उन्नीस दिनों को दूसरा लाॅक डाउन

जनमत

14 अप्रैल को सुबह 10 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में कोरोना से ‘बहुत मजबूती के साथ’ ‘भारत की लड़ाई’ के आगे बढ़ने की बात कही। देशवासियों की उन्होंने प्रशंसा की कि उसने ‘कष्ट सहकर भी अपने देश को, भारतवर्ष को बचाया है’। उनकी भाषा में सहज रूप से उनका ‘राष्ट्रवाद’ झलक रहा था। महामारी को उन्होंने युद्ध और लड़ाई से जोड़ डाला। महामारी लोगों को मारती है, वह सरहद पर नहीं लड़ती।

प्रधानमंत्री के संबोधन में उद्गार अधिक था। 14 अप्रैल बाबा साहब अंबेडकर की जन्म तिथि है। उन्होंने अंबेडकर को नमन किया और संविधान की प्रस्तावना के ‘द पीपल ऑफ इंडिया’ का स्मरण किया। देश में 21 दिन से लाॅक डाउन लगा था और अंतिम दिन 3 मई तक लॉक डाउन बढ़ाने की उन्होंने घोषणा की। कई राज्यों की सरकारें दो-चार दिन पहले लाॅक डाउन बढ़ाने की घोषणा कर चुकी थीं। मोदी अपनी घोषणा अंतिम समय में करते हैं। दो-तीन दिन पहले की जाने वाली घोषणा से जनता को सोचने विचारने का कुछ समय मिलता है, जो वे नहीं देते। इसका मानस पर एक भिन्न प्रभाव पड़ता है। साइको इफेक्ट।

14 अप्रैल कई राज्यों में नए वर्ष का आरंभिक दिवस है। तिथि चयन में मोदी अप्रतिम हैं। उन्होंने देशवासियों के ‘उत्तम स्वास्थ्य की मंगल कामना’ की। काम की बात बाद में कहीं। वह हमेशा उपदेशक की भूमिका में होते हैं। जनता को हिदायत देते हैं – ‘न खुद को लापरवाही करनी है, न किसी और को लापरवाही करने देना है’। उनकी भाषा का मनोसामाजिक अध्ययन नहीं किया गया है। ‘तेज फैसले न होते तो बुरे हालात होते ’ में आत्म प्रशंसा थी और ‘बाहर से आए लोगों को क्वारांटीन किया’ झूठ था। बाहर से आने वाले सभी लोगों की स्क्रीनिंग नहीं की गई थी। तबलीगी जमात की स्क्रीनिंग हुई होती तो उनके जरिए इतनी अधिक मात्रा में कोरोना नहीं फैलता।

अमेरिका में अक्टूबर 2019 में इस प्रकार की संभावित महामारी की बड़े पैमाने पर छद्म रूप पाए गए थे, पर अमेरिका ने कुछ नहीं किया। 31 दिसंबर 2019 को चीन ने विश्व स्वास्थ्य संगठन – डब्ल्यूएचओ – को प्रकल्पित बैक्टीरिया जनित निमोनिया के अज्ञात रोग लक्षण की सूचना दी थी और एक सप्ताह बाद चीनी वैज्ञानिकों ने जनवरी 2020 के आरंभ में इसकी कोरोना वायरस के रूप में पहचान की, इसका सिलसिला देखा और पूरी दुनिया को इसकी सूचना दी। कुछ देश तुरंत इस महामारी को रोकने की दिशा में सक्रिय हुए और अन्य देशों ने कुछ भी नहीं किया। वे लापरवाह बने रहे। भारत लापरवाह देशों में एक था। प्रधानमंत्री ने ढाई महीने बाद लॉक डाउन का निर्णय लिया और इसके पहले जिस तत्परता और सक्रियता से इसकी जांच आवश्यक थी, वह नहीं की गई। एक साधारण मास्क तक डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों के पास लंबे समय तक उपलब्ध नहीं था। प्रधानमंत्री ने 14 अप्रैल को अपने संबोधन में अनुशासन का पालन करने की बात कही। कोरोना नए क्षेत्रों में नहीं फैले इसके लिए जांच सर्वाधिक जरूरी है। भारत कम टेस्ट कर रहा है।

