समकालीन जनमत
स्मृति

सलाम चितरंजन भाई ! आप ने दमन, अत्याचार के खिलाफ संघर्ष की जो लौ लगाई, वह कभी नहीं बुझेगी

मैं जब गोरखपुर विश्वविद्यालय में स्नातक की पढ़ाई कर रहा था, तभी पत्रकारिता की तरफ झुकाव शुरू हुआ. वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन शाही (अब सूचना आयुक्त, उत्तर प्रदेश ) से मुलाकात के बाद पत्रकार बनने की चाहत और जोर मारने लगी. यह 1991-92 की बात है. उस समय राष्ट्रीय सहारा का गोरखपुर के सिनेमा रोड पर  ब्यूरो आफिस था. वहां आना-जाना शुरू हो गया. एकाध बार प्रेस रिलीज बनाने को कहा गया तो बना दिया.

एक दिन शहर में मशहूर आलोचक नामवर सिंह आए. अचानक मुझसे कहा गया कि आपकी साहित्य में रूचि है. उनका कार्यक्रम कवर कर लीजिए. पूर्वोत्तर रेलवे के आफिसर्स क्लब में लेखक-पाठक संवाद कार्यक्रम था. पहला मौका था कि किसी कार्यक्रम की रिपोर्टिंग का. काफी दबाव महसूस कर रहा था. रिपोर्ट छपी और प्रशंसा भी हुई. इसी के साथ गोरखपुर में शहर में पत्रकारिता में मेरा जीवन शुरू हुआ.

एक दिन राष्ट्रीय सहारा के आफिस में बैठा हुआ था कि चितरंजन सिंह आए. मैं नाम से उनको जानता था लेकिन कभी देखा नहीं था. तब चितरंजन सिंह के भाई मनोरंजन सिंह भी राष्ट्रीय सहारा में काम करते थे. चितरंजन सिंह ज्योंही सहारा भवन की तीसरी मंजिल पर स्थित राष्ट्रीय सहारा के ब्यूरो आफिस में आए, कनिष्ठ-वरिष्ठ पत्रकार अपनी सीट पर भैया-भैया कहते हुए खड़े हो गए और उनका अभिवादन करने लगे. यह देख मै चकित था कि आगंतुक शख्स आखिर कौन हैं जिनका इतना सम्मान हो रहा है. बाद में पता चला कि चितरंजन भाई हैं. वहीं मेरा भी उनसे परिचय कराया गया. चितरंजन भाई काफी देर तक दफ्तर  में बैठे रहे। उस वक्त अखबारों के दफ्तरों में राजनेताओं, साहित्यकारों से लेकर हर तरह के लोग आते थे और खूब बहस-मुबाहिसे भी हुआ करती थीं.

मनोरंजन सिंह बाद में लखनऊ चले गए लेकिन चितरंजन सिंह का गोरखपुर आना-जाना लगातार बना रहा. करीब तीन-चार वर्ष तक उनसे ज्यादा घनिष्ठता तो नहीं हो पायी लेकिन जब भी आते तो जरूर हालचाल पूछते.

वर्ष 1996 में लखनऊ से ‘हिन्दुस्तान’ का प्रकाशन शुरू हुआ. गोरखपुर में ब्यूरो कार्यालय बना. मैं ‘ सहारा ‘ से ‘ हिन्दुस्तान ‘ में चला आया. यहीं पर अशोक चौधरी ने भी अपने पत्रकारिता जीवन की शुरूआत की. चितरंजन भाई, अशोक चौधरी से पहले से परिचित थे. ब्यूरो प्रमुख हर्षवर्धन शाही से उनकी काफी घनिष्ठता थी. इसलिए चितरंजन भाई जब भी गोरखपुर आते तो ‘ हिन्दुस्तान ‘ के ब्यूरो आफिस जरूर आते. घंटों देश-दुनिया, गांव-समाज की बात होती. मेरा उस समय तक अखबार के बाहर साहित्य, राजनीति की दुनिया से परिचय शुरू ही हो रहा था. अशोक चौधरी के साथ कार्य करने के बाद यह प्रक्रिया तेज हो रही थी.

