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मुसलमानों को सियासत और आंदोलन से अलग रहने की सलाह देने वाले किसकी मदद कर रहे हैं ?

कुछ लोग मुसलमानों को बार-बार एक ही नसीहत दे रहे हैं कि सियासत के चक्कर में मत पड़ो, आंदोलनों में शामिल मत हो, सत्ता से टकराने से बचो, क्योंकि अगर तुमने सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई तो उसका ख़ामियाज़ा तुम्हें मुसलमान होने की वजह से भुगतना पड़ेगा। कभी यह नसीहत मज़हब के नाम पर दी जाती है, कभी समुदाय की हिफाज़त के नाम पर और कभी इस दलील के साथ कि सियासी पार्टियाँ मुसलमानों का इस्तेमाल करती हैं। सुनने में यह बात मुसलमानों की हिफ़ाज़त की फ़िक्र से निकली हुई लगती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या हर बार डराकर पीछे हटाना ही हिफ़ाज़त का रास्ता है ? क्या किसी समुदाय को ख़तरे से बचाने का मतलब यह है कि उसे अपने अधिकारों के लिए लड़ने से ही रोक दिया जाए ? और जब सत्ता के ख़िलाफ़ उठने वाला कोई सवाल पूरे देश के नागरिकों के अधिकारों से जुड़ा हो, तब मुसलमानों को उससे अलग रहने की सलाह देने वाले आख़िर किसकी मदद कर रहे होते हैं ?

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ उठे विरोध और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर का मामला इसी सवाल को हमारे सामने रखता है। इस आंदोलन का बुनियादी मुद्दा चुनाव आयोग की जवाबदेही, मतदाता सूची की विश्वसनीयता और हर योग्य शहरी के वोट देने के अधिकार की हिफाज़त है। चुनाव आयोग का कहना है कि पुनरीक्षण का मक़सद मृत, दोहरी प्रविष्टियों वाले और अपात्र मतदाताओं के नाम हटाकर सूची को दुरुस्त करना है। दूसरी तरफ़, विपक्ष और नागरिक अधिकारों के लिए काम करने वाले लोग सवाल उठा रहे हैं कि इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने या सूची में शामिल न हो पाने की वजह क्या हैं, और क्या इस प्रक्रिया में ग़रीबों, प्रवासी मज़दूरों, औरतों, अल्पसंख्यकों और दस्तावेज़ों की कमी से जूझ रहे लोगों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। रॉयटर्स की 13 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक़, एसआईआर के तहत लगभग 13 करोड़ नाम हटाए गए है। 15 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर से जुड़े मामले में चुनाव आयोग से उसके फैसलों से संबंधित रिकॉर्ड माँगे।

इस पूरे विवाद में एक और सियासी सवाल सामने आता है। जब चुनावी अधिकारों और लोकतांत्रिक जवाबदेही पर आंदोलन चल रहा है, तब कुछ मज़हबी रहनुमाओं की तरफ़ से मुसलमानों को इससे दूर रहने की सलाह क्यों दी जा रही है ? टाइम्स ऑफ़ इंडिया की 9 अक्टूबर की रिपोर्ट में ऑल इंडिया इमाम ऑर्गनाइज़ेशन के प्रमुख उमर अहमद इलियासी की ऐसी अपील का ज़िक्र आया। मुफ़्ती शहाबुद्दीन रज़वी बरेलवी की तरफ़ से भी इस तरह की सलाह दी गई। उनकी दलील का एक हिस्सा ये है कि सियासी पार्टियाँ मुसलमानों को अपने हित के लिए इस्तेमाल करती हैं और बाद में उन्हें अकेला छोड़ देती हैं। इसमें कोई शक नहीं कि हिंदुस्तानी सियासत में मुसलमानों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करने की कोशिशें हुई हैं। लेकिन इस सच्चाई से यह नतीजा कैसे निकलता है कि मुसलमान अपने अधिकारों के लिए होने वाले आंदोलनों से ही दूर रहें ? अगर किसी आंदोलन में सियासी इस्तेमाल का ख़तरा है, तो क्या सियासत से बाहर रहना इसका इलाज है ? और अगर मुसलमान हर बार इसी डर से पीछे हटते रहे, तो उनके अधिकारों के सवाल कौन उठाएगा ?

