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कविता

अर्चना लार्क की कविताओं में समकाल की बारीक़ परख है

निरंजन श्रोत्रिय


युवा कवयित्री अर्चना लार्क की काव्य संवेदना का पाट व्यापक है। वे अपनी संवेदना के विस्तृत परिसर में हर जीवंत घटना को समेट लेना चाहती हैं-घर की मेड से लेकर शोकसभा के एक मिनट के मौन तक।
वे अपनी बात बहुत साफगोई से कविता में रखती हैं। बगैर अनावश्यक अमूर्तता के उनकी काव्य भाषा के मन्तव्य स्पष्ट हैं। ‘युद्ध के बाद की शांति’ कविता में विभीषिका और उसके उत्तरवर्ती माहौल पर तीखी टिप्पणियाँ हैं।
हमारे समय के नाजुक और नफ़ीस को हिंसा की लगी नज़र से कवयित्री व्यथित है। ‘अंधापन फैल चुका है’ कविता समकाल पर एक गम्भीर बयान है। अवसान के गर्त में जा रहे समय-समाज की गति पहचानती कवयित्री यहाँ अपनी स्पष्ट दृष्टि का पता देती है-‘सच भरभरा कर गिर गया है/ ‘हाँ’ को बरी और ‘ना’ को नज़रबंद किया गया है।’
‘कलाकार’ कविता में सर्जक का द्वन्द्व और संघर्ष है। यहाँ कलाकार के ईश्वर होने और हमारे उदास समय में ईश्वर के मरने की करूण दास्तान है। ‘स्त्री की आवाज’ एक विशुद्ध राजनीतिक कविता है जिसमें वंचितों की पीड़ा, उनके संघर्ष को आवाज़ दी गई है।
यहाँ रेखांकित करने योग्य यह है कि दमन के विरूद्ध बुलंद इस आवाज़ में स्त्री-स्वर प्रमुख है। शाहीनबाग के माध्यम से स्त्रियों की तेजस्विता उभारती यह कविता स्त्री के संघर्ष के पक्ष में खड़ी है। ‘जिससे सिसकती है फसल की खुशबू’ और ‘कट्टरता एक मनोरोग’ कविताओं में धर्मोन्माद, धार्मिक पाखण्ड और नफ़रत को उजागर किया गया है।
अहिंसा का नकाब ओढ़े मनुष्य अपनी प्रकृति में कितना हिंसक है, ये कविताएँ बताती हैं। ‘राख हो चुकी लड़की’ एक छोटी लेकिन मार्मिक कविता है जिसमें स्त्री के दमन-शोषण और उसकी जिजीविषा को केन्द्र में रखा गया है। सच है, किसी को पत्थर या राख में तब्दील कर देने से उसका विमर्श खत्म नहीं हो जाता।
‘प्यारी लड़कियों’ औरत की वास्तविक आजादी की कविता है। उनका होना अपने आप में एक उत्सव है। तुम लिखो, तुम बोलो, तुम खुल कर जियो/ तुम्हारे डायरी के पन्ने किसी कोने में/आँसुओं से भीगने के लिए नहीं हैं।’
‘बेटी का कमरा’ एक मार्मिक कविता है जिसमें ससुराल गई बेटी की आत्मीय स्मृतियाँ हैं। माँ और बेटी का स्नेहिल रिश्ता एक नर्म-नाजुक अहसास की तरह पूरी कविता में व्याप्त है।
‘एक मिनट का खेल’ एक पृथक भाव-भूमि की कविता है जिसमें जीवन की नश्वरता पर एक तंज़ है। ‘होना होगा’ कविता दरअसल शब्द की ताकत की कविता है। सही जगह पर मौजूद शब्द एक अलग ही अर्थ-सृष्टि रचता है।
‘त्रिया चरित्रं…देवौ ना जानाति’ जैसी छोटी कविता एक वृहद स्त्री-विमर्श रचती है। परम्परा और संस्कार की बेड़ियों में जकड़ी औरत की व्यथा को बयां करती है यह कविता। ‘नाक और बेटी’ शृंखला की दोनों कविताएँ हमारे समाज में औरत को देखने के नजरिए का कड़वा सच है। यहाँ बेटी स्त्री के रूप में वे तीखे सवाल कर रही है जिसके जवाब कहीं नहीं हैं-‘कोई तो बताओ/ एक लड़की के चलने, बोलने, लिखने, प्रेम करने या फिर एक लड़की के होने में/ नाक का क्या सम्बंध ??’
