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कविता जनमत

प्रतिरोध का रसायन तैयार करती उस्मान ख़ान की कविताएँ

खुशियाँ अच्छी हैं बहुत,

गर  इसमें भी अतिश्योक्ति है!

उस्मान की कविताओं का संसार, एक ऐसा संघन संसार है जहाँ एक हाथ को नहीं सूझता दूसरा हाथ और हर राह आगे बढ़ कर काट देती है दूसरी राह.

यह युवा कवि अपनी असहमति के विवेक के जरिए हमें उस संसार से अवगत करवाता है, जो मध्यमवर्गीय सुखों और दुखों से कहीं अलग हैं, जिसमें वीकेंड की खुशियों और दस से छः वाली दिनचर्या के दुख और परेशानियों के अलावा हजारों ऐसे अचिन्हित दुःख हैं, जिनका कभी किसी काल में ‘द एंड’ नहीं हुआ बल्कि वे पीढ़ी दर पीढ़ी और पुख्ता होकर हमारी मॉस-मज्जा का ऐसा सुन्न हिस्सा हो गये हैं कि अब वे हमें कहीं से भी परेशान नहीं करते.
राजनीतिक संवेदनशीलता उनकी कविताओं में कई रूपों में परिभाषित होती है. जनता वोट देकर अपना संवैधानिक कर्तव्य पूरा कर छुट्टी पा लेती है और उसे आज के तथाकथित समझदार युग में भी भोली मान कर अच्छे दिनों के आगमन का प्रलोभन दिया जा सकता है.

जबकि सच्चाई इतनी भर है कि ‘जय जवान जय किसान’ और ‘अच्छे दिन आयेंगे’ के दरमियान सिर्फ बरसाती मेंडकों की टर्र-टर्र के सिवा कुछ नहीं. आज भी बिना किसी जुर्म के कितने ही निर्दोष लोग अपने जीवन के कीमती वर्षों को जेल में गला डालने को मजबूर हैं.
मेरे मस्तिष्क रन्ध्रों पर बार-बार पड़ते हैं छटपटाते दो पैर
अपने निर्दोष होने की साक्षी देते
क्रूरता के दौर की साक्षी देते।
( कतई राजनैतिक)

राजनीति, जो हमें  लोकतंत्र के लिहाफ में लपेट कर पेश की गयी है और  सामाजिकता, जिससे हम रिश्तेदारी-नातेदारी कह कर निभा लेते है, के ढेरों अंतर्विरोध कवि के गले में अटके हुए हैं और वह किसी भी कीमत पर दुनियादारी की मीठी गोली समझ कर इन्हें निगल नहीं सकता.

दुख-सुख, नित नई उम्र, यह एक ही जनम में कई जनमों की व्यवस्था,
नित नए संघर्ष, नई जीत-हार, नए रंग, नया गुणा-भाग, नई जीवन-अवस्था।
(मैं एक बंधक विद्रोही के स्वप्न में हूँ)

प्रतिरोध का रसायन तैयार करते हुए कवि अँधेरे के अवसाद का शिकार नहीं बनता, जबकि आक्रोश का यह ज्वार हर कोमल और महीन संरचना के खिलाफ है मगर कवि के भीतर की आद्रता और आशावादिता उसे हरसंभव बचाए रखती है. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि कवि के सपनों ने देख लिया है सुबह का प्रकाश.

अपने काले अंधेरे में गिरता हूँ
फ़िर उजाले की तरह उठने के लिए
नव से नवतर होता विद्रोह
मुझे सीखाता बेहतर से बेहतर
(मैं इस पल के छोर पर)

एक निश्चित दूरी से चीज़ों को देखने के इस सलीके ने कवि को वह आँख दी है जो सूरज के उगने और चंद्रमा के निकलने तक के अन्तराल में न जाने कितने ही संघर्षों और दुखों को साफ़ देख पाती है.

