समकालीन जनमत
कहानी

‘रोटी के चार हर्फ़’ सामायिक घटनाओं और सामाजिक विभेद की सरोकारी रचना है

गति उपाध्याय


“रोटी के चार हर्फ़ ” सिर्फ एक कहानी ही नहीं बल्कि एक कथाचित्र है | कहानी पाठकों के दिलदिमाग़ में चित्र खींचती है | ऐसी कितनी ही घटनाएं जो हमारे आंखों के सामने रोज़  घटित होती हैं पर हमारे हृदय के डार्टबोर्ड को बिना बेधे दाएं-बाएं से निकल जातीं हैं | “हमसे क्या” और “अपने काम से काम ” वाली सोच ने जीवन सरल तो किया है पर मानवता निगल ली है | प्रेम की जगह भय और संदेह ने ले ली है, इंसान इतना भयभीत है कि किसी के दु:ख से और दुखी नहीं होना चाहता वहीं लेखक की सूक्ष्म दृष्टि और संवेदना, चिंतन में गहरे तक उतर जाती है |
एक मजबूर बच्चे के प्रवासी मजदूर बन जाने की घटना है पूरी कहानी | साधारण से विषय पर लिखी गई असाधारण कहानी दर्ज करती है कि  रोज़ी और रोटी की ज़द्दोज़हद क्या है।
रोटी की महक रोटी का स्वाद  चपाती वाले प्रदेश क्या दे सकेंगे? “जैसा अन्न वैसा मन” वाले देश में जब कोल्हू के बैल जैसे खटकर भी अपना प्रिय भोजन न मिले तो हर निवाले के साथ मन कसैला हो जाता है |
कहानी कभी लेखक की महसूस की गयी तो कभी पूरे समाज की लगती है, समाज के उस वर्ग की जो हर वक्त सफ़र में रहा है |
ऐसे पाठक जिन्होंने न गाँव देखें हैं ना जिया है उनके लिए ऐसी कृतियां ना हो तो कौन महसूस कराएगा कि एक गांव था जो नहीं रहा… एक नानी है जो दिन भर की मेहनत मज़दूरी के बाद इतना थक जाती है कि अपने नाती को कोई कहानी सुनाकर सुलाना भी अब सम्भव नहीं रहा।
गांव की सहकारिता पर शहरों की रवायतों ने सेंध लगाया है हर किसी की आंखों ने ऐसे बेचारे नाती देखे होंगे वक्त जिन पर बहुत बेरहम था पर लेखक ने उस नाती की वेदना न सिर्फ ज़ज़्ब की बल्कि अपने क़लम में ज़ब्त भी की है |
कहानी का सबसे मार्मिक दृश्य है बुढ़िया नानी की नाती के लिए उपजी करुणा जिसमें वो मरी हुई बेटी को नाती का क़ुसूरवार मानती है और बड़बड़ाती है
– “गेय बीमारयाही… क्या सोचकर चली गयी… आ कर देख यहाँ क्या हो रहा “
 “आँखें बंद कर लेने से भी दिखना कहां बंद होता है ” -लेखक का अंतर्द्वन्द्व |
 “एक मजबूर घर के पास कोई ना कोई बड़ा अहाता ज़रूर होता है उस अहाते में विस्तार की प्रबल लालसा होती है” -वर्गवाद का वास्तविक बिम्ब है |
ये पंक्ति पड़ोसी अमीर साहूकार अड़ोसी ग़रीब निरीह की ज़मीन को अपने अहाते में मिलाने की बेचैनी को दिखाती  है |
“नानी का कड़वा तेल छू लेने भर से चिल्लाने लगना”… उफ़्फ़ ज़िन्दगी की ये ज़द्दोज़हद और ये चक्कलस !!
नानी मरने के बाद स्वर्ग में सुख से होगी, फटी साड़ियों से अब उसे निजात मिली होगी, स्वर्ग के सुख की कल्पना कैसे इहलोक के दु:खों को हर लेती है अचानक से नाती का सोचना “बुढ़िया ऊपर भी तो लकड़ी नहीं बिन रही होगी “बालमन का सफल चित्रण है |