यह मानसिकता संसद के भीतर भी दिखाई दे चुकी है। जून 2026 में जम्मू-कश्मीर के नेशनल कॉन्फ़्रेंस सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी ने पिछले शीतकालीन सत्र की एक घटना का ज़िक्र करते हुए दावा किया कि जब विपक्षी सांसद एसआईआर और दूसरे मुद्दों पर विरोध कर रहे थे, तब तृणमूल कांग्रेस के सांसद यूसुफ पठान भी प्रदर्शन में शामिल थे। रुहुल्लाह के मुताबिक़, एक प्रमुख मुस्लिम सांसद ने यूसुफ पठान को प्रदर्शन से हटने के लिए कहा और उन्हें चेताया कि भाजपा के ख़िलाफ़ विरोध करने से गुजरात में उनका घर बुलडोज़र की कार्रवाई का निशाना बन सकता है। रुहुल्लाह ने दावा किया कि इस बातचीत के बाद पठान पीछे हटकर अपनी सीट पर लौट गए। बाद में तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने बताया कि वो व्यक्ति असदुद्दीन ओवैसी थे l

यह उस सोच का उदाहरण है जिसमें एक मुस्लिम जनप्रतिनिधि को यह समझाया जाता है कि सत्ता के ख़िलाफ़ खड़े होने का ख़तरा उसे इसलिए उठाना पड़ सकता है क्योंकि वह मुसलमान है और गुजरात में रहता है। सत्ता की आलोचना करना उसका लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन उसे इस अधिकार का इस्तेमाल करने से रोकने के लिए उसकी मज़हबी पहचान के आधार पर डर पैदा किया जाता है। इसका सबसे ख़तरनाक पहलू यह है कि मुसलमानों को यह मानने के लिए तैयार किया जाता है कि वे बराबरी के शहरी नहीं हैं, बल्कि ऐसे लोग हैं जिन्हें सरकार के ख़िलाफ़ बोलने से पहले अपनी मज़हबी पहचान और संभावित सज़ा का हिसाब लगाना चाहिए। किसी नेता का अपने समुदाय को ख़तरे से आगाह करना और उसे ख़तरे के डर से सियासी कार्रवाई छोड़ने की सलाह देना दो अलग बातें हैं। ऐसी अपील से किसका रास्ता आसान होता है? क्या इससे सत्ता की जवाबदेही बढ़ती है या कम होती है? क्या इससे मुसलमानों की नागरिक हैसियत मज़बूत होती है या वे अपने अधिकारों के सवाल पर और ज़्यादा अलग-थलग पड़ते हैं ? मुस्लिम मज़हबी नेतृत्व का एक हिस्सा सत्ता से टकराने के बजाय उसके क़रीब बने रहने में अपना फ़ायदा देखता है। लेकिन सत्ता से नज़दीकी और समुदाय के हितों की रक्षा हमेशा एक ही बात नहीं होती। सत्ता के क़रीब रहने से किसी संस्था या उसके पदाधिकारियों को सुविधा मिल सकती है, मगर आम लोगों की दिक्कतें जस की तस रहती हैं।

मुस्लिम मज़हबी नेतृत्व के एक हिस्से की दिक्कत सिर्फ़ यह नहीं है कि वह मुसलमानों को सियासी आंदोलनों से दूर रहने की सलाह देता है। इससे भी बड़ी दिक्कत यह है कि कई बार वह मुसलमानों के बुनियादी सियासी सवालों को अपने रवैये और बयानों के ज़रिए मज़हबी सवालों में तब्दील कर देता है। इस प्रक्रिया में ऐसा सियासी नैरेटिव तैयार होता है जिसका फ़ायदा सीधे या परोक्ष रूप से संघ और हिंदुत्व की सियासत को मिलता है। संघ की सियासत लंबे वक़्त से मुसलमानों को ऐसे समुदाय के तौर पर पेश करती रही है जो मज़हब के प्रति अत्यधिक कट्टर है, अपनी मज़हबी पहचान से बाहर निकलकर देश और समाज के साझा सवालों पर सोचने में असमर्थ है और जिसके लिए मज़हब, राष्ट्र और नागरिकता से ऊपर है। जब मुस्लिम मज़हबी नेतृत्व सियासी सवालों को भी मज़हबी बहस में बदल देता है, तो वह अनजाने में ही इस नैरेटिव को सही साबित करने का सामान उपलब्ध करा देता है। वंदे मातरम का विवाद इसकी एक बड़ी मिसाल है। यह बुनियादी तौर पर मुसलमानों की मज़हबी आस्था का मामला है ही नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्रवाद, इतिहास की समझ और एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के प्रतीकों का सियासी सवाल है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने आनंदमठ नाम का उपन्यास लिखा, जिसमें अठारहवीं सदी के तारीखी हालात को अपनी सियासी और सांस्कृतिक कल्पना के मुताबिक़ पेश किया गया। इस उपन्यास में मुस्लिम शासकों और मुसलमानों को जिस तरह चित्रित किया गया है, उसमें उनके प्रति गहरी शत्रुता दिखाई देती है। कुछ प्रसंगों में मुसलमानों के घरों और मस्जिदों को नष्ट करने तक को एक तरह की मुक्ति की कार्रवाई के तौर पर पेश किया गया है।