सहज से दिखने वाले जीवन की न पकड़ में आने वाली जटिलता का बोध उनके मन के चारों कोनों को स्पंदित करता है. इस बोध ने कवि को भीतर-बाहर का ऐसा संसार दिखा दिया है जिसे उसका कवि-हृदय कतई महिमामंडित नहीं कर सकता.
अपनी कविताओं में समाहित जटिलताओं को  कवि ने सायास कहीं से उलीचा नहीं.

जीवन को एक खास नज़रिए से देखने और उसके प्रतिरोध ने कवि के सशक्तिकरण के दरवाज़े खोले हैं और उसे ऐसे संस्कार दिए है जिसके बूते वह आगे की दौड़ के लिए जीवन के खुले हुए तस्मों को कसने की हिम्मत रखता है और वह अकेला ही इस दौड़ का विजयी धावक नहीं बनना चाहता बल्कि वह समूची इंसानियत को आगे लेकर चलने का भी हिमायती है.
नैतिक मूल्यों के संदर्भ, कवि के यहाँ किसी काम के नहीं, क्योंकि उसका निर्वाह अनुभवजन्य सच्चाई से होता है.

वह उस दुनिया में पला बढ़ा है जहाँ बिना मेहनत स्वप्न देखने की परंपरा रही है, जहाँ प्रार्थनाओं में बूते ही आधा जीवन आसानी से कट जाया करता है. मगर कवि के करीब एक बेचैन हाहाकार की दुनिया है, जो संघर्ष के बल पर अपना जीवन यापन करना चाहती है. जबकि अब तक उसने बांच ली हैं दुःख की न जाने कितनी ही पोथियाँ.
मेरे पास
मंगतों-सी सड़क पर परेशान करती
अर्धविक्षिप्तों की कथाओं
और दुःस्वप्नों के विश्लेषणपरक लेखों के अलावा
कुछ नहीं है – मेरे गाथाकार
(अतिशयोक्तिपूर्ण)

‘मैं एक बंधक विद्रोही के स्वप्न में हूँ’ शीर्षक से लिखी गई लंबी और महत्वपूर्ण कविता, सलाखों और चारदीवारी के बीच कैद किये गए कैदी की झटपटाहट का ब्यान न होकर लोकतंत्र के एक नागरिक की झटपटाहट का हाहाकार है.
अपमानजनक संबंधों को ताउम्र निभाए रखने की मनोवैज्ञानिक दासता, जो हमें विरासत में मिली है वह भी  कवि की निगरानी पर है. सामाजिक सरोकारों के प्रति यही अत्यधिक संवेदनशीलता कवि के मन-भीतर एक ऐसा कुहासा भर देती है, जो लगातार यही प्रातिध्वनित करती है कि खुशियाँ अच्छी हैं बहुत  मगर जरूर इनमें भी अतिश्योक्ति है. ठीक वैसे ही जैसे कभी साहिर लुधियानवी ने लिखा था “ ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है.”

उस्मान ख़ान की कविताएँ

 

1 क़तई राजनैतिक

मैं देखता हूँ
अपने देश के गली-कुँचों की बदरंग दीवारें
जिनकी परछाईयाँ
ईथर की गंध में लिपटी सड़ती हैं
अँधेरे कोने में फाईलों तले खाती हैं चुहों की लेंडियाँ
मवाद की तरह हर जगह से निकाली जाती हैं
और आकाश, धरती, दृश्य सारे और सारी वस्तुएँ
एक स्याह भभके में डूब जाते हैं
और मैं इन्हें कर लेता हूँ नोट
फोटो खींच लेता हूँ इनके कभी।

अपने तहखानों में सिगरेट पीते हुए
सरकार की मुख़ालफ़त करने का शग़ल
अपने पाले में नहीं रक्खा है मैंने।
राजा को खाल दी जा सकती है, अपनी आत्मा नहीं
(अनलहक़ ! अनलहक़ ! ! अनलहक़ ! ! !)
मैंने रख दिया है अपना नाम वहाँ
जहाँ नज़रें हैं गिद्धों की।