‘विमर्शों से बाहर वो मेड हैं’ कविता में नौकरानी के घर-संसार के बहाने निम्नवर्ग के अभावों और संघर्षों की तस्वीर है। अर्चना लार्क एक संभावनाशील युवा कवयित्री हैं जिनके पास गहन संवेदना, समर्थ काव्य भाषा और स्पष्ट मन्तव्य है।
अर्चना लार्क की कविताएँ
1. युद्ध के बाद की शांति
पृथ्वी सुबक रही थी
खून के धब्बे पछीटे जा रहे थे
न्याय व्यवस्था की चाल डगमग थी
युद्ध के बीच शांति खोजते हुए
हम घर से घाट उतार दिये गये थे
वह वसंत जिसमें सपने रंगीन दिखाई दिये थे
बचा था सिर्फ स्याह रंग में
खून के धब्बे मिटाए जा चुके थे
पता नहीं क्या था
जिसकी कीमत चुकानी पड़ रही थी
चुकाना महँगा पड़ा था
हर किसी की बोली लग रही थी
हर चीज़ की कीमत आंक दी गई थी
हम कुछ भी चुका नहीं पा रहे थे
सपने में रोज़ एक बच्चा दिखता था
जो समुद्र के किनारे औंधे मुँह पड़ा था
एक बच्चा खाने को कुछ मांग रहा था
तमाम बच्चे अपनों से मिलने के लिए
मिन्नतें कर रहे थे
उसे युद्ध के बाद की शांति कहा जाता था
दो खरगोश थे उनकी आँखें फूट गईं थीं
एक नौजवान अपनी बच्ची से कह रहा था
मुझ जैसी मत बनना
मजबूत बनना मेरी बच्ची
यह वह वक्त था
जब प्रेमियों ने धोखा देना सीख लिया था
खाप पंचायतें बढ़ती जा रही थीं
उस दिन मेरी फोटोग्राफी को पुरस्कार मिला था
मेरी गिरफ्तारी सुनिश्चित हो चुकी थी
मैंने यह कोई सपना नहीं
मेरे होने की कीमत है जिसे मुझे चुकाना है।
2. अंधापन फैल चुका है
हम कितनी जल्दी में हैं नष्ट होने को आतुर
हुंकारते सींग मारते घुसे जा रहे मनमाने
कीचड़ हो गए विचार बिक गए चौथे खम्भे से
शब्दों के सौदागरों की राय है
कि मनुष्य न बचे रहे
बेशक मंदी छाई हो
लेकिन झंडा ऊँचा है
झंडाबरदार अँधेरे में तीर चलाते
सम्मोहन के खतरनाक पड़ाव के पार हैं
उनकी मृत्यु भी अब स्थगित है
सुना है अंधापन फैल चुका है इलाके में
बहरेपन ने दस्तक दी है
रिश्तों और विचारों का मातम मन रहा
सच भरभराकर गिर गया है
‘हाँ’ को बरी
और ‘ना’ को नज़रबंद किया गया है
अक्षर और शब्द हड़ताल पर हैं
जागो आगे तुम्हारा भी नम्बर आएगा।
3. कलाकार
कलाकार जब लिखता है प्यार
तो कितनी ही कटूक्तियों से दो चार हुआ रहता है
जब वह लिखता है आजादी
तो जानता है उनके कैसे-कैसे फरमान हैं
जिनसे मुक्ति की कोशिश में है कला
वह सुनता है धार्मिक नारों के बीच बजबजाती हुई
उनकी आवाज़
उनके थूथन की सड़न को धोने में काम आता है उसका प्यार
कलाकार होता जाता है ईश्वर का दूसरा नाम
हर बार
वह जानता है प्यार ही है जो बचता है ज़रा-सा भीतर
लोगों की मुस्कानों में तेवर में
उदास होता जाता है कलाकार रोज़-ब-रोज़
हर किसी के भीतर मरता रहता है एक ईश्वर।
4. स्त्री की आवाज़
जब तुम जनेऊ लपेट रहे थे
कुछ दूर एक सुंदर बच्चा अपने होने की गवाही दे रहा था
जब मंत्रों की बौछार के बीच
तुम भाग्य का ठप्पा लगा रहे थे
कुछ दूर वह बच्चा संघर्ष का पहला पाठ पढ़ रहा था