कोरोना वायरस की जांच के बारे में मोदी ने कुछ भी नहीं कहा। 23 मार्च को उन्होंने घर से बाहर न निकलने के लिए लक्ष्मण रेखा न लांघने की बात कही थी। इस बार उन्होंने ‘अग्नि परीक्षा’ की बात की। लक्ष्मण रेखा और अग्नि परीक्षा का संबंध सीता से है। दूरदर्शन पर ‘रामायण’ दिखाया जा रहा है। भाषा दूसरी भी हो सकती थी। प्रतीक भी भिन्न हो सकते थे पर मोदी की भाषा में धार्मिक पुट कम नहीं होते जो हमारे धार्मिक संस्कारों को मनोवैज्ञानिक रूप से और अधिक सुदृढ़ करते हैं। इन पंक्तियों के लेखक ने अपने पूर्व स्तंभ में जिस कोरोना साइकोलॉजी, कोरोना संस्कृति और कोरोना पॉलिटिक्स की बात कही थी उसे बीज रूप में ही सही यहां देखा जा सकता है।

प्रधानमंत्री ने एक ओर ‘त्याग और तपस्या’ की बात कही और दूसरी ओर नागरिक को ‘सैनिक’ बनाया। त्याग और तपस्या का संबंध हिंदू धर्म से है और नागरिक को सैनिक रूप में प्रस्तुत कर कोरोना से युद्ध की बात करने में प्रछन्न रूप से ‘राष्ट्रवाद’ है। उन्होंने कहीं से भी चिकित्सा की शब्दावली का प्रयोग नहीं किया। सारी अपेक्षाएं जनता से की। घर में रहने से ही सभी समस्याओं का हल नहीं होता। नागरिक को ‘अनुशासित सैनिक’ कहने के गहरे अभिप्राय हैं जिन्हें हमें समझना चाहिए।

लॉक डाउन का दूसरा दौर आरंभ हो चुका है। पहला लॉक डाउन 21 दिनों का था। दूसरा 19 दिन का है। कुल 40 दिनों का लॉक डाउन। आगे क्या होगा, हम आप नहीं जानते। कोरोना वायरस संक्रमण संबंधी जांच भी शत-प्रतिशत सही नहीं होती। 30 प्रतिशत तक जांच के गलत होने की संभावना है। फिलहाल मरीज के नाक के बहुत भीतरी हिस्से से लिए गए नमूने की जांच की जाती है। जांच के अन्य तरीके अभी उपलब्ध नहीं हैं। देश में केवल सिक्किम ही इससे अछूता है। कोरोना वायरस के संक्रमण की अधिकता देश के कुल 170 जिलों में है जिन्हें ‘हॉट स्पॉट’ के अंतर्गत रखा गया है। 207 जिलों में इस संक्रमण के मामले बहुत कम हैं।

लगभग ढाई महीने में कोरोना केस 2 से बढ़कर 12 हजार के करीब पहुंच चुका है। नए ‘हॉट स्पॉट’ को न बनने देने की चिंता स्वाभाविक है। इसे नए क्षेत्रों में फैलने न देने के लिए नागरिकों और सरकार दोनों को एक साथ पहल करनी होगी। प्रधानमंत्री के संबोधन में नागरिकों से संबंधित निर्देश ही अधिक थे। अनुशासन का पालन करना आवश्यक माना गया। प्रधानमंत्री ने हर कस्बे, हर थाने को बारीकी से परखे जाने की बात कही। यह संभव कैसे होगा? क्या केवल फिजिकल डिस्टेसिंग – सोशल डिस्टेसिंग उदारवादी अर्थव्यवस्था का पद है – से या सरकार भी इस दिशा में पहले की तुलना में अधिक सक्रिय होगी। देश में स्वास्थ संबंधी संसाधनों की बेहद कमी है। सरकार को युद्ध स्तर पर कार्य करना होगा। प्रधानमंत्री ने और अधिक कठोरता बढ़ाने की बात कही है।

