कविता

उस चाँद पर अब ख़ून के धब्बे हैं ..

(आलोचना पत्रिका में प्रकाशित फ़रीद ख़ाँ की कविताओं पर एक नज़र)

मोहम्मद उमर


इस बार की हिंदी त्रैमासिक पत्रिका ‘आलोचना’ के ‘अक्टूबर-दिसम्बर 2020’ के अंक में ‘फ़रीद ख़ाँ’ की कविताओं से रूबरू होने का मौका मिला (फ़रीद ख़ाँ की कविताएँ, पृष्ठ संख्या–23-28)। ‘फ़रीद खाँ कवि, पटकथाकार और फ़िल्म समीक्षक हैं। उनका पहला कविता संग्रह ‘हम भारत के लोग’ प्रकाशाधीन है।’ इस कविता संग्रह का इंतज़ार हम सभी को है। उम्मीद है, जल्द से जल्द वह कविता संग्रह हमारे बीच आएगा।
फ़रीद ख़ाँ की कविताओं को पढ़ते वक़्त ऐसा महसूस हो रहा था और यह बात बार-बार जेहन में तारी हो रही थी कि, कहीं ये इस देश की राजनीति, समाज इत्यादि में पिछले कुछ बरसों में जो कुछ घटित हो रहा, उस का लिखित दस्तावेज तो नहीं है। एक-एक कविता से गुज़रते हुए हम एक ‘रिपीट टेलीकास्ट’ देख रहे थे। ये ‘रिपीट टेलीकास्ट’ मुल्क के हालात की रिपोर्टों की एक रील थी। इस ‘रील’ में हमने देखा कि, एक तरफ़ लुटी पिटी भूखी जनता है तो एक तरफ़ उसे ‘झूठे और खोखले वायदे करके उसका शोषण करने वाली सत्तासीन जमात है। एक ओर भयाक्रांत मुस्लिम समाज है तो उसे उसी के देश में विदेशी कहने वाली
हिंदुत्ववादी जमातें, जो कि आज सत्ता पर काबिज हैं। एक ओर अपनी भूमि पर विकास के नाम पर ठगा हुआ आदिवासी है तो दूसरी ओर उसे ठगने वाली सत्ता और कॉरपोरेट की शक्तिशाली ताकतें हैं।
कहना न होगा कि ‘फ़रीद ख़ाँ’ ने इस सब नग्न यथार्थों का बखूबी नक्शा अपनी कविताओं में खींचा है। लेकिन इन तमाम यथार्थों से परिचित होने के बावजूद हम आज एक ऐसे समाज के नागरिक होने का परिचय दे रहे हैं जिसकी चेतना मृत चुकी है। हमें देश के और सिस्टम के द्वारा छिपा लिए गए ‘राज्य प्रायोजित हिंसा और हत्याओं’ से परिचित होने का क्या मतलब है! भूख से अकुलाते लोगों को जब रोटियां मिलीं तो राज्य ने उन रोटियों को नमक या चटनी भी नहीं दी बल्कि, उनकी बोटियों को उन रोटियों पर पेश कर दिया। धड़ धड़ करती हुई रेल जीवन के ऊपर से गुज़र गयी लेकिन हम ‘घरों में, ऑफिसों में, ऐसी बंद इमारतों में या किसी रेस्त्रां पर बर्गर खाते हुए हम इन तमाम घटनाओं से नावाक़िफ़ होने का परिचय देते रहे। हम तथाकथित सभ्य समाज के लोग ‘नाक पर रुमाल’ रखकर खिसक लेते हैं। ‘एयर फ्रेशनर’ वाले लोग! किसी गरीब के लाश की दुर्गंध हम तक न आए और इस हम भी उसकी हत्या के हिस्सेदार बन बैठते हैं। हम उसे दुबारा मार देते हैं! ‘एयर फ्रेशनर’ कविता हमारे भीतर की पूँजीवादी चेतना से सवाल करती है:
आपने एयर फ्रेशनर लगाकर जिस गन्ध को दबा रखा है
वह लाशों की गंध है और कोई बहुत दूर से नहीं आ रही है।
आपके घर के नीचे से ही आ रही है।
………..