जब तुम अपने नाकारापन पर गंगाजल छिड़क रहे थे
और उस बच्चे को हर कहीं रोक रहे थे
तुम्हारी मूर्खता तुम्हारी चोटी की तरह लहरा रही थी
तुम उसकी बुद्धि को पहचानने से इनकार करते रहे
वह कोई एकलव्य या उसका वंशज रोहित वेमुला
तुमने कहा वे चहारदीवारी के अंदर नहीं आ सकते
अपने स्वार्थ से समय को सिद्ध करते हुए
तुमने उन्हें अपनी थालियों से दूर रखा
कुर्सी पर विराजमान तुम
उन्हें अपने पैरों के पास बिठाने को क्रांति समझते रहे
तुम स्त्रियों को कभी राख तो कभी पत्थर बनाते चलते रहे
तुम्हारा पुरूषत्व उन पर गुर्राता रहा
फिर एक दिन तुमने कहा कि घर ही खाली कर दो!
तुम्हारे खड़ाऊँ तुम्हारी धोती तुम्हारा अंगोछा जनेऊ
मस्तक पर उभरा हुआ चंदन तुम्हारा भोजन
सब उनका श्रम है
तुम नंगे हो अपनी जाति अपने प्रतीकों अपने धर्म के भीतर
‘तुम विधर्मी ँसब गद्दार हो’ कहने वाले तुम
ज़रा नज़रें घुमा कर देखो एक लम्बी कतार है
सौंदर्य से भरा हुआ एक शाहीन बार
सुनो वे आँखें तुमसे क्या कह रही हैं?
मैंने अभी-अभी सुना-‘हिटलर गो बैक’
और सबसे ऊँची आवाज़ उस स्त्री की है
जिसे तुम अपने शास्त्रों के खौलते हुए तेल में
डुबोते रहे थे बार-बार।
5. जिससे सिसकती है फसल की खुशबू
वह समय के पहिए में छेद करता
धीरे-धीरे पैर गड़ाता है
कर्कशता से भिन्नाता कोई नारा है
जिसकी ध्वनि तरंगें भेद रही चहुँ देश
उसने भरी फौज को अंधा-बहरा बनाते
बंदूकों की नली को अपने आदेश के पहर में बाँध रखा है
देखते-देखते हमारे रक्षक घुटनों के बल बैठे निरीह हो रहे हैं
उसके दिमाग की सनक आँखों तक आती
हाथों से होती
सीने पर प्रहार करती है
खून से भर जाता है शरीर
ये सब धीरे-धीरे तय होता है
वह दुधमुँहा अहिंसक गौ पालक
बना अट्टहास करता है
जिससे सिसकती है फसल की खुशबू
माँ की लोरी
प्रेमियों का प्रेम
देश प्रेम।
6. कट्टरता एक मनोरोग
गोली चलाता हत्यारा
अक्सर कहता है उसे शोर पसंद नहीं
अहिंसा ही जीवन उसका
रघुपति राघव राजा राम सबको सन्मति दे भगवान
को सोते हुए गाता है
गाली, बंदूक से शांति फैलाना
मकसद है मेरा
पुरूष के बायोलॉजिकल नीड कंट्रोल नहीं हो पाते
कहता
स्त्रियों का रक्षक बनना चाहता है
वह एक विक्षिप्त मनोरोगी बना
अपने ईश्वर का शांतिदूत है
जिससे पूरी सृष्टि आतंकित है
उसने हर बार मनुष्य रहने का अपना पाठ पढ़ाया
बाहें पसारकर बोला आओ गले मिलें ईद मनाएँ, होली खेलें।
7. राख हो चुकी लड़की
शब्द शून्य हो रहे
आवाज़ कमज़ोर है
समाज खो चुका है अपनी भाषा
माहौल में एक लड़की की सिसकी है
राख हो चुकी एक लड़की हवा में तैर रही है
एक लड़की जिसने आज ही दुनिया को अलविदा कहा
प्यारी लड़की तुम और तुम जैसी बहुत-सी
अंत तक बनी रहेंगी अपनी आवाज़ में
अपनी राख में।
8. प्यारी लड़कियों
तुम लिखो, तुम बोलो, तुम खुल कर जियो
तुम्हारे डायरी के पन्ने किसी कोने में
आँसुओं से भीगने के लिए नहीं हैं
एक दिन दुनिया को
और सुंदर सचेतन बना जाएगी लड़कियाँ