यही दौर था जब गोरखपुर की राजनीति एक बड़ा करवट ले रही थी. गोरखपुर में लम्बे समय तक चलने वाले गैंगवार की दुनिया में श्रीप्रकाश शुक्ला का उभार हुआ था और उसने स्थापित बाहुबलियों हरिशंकर तिवारी और वीरेन्द्र प्रताप शाही को चुनौती दे दी थी. दलितों- पिछड़ों की राजनीति में ओम प्रकाश पासवान बड़े नेता के रूप में उभरे थे. गोरखपुर और आस-पास के जिलों की राजनीति इन्ही के आस-पास केन्द्रित थी. गोरक्ष पीठ के उत्तराधिकारी के रूप में योगी आदित्यनाथ गोरखपुर आ चुके थे.

कुछ वर्षों के अंतराल में गैंगवार में ओम प्रकाश पासवान मारे गये. वीरेन्द्र प्रताप शाही की भी श्री प्रकाश शुक्ला ने लखनऊ में हत्या कर दी.

वर्ष 1998 में योगी आदित्यनाथ गोरखपुर सीट से चुनाव लड़े और सांसद चुने गए. वर्ष 1999 में वह दुबारा सांसद चुने गए लेकिन इस बार हार-जीत के मतों का अंतर काफी कम था. इसके बाद से साम्प्रदायिक राजनीति परवान चढ़ने लगी.

महराजगंज जिले में पंचरूखिया कांड हुआ. कुशीनगर में मोहन मुंडेरा में अल्पसंख्यकों के घर जलाने की घटना हुई. पूर्वांचल में साम्प्रदायिक राजनीति की कब और कैसे शुरूआत हुई, इस पर विस्तार से कभी बाद में. छिटपुट तो लिखा हुआ है ही.

पूर्वांचल में साम्प्रदायिक राजनीति के बढ़ते कदम को सबसे पहले जिस शख्स ने पहचाना और उसका मुखर विरोध शुरू किया, वे थे चितरंजन सिंह. वे पीयूसीएल में सक्रिय थे.  अक्सर गोरखपुर आते और पत्रकार वार्ता कर या प्रेस रिलीज जारी कर इस क्षेत्र में हो रही साम्प्रदायिक राजनीति का विरोध करते. वह खुद अपने हाथ से लिखी हुई प्रेस रिलीज लेकर अखबार के दफ्तर में आते। दफ्तर में प्रवेश करते समय सबसे पहली मेज मेरी ही थी। प्रेस रिलीज थमाते हुए बोलते कि इसे छाप देना.

उस वक्त मैं पूरी तरह अखबारी काम में डूबा रहता था. ब्यूरो आफिस में काम बहुत था और स्टाफ कम. सिर्फ दस लोग काम करते थे और गोरखपुर-बस्ती मंडल के सात जिलों की खबर ब्यूरो आफिस पर आती और सम्पादित होकर लखनऊ  भेजी जाती. लखनऊ से छपकर अखबार टैक्सी से गोरखपुर आता. सात जिलों के ग्रामीण अंचल की खबरों का सम्पादन अकेले मेरे उपर था. इसलिए सुबह से रात तक किसी और काम के लिए न फुर्सत थी न सोचने का वक्त लेकिन ऐसे ही समय चितरंजन भाई ने ठहरे हुए तालाब में पत्थर मारा.

गोरखपुर के दौरे के दौरान वह सिर्फ बयान ही देने का काम नहीं कर रहे थे बल्कि  साम्प्रदायिक राजनीति के खिलाफ काम करने के लिए संगठन बनाने का भी काम करने में जुटे थे. वे गोरखपुर के कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों व पत्रकारों के साथ दो बैठकें कर चुके थे. बैठक में कुछ बात तय हुई लेकिन उस पर अमल नहीं हो पाया. इन बैठकों की न तो मुझे जानकारी थी और न मुझे शामिल किया गया था. अशोक चौधरी जरूर इन बैठकों में थे.