आलोक के पास अद्भुत शब्द भंडार है जिनसे आटे और पानी से बने दैनिक खाद्य रोटी की मिठास बिना घी-शक़्कर के पाठकों तक पहुंचाने में सफ़ल रहें हैं | अपने शब्दों से अलोक तरह-तरह के बिंब रचने में सफल रहे हैं –
आसमान का रंग बिखर रहा था जैसे उसके साँवलेपन में माँ की खूनी उल्टियाँ मिल रही हो।
यादों के ईंधन से बस चल रही हो जैसे |
केवल नानी ही नहीं मरी उसकी (नाती की )पहचान भी मर गई |
चापाकल की आवाज़ सी नानी की खाँसी की सों-सों की आवाज़ |
मौखिक  अपमान को झाड़ देना किसी ने सिखाया ही नहीं|
आत्मा को धक्का लगना|
गाँव सोता रहा |
जैसे तमाम वाक्य लेखकीय कुशलता दर्शाते हैं |
बाईमार, नघी-नघी हिन्दी शब्दों के मलयाली उच्चारण के साथ
भीत का घर, खदकना, ज़ारो-कतार, गप्प सड़क्का , चापाकल, सपासप दुआली का चलना, नानी की सारा जैसे शब्द आँचलिकता का पुट डालकर कहानी को पुष्ट और सामर्थ्यवान बनाते हैं |
वर्गीय भेदभाव के साथ साथ भाषा और खानपान की लड़ाई प्रवासी मजदूरों के जीवन को और जटिल बनाती है। ग़ौर करने वाली बात है कि नानी और नाती का कहानी में कोई नाम नहीं |अभागो का कोई नाम कहां होता है?  अभागी ग़रीब रियाया की बस तकदीर होती है जिनको पढ़ाई से अधिक नीरस और बतकही से अधिक सरस कुछ भी नहीं लगता।
कहानी सवाल पूछती है ऐसे अभागे नातियों के भविष्य के…कंडक्टर प्रतीक है पब्लिक डीलिंग में बैठे तमाम मुलाज़िमों का जो आवेश के किसी क्षण में अन्याय तो कर बैठते हैं पर अगले ही क्षण जनता के डर से या कि ऊपर वाले के डर से उसको सुधारने में त्वरित तत्पर हो जाते हैं काश ऐसी कोई व्यवस्था होती जहाँ सरकारें भी अपने किये गलतियों को सुधार लेतीं !
और आख़िरी में वो संवेदना, वो आर्तनाद, वो करुणा जो बिनावज़ह किसी मजदूर के मुंह से निवाला छीन जाने पर आती है, सबका हृदय द्रवित कर पाठकों को भी झिंझोड़ देती है |
सामायिक घटनाओं और सामाजिक विभेद की सरोकारी रचना है “रोटी के चार हर्फ़” रोज़ी और रोटी के इतने सूक्ष्म अवलोकन हेतु आलोक को साधुवाद !
कहानी पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें (साभार पहल पत्रिका)

 

(कहानीकार आलोक रंजन, चर्चित यात्रा लेखक हैं, केरल में अध्यापन,  यात्रा की किताब ‘सियाहत’ के लिए भरतीय ज्ञानपीठ का 2017 का नवलेखन पुरस्कार ।)

समीक्षक गति उपाध्याय
जन्मतिथि – 21.09.1981
मोबाइल – 9140898758
ई मेल [email protected]
मिर्ज़ापुर (उत्तर प्रदेश )
(स्वतंत्र लेखन)
पूर्व बैंककर्मी (MBA, MA, B.Ed)
कई पत्र पत्रिकाओं में कविताएँ, समीक्षाएँ और लेख प्रकाशित

मार्च 2019 से में शौक़िया लेखन और अप्रैल 2020 से कविताएं लिखना शुरू किया |)

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