Wednesday, August 17, 2022
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मुझें मसीहाई में यक़ीन है ही नहीं, मैं मानता ही नहीं कि कोई मुझसे बड़ा होगा

ममता


मुझें मसीहाई में यक़ीन है ही नहीं,
मैं मानता ही नहीं कि कोई मुझसे बड़ा होगा,
जनकवि  रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ का जन्म 5 दिसम्बर 1957 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर ज़िले में अहिरी फिरोजपुर गांव में हुआ था, पिता का नाम – रामनारायण यादव और माता का नाम-करमा देवी है, ‘विद्रोही’ की पत्नी का नाम  श्रीमती शांति देवी, आजीवन लोगों के कवि घर से बाहर कविताएं सिर्फ़ इसलिए कर सके क्योंकि उनकी पत्नी ने उन्हें घर के हालातों से मुक्त रखा, श्रीमती शांति देवी ने उन रूढ़ियों का खंडन किया कि घर पति के बिना नही चल सकता, ‘विद्रोही’ की एक बेटी भी है जिसका नाम अमिता है और जिसे वो जेएनयू में पढ़ाना चाहते थे।
‘विद्रोही’ को शिक्षा की प्रेरणा शिक्षित पत्नी श्रीमती शांति देवी से मिली, 1980 में विद्रोही  जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में एम. ए हिंदी की पढ़ाई करने आये थे, 1983 में छात्र आंदोलन में उनकी सक्रियता के कारण 8 मई को उन्हें गिरफ़्तार कर तिहाड़ जेल भेज दिया गया था। आंदोलन में उनकी निरन्तर भागीदारी के कारण उन्हें प्रशासन के कोप का भाजन बनना पड़ा, जिसके परिणामस्वरूप ‘विद्रोही’ की शिक्षा अधूरी रह  गई और उन्हें जेएनयू से निष्कासित कर दिया गया, लेकिन फिर भी कवि 33 साल तक जेएनयू में रहे और अपने इन्कलाबी साथियों की हौसला अफजाई करते रहे।
अपनी कविताओं से, इन्ही संघर्षों के बीच जब जेएनयू के छात्र, यूजीसी द्वारा नॉननेट फेलोशिप को समाप्त कर देने वाली घोषणा का विरोध कर रहे थे, तब विद्रोही भी शिक्षा के बाजारीकरण के विरोध में उस जुलूस में शामिल हो गए जो जंतर मंतर जा रहा था, कविताएं विद्रोही के लिए बेजान शब्द नहीं थी । उनको पता था कि कविताएं सत्ता से लोहा लेती हैं, आंदोलन के बीच में अचानक से ‘विद्रोही’ को बेचैनी महसूस होने लगी । उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जहाँ शाम साढ़े चार बजे 8 दिसम्बर, 2015 को विद्रोही ने अंतिम साँसे लीं, अपनी कविताओं को हमें देकर वो हमें अलविदा कहे चुके थे, इस आंदोलन में शामिल सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर, अनिल सदगोपाल, योगेंद्र यादव और सभी छात्रों ने  कवि को भावपूर्ण श्रद्धाजंलि दी, अपने साथी के जाने के ग़म में ये जुलूस बढ़ता रहा । उन्हें पता है विद्रोही की कविता कारवाँ रुकने नहीं देगी ।
विद्रोही को साहित्य जगत में स्थान नहीं मिला, लेकिन लोगों के कवि विद्रोही और उनकी कविता लोगों को कंठस्थ हो गई, जिसे बाद में अंग्रेजी मीडिया, इंडियन एक्सप्रेस, इंडिया टुडे औऱ स्क्रॉल ने संघर्षरत ‘विद्रोही’ के जीवन और कविता को प्रमुखता देकर उन पर आलेख लिखे, नितिन पमनानी और इमरान द्वारा निर्देशित फ़िल्म जिसका शीर्षक है ‘मैं तुम्हारा कवि हूँ ‘ विद्रोही पर ही केंद्रित है, आज भी कोई भी आंदोलन विद्रोही की कविताओं से अछूता नहीं है। विद्रोही की सभी कविताओं के संग्रह का ‘नयी खेती ‘शीषर्क से संपादन बृजेश यादव ने किया है, जिसमें सह-संपादन की भूमिका अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी और मृत्युंजय ने निभाई है, आज भी इस किताब को ढूंढकर पढ़ते हैं पाठक, जिसमें कविताएं जीवित होकर बोलती हैं !