एक दिन चितरंजन भाई दफ्तर में आए. स्वभाव के विपरीत मिजाज थोड़ा गर्म था. अशोक चौधरी से बोले कि तुम लोग कुछ नहीं कर सकते. बस बातें करते हो. मैने उनसे पूछा कि हुआ क्या ? बोले कि गोरखपुर में साम्प्रदायिक राजनीति के खिलाफ एक कार्यक्रम करने की बात तय हुई है. दो बार बैठक हो चुकी है लेकिन बात आगे नहीं बढ़ पा रही है. मैं तो अब निराश हूं. मैंने उनसे पूरी बात समझी और उनसे वादा किया कि इस बार की बैठक में हम लोग कार्यक्रम की रूपरेखा बनाते हैं. कार्यक्रम जरूर होगा.

वादे के मुताबिक बैठक हुई. बैठक में कुल सात लोग उपस्थित हुए. इसी बैठक में पीपुल्स फोरम का गठन हुआ और उसकी अगुवाई में साम्प्रदायिक राजनीति के खिलाफ ‘जनतंत्र बचाओ सम्मेलन’ के आयोजन का फैसला लिया गया. गोरखपुर विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के सेवानिवृत्त प्रोफेसर राम कृष्ण मणि त्रिपाठी पीपुल्स फोरम के अध्यक्ष बने. उन्होंने सम्मेलन का पर्चा लिखा.

बदलती राजनीति में अपने को अनफिट पा रहे समाजवादी नेता फ़तेह बहादुर सिंह भी पीपुल्स फोरम से स्थापना समय से ही जुड़ गये. उन्हें भी नए मोर्चे पर सक्रिय करने का कार्य चितरंजन सिंह ने ही किया. बढती उम्र के बावजूद वे आज भी जन आंदोलनों से जुड़े हुए हैं.

सम्मेलन की तारीख और स्थान तय होते ही चितरंजन भाई खासे सक्रिय हो गए. स्थानीय स्तर पर हम लोगों ने मोर्चा संभाला. मैं पहली बार गोरखपुर में किसी सार्वजनिक कार्यक्रम का आयोजक बना था. सब कुछ मेरे लिए नया था. चितरंजन भाई ने कहा कि सम्मेलन में पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर भी आएंगें. हम लोगों ने उसके अनुरूप तैयारी शुरू कर दी. सम्मेलन के कुछ दिन पहले ही चितरंजन भाई गोरखपुर आ गए. आयोजन के दो दिन पहले पता चला कि चन्द्रशेखर जी नहीं आएंगे. चितरंजन भाई ने उनसे बात की और कहा कि यदि वह नहीं आ पा रहे हैं तो अपना संदेश भेजें. उन्होंने संदेश भेजना स्वीकार कर लिया लेकिन संदेश आया नहीं.

खैर, तय समय पर सेंट एंड्रयूज कालेज के सभागार में 31 अगस्त 2003 को जनतंत्र बचाओ सम्मेलन हुआ. इसमें जाने-माने पत्रकार आनन्द स्वरूप वर्मा, पीस के अनिल चौधरी, प्रो राम कृष्ण त्रिपाठी, प्रो रामदेव शुक्ल आदि ने भाग लिया. करीब दो सौ लोगों ने इस सम्मेलन में शिरकत की. यह सम्मेलन गुजरात से प्रेरणा लेकर गोरखपुर में तैयार की जा रही साम्प्रदायिक राजनीति के जमीन के खिलाफ उठी पहली जोरदार आवाज थी.

यहीं से मेरे जीवन ने नया मोड़ लिया. पत्रकारिता के साथ-साथ मानवाधिकार आंदोलन और जनतांत्रिक आंदोलनों से मेरा जुड़ाव शुरू हुआ. इसके सूत्रधार चितरंजन भाई थे.