और आपका अभ्यास इतना सधा हुआ है
कि अब आपको ऐसी गन्ध से उल्टियाँ नहीं आतीं।(पृ.24)
राज्य की पूरी शक्ति कॉरपोरेट की खिदमत में लगी हुई है। उसे जमीन के सवालों से कोई सरोकार नहीं है। उसे बस उनकी झोलियां भरनी है जो उसे चुनावी चंदा देकर दिल्ली के राज सिंहासन (तख्ते ताउस) पर बिठाते हैं। उसने आदिवासी क्षेत्रों के विकास के नाम पर उनसे युद्ध छेड़ रखा है। अपने नागरिकों को प्रतिमाह भाड़े पर रखकर अपने ही नागरिकों का कत्ल! राज्य ने विकास की ये कैसी परिभाषा खोज निकाली है जहाँ विकास के मायने ‘कॉरपोरेट द्वारा सम्पदाओं की खुली लूट और गरीबों का नरसंहार है!’
‘छत्तीसगढ़ का विकास’ कविता हमें इस हक़ीक़त से रूबरू कराती है। कविता की अंतिम पंक्तियों को देखिये–
छत्तीसगढ़ के विकास में आप महसूस कर सकते हैं
जंगलों के नर-संहार
और नर-संहार की गंध।(पृ.24)
‘नर संहार’ किसका है? कौन नर है यह? किसका संहार करके लाश गिराई जा रही? कविता के शुरू की पंक्तियां हैं कि ‘उन सिपाहियों के लाशों की गंध। उन सिपाहियों ने जिन आदिवासियों को मार गिराया, उन आदिवासियों के लाशों की गंध।’
जल, जंगल, जमीन की खुली लूट बदस्तूर जारी है। खनिजों को औने पौने दामों पर बेचा जा रहा है। इस देश के मूलनिवासियों से उनकी जमीनें उनके पेड़ उनके पहाड़ और सबकुछ जो उनका था, छीना जा चुका है। वह प्रकृति के मित्र बनकर रहते हैं। वह उस प्रकृति का उपभोग करते हैं लेकिन बदले में उसे पुनः सृजित करते हैं। उसे हरा भरा बनाये रखते हैं। लेकिन पूँजीवादी दानवों ने सबकुछ उजाड़ने की ठान ली है। आज के पूँजीवादी युग के अधिक मुनाफ़े की अँधी दौड़ में उनके सामने इंसानों का जीवन, उसकी आस्थाएँ उसके लोकविश्वास उसकी लोकसंस्कृतियाँ कुछ भी मायने नहीं रखती हैं। सबकुछ बिखर चुका है, सामूहिकता का नाश हो चुका है, श्रम का कोई मोल नहीं, महिला श्रमिकों के साथ अन्याय….ये देन रही है इस पूँजीवादी दानव की! ‘चाँद’ कविता अपने अंदर गहरे बिम्बों को छिपाये हुए है, जो कि शोषण की कहानी कहते हैं। मेहनती स्त्रियों के शोषण की कहानी और लोकसंस्कृति के प्रतीकों की हत्या की कहानी और उनके आस्थाओं और मूल्यों के हत्या की कहानी–
उस समय चाँद पर एक बुढ़िया हुआ करती थी,
जो चरखा कातकर चलाती थी।
कभी-कभी चाँद से धुँआ भी उठता था,
वह खीर पकाया करती थी।
वह मिट्टी खोदकर कोयला निकालती थी,
फिर उस मिट्टी में एक पेड़ लगा दिया करती थी।
….
…….