‘विद्रोही’ को पता है देश किसी की जागीर नहीं है, किसान- मजदूर, आम आदमी, और कवि कोई कुत्ता बिलार नहीं है जिन्हें देश के पूँजीपति, कॉरपोरेट कम्पनी के लोग हाँके , जहाँ रघुवीर सहाय के कविताओं के पात्र भीड़ में तब्दील हो गए हैं, शक्तिहीन हो गए हहैं, जहाँ रामदास कविता में रामदास को यक़ीन है कि उसको मार दिया जाएगा, वहीं विद्रोही की कविता  जिसका शीर्षक है ‘जन-गण-मन’, में विद्रोही आम इंसान के संघर्ष को उच्च श्रृंखला की चोटी पर देखते हैं, जहाँ अन्य कवि न देख सके, सब ने त्रास, भय, पीड़ा, सामाजिक राजनीतिक चक्र-व्यूं में फँसे आम इंसान की निष्क्रियता को दर्शाया, वहीं तगड़े कवि विद्रोही कहते हैं-
हाँ मैं भी मरूँगा
और भारत भाग्य विधाता भी मरेगा
मरना तो जन-गण-मन अभिनायक को भी पड़ेगा
लेकिन पहले जन-गण-मन अधिनायक मरे
फिर भारत-भाग्य विधाता मरे
फिर साधू के काका मरें
यानी कि सारे बड़े -बड़े लोग पहले मर लें
फिर मैं मरूँगा-आराम से, उधर चलकर  बसंत ऋतु में
जब दानों में दूध और आमों में बौर आ जाता है
या फिर तब जब महुवा चूने लगता है
या फिर तब जब वनबेला फूलती है
नदी किनारे मेरी चिता दहक कर महके
और मित्र सब करें दिल्लगी
कि ये विद्रोही भी क्या तगड़ा कवि था
कि सारे बड़े-बड़े लोगों को मारकर तब मरा
यदि विद्रोही की कविता को सौंदर्य बोध और भाषा की दृष्टि से देखें तो ग्रमीण जीवन की अनुभूति होती है, महुवा शब्द, दानों में दूध और आमों में बौर, ये शब्द ग्रमीण जीवन के सुखभोग को दर्शाती है जिससे शहरी जीवन कटता जा रहा है, इस ग्लोबल, वैश्विक- संस्कृति ने हमारे जीवन पर हाईक्लास दिखने का मुलम्मा चढ़ा दिया है, वहीं कवि विकास की धुरी सहज जीवन में प्रतिष्ठित करते हैं, विद्रोही की कविताओं के स्वर हारने वालों में से नहीं हैं । उनकी कविताओं का नायक झुकने वाला नहीं है, वो लड़ेगा।
विद्रोही सतही कवि नहीं है, माओ की तरह वो विचारों की तलहटी में जाते हैं, तहकीकात करते हैं उन समस्याओ की जहाँ समय रहते सबूतों को मिटा दिया गया है, वो इतिहासकारों पर विश्वास नहीं करते, वो पितृसत्ता, ब्राह्मण वाद, उस हर सत्ता का खोल हटाते हैं जहाँ मखमली लिबास से सत्य को छुपा दिया गया था ! भविष्य में उसे बदलने की क्षमता भी रखते हैं, विद्रोही की कविता-‘औरत’ की इन पंक्तियों को देखें—
इतिहास में वह पहली औरत कौन थी जिसे सबसे पहले जलाया गया?
मैं नहीं जानता
लेकिन जो भी रही हो मेरी माँ रही होगी,
मेरी चिंता यह है कि भविष्य में वह आख़िरी स्त्री कौन होगी,
जिसे सबसे अंत में जलाया जाएगा?
