स्मृति

प्रो. कृपाशंकर चौबे

चितरंजन सिंह (14.01.1952-26.06.2020) पिछली आधी शताब्दी से शोषित-शासित-उत्पीड़ित लोगों की आवाज बने हुए थे। उनकी वेदना यह थी कि भारत में आज गरीबी व असमानता बढ़ी है। अनाज गोदामों में सड़ रहे हैं और गरीब, किसान भूखे मर रहे हैं। पिछले दो दशकों में ढाई लाख से अधिक किसानों ने आत्‍महत्‍या कर ली। भारत के किसानों, आदिवासियों तथा हाशिए के लोगों के बीच बढ़ती बेचैनी एक ऐसी वास्तविकता है जो चितरंजन सिंह को बार-बार संघर्ष के मैदान में खड़ी कर देती थी।

गालिब ने कहा था- मैं हूं अपनी शिकस्त की आवाज। गालिब टूटते हुए समाज की आवाज बने थे। उदारीकरण ने जब गरीबों को शिकस्त देना शुरू किया तो चितरंजन सिंह उन हारे-शिकस्त खाए लोगों की आवाज बन बनकर सामने आए। उन्होंने हमेशा अन्याय का प्रतिरोध किया और डटकर किया। वे बार-बार जेल गए। 1975 में प्रेस विरोधी आंदोलन में चितरंजन सिंह पहली बार जेल गए थे। बोफोर्स तोप सौदे की जांच की मांग को लेकर हुए आंदोलन में भी वे जेल गए। चंद्रशेखर के प्रधानमंत्रित्वकाल में अमेरिकी जहाजों को तेल भरने की इजाजत देने के खिलाफ आंदोलन करते हुए भी वे जेल गए। नब्बे के दशक में शाहजहांपुर के क्रूर जमींदार की हत्या के आरोप में गिरफ्तार प्रेमपाल सिंह व उन जैसे अन्य कैदियों की रिहाई की मांग को लेकर डायबिटीज के मरीज चितरंजन सिंह ने लखनऊ में गांधी मूर्ति के पास पांच दिनों तक अनशन किया। पीलीभीत में कई सिखों को आतंकवादी कहकर मार डाला गया तो उसके खिलाफ चितरंजन ने लड़ाई की। उस लड़ाई के फलस्वरूप सीबीआई जांच हुई और उसमें सिद्ध हुआ कि मारे गए सिख आतंकवादी नहीं थे।

निकट अतीत तक चितरंजन सिंह मानवाधिकारों की रक्षा के लिए लगातार संघर्ष करते रहे। पिछला संग्राम इंडियन सोशल एक्शन फोरम (इंसाफ) के सवाल पर किया था। केंद सरकार ने विदेशी अनुदान पंजीकरण (एफसीआरए) की आड़ लेकर इंसाफ के बैंक खाते को सील कर दिया तो चितरंजन का कहना था कि सरकार ने जनांदोलनों को कुचलने के लिए इंसाफ के साथ नाइंसाफी की जो संवैधानिक मर्यादा के खिलाफ है। इंडियन सोशल एक्शन फोरम 700 से अधिक गैर सरकारी संगठनों का नेटवर्क है जो जल, जंगल, जमीन से जुड़े आंदोलनों के लिए बैनर, पोस्टर छपवाने से लेकर प्रदर्शन स्थल का खर्चा उठाकर आंदोलनों को समर्थन देता रहा। गृहमंत्रालय ने 30 अपैल 2013 को नोटिस भेजकर इंसाफ का बैंक खाता सील कर दिया और एफसीआरए को 180 दिनों के लिए रद्द कर दिया। जस्टिस राजिन्दर सच्चर, शिक्षाविद् विनोद रैना और सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी भी इंसाफ के साथ जुड़े थे।

सनद रहे कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद लोकतांतिक मूल्यों को बचाने के लिए इंसाफ का गठन किया गया था। कुडनकुलम से लेकर कश्मीर तक चल रहे जल, जंगल, जमीन, अस्मिता और अधिकारों के लिए संघर्षरत लोगों को बुनियादी समर्थन दिया जाता रहा ताकि लोगों की आवाज मंद न पड़े। सरकार का कहना है कि बंद, हड़ताल, रेल रोको, रास्ता रोको या जेल भरो जैसी राजनीतिक कारवाई को अंजाम देने वाली संस्थाओं को एफसीआरए का पात्र नहीं माना जाएगा।  सरकार के इस कदम के खिलाफ चितरंजन लगातार मुखर थे। उनका कहना था कि आंदोलनों की आवाज इस तरह नहीं दबाई जा सकती।