उस चाँद पर अब ख़ून के धब्बे हैं। (पृ.24)
लेकिन राज्य और कॉरपोरेट के इन दमनकारी षड्यंत्रों का लोकतांत्रिक तरीकों से विरोध इस लोकतांत्रिक देश में बड़ा ‘कॉस्टली’ साबित हो रहा है। प्रतिरोध की आवाज़ों को मार दिया जा रहा है या उनसे जेलों को भरा जा रहा है। कोई ‘विदेशी’ है, कोई ‘अर्बन नक्सली’ है तो कोई ‘टुकड़ा-टुकड़ा’ गैंग! झूठा शोर मचाया गया है कि प्रगतिशीलों और बुद्धिजीवियों से देश को ख़तरा है! ‘यूनिवर्सिटियों’ से देश को खतरा है! इतना ही नहीं, बल्कि ‘असहमति’ शब्द से ही इस शक्तिशाली पूर्ण बहुमत वाली सत्ता और हिंदुत्ववादी संगठनों के ‘कलयुगी अवतार’ को डर है! ‘असहमति’ तो लोकतंत्र की खूबसूरती है लेकिन सत्ता को बर्दाश्त नहीं है।
‘आओ मिलकर बद्दुआ करें’ कविता  सत्ता द्वारा देश में ‘प्रतिरोधों और असहमतियों के दमन’ के सच को उजागर करती है। किस तरह से सत्ता असहमतियों को कुचलती है और राज्य की दमनकारी शक्तियां उसे ढक लेती हैं, इसका एक नंगा नाच जहाँ हम अपनी आवाज़ों को दबाया जाता हुआ देखते हैं। हम देखते हैं कि दलितों के साथ अत्याचार हो रहा है।
हम देखते हैं कि कमजोरों की स्त्रियों का बलात्कार हो रहा लेकिन हम बद्दुआओं से ज्यादा कुछ नहीं कर पाते!
‘तो आओ मिलकर बद्दुआ करें उस व्यवस्था के लिए
जिन्हें लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार का कोई दोषी नहीं मिलता।
जिन्हें हत्यारे नहीं मिलते रोहित वेमुला के।
जिन्हें बलात्कारी नहीं मिलते मणिपुर के।
जिन्होंने सोनी सोरी की योनि में ठूँस दिए थे पत्थर
उनके लिए बद्दुआ करें।……'(पृ.24-25)
इस क्रूरतम सत्ता और कलयुगी अवतार का उदय आज से कुछ बरसों पहले शुरू होता है एक दंगे के साथ। अल्पसंख्यकों के नरसंहार की घटना के बाद इस अवतार को हीरो बनाया जाता है और हिंदुत्ववादी संगठन इसे बतौर हिन्दू उद्धारक पेश करते हैं। मलेच्छों के खून से नहाकर एक ‘उन्नायक’ को बहुसंख्यक की स्वीकार्यता मिलती है। एक फासिस्ट सोच जन्म लेती है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश को एक हिटलरी ट्रेलर देखने को मिला। सत्ता की बागडोर थामे शख्स के कुर्तों पर खून की छीटें थीं जो आज भी धुली नहीं हैं। आज वो छीटें फिर गहरी गाढ़ी लाल दिख रही हैं। ‘मुँह में कुछ अटका पड़ा है’ जहाँ से बदबू आती है। ‘माननीय प्रधानमंत्री’ कविता देखिये–
प्रधानमंत्री के दाँत में दर्द है।
कुछ अटका पड़ा है पिछले पंद्रह सालों से।
रह-रह कर ख़ून रिसता है वहाँ से।
कभी-कभी मवाद भी आता है।
नज़दीकी लोग बताते हैं कि दुर्गंध भी आती है।
जब भी वे मुँह खोलते हैं, जली हुई लाश का भभका आता है।
इसीलिए वे विदेश दौरे पर रहते हैं और दुर्गंध से झल्लाये कुछ भी बोलते हैं।(पृ.26)
इस निवर्तमान सत्ता को भय है लोकतंत्र से, संविधान से, क्योंकि संविधान और उसमें उल्लिखित प्रावधान उसके ‘मनुवादी’ सोच के विपरीत जाते हैं। संविधान पैर के बल है तो उसकी सोच सिर के बल! वह ‘डेमोक्रेसी’, ‘असहमति’, ‘सौहार्द’ के विलोमों की स्थापना के प्रति कटिबद्ध है। सच तो ये है उसे आधुनिक और वैज्ञानिक समाजवाद के मूल्यों से डर है और उसने झूठमूठ के ‘विलेन’ खड़े कर रखे हैं। निवर्तमान सत्ता और कट्टर फांसीवादी हिन्दू ह्रदय में वास कर रहे ‘अवतार’ को जमीनी मुद्दे कभी प्रिय नहीं रहे हैं। इन्हें टरकाने के लिए इस शक्तिशाली सत्ता को अब देश के ‘कमजोर अल्पसंख्यकों’ से खतरा है, उसे दलितों से खतरा है और उसे प्रबुद्ध सेक्युलर नागरिकों से खतरा है! राज्य की शक्ति जिसके नियंत्रण में हो, वह अपनों से ही भय खाता है! कैसे ‘कमजोर प्रतीक’ खड़े किए हैं। और ‘प्रधानमंत्री की जान को खतरा’ है कविता व्यंग्यात्मक लहजे में इस सच को उधेड़ कर रख देती है।