तारीख बदल जाए, सूरज एक रोज पश्चिम में
लड़कियाँ इसी तरह खिलती रहेंगी
वे दुख को परे धकेल देंगी
और हँसेगी वह हँसी
जिससे शर्मसार होता रहा है यह ताकतवर समाज
आज इन्हीं आवाजों से रोशन से सारा जहान
वे लहरा रहीं परचम
वे कमसिन भी हैं और विद्रोह का बिगुल भी
वे अपने होने का उत्सव हैं।
9. बेटी का कमरा
एक दिन नहीं बचता बेटियों का कमरा
बहू के कमरे में चक्कर लगातीं
सवालिया शिकन को नज़रअंदाज कर भरसक खिलखिलाती हैं
उनके कमरे उनके नहीं रह जाते
कमरे का कोना देख याद आता है
आँख-मिचौनी का खेल
वहीं अलमारी में रखी वह तस्वीर जिससे माँ ने कभी डराया था
सहेली को लंगड़ी फंसा कर गिरा देने पर बड़ी देर तक
घूरती रही थी वह तस्वीर
बाबा की परछाईं कोने में रह गई है
माँ के बगल में सोने की लड़ाई आज भी कमरे में खनकती है
माँ के पेट पर ममन्ना लिखना और पेट पर फूँक मारना
माँ ने मान ही लिया है
अब किसी कोने में हो जाएगा उसका गुजारा
तो बेटियों का क्या है ससुराल में
कि हो उनका कोई कमरा।
10. एक मिनट का खेल
एक मिनट का मौन
जब भी कहा जाता है
हर कोई गिन रहा होता है समय
और फिर मौन बदल जाता है शोरगुल में
एक मिनट का मौन
गायब हो जाता है
सिर्फ एक मिनट में
अपने शव के पास उमड़ी भीड़ को देख व्यक्ति और मर जाता है
मृत्यु वाकई पहला और अंतिम सत्य है
और माफ करें मुझे मरने में ज़रा समय लग गया।
11. होना होगा
आँसू को आग
क्षमा को विद्रोह
शब्द को तीखी मिर्च
विचार को ‘मनुष्य’ होना होगा
खारिज एक शब्द नहीं ‘हथौड़ा’ है
‘मादा’ की जगह लिखना होगा सृष्टि
मुहब्बत
मजबूती
जीने की कला
शीशे की नोक पर जिजीविषा
मनुष्य लिखना नहीं
मनुष्य होना होगा।
12. त्रिया चरित्रं…देवौ न जानाति
जब स्त्री को वेद-वाक्यों में बाँध बरगलाया गया
तब इस बंधन में उनमें से किसी एक ने सिसकारी भरी थी
दूसरी ने रस्सी तोड़ भागने की कोशिश की थी
तीसरी ने कुछ लिखा
और मर गई थी।
13. नाक और बेटी -1
बेटी बड़ी हो रही है
साथ ही पिता की नाक भी
कभी चौड़ी, कभी लंबी
कभी लाल, कभी काली
तो कभी एकदम से कटने लगी है नाक
पिता की
नाक का कट जाना
एक मुहावरा
अक्सर पढ़ाया जाता है स्कूलों में
पर एक बेटी का पूरा जीवन
सिमटकर रह जाता है
बीत जाता है
उस तथाकथित नाक के सहारे
बेटी हर रोज़ तौली जाती है
समाज द्वारा निर्मित नाक से
आहत हो जाती है बेटी
उस सामाजिक नाक के नाम पर
हँसता-खेलता बचपन
खिलंदड़ यौवन
और बुढ़ापा
सब बरबाद, नष्ट हो जाने पर
समाज देता है उसे शाबासी उसी तरह
जैसे देते हैं कई राम, कई सीताओं को
अग्निपरीक्षा के बाद
एक दिन सब कुछ छोड़कर बेटी चल बसती है
तो समाज बड़ी गंभीर मुद्रा में उवाचता है-
बड़ी अच्छी थी
चुप रहती थी…गुमसुम
समाज की नाक नहीं कटने दी।
14. नाक और बेटी-2
बेटी फिर बड़ी हो रही है
उसी नाक के सहारे
जिससे बड़ी हुई है अभी तक अन्य बेटियाँ
बेटी पिता की नाक खींच, दुलराते…गाते
सवाल करती है
पापा, नाक का कटना क्या होता है ?