यह कोई मामूली साहित्यिक विवाद नहीं है। यह उस तारीखी नैरेटिव का सवाल है जिसमें मुसलमानों को इस देश की साझा संस्कृति और तारीख़ का हिस्सा मानने के बजाय एक बाहरी, दुश्मन और पराजित किए जाने योग्य समुदाय के तौर पर दिखाया जाता है। मुसलमानों का कोई धड़ा अगर इस गीत को राष्ट्रीय प्रतीक के तौर पर क़ुबूल किए जाने पर आपत्ति करता है, तो उसकी आपत्ति को सिर्फ़ इस्लामी आस्था के चश्मे से क्यों देखा जाए ? यह सवाल क्यों नहीं उठाया जाता कि मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत और तारीखी ग़लतबयानी से भरे एक उपन्यास से जुड़े गीत को हिंदुस्तान के राष्ट्रीय आंदोलन और राष्ट्र की साझा पहचान का प्रतीक किस आधार पर बनाया जा सकता है? क्या किसी भी धर्मनिरपेक्ष शहरी को ऐसे साहित्यिक और सियासी संदर्भ पर सवाल नहीं उठाना चाहिए ? लेकिन इस मामले में मुस्लिम मज़हबी नेतृत्व के एक हिस्से ने पूरे सियासी सवाल को एक मज़हबी दलील में समेट दिया। कहा गया कि इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी की वंदना की इजाज़त नहीं है और चूँकि वंदे मातरम में मातृभूमि की वंदना की बात है, इसलिए मुसलमान इसे नहीं गा सकते। अब सवाल यह है कि आनंदमठ में मुसलमानों के प्रति मौजूद दुश्मनी, उसके भीतर गढ़ी गई झूठी तारीख़ और उसके सियासी विचार का सवाल कहाँ गया ? एक ऐसे उपन्यास से जुड़े गीत को राष्ट्रीय प्रतीक बनाने पर आपत्ति का जो बड़ा सियासी और धर्मनिरपेक्ष आधार हो सकता था, उसे मज़हबी आस्था के एक छोटे दायरे में क्यों समेट दिया गया ?

इस तरह एक साझा राष्ट्रीय और सियासी सवाल को मुसलमानों का निजी मज़हबी मामला बना दिया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि संघ और हिंदुत्व की सियासत को यह कहने का एक और मौक़ा मिल गया कि मुसलमान देश के राष्ट्रीय प्रतीकों को क़ुबूल नहीं करते, वे हर चीज़ को अपने मज़हब की कसौटी पर देखते हैं और उनके लिए देश से पहले मज़हब है। दूसरी तरफ़, जो सेक्युलर और उदारवादी हिंदू इस सवाल को साझा सियासी और तारीखी सवाल के तौर पर देख सकते थे, उनके सामने भी इसे मुसलमानों का अपना मज़हबी विवाद बनाकर पेश कर दिया गया। यह संघ की सियासत के लिए कितनी सुविधाजनक स्थिति है, इसे समझने के लिए बहुत गहरी सियासी समझ की ज़रूरत नहीं है।