प्रधानमंत्री की जान को खतरा है
उसकी सुरक्षा के लिए पूरे देश को अपनी जान लगा देनी चाहिए।
हर नागरिक को शक की निगाह से देखना चाहिए।
शक की बिना पर किसी को भी गिरफ्तार करके मुकदमा चलाना चाहिए।
………
ध्यान रहे कि ऐसे संकट के दौर में भी
कुछ लोग भूख और बेरोजगारी की बात करेंगे।
लूट-खसोट को उजागर करने वाली ख़बरों को फैलाएंगे।
मुद्दे से देश को भटकाने के लिए महिलाओं की सुरक्षा
और बलात्कार के मामलात को उठाएँगे।
राष्ट्र अपने इन शत्रुओं को कभी माफ़ नहीं करेगा।……(पृ.25-26)
‘अवतार’ कभी झूठ नहीं बोला करते। ‘आधुनिक कल्कि अवतार’ और उनकी सेना ने झूठ बोलना कहाँ सीखा है! बल्कि ऐसा सच बोला है कि चला आ रहा वैज्ञानिक, प्रमाणिक, ऐतिहासिक रूप से ज्ञात ‘सच’ भी झूठ हो गया है। प्रधानमंत्री पद पर अवतरित अवतार ‘कुन फयाकुन’ वाला है उसने कहा ‘हो जा!’ और ‘हो गया!’ क्षण भर में इतिहास ही बदल गया। भले ही ‘अतीत’ प्रधानमंत्री की बातों से कतई मेल न खाता हो लेकिन जो कह दिया उसे माना जाना चाहिए। क्योंकि, हो सकता है, ‘अवतार’ की कही गयी  बात है तो ‘अतीत’ भी लिहाज करते हुए सभी चीजों को उलट दे! सावरकर अंग्रेजो से लोहा लेने लगें और भगत सिंह को दलाली की ₹60 प्रतिमाह पेंशन मिलने लगे। ‘हेडगेवार’ अछूतों के हीरो बन जायें और अम्बेडकर वर्णधर्म का उपदेश दें! यही है निवर्तमान ‘प्रधानमंत्री’ के शब्दों की ताक़त! उनके शब्द ही शाश्वत और अंतिम सत्य हैं और प्रामाणिक भी, जिसे काटा नहीं जा सकता! और इसे ही पाठ्यक्रम बना दिया जाए। ‘प्रधानमंत्री कभी झूठ’ नहीं बोलते कविता में अद्भुत व्यंग है–
प्रधानमंत्री कभी झूठ नहीं बोलते।
बल्कि घटनाएं जो घट चुकी हैं वो ही सच नहीं थीं।(पृ.27)
देश में फांसीवादी ताकतों के उभार की एक इतिहास है जिसका एक तार गुजरात से जुड़ा है तो दूसरा अयोध्या से। दोनों दफ़े मानवता शर्मसार हुई। इतिहास के काले अध्याय। इंसान होने का हक़ खो दिया। इतिहास की भूल सुधारने के लिए इंसानियत का मुँह नोच लिया गया। ‘ऊंचाई’ पर चढ़ गए लेकिन इंसानियत की इमारत से गिर पड़े–
जिस ऊंचाई पर वह था
चाँद वहाँ से भी बहुत दूर था।
चाँदनी का सिरा पकड़े पकड़े
अपनी जिस छत पर वह जाकर खड़ा हुआ
उसकी ईंट तो पहले से ही हिल रही थी।
वहाँ की हर चीज हिलती है।
वहाँ की हर चीज डुलती है।
उस जगह पहुँचकर कुछ गिर जाते हैं
कुछ मर जाते हैं। (पृ.23)
इस देश का अल्पसंख्यक तबका आज डरा हुआ है। उसे आज उसका नाम ही डरा रहा है। वह अपने घर में सुरक्षित नहीं है, क्या पता, भीड़ उसके घर के किचन में घुस जाए या उसकी फ़्रिज खोलने लगे? कौन उससे उसके नागरिक होने का प्रमाण माँग ले तो कौन उससे ‘भारत माता की जय’, ‘राष्ट्रगान’, ‘वन्दे मातरम’ गाने को कहने लगे? इन्हीं ‘पैरामीटर्स’ के आधार पर आज देशभक्ति की जाँच होती है।
मुस्लिम समुदाय के भीतर के भय को ‘छिप कर रहता हूँ’ कविता बखूबी उजागर कर देती है–
‘अपनी पहचान के सारे पत्र जुटा रखे हैं मैंने,
ताकि किसी को शक न हो कि मैं अब नहीं रहता इस देश में।
….
