प्रेमचंद और अर्थशास्त्र के विद्यार्थी

शख्सियत

(31 जुलाई को प्रेमचंद की 140वीं जयंती के अवसर पर समकालीन जनमत जश्न-ए-प्रेमचंद का आयोजन कर रहा है। इस अवसर पर 30-31 जुलाई को समकालीन जनमत लेखों, ऑडियो-वीडियो, पोस्टर आदि की शृंखला प्रकाशित कर रहा है। इसी कड़ी में प्रस्तुत है ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ के चित्तौड़गढ़ चैप्टर से जुड़े अध्यापक महेंद्र नंदकिशोर का यह लेख: सं।)


महेंद्र नंदकिशोर


बारहवीं कक्षा में अर्थशास्त्र के पाठ्यक्रम के पहले अध्याय में जमींदारी प्रथा और ऋण के अनौपचारिक स्रोत नाम से दो टॉपिक हैं। मेरी हमेशा से कोशिश रही है कि विद्यार्थियों के समक्ष वे उदारहण रखें जाएं जिनका उनसे सीधे तौर पर जुड़ाव हो ताकि वे टॉपिक को न सिर्फ ठीक से समझ सकें बल्कि उसे महसूस कर सकें। सेंट्रल अकेडमी स्कूल, चित्तौड़गढ़ के जिन विद्यार्थियों को मैं पढ़ा रहा था वो इंस्टाग्राम और ट्विटर के ज़माने के थे, साथ ही आर्थिक रूप से सक्षम भी। ऐसे में इनको गरीबी, बेरोजगारी, देश की आर्थिक समस्याएँ जैसे टॉपिक पढ़ाना और ठीक से उनकी समझ में लाना मुझे एक हद तक कठिन जान पड़ रहा था। मैं सोच-विचार में था कि किस तरह से पढ़ाया जाए? सोचते-सोचते अनायास ही मन में हल्कू और जबरा का खयाल आ गया। “रात का समय है झींगुर की आवाज़ आ रही है हल्कू जो कि ठंड में ठिठुर रहा है, पर सो नहीं सकता। खेत की रखवाली जो करनी है।” फिर सोचा कि ऐसा क्या है जो हल्कू सो नहीं सकता? बचपन में स्कूल में पढ़ी कहानी थोड़ी धुंधला गई थी। फिर याद आया वो दृश्य, साहूकार हल्कू के घर के सामने आकर गंदी-गंदी गालियाँ दे रहा था। पर वो गालियाँ क्यों दे रहा था? हल्कू ने साहूकार से कर्जा जो लिया था और शायद समय से न लौटा पाया। बस इतना खयाल आते ही मैं समझ गया कि मुझे अगले रोज़ क्या करना है। आप इत्तेफाक देखिए, अगले रोज़ 30 तारीख थी।

30 जुलाई 2019
बारहवीं का कक्षा अध्यापक होने के नाते पहला पीरियड मेरा था। पूरी ऊर्जा के साथ कक्षा में दाखिल हुआ और चर्चा शुरू की। विषय था, ‘आजादी के समय भारत की अर्थव्यवस्था की दशा’। तब भारत की 70 प्रतिशत से अधिक आबादी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि से जुड़ी थी और कृषि में जमींदारी प्रथा और ऋण की व्यवस्था का जिक्र होना ही था। बस यहीं से मैंने विषय से उनका ध्यान हटाकर प्रेमचंद की ओर खींचा और बच्चों से पूछा कि आपने प्रेमचंद की कौन-कौन सी कहानियाँ पढ़ी हैं? जैसा कि अपेक्षित था बच्चों का जवाब आया “ईदगाह पढ़ी है सर।” ठीक बात है, और कोई कहानी? मैंने पूछा। इस बार इक्के-दुक्के बच्चों का जवाब आया ‘मंत्र’, ‘नमक का दरोगा’ और शायद एक दो और कोई कहानियों के नाम भी बोले उन्होंने जो मुझे भी ठीक से याद नहीं। यह बात लगभग सालभर पुरानी हैं।

‘पूस की रात’ कहानी का जिक्र शायद किसी ने नहीं किया। मेरे पूछने पर एक दो बच्चों ने हाँ में सर हिलाया पर उतने विश्वास के साथ नहीं। खैर बात आगे बढ़ी और मैं जितना कुछ जानता था प्रेमचंद की कहानियों के बारे में उतना उन्हें बताया। फिर घूमकर टॉपिक पर आ गए। अगले रोज़ 31 जुलाई यानी प्रेमचंद जयंती थी और होमवर्क के लिए हम सभी ने मिलकर तय किया कि हम कक्षा में ही प्रेमचंद जयंती मनाएँगे और सब बच्चें प्रेमचंद की लिखित कोई एक कहानी सुनाएँगे।

31 जुलाई 2019
आज कक्षा में जो उत्साह था प्रेमचंद की कहानियों को लेकर, वो देखने लायक था। मैं कक्षा में दाखिल हुआ हाज़री ली और मैंने कहा चलो आगे का टॉपिक पढ़ते हैं। इतने में तो बच्चों ने मुझे टोक दिया बोले “सर प्रेमचंद जयंती!” मैं मुस्कुराया और फिर हमने शुरू किया कहानियों का सिलसिला। एक-एक करके बच्चे कहानी सुना रहे थे और मैं दंग था उन्हे देखकर। उनको कहानी ज़बानी याद थी और जिस तरह से वो कहानी सुना रहे थे, ऐसा मालूम पड़ रहा था जैसे प्रेमचंद उनके दादा के मित्र हैं और उन्हें रोज़ कहानी सुनाते हैं।