एसआईआर का घोषित उद्देश्य मतदाता सूची का पुनरीक्षण है। लेकिन जब मतदाता सूची नए सिरे से तैयार की जाती है, दस्तावेज़ों और पुराने रिकॉर्ड के आधार पर पात्रता की जाँच होती है और बड़ी संख्या में लोग सूची से बाहर रह जाते हैं, तो यह प्रक्रिया उन समुदायों को असमान तौर पर प्रभावित कर सकती है जिनके पास दस्तावेज़ कम हैं या जिनकी ज़िंदगी प्रवास, ग़रीबी और प्रशासनिक उपेक्षा की वजह से पहले से अस्थिर है। सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 में एसआईआर की वैधता पर अपने फ़ैसले में यह स्पष्ट किया था कि मतदाता सूची से नाम हटना अपने आप किसी इंसान को गैर-नागरिक घोषित करना नहीं है। लेकिन उसी फ़ैसले में कुछ मामलों में नागरिकता पर सक्षम प्राधिकारी द्वारा फ़ैसले की प्रक्रिया का सवाल भी सामने आया। इसीलिए यह आशंका बनी हुई है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण और नागरिकता की जाँच के बीच ऐसा रास्ता बन सकता है जिसके असर सामान्य चुनावी प्रक्रिया से कहीं आगे जाएँ।

सीएए-एनआरसी के ख़िलाफ़ हुए आंदोलन की याद इस संदर्भ में अहम है। उस आंदोलन ने देश भर में बड़ी तादाद में लोगों को एक साझा मंच पर ला खड़ा किया था। उसमें मुसलमानों के साथ छात्र, औरतें, दलित, वामपंथी, उदारवादी और दूसरे समुदायों के लोग भी शामिल हुए। उस आंदोलन ने यह सवाल उठाया था कि क्या मज़हब के आधार पर नागरिकता की नीति बनाना हिदुस्तानी संविधान की समानता और धर्मनिरपेक्षता की बुनियाद से मेल खाता है। आज एसआईआर को लेकर जो आशंकाएँ उठ रही हैं, वे उसी अनुभव की पृष्ठभूमि में समझी जा सकती हैं। अगर नागरिकता के सवाल को सीधे उठाने वाली सियासी परियोजना को व्यापक जनविरोध का सामना करना पड़ा, तो मतदाता सूची के पुनरीक्षण जैसी प्रशासनिक प्रक्रिया के ज़रिए नागरिकों की पात्रता और दस्तावेज़ों पर नए सिरे से ज़ोर देना दूरगामी असर वाला रास्ता बन सकता है। लोकतंत्र में ऐसी आशंकाओं पर सवाल उठाना और उनके संभावित असर की जाँच माँगना नागरिकों का अधिकार है।

यहाँ एक और विरोधाभास दिखाई देता है। मज़हबी नेतृत्व का एक हिस्सा मुसलमानों को मज़हब के नाम पर एकजुट होने की नसीहत देता है, लेकिन जब उसी समुदाय के आम लोगों के घरों पर बुलडोज़र चलता है, उन्हें भीड़ के आतंक का सामना करना पड़ता है या पुलिसिया कार्रवाई में उनके अधिकार कुचले जाते हैं, तब उनकी लड़ाई को अक्सर किसी बड़े सियासी सवाल में बदलने की कोशिश नहीं दिखती। तब यह सवाल नहीं उठाया जाता कि राज्य की जवाबदेही क्या है, कानून सबके लिए बराबर क्यों नहीं है और मुसलमानों के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा को रोकने के लिए किस तरह का सियासी और समाजी प्रतिरोध खड़ा किया जा रहा है।

इस तरह मज़हब के नाम पर समुदाय की नुमाइंदगी का दावा तो बना रहता है, लेकिन समुदाय के सबसे कमज़ोर लोगों की वास्तविक सुरक्षा और अधिकारों का सवाल पीछे छूट जाता है। यह जाँच का विषय है कि मज़हबी नेतृत्व के इस हिस्से और संघ की सियासत के बीच किस तरह के रिश्ते और सियासी समानताएँ काम करती हैं। यह ज़रूरी नहीं कि दोनों के बीच कोई प्रत्यक्ष संगठनात्मक समझौता या सीधा संपर्क हो, कई बार सियासी हितों का मेल बयानों और कार्रवाइयों के असर में दिखाई देता है। जब एक तरफ़ संघ मुसलमानों को मज़हब में उलझा हुआ, कट्टर और राष्ट्र से अलग समुदाय के तौर पर पेश करता है और दूसरी तरफ़ मुस्लिम मज़हबी नेतृत्व का एक हिस्सा हर सियासी सवाल को मज़हबी बहस में बदल देता है, तो दोनों की सियासत का नतीजा एक-दूसरे को सहारा देने वाला होता है। इसी तरह जब हिंदुत्व की सत्ता आम मुसलमानों को निशाना बनाती है और ये मज़हबी नेतृत्व उन्हें सत्ता से टकराने के बजाय पीछे हटने की सलाह देता है, तो इसका सियासी फायदा किसे मिलता है, यह सवाल अपने आप सामने आता है।

