हर्ष पटेल
हर दौर कभी ख़त्म तो हुआ ही करता है…
वीरेन दा की यह पंक्ति हमें सितारे से आगे के जहाँ की तरफ़ ले जाती है। हम जिस समाज में रच-बस गए हैं, वह समाज हमारे ख़्वाबों का समाज नहीं है। हमें अपने सपनों को पहले बचाना है, फिर उन्हें सुंदर बनाना है। इसी जद्दोजहद में लोग सड़कों पर निकल रहे हैं। अपने अधिकारों को पहचान रहे हैं। ज़ुल्म के ख़िलाफ़ बेख़ौफ़ होकर डट गए हैं। अपने समय के क्रूर शासकों को चुनौती दे रहे हैं और इस बात को महसूस कर रहे हैं—
‘हमने यह कैसा समाज रच डाला है
इसमें जो दमक रहा शर्तिया काला है।’
हिंदी के मशहूर कवि वीरेन डंगवाल की स्मृति में जन संस्कृति मंच का वार्षिक आयोजन ‘वीरेनियत’ इस बार नई दिल्ली के जवाहर भवन में अपना आठवाँ जलसा मना रहा था।
वीरेन डंगवाल की कविता उम्मीद की कविता है। उजले दिनों की उम्मीद की कविता। वे जानते थे कि उजले दिनों की ज़रूरत ‘अच्छे दिनों’ से कहीं ज़्यादा है। डंगवाल साहब के ‘राम सिंह’ के सामने जो सवाल थे, वे दिल्ली की सड़कों पर फिर ज़िंदा हो उठे हैं। वैसा ही माहौल। हज़ारों-लाखों ‘राम सिंह’ दिल्ली की सड़कों पर उतारे गए हैं। उन्हें आदमी के सामने खड़ा करके यह हुक्म दिया गया है कि ये पुतले हैं, इन पर लाठियाँ बरसा दो, गोली चला दो, संगीन भोंक दो।
ऐसे माहौल में बचते-बचाते वीरेन दा के तमाम चाहने वाले 9 अक्टूबर की शाम जवाहर भवन में इकट्ठा हुए। इस बार के आयोजन में सीधे कविता-पाठ से पहले कुछ नई चीज़ें हुईं। नवारुण प्रकाशन से प्रकाशित ‘उजले दिन आएँगे ज़रूर’ का लोकार्पण प्रो. वीर भारत तलवार के कर-कमलों से हुआ। इस अवसर पर प्रकाशक संजय जोशी भी मौजूद थे। यह किताब वीरेन दा की प्रतिनिधि कविताओं का संकलन है, जिसका चयन और संपादन हरिश्चंद्र पांडेय ने किया है। इसके साथ ही वीरेन डंगवाल की कविताओं पर आधारित आठ कविता-कार्डों के सेट का भी लोकार्पण हुआ।

कार्यक्रम के आरंभिक हिस्से में ‘कोरस’ की टीम से डी. पी. सोनी, समता राय और अंकुर ने वीरेन दा की कविता ‘हमारा समाज’ का संगीतमय पाठ प्रस्तुत किया। वीरेन दा की कविता को संगीत के माध्यम से प्रस्तुत करने का यह एक नया प्रयोग था।
कई श्रोताओं को यह बात अच्छी नहीं लगी कि इस प्रस्तुति में कविता में आए ‘काला’ शब्द को बदलकर ‘अंधियाला’ कर दिया गया था! यहाँ बहस नई भाषिक संवेदना और पुराने टेक्स्ट की पवित्रता के बीच है, जिसे सुलझाना सरल नहीं है।
कविता-पाठ की शुरुआत इब्बार रब्बी की कविता से हुई। चूँकि इब्बार रब्बी कार्यक्रम में आमंत्रित थे, मगर स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के चलते नहीं आ सके, इसलिए उनकी कविता ‘दिल्ली की बसों में’ का पाठ आशुतोष कुमार ने किया। इब्बार रब्बी ने जब यह कविता लिखी थी, तब उन्हें यह नसीहत देनी पड़ी थी कि ‘टिकट ज़रूर ले लें’, मगर आजकल दिल्ली की बसें सिर्फ़ टिकटशुदा सवारियाँ नहीं ढोतीं। गुज़िश्ता कुछ दिनों से पुलिस बग़ैर टिकट सवारियाँ ढो रही है। अगर कोई सवारी बैठने से इनकार कर दे, तो भी पुलिस उसे जबरन उठाकर बस में ठूँस देती है। सवारियाँ बसों से झाँकती रहती हैं। ये सवारियाँ नहीं हैं, उम्मीदें हैं, जो नारे लगा रही हैं, तिरंगे लहरा रही हैं।
उम्मीदें… उजले दिनों की उम्मीदें।