मेरी आँखों में घुसी पड़ी हैं, एक-दूसरे में झाँकती वो आँखें
एक अँधेरी चीख़ के बाद की अँधेरी चुप्पी उगी थी जिनमें
मेरे मस्तिष्क रन्ध्रों पर बार-बार पड़ते हैं छटपटाते दो पैर
अपने निर्दोष होने की साक्षी देते
क्रूरता के दौर की साक्षी देते।

मेरे देश का उदास चेहरा
नाज़ी यातना-शिविरों पर झुकी किसी चुप शाम की तरह
मेरी मज्जा में करता है टंकित यातनाओं का उपन्यास

होता यह है कि
साँसों की सीमा के पार हो जाता है दर्द
अस्पताली गंध में लिथड़े घड़ी के काँटे
मुर्दा रात को राख करते हैं एवम्
बदबूदार कंबल की ओट में धीमे-धीमे
कोई हो जाता है ख़-त-म

मैं सुलगाता हूँ रात का बेचैन अँधेरा
और फूँकता हूँ सुब्ह तलक
आँगन में सूरज की पहली किरण
और मुँह में कसैला स्वाद
खड़े मिलते हैं साथ
और होता यह है कि
मेरी रोटी पर
अपना जूता रख देता है कोई
जब-तब मुझे नंगा कर देता है कोई
सड़क पर या जेल में
बार-बार
मुझे आँखे नीची करने को कहता है कोई
और एक ही जुर्म की सज़ा में
बार-बार
मेरी खाल खिंचवायी जाती है

और मैं इन्हें कर लेता हूँ नोट
फोटो खींच लेता हूँ इनके कभी।

मेरी कविताएँ ये नोट, ये फोटो हैं बस,
और ये नोट, ये फोटो राजनैतिक हैं क़तई
क्योंकि, कविता में संभव है उदासी
उदासीनता बिल्कुल नहीं।

2.मैं एक बंधक विद्रोही के स्वप्न में हूँ


यह एक स्वप्न है, एक महामायामय मज़बूत उत्तेजित यातनागृह है,
निशाचर-क्रीडा बाहर, बंधक क्लांत, सतर्क, स्व-निमग्न है, निस्पृह है।

वन-प्रांतर हूँकते, सियाह होती एक-एक तस्वीर, संवलाती एक-एक पीर,
श्वास-प्रश्वास, लोहे के बंधनों के स्वर, पीड़ा-विद्ध-चेतस-सिद्ध-शरीर।

सम्पूर्ण होती स्मृति, मनन की नोक तीखी, भीतर करती स्थीर रक्त-चाप,
लावा नसों में बहता, और कभी नदी का किनारा दिखता, चेहरे पर ताप।

विचार-श्रंखला बनती जाती, पीड़ा खोती जाती, अनुभव होते और कठोर,
आशा जागती, अंधेरे का सीना भेदकर, अब कि तब आती ही है भोर।

यह दुख-सुख, नित नई उम्र, यह एक ही जनम में कई जनमों की व्यवस्था,
नित नए संघर्ष, नई जीत-हार, नए रंग, नया गुणा-भाग, नई जीवन-अवस्था।

जीवन स्वतःस्फूर्त – घृणा और प्रेम, हिंसा और शांति – बहुरूप अग्नि-प्रेरक वह
आशा-निराशा के गर्तों में, एकांत और सभा में, विषयासक्त, खूबसूरत और दुसह।

सभ्यता की चीखें निकलती हैं कई सतहें पार करती, पृथ्वी के क्रोड से, अचानक,
जैसे किसी प्रसूति-गृह के उजाले में चीखती है कोई तरुणी जी तोड़ के, अचानक।

लेकिन सुलगते इस भव्य-राज-दरबार में, यह कौन स्वर्ण-आभूषित सिंहासन-आरूढ़,
यह कौन वीभत्स-संसार रचता भीतर ही भीतर? राज्य-रहस्य! क्या वह गूढ या मैं मूढ़!