आरंभ में सरकार सुषुप्त अवस्था में थी। समय पर स्क्रीनिंग नहीं हुई और बिना किसी प्लान के सरकार ने लॉक डाउन किया। प्रधानमंत्री ने सरकार के दायित्वों की कोई बात नहीं की। अपनी कार्य योजनाओं की सही जानकारी देकर लोगों को न चिंता मुक्त किया ना आश्वस्त। उन्होंने स्वास्थ्य कर्मियों के लिए आवश्यक चीजों की बात नहीं की। एक लाख बेड और देश भर में 600 से अधिक कोरोना संबंधी अस्पतालों की सूचना दी। यह कोई नहीं जानता कि उनकी जगह से वह अस्पताल कितनी दूर और कहां है जहां कोरोना का इलाज होता है। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में 7 बार हाथ जोड़े और सात बातें कहीं। बेशक उनकी बातें महत्वपूर्ण है पर ‘सप्तपदी’ शब्द प्रयोग सही नहीं है क्योंकि सप्तपदी विवाह की एक विधि है जिसमे अग्नि की सात बार परिक्रमा की जाती है। यह मात्र मोदी का शब्द-मोह है।

कोविद का एकमात्र इलाज जांच है जिसकी प्रतिदिन संख्या बहुत कम है। प्रधानमंत्री ने लोगों को बचने बचाने के स्थान पर देश को बचाने की बात कही। कोरोना संक्रमण से प्रभावित मनुष्य होता है। तबलीगी जमात को लेकर जो प्रचार-दुष्प्रचार हुआ, उसने कोरोना को एक सांप्रदायिक रूप-रंग देने की कम कोशिशें नहीं की। स्थिति ऐसी बनी कि मुसलमान सब्जी विक्रेता से कई स्थानों पर हिंदुओं ने सब्जी लेने से इनकार किया और उन्हें अपने मोहल्ले से ठेले ले जाने को कहा।

30 मार्च को कैबिनेट सचिव ने लॉक डाउन न बढ़ाने की बात कही थी। सारे निर्णय मोदी लेते है। दूसरे लाॅक डाउन से पहले उन्होंने राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बात की। पहले लाॅक डाउन के पहले ऐसा नहीं किया था। नागरिक ‘अनुशासित सैनिक’ क्यों बने? वह अनुशासित नागरिक क्यों नहीं बने? नागरिक को सैनिक के रूप में देखने से किसी को ‘सैनिक शासन’ का संदेह हो सकता है। कोरोना को लेकर राष्ट्र के नाम संबोधन में इस बार का 14 अप्रैल का संबोधन भाषिक दृष्टि से कहीं अधिक धार्मिक राष्ट्रवादी प्रतीकों से भरा था। अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने अगले दिन 15 तारीख को दिशा निर्देश देने की बात कही। इस दिशा निर्देश में किसानों और मजदूरों को राहत दी गई है। नौकरी से न निकाले जाने की उनकी बातों की कई क्षेत्रों में अनसुनी की गई है।

‘हॉट स्पॉट’ के नहीं बढ़़ने पर 20 अप्रैल से चिन्हित क्षेत्रों में सीमित छूट के प्रावधान की बात उन्होंने की। एक ओर प्रधानमंत्री का संबोधन और दूसरी ओर मुंबई, सूरत, अहमदाबाद आदि कई जगहों पर घर लौटने के लिए कामगार मजदूरों की भीड़। मुंबई के बांद्रा स्टेशन के परिसर में अपने-अपने घर जाने के लिए डेढ़ हजार मजदूरों के इकट्ठा होने के पीछे की बेबसी को सरकार ने कम समझा है। प्रधानमंत्री ने इनकी परेशानी नहीं देखी। लोगों को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया। प्रवासी मजदूरों ने सूरत में भी विरोध किया।

महाराष्ट्र में शिवसेना, राकांपा और कांग्रेस की सरकार है। गुजरात में भाजपा की सरकार है। सामान्य जनता, कामगार मजदूर सर्वत्र परेशान हैं। दिल्ली में ‘आप’ की सरकार है पर वहां सब को दो जून का भोजन नहीं मिलता। वितरण और आपूर्ति व्यवस्था पर, भोजन पर अब भी कहीं अधिक ध्यान देने की जरूरत है। प्रधानमंत्री ने ‘देश में दवा से राशन तक पर्याप्त भंडार’ होने की बात कही। केंद्र और राज्य सरकारों के बीच संकट की इस घड़ी में जितना अधिक तालमेल होने की जरूरत है उतनी नहीं है। लाॅक डाउन से कहीं अधिक जरूरी भोजन है। जिनके पास भोजन नहीं है उनके लिए लाॅक डाउन का कोई अर्थ नहीं है।