……….
मैं डरपोक तो हूँ। इसमें कोई शक नहीं है,
और इस वक़्त सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान गाते हुए सबसे ऊँची आवाज़ मेरी ही है,
और लोग मुझे सम्मान के साथ कनखियों से देख रहे हैं। (पृ.25)
‘दूर देश की कथा’ कविता देश के विकास की कहानी को बयाँ कर देती है। दिल्ली के राजसिंहासन पर जो भी आसीन हुआ उसने सपनों का एक जाल बुन दिया और देश उन्हीं सपनों में खो गया। कागज़ में, राजनेताओं के भाषणों में, रंग बिरंगे विज्ञापनों में हम सभी हरे भरे और खुशहाल दिखे लेकिन सच की जमीं पर वहीं खड़े हैं जहाँ पहले थे। हर चेहरे मुरझाए हुए हैं। गरीब हो किसान हो या मजदूर हो, किन्हीं चेहरों पर न कोई ललक है न कोई चमक है। नाउम्मीदी की गहरी माँद है जहाँ से बाहर निकलने को कोई रोशनी नहीं है। चार पाँच बरस पहले सपने दिखाए गए। कहा गया हम सच कर दिखाएंगे। लेकिन वो शख्स सिर्फ शब्दों का जादूगर है! सिर्फ अच्छे-अच्छे ख़्याल बुन सकता है और मीठे-मीठे सपने दिखा सकता है। विकास के आँकड़ों में हम आज भी बहुत पीछे हैं। हमारे पास आँकड़े तो नहीं हैं लेकिन फ़रीद ख़ाँ की कविता है–
देश बहुत दूर है उसके स्कूल से।
कम से कम दस किलोमीटर दूर उसको अपने मोबाइल पर मिलता है सिग्नल और साथ में थोड़ा-सा एक देश।
देश उसके चूल्हे से बहुत दूर है।
कम से कम एक हज़ार किलोमीटर दूर से
उसे सुनाई देता है थोड़ा-थोड़ा एक प्रधानमंत्री का भाषण
और दिखाई देता है थोड़ा-थोड़ा एक देश।
……..