मैं हर विस्तार से चौंकता, हर सूक्ष्मता से हैरान, उसके भीतर एक दर्द-सा क़ैद हूँ,
मैं उसके बाहर उसे देख सकता हूँ, उसके मन की किसी एक सतह का एक भेद हूँ।
१०
ढोंग-धतूरे के पार, रहस्यों का अंत हुआ, आत्मा के परखच्चे उड़े, परम-आत्मा भी भस्म हुई,
उसने फ़ोकस देखा, सेकंड का काँटा, फ़िर समय या जीवन टटोलने के लिए अपनी नब्ज़ छुई।
११
इस जगह या उस जगह, इस या उस कारण से, इस पल या उस पल, जीवन का अंत निश्चित है,
पर जंगलों में अकेले भटकते अपनी जड़ों को छूना इस पल सुखद है, मन जगमग है, विस्मित है।
१२
सफ़ेद फूल हैं विशालकाय पवन चक्की के साए में, मई की धूप में खिले हुए पठार पर, शांत
इस पल और उस पल के बीच वह कि दर्द, फ्रेसनेल लेंटर्न उसकी आँखों की किनार पर, शांत।
१३
महाकार, टेढ़ी-मेढ़ी, आसमान की ओर बढ़ती, लोहा, पत्थर और काँच खाती इमारतें,
सूरज की किरणें अपना रस्ता बनाती हैं इन गलियों में, बचते हुए बहुत ध्यान से।
१४
पानी ज़हरीला है, हवा ज़हरीली, ग़ुलाम खुश हैं, जंतर-मंतर, चक्रव्यूह है, तम-संजाल है,
संत हैं, बेरोज़गार हैं, वैश्याएँ हैं, मज़दूर हैं, मालकिन और उसका पति है, जंजाल है।
१५
इन गुफाओं में, इंटरनेटधारी सीलन छाए तंग कमरों में, अकेली व्याकुल विकृतियाँ मंडराती हैं,
कभी साइबर स्पेस में, कभी रसोई में, कभी बाथरूम में, कभी छत पर आती हैं – जाती हैं।
१६
हँसी और चीखें – पड़ोस में होती पार्टी पर सोचती कोई रोशनदान को घूरती है देर तक गुस्से में,
अस्तित्त्व या बेवफ़ाई पर सोचता कोई करता है हस्तमैथुन ग्लानि में, हताशा में, अपलक गुस्से में।
१७
शरीर पर चिपकती जाती धूल और पसीने की तरह, चमकती शीशेदार क्रूर-वीभत्स बनावटें दिन-भर,
वे असंख्य अकेले अजनबी शहर में भटकते, उम्मीद का गुब्बारा रखे अनिश्चित भविष्य की नोंक पर।
१८
वे रोटी और इज्ज़त की तलाश में, वे बच्चे, उन्मादी जुलूस के निर्माता, वे ज़माने को असह्य
भूखे और अपमानित, भ्रमित, कुंठित, नागरिक, अशिक्षित-अर्धशिक्षित, सरकारों के लिए अवह्य।
१९
मैं उनके बीच, उनका, वे मेरे जन्म का कारण, मेरे दुख का निवारण करने वाले, मेरे अपने,
वे अकेलेपन से घबराए हुए हैं, वे सोचते अन्याय के अंत के बारे में, वे निराले, मेरे अपने।
२०
सोचता हूँ, ऐसी स्थितियों के मध्य, इन संघर्षों बीच, वह सहज महासुख कैसे हुआ जाग्रत,
वह ज़िंदगी का आकर्षण तीखा, वह आशा भरा आकाश, वह विजय या मृत्यु का एकव्रत।
२१
यह निरंतर तेज़ होता संघर्ष, लगातार रास्ता उभरता, अंधेरे के आवर्त तोड़ता मन –
प्रकाशमय होता, सत्य और साहस का धारक, अमीरों का खटका, गरीबों का हमवतन।
२२
महासंपत्तिशालियों के झगड़ों में अन्याय, आतंक और अविश्वास की दुनिया बनती जाती है,
पृथ्वी का विनाश रोकने में संपत्तिहीनों की प्रार्थना विफल और हास्यास्पद नज़र आती है।
२३
ऐसे में, कोई ग़ुलाम बाग़ी हो जाता है, गिरोह बनाता है, हमले करता है मालिकों पर ही,
वह जो सितारे सी चमकती है एक आवाज़ संगीनों के साए में बदले और बदलाव की।
२४
वह जो एक मारी गई थी, जिसने अन्याय के समक्ष समर्पण की राह नहीं ली थी,
वह विद्रोह की प्रतीक थी, उसकी हत्या चुनौती थी, खुबसूरती को खौफ़ की चुनौती।
२५
मैंने वह चुनौती स्वीकार की, आगे बढ़कर, बेझिझक मैंने ख़ुद को आग में झोंक दिया,
मैंने शक्तिशालियों की क्रूरता के विरुद्ध शक्तिहीन के संघर्ष का पक्ष आत्मसात किया।
२६
इस वन में अकेले हिंस्र-पशुओं के मध्य मैं दृढ़ हूँ अपने वचन पर, निश्चित हूँ,