14 जनवरी 1952 को बलिया के सुल्तानपुर में शेर बहादुर सिंह व धरोहर देवी की संतान के रूप में जन्मे चितरंजन सिंह का बचपन पूर्वी उत्तर प्रदेश में बीता। बनारस के क्वींस कालेज से हाईस्कूल व इंटर करने के बाद चितरंजन ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीए और उसके बाद एलएलबी किया। उसी दौरान वे छात्र युवजन सभा के संपर्क में आए। 1972 में चितरंजन सिंह का विवाह मोती देवी से हुआ। 1980 में उनकी एकमात्र बेटी रजनी का जन्म हुआ। उसके कुछ ही समय बाद मोती देवी का निधन हो गया। तब तक चितरंजन अपने को पूरी तरह जनांदोलनों में समर्पित कर चुके थे और लोकनायक जयप्रकाश नारायण मानवाधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) की स्थापना कर चुके थे और चितरंजन सिंह इस संस्था के स्थापना काल से ही जुड़ गए थे। 1980 में पीयूसीएल का पहला सम्मेलन हुआ जिसमें न्यायमूर्ति बीएम तारकुंडे अध्यक्ष चुने गए। चितरंजन सिंह संस्था की उत्तर प्रदेश शाखा के संगठन सचिव चुने गए। वे 1997 से 1990 तक पीयूसीएल के राष्ट्रीय संगठन सचिव रहे। 2005 वे पुनः इसके राष्ट्रीय संगठन सचिव बने। वे इसके राष्ट्रीय सचिव बने। बीच में वे इंडियन पीपुल्स फ्रंट से भी संबद्ध रहे किंतु बाद के वर्षों वे पूरी तरह मानवाधिकार कार्यकर्ता के बतौर ही संघर्षशील रहे।

चितरंजन सिंह का व्यक्तिगत जीवन बहुत उथल-पुथल से भरा रहा। व्यक्तिगत जीवन में उन्हें कई आघात सहने पड़े। एकमात्र बेटी की रजनी अपने चाचा मनोरंजन के यहां रहती थी। उसने एमए कर किया। चितरंजन सिंह ने उसकी शादी भी तय कर दी थी। गोदभराई भी हो गई थी कि उसी बीच लड़के की मां ने कह दिया कि लड़की नाटी है। जनसंघर्षों के योद्धा चितरंजन सिंह लड़के के माता-पिता के सामने हाथ जोड़े खड़े रहे किंतु कोई सुनवाई नहीं हुई। शादी टूटने का सदमा रजनी झेल नहीं पाई और उसने आत्महत्या कर ली। उस घटना के बाद चितरंजन लंबे समय तक अवसाद में रहे। मुश्किल से उस स्थिति से उबरे और जनसंघर्षों में हिस्सा लेने लगे। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने एक कार्यक्रम में चितरंजन सिंह को फक्कड़ कहा था।

भारत में लेखकों की एक ऐसी धारा भी है जो एक्टिविज्म से लेखन की ओर आई है। इसी धारा की एक प्रमुख शख्सियत थे चितरंजन सिंह। एक्टिविस्ट चितरंजन सिंह के विलक्षण गद्य की झलक ‘कुछ मुद्देः कुछ विमर्श’ नामक किताब में देखी जा सकती है। नीलाभ प्रकाशन से छपी इस किताब में बीसवीं शताब्दी की सांध्यवेला के ज्वलंत प्रश्नों से उपजी कई मार्मिक छवियां हैं। किताब की तलस्पर्शी टिप्पणियों में चितरंजन सिंह अपने युग के सवालों के साथ निरंतर मुठभेड़ करते हैं। वे अपने समय के मनुष्य के पक्ष में निरतंर संघर्षरत है। परिवर्तन की कामना में उनका संघर्ष शुरू तो होता है, खत्म नहीं। उनका लेखन भी परिवर्तनकामी है और समता पर आधारित एक स्वस्थ समाज के सपनों से पूरी तरह प्रतिबद्ध भी। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि इसी प्रतिबद्धता ने उन्हें लेखक बनाया। उनके लिखने की शुरुआत 1971 में ‘दिनमान’ से हुई थी। पहले वे डायरी लिखते थे। बाद में कई पत्र-पत्रिकाओं में वैचारिक लेख लिखने लगे। कालम भी लिखा।

(  प्रो कृपा शंकर चौबे महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के जन संचार विभाग में प्रोफेसर हैं. उनका यह लेख आज लखनऊ से प्रकाशित होने वाले जनसंदेश टाइम्स में प्रकाशित हुआ है )

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