देता है। वे लोकतंत्र को केवल संसदीय व्यवस्था तक सीमित नहीं करते थे। उनके लिए लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ उन वंचित समुदायों की राजनीतिक आवाज और अधिकारों का विस्तार भी था, जो सामाजिक और आर्थिक सत्ता-संबंधों के कारण हाशिये पर रखे गए हैं।
स्वदेश भट्टाचार्य का राजनीतिक जीवन एक निरंतर वैचारिक और संगठनात्मक यात्रा था। उन्होंने नक्सलबाड़ी की क्रांतिकारी ऊर्जा को उसके ऐतिहासिक संकटों के बावजूद बचाए रखने और उसे व्यापक जनतांत्रिक संघर्षों से जोड़ने की कोशिश में अपना जीवन लगाया।
विनोद मिश्र के सर्वहारा जनजागरण के सपने में उनकी हिस्सेदारी केवल एक संगठनात्मक जिम्मेदारी नहीं थी। उसमें भगत सिंह की क्रांतिकारी विरासत और आंबेडकर की सामाजिक मुक्ति की आकांक्षा को जोड़कर भारतीय समाज के रूपांतरण की एक व्यापक कल्पना भी शामिल थी।
उनकी स्मृति को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि इस अधूरे जनजागरण के सपने और उसके लिए जरूरी वैचारिक साहस, सामाजिक दृष्टि तथा जनसंघर्षों की विरासत को आगे बढ़ाने की कोशिश जारी रहे।