पहले कवि के तौर पर मध्य प्रदेश से आए युवा कवि अरबाज़ ख़ान ने कविताएँ पढ़ीं। उनकी कविता में तमाम ज़रूरी मुद्दे थे। उनकी कविता ‘मस्जिद के भीतर चहकते बच्चे’ हाथों-हाथ ली गई। कविता में वे बच्चों के बीच मशहूर खिलंदड़े जुमलों, मसलन ‘सूख सूख पट्टी, चंदन पट्टी’, ‘आदा-पादा’ का खूबसूरती से इस्तेमाल करते हैं। कविता जहाँ एक ओर बच्चों की शरारतों से पटी पड़ी है, वहीं दूसरी ओर वही बच्चे कविता में कहते हैं—
‘दुआ में बोले जाने वाले आमीन को
कुछ बच्चे अम्मी समझ बैठे हैं
और इमाम की हर दुआ पर चिल्ला रहे हैं
अम्मी, अम्मी, अम्मी
साबित करते हुए
ये बच्चे हैं
अपनी अम्मियों के बच्चे
तुम मत दो कोई जगह अम्मी को मस्जिद में
लेकिन ये साथ ले ही आएँगे उसे’
अपनी रूढ़ियों को वर्षों से ढो रहे मुस्लिम समाज पर अरबाज़ बच्चों के ज़रिए कितना बड़ा व्यंग्य करते हैं! उनकी दूसरी कविता ‘एक मिस्त्री की याद’ भी सराही गई।
अरबाज़ के बाद सौम्य मालवीय ने कविताएँ पढ़ीं। उनकी कविताएँ बहुत लंबी नहीं थीं, मगर असरकुन थीं। उन्होंने मंच पर एक मँजे हुए कवि की तरह सहजता से पाठ किया। उन्होंने ‘नीला कोट’, ‘ख़तरा है’, ‘फूल हो सकते हैं बेहया के’, ‘बेटी पर्यायवाची मत पढ़ना’, ‘फ़ासीवाद के नाम से’ और ‘सभी वादे निभाता है आपातकाल’—कुल छह कविताएँ पढ़ीं। उनकी कविताओं में वे तमाम मंज़र नज़र आते हैं, जिनके ख़िलाफ़ एहतिजाज करते हुए लोग दिल्ली की सड़कों पर लाठियाँ खा रहे हैं। मसलन, ‘सभी वादे निभाता है आपातकाल’ कविता में वे कहते हैं—
‘सतत् चमत्कार है आपातकाल
अंतहीन आखेट का रोमांच
कातिलाना मौज की हू-हू
प्रतिशोध की सुन्न कर देने वाली पिनक
लिस्ट से एक-एक कर काटे जाते नाम’
इसके अलावा ‘फ़ासीवाद के नाम से’ में पढ़ते हैं—
‘मतदाता सूची में हेर-फेर सू-ए-इरादा
जीत का ऐलान बेगरज-बेसाख्ता’
‘बेटी पर्यायवाची मत पढ़ना’ को भी श्रोताओं ने काफ़ी पसंद किया।

आर. चेतन क्रांति की कविताएँ हमेशा की तरह शानदार रहीं, मगर कुछ श्रोताओं ने ऐसा महसूस किया कि कविता-पाठ के लिए वे बहुत उत्साहित और तैयार नहीं लग रहे थे। कुछ लोगों को यह शिकायत रही कि उनकी कविताएँ समझ में नहीं आईं, संप्रेषित नहीं हुईं। मगर मैं यह भी कहना चाहूँगा कि कविता जितनी सुनी जानी चाहिए, उससे कहीं अधिक महसूस की जानी चाहिए। इस दमनकारी दौर पर उन्होंने दो बहुत ज़रूरी कविताएँ पढ़ीं।
‘वे रौंदे जा रहे हैं
वे ज़रा-ज़रा से पिल्ले
वे अश्लील बदतमीज़ बदज़ुबान
ये जेन-जी, जेन-फी
और न जाने कौन-कौन
ये कमबख़्त
जिनका दिमाग़ इतना तेज़ चलता है
(राम इन्हें गारत करें)
यह साले दिमाग़दार नक्सल!
(अरे मेरा बुलडोज़र कहाँ रख दिया कमबख़्तों?)’
इस बार के ‘वीरेनियत’ में मुझे जेन-ज़ी के आंदोलनों और युवा प्रतिरोध की आकांक्षाओं की एक गूँज सुनाई दी। इस मौज़ू पर इससे बढ़िया कविता शायद ही पूरे कार्यक्रम में पढ़ी गई हो। आर. चेतन क्रांति एकमात्र ऐसे कवि हैं, जिन्होंने ‘वीरेनियत’ में दो बार शिरकत की है।
आशुतोष कुमार ने पार्वती तिर्की को बुलाते हुए कहा कि उनकी कविताएँ पढ़कर यह समझना मुश्किल हो जाता है कि जिसको हम जंगल कहते और समझते हैं, वह जंगल है या जहाँ हम रहते हैं, वह जंगल है।
महानगरों में रहने वाले लोगों के लिए जंगल सिर्फ़ पर्यटन का स्थल है। वे जंगल की तस्वीर तो खींच सकते हैं, मगर उसकी धड़कन सुनना उनके लिए चुनौती भरा होता है। पार्वती तिर्की की कविता जंगल की धड़कन की कविता है। महानगरीय शोर से उकता चुके कानों को ऐसी कविताएँ समझने के लिए श्रम करना पड़ेगा। यही कारण रहा कि कुछ लोगों को पार्वती तिर्की की कविताएँ कम पसंद आईं। पार्वती ने छोटी-छोटी कुल नौ कविताएँ सुनाईं। उनकी शिकायत जंगल को विकास के नाम पर ख़त्म करके उसे हड़पने वाले घुसपैठियों से है। उनकी कविताओं में जंगल, नदियाँ, ज़मीन, पेड़ और पहाड़ केवल प्राकृतिक दृश्य नहीं, बल्कि आत्मीय संबंधों और जीवन-संसार के हिस्से हैं।