खुश हूँ जीवन की संभावनाओं से, घायल हूँ – लेकिन अविजित हूँ, अशंकित हूँ।
२७
मौन अपनी स्मृतियाँ स्निग्ध करता, अपना पक्ष स्पष्ट, अपने तर्क तेज़,
अपनी विकृतियों का विश्लेषक-संश्लेषक, अपनी बनाई दुनिया का रंगरेज़।
२८
दुखती आँखों को मीचता, अपनी बेड़ियों को माथे से छूता, वह मुसकुराता है,
जैसे आने वाले तमाम वक़्तों से जांविदानी का आशीर्वाद पाता है।
२९
वह किसीकी बात सुनता है, गुनता है, प्यार से किसी के सलोने हाथ चुमता है,
यातनागृह में पहुँची नई सामग्रियों से अनजान, वह सड़क पर आवारा घूमता है।
३०
रात की गहराई में परिताप चुप, संताप चुप, सैनिकों की पद-चाप चुप,
अंधेरा घूप, अंध-कूप जैसे – पर हँसी, बातचीत, सड़क और कड़क धूप।
३१
क्या करते हैं विद्रोह के सहभागी? क्या मुर्दा ठंडक से भर जाएगा यह देश-काल,
क्या आग और भड़की? नए संघर्ष की दिशा क्या? नई स्थितियों के नए सवाल।
३२
उसने विद्रोह किया है, दर्द सहा है, सच के लिए सूली को स्वीकार किया है,
उसने बिजली के पहाड़ों पर सपने बोए हैं, उसने विद्रोहियों को तैयार किया है।
३३
वह दुनिया को बदल देना चाहता है, किसी भी तरह से, उत्पीड़ितों के पक्ष में,
वह इस अत्याधुनिक यातनागृह में, आदिम सीली गुफ़ा में, इलेक्ट्रिक कक्ष में।
३४
वह अपनी हर साँस, अपनी सारी क्षमता, युद्ध की आग में डालता जाता है,
वह, क्रूरता और घृणा पर ज्ञान और प्रेम की जीत में, विश्वास जताता है।
३५
अपनी मृत्यु पर नहीं, अपने जीवन और सपनों पर, धूप-छांव की सड़क पर,
वह सोचता है अलग-अलग सीरे पकड़कर, जात, धर्म, भाषा, मनुष्य, रोबोट, ईश्वर।
३६
वे कौन जो हर सुबह, हर रात, दिल कड़ा कर, चौराहे पर ख़ुद का सौदा करते हैं,
वे कौन, जो अक्सर भूखे सो जाते हैं, वे कौन, जो अस्पतालों में बेइलाज मरते हैं।
३७
फिर वे कौन, मेहनत के लुटेरे, मुनाफाखोर, ज़माने के ख़ुदा, ईश्वर के अवतार,
वे कौन, अय्याश, हिंसक, महाक्रूर, जिनके लिए विनोद हत्या और बलात्कार।
३८
वे कौन, भयभीत-शंकित, जो सपने देखने वालों की आंखे फोड़ देते हैं,
वे आत्म-मुग्ध, तानाशाह, जो अलग सोचने वालों के सिर तोड़ देते हैं।
३९
इस घमासान युद्ध में, बाहर-भीतर के संघर्ष में, अपना पक्ष तैयार करना,
ज़िंदगी को खुबसूरत बनाना कितना कठिन है, कितना कठिन है प्यार करना।
४०
पर डरकर, अपमान सहकर जीने से मौत बेहतर, जो जैसी चुने ज़िंदगी, वैसी जीए!
जैसे बहती है नदी, जैसे उड़ते हैं पंछी, जैसे हँसते हैं बच्चे, जैसे जलते हैं दीए।
४१
अंधेरा ओढ़े बैठे सन्नाटे में, बूटों की बढ़ती आहटें सुनकर, वह सतर्क हो जाता है,
आँखें खोल दीवारें देखता है, बेड़ियों को अपने माथे से लगाता है, ख़ुद को उठाता है।
४२
मैं हूँ, वह है, बूटों की आवाज़ें हैं – हत्या, बलात्कार, प्रतिरोध और शहादत के दरमियान,
इस इलेक्ट्रिक कक्ष में, हिंस्र-पशुओं के सामने, मैं नारा उठाता हूँ इंकलाब का – सीना तान –
४३
वह उठता है, कुछ देर फ़र्श और सलाखों पर ख़ून के धब्बे देखता है, बैठ जाता है,
शायद सपना ही था, बेड़ियाँ हामी भरती हैं, फ़िलहाल, कोई इधर नहीं आता है।
४४
तीखे उजाले में पीघलते हैं हिंस्र-पशु मेरी प्रतीक्षा में, बाक़ी बस सड़क-सी भीत है,
कोई पीड़ा अपने बंधन तोड़ देती है, मूर्छा का अंधेरा है, मुक्ति की अपनी रीत है।
४५
शायद सपना ही था, वह अकेला इस प्रकाशमय यातनागृह में श्रंखला-बद्ध निढाल पड़ा है,
वह अकेला अपने पीड़ा-विद्ध-चेतस-सिद्ध शरीर को पहचानता, चिलकते आईने में जड़ा है।