एक बच्ची ने ‘पूस की रात’ भी सुनाई जो मैं चाहता था बच्चें पढ़ें। प्रेमचंद की सारी कहानियाँ क्या गज़ब हैं। सच कहूँ तो प्रेमचंद से मेरी सही मुलाक़ात मेरे हिन्दी के शिक्षकों ने नहीं मेरे अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों ने करवाई। उस दिन के बाद मैं एक-एक करके प्रेमचंद की कहानियाँ पढ़ता गया और ठीक से समझ बनी तो पाया कि प्रेमचंद की कहानियों का अपना एक अर्थशास्त्र है। जैसे ‘ईदगाह’ कहानी में हामिद खिलौने के बजाए चिमटा लेकर आता है। यही तो अर्थव्यवस्था की केंद्रीय समस्या है- संसाधन सीमित हैं इसलिए चुनाव करना पड़ता है और चुनाव जरूरत को पहचान कर किया जाता है। यही तो हामिद ने भी किया।

देवी’ नाम की कहानी में देवी को जो 10 रुपये का नोट मिलता है वो उस फ़कीर को दे देती है। कहानी में ‘देवी’ अपनी जरूरतें पहचानती है और उसी अनुरूप संसाधनों का उपयोग कर रही है। शायद देवी का इशारा समतामूलक समाज की ओर है। आय का समान वितरण।

पूस की रात’ कहानी देश की उस आबादी की सच्चाई हमारे सामने रखती है जो आर्थिक रूप से आज भी व्यवस्था की गुलाम हैं। जिनके लिए कहा जाता है “भारत में छोटे किसान और मजदूर आज भी क़र्ज़ में जन्म लेते है, क़र्ज़ में जीते है और क़र्ज़ के साथ ही मरते है और सिलसिला यहाँ ख़त्म नहीं होता बल्कि क़र्ज़ चुकाने का जिम्मा अगली पीढ़ी को चला जाता है।” इस दौरान मुझे समझ आया अर्थशास्त्र का अध्ययन सिर्फ सिद्धांतों को रटा कर 100 नंबर लाने का विषय नहीं है बल्कि संसाधनों और आवश्यकताओं के प्रति समझ बनाने का सही विकल्प हैं।

मुझे प्रेमचंद की कहानियों के अर्थशास्त्र की समझ मेरे विद्यार्थियों से मिली ऐसे में इस ‘अर्थशास्त्र’ में वे मेरे ‘गुरु’ हुए। भारत में कई अर्थशास्त्री हुए जिन्होंने बड़े-बड़े पुरुस्कार जीते, ऊँचे मुकाम हासिल किए पर मुझे लगता है प्रेमचंद की कहानियों में जो अर्थशास्त्र है उसे भी टटोलकर देखा व समझा जाना चाहिए।


प्रेमचंद की कहानियों और मेरे विद्यार्थियों का सफर यहीं नहीं थमा। कुछ रोज़ बाद अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन की तरफ से प्रेमचंद की मशहूर कहानी ‘बड़े भाई साहब’ के नाट्य मंचन की सूचना मिली। नाट्य मंचन चित्तौड़गढ़ शहर के एक सभागृह में शाम 5 बजे था। मैंने सोचा बच्चों को भी इसकी सूचना देता हूँ। बारहवीं ‘बोर्ड परीक्षा’ होती है इसके चलते बहुत से बच्चों ने एक्स्ट्रा क्लास लगवा रखी थी, इसलिए असमंजस में था कि कोई रूचि लेगा या नहीं। खैर, फिर भी मैंने बच्चों को मैसेज कर दिया। शाम को पाँच बजे जब मैं सभागृह पहुँचा तो वहाँ पहले से ही सात-आठ विद्यार्थी मौजूद थे। प्रेमचंद की कहानियों का क्या खूब चस्का लगा था इन्हें। मैं मन ही मन खुश था कि इंस्टाग्राम से मेरे बच्चे लौट कर किताबों-कहानियों की तरफ आ रहे थे। बाद में बच्चे अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन चित्तौड़गढ़ इकाई की लाइब्रेरी में भी गए और इस तरह प्रेमचंद के मार्फत किताबों में उनकी रूचि जगने लगी। मेरे लिए वो पल सबसे ख़ास था जब एक बच्ची ने लाइब्रेरी की अलमारी से एक किताब निकालकर मेरी तरफ बढ़ाई और पूछा सर ये किताब कैसी है? ये पढ़ूँ क्या? वो मक्सीम गोर्की की किताब ‘माँ’ थी। मुझे एक बात का एहसास तो हो ही चला था कि मेरे ये बच्चे अब जीवन में कोई भी मुश्किल पार कर जाएँगे। इन्होंने सही राह जो पकड़ ली है। प्रेमचंद के ज़रिए अच्छी किताबों की संगत बच्चों को कहाँ ले जाएगी? यह तो भविष्य के गर्भ में है, पर मैं उनका अर्थशास्त्र का शिक्षक उनके भविष्य को लेकर आश्वस्त हूँ।

(नीमच में अध्यापन कर रहे महेंद्र नंदकिशोर प्रतिरोध का सिनेमा के चित्तौड़गढ़ चैप्टर से जुड़े हैं।)

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