चितरंजन भाई की पहल पर हम लोगों ने गोरखपुर और आस-पास के जिलों में साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाओं पर एक रिपोर्ट तैयार की. इस रिपोर्ट को लेकर चितरंजन भाई राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग गए. उस समय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश जे.एस. वर्मा थे. उन्होंने इस रिपोर्ट के आधार पर नोटिस भी जारी किया था. बाद में यही रिपोर्ट ‘यूपी अब गुजरात की राह पर’ नाम से प्रकाशित हुई. यह रिपोर्ट आज भी गोरखपुर और पूर्वांचल में हिन्दू युवा वाहिनी द्वारा शुरू की गयी साम्प्रदायिक राजनीति को समझने के लिए एक प्रामाणिक दस्तावेज है.

चितरंजन भाई की सक्रियता ने गोरखपुर में युवा पत्रकारों, वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों की एक टीम खड़ी कर दी. पीपुल्स फोरम के लगातार कार्यक्रमों व हस्तक्षेप ने एक नयी उर्जा का संचार किया. साम्प्रदायिक राजनीति के उभार से इधर-उधर पस्त पड़े कई संगठन भी धीरे-धीरे सक्रिय हुए. वर्ष 2003 में जो शुरूआत हुई, वह सिलसिला आज भी जारी है.

चितरंजन भाई के साथ 2003 से अगले दस वर्ष से अधिक समय तक काम करने काम मौका मिला. हम लोगों ने पूर्वांचल में पुलिस दमन, फर्जी मुठभेड़, साम्प्रदायिक हिंसा, कुशीनगर जिले में मुसहरों की भूख से मौतें, इंसेफेलाइटिस से बच्चों की मौतों के मामले उठाए. इन मुद्दों को चितरंजन भाई के जरिए ही राष्ट्रीय स्तर पर आवाज मिली. उन्होंने हम लोगों को यूपी
ही नहीं दिल्ली, जयपुर, रायपुर सहित विभिन्न स्थानों पर मानवाधिकार सम्मेलनों, जनसुनवाईयों में शरीक होने का मौका दिया. इससे हम सभी को काफी कुछ सीखने को मिला.

चितरंजन भाई इतनी आत्मीयता से मिलते और बात करते कि हम सभी उत्साह से भर जाते. वह खुद ही सभी लोगों से संवाद की पहल लेते. अक्सर उनका ही फोन आता. यह फोन सुबह के समय आता-मनोज कैसे हो ! पत्नी और बच्चे कैसे हैं ! अशोक कैसा है ! वह सबसे पहले घर-परिवार से लेकर दोस्तों-मित्रों का हालचाल पूछते. इसके बाद ही दूसरे विषयों पर चर्चा करते. युवा पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं की इतनी ज्यादा फिक्र करने वाला मैंने अभी तक किसी और को नहीं देखा.

वर्ष 2014 में मैंने ‘हिन्दुस्तान’ अखबार की नौकरी छोड़ी और स्वतंत्र पत्रकार के बतौर काम शुरू किया. अखबार की नौकरी छोड़ने की जानकारी मिलने के बाद उनका फोन अक्सर आने लगा. वह आजीविका सम्बन्धी परेशानियों को लेकर ज्यादा चिंतित हो गए थे.

चितरंजन भाई का गोरखपुर से बहुत पुराना नाता था. उनका गोरखपुर में 1978 से आना-जाना था. वे 1980 से भाकपा माले के सदस्य बने थे. आईपीएफ के गठन के बाद उन्होंने गोरखपुर में दो वर्ष तक जिलाध्यक्ष का काम देखा. इस दौरान विधानसभा चुनाव में आईपीएफ प्रत्याशी का प्रचार करते हुए गोरखपुर शहर उनके ओजस्वी भाषणों से तप गया था. उनकी चारों तरफ चर्चा होने लगी थी. उस दौर की यादें आज भी गोरखपुर के कई पुराने साथियों की स्मृतियों में सुरक्षित है.

गोरखपुर में उनकी छोटी बहन रहती हैं. उन्होंने अपनी बहन को भी हम लोगों के कार्यक्रमों से जोड़ा. आज भी वह हम लोगों के हर कार्यक्रम में आती हैं.

चितरंजन भाई का गोरखपुर में सम्पर्क का दायरा बहुत विस्तृत था. वह पूरे दिन लोगों से मिलने में व्यस्त रहते. अक्सर वह मोहद्दीपुर में अपने मित्र दिनेश सिंह के यहां ठहरते. हम लोग उनसे मिलने वहां जाया करते.

पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता सीमा आजाद सहित कई लोगों की गिरफतारी के विरोध में उन्होंने इलाहाबाद में एक बड़ा सम्मेलन आयोजित कराया. मशहूर चिकित्सक बिनायक सेन की रिहाई के लिए उनके अथक प्रयासों को कौन भूल सकता है.पीलीभीत में सिख यात्रियों की फर्जी मुठभेड़ में हत्या, भवानीपुर फर्जी मुठभेड़ कांड, रामपुर तिराहा कांड, डिप्टी एसपी केपी सिंह की हत्या सहित कई घटनाओं को जिस निर्भीकता के साथ चितरंजन जी ने उठाया और दोषियों को उनके अंजाम तक पहुंचाने की लड़ाई लडी उसकी और मिसाल दुर्लभ है. इस बारे में भाई केके राय विस्तार से लिख चुके हैं.

चितरंजन भाई हमेशा कठिन चुनौती स्वीकार करते. वर्ष 2008 के नेपाल संविधान सभा के चुनाव में पर्यवेक्षक बन जाने का मौका मिला. जब मै वहां पहुंचा तो चितरंजन जी पहले से मौजूद थे.  उन्होंने चुनाव देखने के लिए काठमांडू के बजाय नेपाल के दूरस्थ क्षेत्र में जाने का निर्णय लिया और गये.

चितरंजन सिंह यूपी सहित कई राज्यों में मानवाधिकार आंदोलन के पर्याय थे. उनकी पहचान पीयूसीएल से अटूट रूप से जुड़ी थी. पीयूसीएल का नाम आते ही चितरंजन सिंह का नाम जेहन में अपने आप आ जाता. बतौर मानवाधिकार कार्यकर्ता उनका नाम इतना विश्वसनीय था कि कहीं भी राज्य दमन हो उनकी पुकार होने लगती.

वे खुद में एक चलती-फिरती संस्था थे. उन्होंने पीयूसीएल का जिला स्तर तक संगठन विकसित किया था. छोटे से छोटे कस्बे से लेकर बड़े शहरों तक, हर जगह उनके चाहने वाले, पसंद करने वाले लोग थे. इतना निश्छल, निर्मल मन बहुत कम लोगों को मिलता है. मैंने उन्हें कभी किसी की शिकायत करते न देखा न सुना. वह खुद के बारे में तो कभी बात ही नहीं करते. हमेशा दूसरों के ही सुख-दुःख की चिंता करते देखा.

चितरंजन भाई को मैने बहुत अनुशासित जीवन जीते देखा. वह अपने स्वास्थ्य के प्रति बेपरवाह नहीं  थे. वह नियम से सुबह सैर करने निकलते, चाहे वह किसी भी शहर-गांव में हों. अक्सर वह आंदोलनों, फैक्ट फाइडिंग टीमों में भागीदारी के सिलसिले में एक जगह से दूसरी जगह दौड़ते रहते. इसके बावजूद सुबह-सुबह कंधे पर गमछा डाले टहलते हुए नजर आते. वह हम लोगों को भी सुबह पैदल चलने की नसीहत देते और देर रात तक जागने से मना करते.

जब उन्हें स्लिप डिस्क हुआ तो वे बहुत परेशान हुए. इस बीमारी ने ही उनकी सक्रियता कम की. बेटी की असमय मौत ने उन्हें गहरा सदमा दिया. जिन शक्तियों से वे पूरे जीवन भर पूरी शक्ति से लड़ते रहे, उन्हें सत्ता के शीर्ष पर विराजमान होते देखना भी उनके लिए कम निराशाजनक नहीं था. उनके कम होते जाते फोन और बातचीत का संक्षिप्त से संक्षिप्त होते जाना दिल में अजीब सी हूक पैदा करता.

सलाम चितरंजन भाई। आप हमेशा यादों में रहेंगे। आप ने दमन, अत्याचार के खिलाफ संघर्ष की जो लौ लगाई, वह कभी नहीं बुझेगी।

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