3. मैं इस पल के छोर पर

मैं इस पल के छोर पर
सभ्यताओं का टूटना देखता हूँ
देखता हूँ
उद्दाम लहरें टकरा रही हैं
अत्याधुनिक
नव से नवतर साम्राज्यों के
प्रतिकों, चिह्नों, स्थापनाओं से
ग़ुलाम हिसाब साफ़ कर रहे हैं आक़ाओं से
भूत-भविष्य-वर्तमान इस वेला में कुछ नहीं
भूल-भुलय्या में हर संज्ञा
नए बंधन में बंधते संबंध सारे
उंच-नीच, आगे-पीछे और दाएँ-बाएँ के
शाम होती है आज़ाद सदियों में कभी
जैसे इस पल, अभी…
मैं इस पल के छोर पर
जहाँ तथाकथित जीवन का गणित
गड़बड़ा जाता है
जहाँ लाखों मृत और घायल
अपनी स्वप्न-पूर्ति चाहते हैं
जीवितों से तुरंत, इसी पल
सेहत-स्फूर्ति चाहते हैं
अपने काले अंधेरे में गिरता हूँ
फ़िर उजाले की तरह उठने के लिए
नव से नवतर होता विद्रोह
मुझे सीखाता बेहतर से बेहतर
सम्राटों के मुकुटों पर
चिंगारियाँ उचटती
शंकित-भयभीत अपने पूर्वजों को पुकारते
वे दुःस्वप्नग्रस्त
अपनी ही खूंखारी से त्रस्त
उच्च-स्नायविक दौरे में
करते अपने अचूक मंत्रों का जाप
अपना ही नाम चिल्लाते दाँत पीस-पीस
फ़ासीवादी प्रलाप
मैं ख़ुश मगर इस शाम
देखता हूँ महासंग्राम
संक्रांति…