लेकिन इस पूरे प्रसंग में सवाल सिर्फ़ मुस्लिम मज़हबी नेतृत्व से नहीं पूछा जाना चाहिए। हमारे बहुसंख्यक हिंदू समाज के उस सेक्युलर तबके को भी आत्मालोचना करनी चाहिए, जो खुद को हिंदुत्व की सियासत का विरोधी मानता है। अक्सर यह देखने में आता है कि मुसलमानों के बीच से उठने वाली उन्हीं आवाज़ों को सेक्युलर मीडिया और सार्वजनिक विमर्श में ज़्यादा जगह मिलती है, जो किसी न किसी तौर पर भाजपा और आरएसएस के सियासी नैरेटिव को मज़बूत करती हैं। चाहे मुसलमानो के सियासी सवाल को मज़हबी सवाल में बदल कर या मुसलमानो की सभी सियासी दिक्कतों की वजह उनकी मज़हबी आस्था में ढूढकर। कोई मुस्लिम मज़हबी रहनुमा मुसलमानों को सियासी आंदोलनों से दूर रहने की सलाह देता है, सत्ता के ख़िलाफ़ आवाज़ न उठाने की नसीहत देता है या किसी विरोध प्रदर्शन में शामिल न होने की अपील करता है, तो उसके बयान को प्रमुखता से प्रसारित किया जाता है। कई बार उसे इस तरह पेश किया जाता है, जैसे वह पूरे मुस्लिम समाज या कम से कम मुस्लिम मज़हबी तबके की प्रतिनिधि आवाज़ हो। जबकि मुस्लिम समाज के भीतर सियासी और समाजी नज़रियों की कहीं ज़्यादा विविधता मौजूद है।

एसआईआर और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ चल रहे विरोध को लेकर मुस्लिम समाज के भीतर से कितनी तरह की आवाज़ें सामने आई हैं। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के मौलाना महमूद मदनी ने बिहार में एसआईआर की प्रक्रिया, दस्तावेज़ों की अनिवार्यता और मताधिकार से वंचित किए जाने के ख़तरे पर सवाल उठाए। जमात-ए-इस्लामी हिंद ने एसआईआर वापस लेने और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की माँग की। केरल में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग की पहल पर कई मुस्लिम सियासी और मज़हबी संगठनों ने साझा बैठक करके यही माँगें उठाईं। एआईएमआईएम के अकबरुद्दीन ओवैसी ने विधानसभा में एसआईआर की प्रक्रिया पर सवाल किए, जबकि असदुद्दीन ओवैसी ने फॉर्म-7 के कथित दुरुपयोग और मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाए जाने के ख़तरे को सामने रखा। एसडीपीआई ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की माँग को लेकर प्रदर्शन किया। मुस्लिम स्टूडेंट्स फेडरेशन और फ्रेटरनिटी मूवमेंट जैसे छात्र संगठनों ने भी जंतर-मंतर के विरोध प्रदर्शन में शामिल होने की घोषणा की।

यह सक्रियता सिर्फ़ सियासी दलों और मज़हबी संगठनों तक सीमित नहीं है। मुस्लिम समाज के भीतर काम करने वाले स्वतंत्र मीडिया संस्थानों और पत्रकारों ने भी एसआईआर और ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ चल रहे विरोध को लगातार जगह दी है। मिल्लत टाइम्स ने एसआईआर के ख़िलाफ़ देशभर में हो रहे प्रदर्शनों, जंतर-मंतर पर छात्र संगठनों की भागीदारी और मतदाता सूची से नाम हटाए जाने से जुड़ी ख़बरों को प्रकाशित किया। इसके संपादक शम्स तबरेज़ क़ासमी और उनकी टीम ने इन घटनाओं को अपनी रिपोर्टिंग का हिस्सा बनाया। इसी तरह मकतूब मीडिया ने मुस्लिम स्टूडेंट्स फेडरेशन और फ्रेटरनिटी मूवमेंट के 10 अक्टूबर के जंतर-मंतर प्रदर्शन में शामिल होने की घोषणा की, उनकी माँगों और मताधिकार से जुड़े सवालों को विस्तार से प्रकाशित किया। क्लेरियन इंडिया ने जंतर-मंतर के प्रदर्शन में शामिल मुस्लिम महिलाओं की भागीदारी और विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस कार्रवाई को रिपोर्ट किया। यानी मुस्लिम मुद्दों पर काम करने वाली स्वतंत्र पत्रकारिता में भी एसआईआर, मतदाता अधिकार और लोकतांत्रिक विरोध के सवाल लगातार उठाए जा रहे हैं।