यह उस देश की कथा है
जहाँ आम लोगों तक नहीं पहुँचता नेटवर्क। (पृ.26)
कोई मेहतर दम तोड़ देता है’ कविता इस देश के ब्राह्मणवादी जातीय वर्चस्व की गाथा गाती है। यह असमानता पर आधारित व्यवस्था पर लिखी गयी मर्शिया है! इस मर्शिया में शोक है, व्यंग है, क्रोध है! जहाँ एक मेहतर की मौत कोई अहमियत नहीं रखती। इंसान की शिनाख्त यह समाज आज भी नहीं कर सका। यह जाति की शिनाख्त करता है। सभ्यता के विकास के साथ हमारी जाति आधारित मानसिकता आज भी नहीं बदली। वह आज भी वर्णाश्रम का ही पालन करती है–
जब हजारों साल के आरक्षण के गटर में
कोई मेहतर दम तोड़ देता है
तो कोई नहीं कहता उसे अयोग्य।
न हिन्दू का खून खौलता है
न मुसलमान का। (पृ.27)
फ़रीद ख़ाँ की कविताओं में स्त्री चेतना मुखर होती रही है। ‘पिटने वाली औरतें’ हों या ‘मुझे पत्नी की बातें नहीं सुनाई देतीं’ दोनों कविताएँ पितृसत्तात्मक व्यवस्था के शोषण को उजागर कर देती हैं। ‘पिटने वाली औरतें’ तो स्त्री शोषण की दारुण कथा कह देती है।
कविता हमें उस सच से रूबरू कराती है कि पितृसत्ता द्वारा स्त्री शोषण की कहानी हर घर की कहानी है। यह हर वर्ग की कहानी है और हर समाज की कहानी है। यह कहानी अपने भीतर अनेकों राज़ दफ़न किये हुए है कि किस तरह हर क्षण एक स्त्री प्रताड़ित होती है। यह प्रताड़ना उसके रोजमर्रा की ज़िंदगी में शामिल है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि शोषण उसके जीवन का पर्याय बन चुका है–
एक रिक्शे वाला रोज़ सुबह अपनी बीबी को पीटता है।
जैसे आप रोज़ सुबह ब्रश करते हैं और नाश्ता करते हैं।
एक दूसरी औरत भी है जो अपने शौहर और बच्चों को छोड़कर
एक दूसरे आदमी के साथ भाग आयी है
और हर रोज़ शाम की चाय के साथ पिटती है उस दूसरे आदमी से। (पृ.27)
….
……..
स्त्री के दुःख दर्द को किसने समझा है! आप उसके कितने भी करीब हों लेकिन उसके भीतर में किसने झाँका है। पुरूष वर्चस्व वाले समाज में वह उपेक्षित है और उसकी हैसियत एक ग़ुलाम सी है। उसका सम्बंध पुरुष से चाहे माँ का हो या बहन का हो, या फिर पत्नी या पुत्री का, पुरुष के आगे वह दोयम दर्जे की स्तिथि में ही रही है। ‘मुझे पत्नी की बातें सुनाई नहीं देतीं’ इस सच को खोल कर रख देती है–
मुझे पत्नी की बातें सुनाई नहीं देतीं
…..
……
अपनी याददाश्त पर थोड़ा जोर लगाकर सोचा
कि मुझे माँ की बात ही कब-कब सुनाई दी है?
मुझे नानी-दादी की बात ही कब सुनाई दी?
जिसके पलंग में घुसकर अक्सर सो जाता था।
मुझे ठीक से याद नहीं कि अपनी बहन की कोई बात सुनी हो।
“खाना पक गया, चलो खा लो”।
इससे ज्यादा मुझे याद नहीं कि मैंने कुछ उनसे सुना हो।
कान बिल्कुल ठीक है, ऐसा कान के डॉक्टर ने कहा है। (पृ.27) 
‘मैं काफ़िर हूँ’ कविता भी मुस्लिम पितृसत्ता पर करारा व्यंग है। मुस्लिम कट्टरपंथ और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के विरोध में यह कविताई तेवर कमाल का है। कविता की शुरुआत ही विद्रोही तेवर से शुरू होती है। ‘आज़ान’ यानी ‘अल्लाहु अकबर की आवाज़, और जिसका मायने है कि खुदा सबसे बड़ा है’ लेकिन, कवि के कान में जिस आवाज़ ने सबसे पहले दस्तक दी ‘वह माँ की चीख थी।’ यह कविता मुस्लिम धर्मग्रंथो की उस मिथकीय कहानी को बताती है जिस आधार पर मुस्लिम औरतों के अधिकारों में कटौती की जाती है। माना ये भी जाता है कि हौव्वा की गलतियाँ आदम  से कहीं ज्यादा थीं। इंसान के जमीं पर आने की कहानी में भी स्त्री को दोषी बनाया गया वरना सभी जन्नत में होते!उम्मीद है कि फ़रीद ख़ाँ के विरोध में फ़तवा आने वाला है! अब राय मशविरा हो रहा होगा कि सिर काटने की क्या कीमत लगाई जाए! कविता की अहम पंक्तियों को देखिये–
आज़ान की आवाज़ नहीं थी मेरे कान में पहली आवाज़।
वह माँ की चीख थी।
….