4. एकांता

एकांता,
तुम्हीं करो नोट
मेरे विचार
तो बेहतर,
बेहतरीन और
अगर दोहरा दो केवल क्रम
कल्पनाओं-विचार-लहरों का
लिखते समय।
धूप नहीं,
चाँद नहीं,
नहीं प्रिया,
तुम पूरी की पूरी तुम,
तुम्हें उकेरना चाहता हूँ हिमालय की किसी
सूनी मज़बूत चट्टान पर –
ज़ख़्मों के मूर्त रूप वे
सोचे-समझे ढाले गए
नारों की तरह।
तुम अपने अँधेरे गर्तों में
मुझे गुम कर दो,
मैं तुम्हारे अलावा और किसी का अस्तित्त्व
अब नहीं कर सकता बर्दाश्त।
पर तुम बड़े खोटे हो,
संवाद को शील-भंग मान बैठे हो,
हे तेजस्वी, महाआक्रांता!
गढ़-प्रवेश का प्रथम क्षण
तुम्हारी प्रतीक्षा में खड़ा है।
ये जन अब तुम्हारे जन हैं,
‘मेरे जन!’।
ये नदी अब तुम्हारी माता है,
ये पर्वत ही पिता।
ये नन्हें मनुष्य अब तुम्हें बड़ा करेंगे,
हर आकाश में।
ये खेत अब तुम्हारा पसीना माँगते हैं।
ये सड़कें तुम्हारे पैरों के निशान चाहती है।
ये सब तुम हो,
दुकानों में लटके हुए,
बसों में कुचले हुए,
पानी के लिए लड़ते हुए,
बे-ईलाज मरते हुए,
तुम हो ये सब।
तुम पथ-भ्रांता!

5. मरीज़ का नाम

चाहता हूँ
किसी शाम तुम्हें गले लगाकर खूब रोना
लेकिन मेरे सपनों में भी वो दिन नहीं ढलता
जिसके आखरी सिरे पर तुमसे गले मिलने की शाम रखी है

सुनता हूँ
कि एक नये कवि को भी तुमसे इश्क है
मैं उससे इश्क करने लगा हूँ

मेरे सारे दुःस्वप्नों के बयान तुम्हारे पास हैं
और तुम्हारे सारे आत्मालाप मैंने टेप किए हैं

मैं साइक्रेटिस्ट की तरफ देखता हूँ
वो तुम्हारी तरफ
और तुम मेरी तरफ
और हम तीनों भूल जाते हैं – मरीज़ का नाम!

6. अतिशयोक्तिपूर्ण

मेरे पास
मंगतों-सी सड़क पर परेशान करती
अर्धविक्षिप्तों की कथाओं
और दुःस्वप्नों के विष्लेषणपरक लेखों के अलावा
कुछ नहीं है – मेरे गाथाकार
तुम मेरे इश्क का क़िस्सा सुनाते आए हो,
तुम मेरे इश्क का क़िस्सा, अब, कैसे सुनाओगे !
कैसे सुनाओगे उस रात की हाय-हाय,
जब मेरे महबूब की उँगली, पिरामिड के
उस तीकोने पत्थर ने कुचल दी थी –
भच्च!!

चाँद का हाला तड़क गया था –
कच्च!!

मेरे इश्क के क़िस्से में,
क्या शाही हँसी का बयान नहीं होगा – अतिशयोक्तिपूर्ण!

 

(कवि  उस्मान खान है, कविता, कहानी, डायरी, आलोचना विधा में दखल में दखल रखते हैं। जे एन यू के हिंदी विभाग से मालवा के लोक-साहित्य पर पी.
एच. डी. इन दिनों रतलाम के एक महाविद्यालय में शिक्षक हैं.
संपर्क : [email protected]
टिप्पणीकार कवयित्री विपिन चौधरी समकालीन स्त्री कविता का जाना-माना नाम हैं। वह एक कवयित्री होने के साथ-साथ कथाकार, अनुवादक और फ्रीलांस पत्रकार भी हैं.)

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