पसमांदा समाज के संगठन ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ का उदाहरण भी सामने है। संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष अली अनवर अंसारी ने सितंबर 2026 में एसआईआर, परिसीमन और मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने के सवाल को उठाया। उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात में मुस्लिम समाज के सामने इन मुद्दों पर गंभीरता से विचार करना ज़रूरी है। ये उदाहरण बताते हैं कि पसमांदा समाज के संगठन और उसके नेतृत्व के बीच भी एसआईआर से जुड़े अलग-अलग पहलुओं पर सार्वजनिक बातचीत और सक्रियता मौजूद है। इन संगठनों और लोगों के सियासी नज़रियों और तरीक़ों में अंतर हो सकता है। कोई एसआईआर की प्रक्रिया का विरोध कर रहा है, कोई उसके संभावित असर को लेकर लोगों को जागरूक कर रहा है, कोई मतदाता सूची में नाम बचाने के लिए सहायता शिविर लगा रहा है और कोई इसके ख़िलाफ़ चल रहे आंदोलन में शामिल है। यहाँ सवाल यह तय करना नहीं है कि इनमें से कौन सही है और कौन ग़लत। ये उदाहरण सिर्फ़ यह दिखाने के लिए हैं कि मुस्लिम समाज के भीतर एसआईआर और मताधिकार को लेकर कितनी व्यापक और विविध सक्रियता मौजूद है। इसके बरक्स ऑल इंडिया इमाम ऑर्गनाइज़ेशन के प्रमुख उमर अहमद इलियासी का बयान देखिए। उन्होंने इमामों और मुसलमानों से जंतर-मंतर के प्रदर्शन में शामिल न होने की अपील की। उनके इस बयान को जिस तरह प्रमुखता मिली, उसकी तुलना में एसआईआर को लेकर सक्रिय मुस्लिम संगठनों, पत्रकारों और छात्र संगठनों की आवाज़ों को बहुत कम जगह मिली।

सवाल यह है कि इलियासी के बयान को पूरे मुस्लिम समाज की राय की तरह पेश करने की इतनी जल्दी क्यों है? जब समाज के भीतर से ही इतने सारे संगठन और लोग अलग-अलग तरीक़ों से इन सवालों को उठा रहे हैं, तब उनकी आवाज़ों को सार्वजनिक विमर्श में वह जगह क्यों नहीं मिलती ? यह दिक्कत आज की नहीं है। जब मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग दो-राष्ट्र सिद्धांत के आधार पर पाकिस्तान की माँग कर रही थी, उस वक़्त भी हिंदुस्तानी मुसलमानों का बड़ा हिस्सा इस सियासत का विरोध कर रहा था। 1940 में अल्लाबख्श सुमरो की पहल पर दिल्ली में आज़ाद मुस्लिम कॉन्फ़्रेंस आयोजित हुई, जिसमें देश के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में मुसलमान शामिल हुए। इस सम्मेलन ने स्पष्ट किया कि मुस्लिम लीग और जिन्ना को पूरे हिंदुस्तानी मुस्लिम समाज का इकलौता प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता। जमीयत उलेमा-ए-हिंद, मज़लिस-ए-अहरार और दूसरे संगठनों के अलावा मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसी बड़ी सियासी आवाज़ भी साझा हिंदुस्तानी राष्ट्रवाद की पैरवी कर रही थी। इन संगठनों और नेताओं की आम मुसलमानों के बीच गहरी पैठ थी और वे पाकिस्तान की माँग और दो-राष्ट्र सिद्धांत का विरोध कर रहे थे। इसके बावजूद उस दौर में हिंदुस्तानी सियासत और बहुसंख्यक हिंदू समाज के एक हिस्से ने जिन्ना और मुस्लिम लीग को ही मुसलमानों की सबसे महत्त्वपूर्ण, बल्कि कई बार इकलौती प्रतिनिधि आवाज़ मानने की गलती की। अंग्रेज़ी हुकूमत की नीतियों ने मुस्लिम लीग को मुसलमानों के प्रतिनिधि संगठन के तौर पर स्थापित करने की कोशिशों से ये धारणा मज़बूत हुई। नतीजा यह हुआ कि मुस्लिम लीग के विरोध में खड़े मुसलमानों की सियासी हैसियत और उनके जनाधार को वह जगह नहीं मिली, जिसके वे हक़दार थे।