सविता सिंह मशहूर स्त्रीवादी कवयित्री हैं। माइक पर उनकी आवाज़ कुछ कम आ रही थी, जिसे बाद में ठीक कर लिया गया। सविता जी ने ‘जहाँ मेरा देश था’ कविता में पढ़ा—
‘कुछ दिनों पहले जहाँ एक राह थी
अब वहाँ एक दीवार है’
यह पंक्ति दिल्ली के संदर्भ में बेहद प्रासंगिक हो उठती है। प्रधान सेवक ने बिल्कुल ऐसा ही इंतज़ाम किया है। दिल्ली में आजकल जिस सड़क से आप शाम को अपने घर लौटे थे, सुबह उसी सड़क पर लोहे की पीली दीवार खड़ी मिलती है, जिसकी हिफ़ाज़त सरहदों से भी कहीं अधिक सतर्कता से की जा रही होती है। अपनी कविताओं से सविता जी यह हौसला देती हैं कि उस दीवार में पहले दरार पड़ेगी, फिर राह बन पड़ेगी।
उसामा ने एक लंबी नज़्म पढ़ी, जिसका उन्वान उन्होंने नहीं बताया। उनकी नज़्म में ज़माने भर की चिंताएँ थीं। नज़्म का कैनवस किसी एक मज़मून तक महदूद नहीं था। अक्सर सामईन इतने बिखरे हुए मज़मून पर कही गई नज़्में सुनने के आदी नहीं होते। उन्हें एक विषय पर तो लंबी कविता सुनाई जा सकती है, मगर जब कविता का फलक बहुत बड़ा हो, तो वह श्रोताओं के हाथ से धीरे-धीरे छूटने लगती है। कुछ श्रोताओं ने कहा कि उन्हें सुनते हुए अकबर इलाहाबादी के मिसरे ‘डोर को सुलझा रहा है और सिरा मिलता नहीं’ के मआनी खुलने लगे। लेकिन आलोचक प्रणय कृष्ण ने अरबाज़ के साथ उसामा को भी हासिल-ए-महफ़िल बताया। उन्हें सविता सिंह की कविताएँ भी असाधारण महसूस हुईं।
अनामिका अंतिम कवि के रूप में डाइस पर आईं। उन्होंने बुलंद आवाज़ में कविताएँ पढ़कर एक बार फिर सबका ध्यान मंच की ओर खींचा। ‘कमरधनिया’ कविता काफ़ी असरकुन रही, जिसमें वे बार-बार कहती हैं—’इतना भी धीरे क्या बोलना, आप बोलें, कमरधनी सुने।’ उन्होंने कुल पाँच कविताएँ पढ़ीं—’तलाशी’, ‘कमरधनिया’, ‘शीरो (राबिया की मस्त सिलाई मशीन के नाम)’, ‘अनब्याही औरतें’ और ‘नमक’।
अनामिका की कविताओं में स्त्री का दायरा बहुत वसीअ है। उनकी स्त्री घरेलू भी है—वर्किंग भी, भोली भी—होशियार भी।
‘शीरो’ कविता में वे जिस राबिया से मुख़ातिब हैं, उसका चेहरा तेज़ाब से जला दिया गया है, मगर उसकी हिम्मत नहीं जली। राबिया कहती है—
‘जो बातें मुझको चुभ जाती हैं
मैं उनको सी बना लेती हूँ—
चुभी हुई बातों की ही सुई से मैंने
काढ़े हैं फूल सभी धरती पर
हरे-भरे सारे नज़ारे
आसमान के ये सितारे
मुझसे ही टँकवाए थे उसे खुदा ने।’

‘वीरेनियत’ की एक रोचक बात यह भी है कि मंच पर जितने कवि होते हैं, उनसे कहीं अधिक कवि श्रोताओं के बीच मौजूद होते हैं। इस बार भी कवियों और कविता-प्रेमियों के बीच देवी प्रसाद मिश्र, मदन कश्यप, सत्यपाल सहगल, शुभा जी, रूपम मिश्र के अलावा प्रो. प्रणय कृष्ण, प्रियदर्शन, प्रो. वीरभारत तलवार आदि अनेक लोग मौजूद रहे।
आयोजन की व्यवस्था में प्रेमशंकर सिंह, अनुपम सिंह, संजय जोशी, योगेन्द्र आहूजा, अशोक भौमिक आदि की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।
अंत में संचालक आशुतोष कुमार ने सभी कवियों, कलाकारों, श्रोताओं और आयोजन में सहयोग करने वाले साथियों का शुक्रिया अदा किया।