मैं नहीं जानता
लेकिन जो भी होगी मेरी बेटी होगी
औऱ यह मैं नहीं होने दूँगा’
‘विद्रोही’ स्वयं को जनता का कवि मानते थे। वे घोषणा करते हैं – मैं तुम्हारा कवि हूँ । उन्हें किसी बड़े संस्थान या अकादमी द्वारा पुरस्कार पाने की चाह भी नहीं थी, वो कविताओं को लिपिबद्ध करने के स्थान पर कविताओं को कहने में संतुष्टि पाते थे, आज भी उनकी कविताओं को जिंदा रखा है संघर्षरत जनता ने, जिस तरह दुष्यंत कुमार, पाशा, अदम गोंडवी, फ़ैज अहमद फ़ैज, गोरख पांडेय, आज भी इनकी कविताएं सत्ता को पिघलाने का दम
रखती हैं। विद्रोही कविकर्म की सार्थकता को समझते हैं और कपोलकल्पना से दूर इस समाज को बचाने की चाह भी रखते हैं, यथार्थ उनको डराता नहीं है और सहयोग उनके केंद्र में है, जहाँ लोग एक दूसरे को बचाकर ही दुनिया बचा सकते हैं जैसे विद्रोही कहते हैं-
तुम वे सारे लोग मिलकर मुझे बचाओ
जिसके खून के गारे से पिरामिड बनें,
मीनारें बनीं, दीवारें बनीं,
क्योंकि मुझे बचाना उस औरत को बचाना है,
जिसकी लाश
मोहनजोदड़ो के तालाब की आख़िरी सीढ़ी पर पड़ी है।
मुझको बचाना उन इंसानों को बचाना है,
जिनकी हड्डियाँ तालाब में बिखरी पड़ी हैं।
मुझको बचाना अपने पुरखों को बचाना है,
मुझको बचाना अपने बच्चों को बचाना है,
तुम मुझे बचाओ!
मैं तुम्हारा कवि हूँ !
कवि को किसी के दल का कहना उचित नहीं होगा, उनके केंद्र में हमेशा ही मनुष्य रहता है, विद्रोही वामपंथ में मानव को मानव समझने की शक्ति को जानते थे, इसलिए वो गरीब छात्रों और जनता के लिए लड़ते रहे, आंदोलन करते रहे, उनकी कविताओं में नायक आम इंसान, कवि, फ़िदेल कास्त्रो, चेग्वेरा, गोरख पांडये रहे हैं और भारत में फासिस्ट सरकार का सामना करने के लिए आत्मनिर्भरता को केंद्र में रखते हुए वेनेजुएला, क्यूबा, का उदाहरण देते हैं, ये विद्रोही का अपना अनुभव था!
विद्रोही ने नयी खेती, नानी, देश मेरे, दो बाघों की कथा, पुरखे, नयी दुनिया, सवाल आदमी तथा लम्बी कविता-दंगो के व्यापारी, चूहे के पक्ष में बयान, कवि इत्यादि कविताएं लिखी हैं, और अवधी कविता भी! यदि कवि को सम्पूर्ण पक्ष में जाना है तो इन कविताओं को पढ़ना आवश्यक है !
विद्रोही अंतराष्ट्रीय स्तर पर मानवता को देखते हैं और उनके केन्द्र में क्रांति वो आख़िरी रास्ता है जब हमें जनविरोधी और फासिस्ट सरकार से लोहा लेना होगा।
 विद्रोही की प्रसिद्ध पक्तियां जो आज हर किसी के मुँह पर है, जिसे बोलने से पहले इंसान अपने जहन में देखता है और एक नये किस्म के स्त्री पुरूष के रिश्ते को जन्म देता है-
मैं तुम्हें इसलिए प्यार नहीं करता
कि तुम बहुत सुंदर हो
औऱ मुझे बहुत अच्छी लगती हो,
मैं तुम्हें इसलिए प्यार करता हूँ
कि जब मैं तुम्हें देखता हूँ तो लगता है
क्रांति होगी ।
(यह लेख दिल्ली विश्वविद्यालय से एम. ए. कर रही छात्रा ममता ने लिखा है। ममता छात्र आंदोलन से भी गहरा जुड़ाव रखती हैं।)
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