तारीख़ का यह वाक़ीया बताता है कि किसी समुदाय की प्रतिनिधि आवाज़ तय करने का अधिकार उसके भीतर मौजूद विविध सियासी और समाजी धाराओं को नज़रअंदाज़ करके किसी एक संगठन या नेता को नहीं दिया जा सकता। आज बदले हुए तौर पर यही गलती दोहराई जा रही है। फ़र्क़ इतना है कि उस दौर में जिन्ना और मुस्लिम लीग को मुसलमानों का प्रतिनिधि बनाकर पेश किया जा रहा था, आज भाजपा और आरएसएस के सियासी नैरेटिव के अनुकूल बोलने वाले कुछ मुस्लिम चेहरों को असंगत तौर से महत्त्व दिया जा रहा है। और उन तमाम आवाज़ों को क्यों नज़रअंदाज़ किया जाता है, जो मुस्लिम समाज के भीतर से लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और संवैधानिक अधिकारों के पक्ष में खड़ी हैं ? गोदी मीडिया ऐसा क्यों करती है समझ में आता है लेकिन विडंबना यह है कि हिंदुत्व की सियासत का विरोध करने वाला सेक्युलर हिंदू समाज भी कई बार इसी चयनात्मक प्रतिनिधित्व को आगे बढ़ाता है। उसे मुसलमानों के बीच से आने वाली वह आवाज़ जल्दी सुनाई देती है, जो आंदोलन से दूर रहने की सलाह देती है, लेकिन व्यापक सियासी, समाजी और पत्रकारिता की सक्रियता दिखाई नहीं देती, जो सत्ता से सवाल कर रही है। इस तरह चंद लोगों के बयान पूरे समुदाय की सोच के तौर पर प्रचारित होते हैं और बहुसंख्यक मुस्लिम समाज की लोकतांत्रिक भागीदारी सार्वजनिक विमर्श से गायब हो जाती है।

यह सिर्फ़ मीडिया की चूक नहीं, मुसलमानों को देखने और समझने के उस नज़रिये की दिक्कत है, जिसमें पूरे समुदाय को कुछ सुविधाजनक चेहरों और बयानों के ज़रिए समझने की कोशिश की जाती है। इसलिए आत्मालोचना की ज़रूरत सिर्फ़ इन  स्वयंभू मुस्लिम रहनुमाओं को नहीं, हमारे सेक्युलर हिंदू समाज को भी है। उसे अपने आप से पूछना चाहिए कि वह बार-बार उन्हीं मुस्लिम चेहरों को इतनी अहमियत क्यों देता है, जिनकी बातें भाजपा और आरएसएस के नैरेटिव को मज़बूत करती हैं? क्या मुसलमानों को समझने के उसके अपने नज़रिये में भी कहीं वही पूर्वाग्रह मौजूद है, जिसके तहत कुछ सुविधाजनक चेहरों को पूरे समुदाय का प्रतिनिधि मान लिया जाता है ? किसी समुदाय की सियासी चेतना को उसके सबसे अधिक प्रचारित प्रतिनिधियों से नहीं, बल्कि उसके भीतर मौजूद विविध आवाज़ों, संगठनों और संघर्षों से समझा जाना चाहिए। एसआईआर के ख़िलाफ़ और मताधिकार की रक्षा के लिए उठ रही आवाज़ें इसका ताज़ा उदाहरण हैं। उन्हें सुनने और जगह देने के बजाय अगर हमारा सेक्युलर समाज भी उन्हीं चंद बयानों पर केंद्रित रहता है, जो सत्ता के सियासी नैरेटिव को सहूलियत पहुँचाते हैं, तो उसे अपनी इस चयनात्मक दृष्टि पर गंभीरता से विचार करना होगा।

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