कोरोना का इलाज ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ के साथ पीपीई, वेंटिलेटर आदि है जिसकी जानकारी प्रधानमंत्री ने नहीं दी। यह समय लोगों को बचाने का है पर प्रधानमंत्री देश को भारत को बचाने की बात करते हैं। देश उसके नागरिकों से बनता है। वह मात्र भौगोलिक क्षेत्र नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप से जिस प्रकार तीखे सवाल पत्रकार करते है, उसकी भारत में कल्पना नहीं की जा सकती। प्रधानमंत्री से सवाल क्यों नहीं पूछे जाने चाहिए। यह सवाल क्यों नहीं किया जाना चाहिए कि संसद की नई इमारत बनाना क्यों जरूरी है ? देश में कितने करोलाइन सेन्टर है? पीपीई की उपलब्धता कितनी है? क्या प्रवासी मजदूरों को दोनों शाम खाना मिल रहा है? जिन्हें राशन नहीं मिल रहा है वह कहां शिकायत करें ?

झारखंड के दो भाजपा नेताओं – एक सांसद व एक विधायक ने निर्देशों का पालन न कर दिल्ली से धनबाद तक की सड़क यात्रा क्यों की? लॉक डाउन का पालन न करने वाले अपने नेताओं पर भाजपा क्या कार्रवाई करेगी? जिन चैनलों ने अपने प्रसारण में मुस्लिम-मस्जिद की बातें की, उन पर सरकार ने क्या कार्रवाई की? कपिल मिश्रा ने भी ऐसे कुछ सवाल किए, सरकार ने क्या किया? गृहमंत्री अमित शाह ने उद्धव ठाकरे से बांद्रा घटना को लेकर जैसी चिंता प्रकट की, बातें की उसी तरह सूरत को लेकर गुजरात के मुख्यमंत्री से क्यों बातें नहीं की ? अमदाबाद के अस्पताल में हिंदू और मुसलमान मरीजों को अलग-अलग रखने का निर्णय किसने लिया ? क्यों लिया? सरकार ने घर जाने वाले प्रवासी मजदूरों के लिए पहले से क्या व्यवस्था की ? सरकार के कर्तव्यों के बारे में नागरिक उससे सवाल करें या नहीं? कोरोना का आक्रमण लोकतंत्र पर नहीं है। लोकतंत्र की रक्षा जरूरी है। केवल नागरिक ही नहीं, सरकार भी त्याग और तपस्या करें।

लॉक डाउन का यह दूसरा दौर भी बीतेगा। इस बीच सरकार को अपने दायित्वों का अधिक निर्वहन करना होगा। केंद्र की सरकार हो या राज्य की सरकारें उन्हें अपनी प्राथमिकता पर कहीं अधिक सक्रिय और तत्पर होना होगा। सबकी अपनी अपनी भूमिका है। अपने को, दूसरों को बचाना है। सरकार अब तक अपनी जवाबदेही से उदासीन रहती थी, दूर रहती थी। करोना ने उन्हें चेतावनी दी है। डॉक्टरों नर्सों पर किए जा रहे हमले भर्त्सना योग्य है। इस समय चिकित्सक अपनी जान पर खेलकर लोगों की जान बचा रहे हैं। कोरोना की चेतावनी समझी जानी चाहिए। वह सेकुलर है। उसके यहां किसी प्रकार का भेदभाव नहीं है। वह सब पर आक्रमण करती है। यह कोरोना पाॅलिटिक्स का समय नहीं है। तीन दिन पहले हम सब ने जो सुना है, जो देखा है उसके बारे में सोचें। स्वयं जिम्मेदार बने और सरकार को उसकी जिम्मेदारी का अहसास कराएं। देश की राजधानी दिल्ली में हजारों हजार लोग भूख से बेचैन हैं। वे प्रतीक्षा नहीं कर सकते। वे सड़कों पर आयेंगे। पुलिस की लाठी नहीं, उन्हें भोजन चाहिए। केवल भोजन।

 

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