बहुत बाद में जब बाप को पहचानना शुरू किया।
तब तक बहुत देर हो चुकी थी,
मैं अपनी माँ का हो चुका था
…पर प्रयोगधर्मी शैतान की बातें ही मेरे पल्ले पड़ीं।
मैंने भी सेब खाए और माँ की बनाई गेहूँ की रोटी खाई।(पृ.28)
फ़रीद खाँ की कविताएँ समकालीन प्रसंगों और समाज की विसंगतियों से जूझती हैं। वह निरंकुश सत्ता से सवाल करती हैं। वह सवाल दबे हुए तेवर से नहीं, बल्कि, ‘ठेठ आम ज़ुबान के शब्दों के साथ करती हैं। लहज़े में कटाक्ष है। साधारण शब्दों के साथ कविता की भव्य इमारत खड़ी हुई है। हम देखते हैं कि कविताओं में कह सकने साहस है। और कहीं-कहीं लहज़ा हास्यात्मक है लेकिन उसमें व्यंग्यात्मक तीव्रता ही अधिक है। हमारी बोलचाल के मुहावरे हैं जिससे कविता से पाठक जुड़ जाता है।
सरकार से जो ले पंगा सी।
सिर पर उसके डंडा सी।
लाठी लेके बगुला बोला,
सबको मारो गोली सी।
गंगू बोला हार के जी।
सब चंगा सी, सब चंगा सी। (पृ.27)
फ़रीद ख़ाँ की कविताओं में एक स्वस्थ नागरिक समाज के निर्माण की कामना है और भीतर से एक दर्द छलका है। जिसमें एक गहरा संदेश है। धर्म, जाति, लिंग से ऊपर बिना किसी भेदभाव के समतामूलक समाज निर्माण के उद्देश्य को लेकर कविताएँ आगे बढ़ती हैं। धार्मिक कट्टरता के ख़िलाफ़ एक बुलंद आवाज़ है और उस ईश्वर का नकार है जिसके नाम पर मानवता का ख़ून पानी की तरह बहाया गया है।
ईश्वर उन नदियों में चुपचाप बह रहा है
जिसमें सभ्यताएँ बह रही हैं।
जिसमें खून बह रहा है।
….
ईश्वर चुपचाप उस बुलडोजर पर पताका बनकर बैठा है
जो झोंपड़ों को मसलता हुआ बढ़ा जा रहा है। (पृ. 23, ‘ईश्वर अपने प्रकट होने का इंतज़ार कर रहा है’
हिंदी संस्कृत के कठिन और मुहावरे दार शब्दों और वाक्यों से कविता को रंगा नहीं गया है। यह पाठकों के लिए अच्छी बात है। अर्थ एकदम साफ़ है कोई दुरुहता नहीं है। कविता हमें जल्द ही खुद से जोड़ लेती है। कवि का श्रम सफ़ल रहा है कि सहृदयकों के साथ उसका तादात्म्य स्थापित हो जाता है। अंत में, हम अपनी बात का समापन ‘फ़रीद ख़ाँ’ की कविता ‘मेरा देश’ की इन पंक्तियों के साथ करना चाहेंगे–
मैंने स्मृतियों में छिपा लिया है अपने देश को
प्राणी जगत का एक-एक प्राणी, नर और मादा।
वनस्पति जगत का हर एक पेड़ पौधा। घास। खर-पतवार।
जंगल। जल प्रपात। धरती आकाश। मौसम और सातों रंग।
मैंने छिपा ली एक प्रति सभी ग्रन्थों की। (पृ.26)
…..

(इस लेख को मोहम्मद उमर ने लिखा है वे
 इलाहाबाद विश्वविद्यालय
बीए तृतीय वर्ष (हिंदी, प्राचीन इतिहास) के छात्र हैं।  

लेख  ‘आलोचना’ के ‘अक्टूबर-दिसम्बर 2020’ के अंक में प्रकाशित फ़रीद ख़ाँ की कविताओं पर आधारित है। 
फ़रीद ख़ाँ  चर्चित कवि, पटकथाकार, फ़िल्म समीक्षक हैं। 
पहला कविता संग्रह ‘हम भारत के लोग’ प्रकाशाधीन।)

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