पापा की नाक लाल हो जाती है
नथुने फूल जाते हैं
जवाब में सिर्फ इतना-
अभी तुम बच्ची हो
कुछ दिन बाद बेटी फिर सवाल करती है
कोई तो बताओ
एक लड़की के चलने, बोलने, लिखने
प्रेम करने
या फिर एक लड़की के होने में
नाक का क्या सम्बंध ??
नाक तमतमा उठती है
कभी खाप, कभी ऑनर किलिंग
कभी सामूहिक बलात्कार के रूप में
बेटी अवाक रह जाती है
जवाब मिलता है
नाक का कटना यही होता है…।
15. विमर्शों से बाहर वे मेड हैं
खेतों की गुड़ाई का अभ्यास करते
कटाई तक हाथ का अभ्यस्त होते जाना
पीठ के दर्द से पेट के दर्द तक चीख निकालते
जौ मिट्टी में लिपटे बच्चे रोएँ न कराहें
समझ तो आता होगा क से कलपना
बालमन के
समझदार होने की मांग पर
दिल बच्चा नहीं कठोर हो जाता है
आटे और चावल की चोरी के आरोप से कसकता जीवन
आग नहीं भाप बन जाता है
माँ-बाप के ‘जेंडर’ पर आश्रित प्रेम क्या अपराध नहीं!
दूध पीने को कुनमुनाते बच्चे पेट की हड्डी से रोते हैं
उसे बिहँसना नहीं बिलखना कहते हैं साहब!
जच्चा-बच्चा स्वस्थ रहें के बीच
दो दिन बाद ही काम पर लौटना आसान तो नहीं
मानुष ढाँचे की पीर उन भावों का उद्रेक
दिल फाड़ देने जैसा होता है
छुटपन से छुट्टू कर दी जाती
गाँव की पंचायत से शहर का कोर्ट कहाँ पता
शहरातू कहलाती मुस्कुराती हैं
शराबी पति को पति न मानती
झगड़ालू का खिताब अपने नाम करती हैं
‘कामवाली’ के शोर से घिरी
सरकारी लाभ से वंचित
रूपए के जोड़-घटाव तक जीवन जिनका
वो मेड हैं।
                           ————-
(कवयित्री अर्चना त्रिपाठी (अर्चना लार्क के नाम से लेखन), जन्मः 7 जुलाई 1988, सुल्तानपुर (उ.प्र.) शिक्षाः हिन्दी में एम.फिल., पी-एच.डी., यूजीसी नेट। सृजनः विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित, नाटकों, लघु फिल्म में अभिनय, विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में शोधपत्रों का वाचन/प्रकाशन। संप्रतिः दिल्ली विश्वविद्यालय के 
डॉ .भीमराव अंबेडकर कॉलेज में अस्थायी सहायक प्राध्यापक। सम्पर्कः 149, पैराडाइज़ अपार्टमेंट्स, रोहिणी, सैक्टर 18, नईदिल्ली
मोबाइलः 9811837135
ई-मेलः[email protected]

टिप्पणीकार निरंजन श्रोत्रिय ‘अभिनव शब्द शिल्पी सम्मान’ से सम्मानित प्रतिष्ठित कवि,अनुवादक , निबंधकार और कहानीकार हैं. साहित्य संस्कृति की मासिक पत्रिका  ‘समावर्तन ‘ के संपादक . युवा कविता के पाँच संचयनों  ‘युवा द्वादश’ का संपादन  और वर्तमान में शासकीय महाविद्यालय, आरौन, मध्यप्रदेश में प्राचार्य हैं. संपर्क: [email protected])

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