समकालीन जनमत
प्रतीकात्मक चित्र (मनोज सिंह )
जनमत

बजट 2019 : निर्मला सीतारमन के सामने सुस्त अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी, ग्रामीण संकट की चुनौतियाँ

आगामी बजट नई मोदी सरकार का पहला पूर्णकालीन बजट होने जा रहा है। दिलचस्प यह है कि आमचुनावों के पहले जिन मुद्दों पर चर्चा हो रही थी वे चुनावों के दौरान सत्तासीन और विपक्षी दल दोनों के विमर्श से गायब थीं। कांग्रेस ने उन्हेें सामने लाने की कुछ कोशिश जरूर की पर सत्तापक्ष द्वारा स्थापित विमर्श की लहर में वह कहीं ठहर ही नहीं सकीं। चुनावों के पहले तीन मुद्दे ऐसे रहे जिन्हें पेशेवर लोग लगातार उठाते रहे और सरकार पूरी जोरदारी से जिन्हें नकारती रही वे निम्न हैंः

1- अर्थव्यवस्था में मंदी 2- बढ़ती हुयी बेरोजगारी 3- बढ़ता ग्रामीण संकट

सरकार ने इसे कभी स्वीकार नहीं किया और दुष्प्रचार कहकर दरकिनार कर दिया और विडम्बना यह कि चुनाव समाप्त होनेतक इसके विरुद्ध तर्क भी करती रही। नयी सरकार के शपथग्रहण के तुरंत बाद 29 मई 2019 को वित्तमंत्रालय के आर्थिक मामलों के सचिव ने एक संवाददाता सम्मेलन में उपरोक्त तीनों बातों को स्वीकार कर लिया। नये मंत्रिमंडल की पहली बैठक में उपरोक्त तीनों विन्दुओं को बड़ी चुनौती माना गया। यह व्यावहारिक राजनीति का यूटर्न था।

पिछले 2-3 सालों से भारतीय अर्थव्यवस्था में मंदी का दौर चल रहा है हाँलाकि सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़ों से ऐसा कुछ दिखायी नहीं देता। यह तो सिर्फ सकल घरेलू उत्पाद के आकलन के तरीकों में बदलाव के कारण है। नोटबंदी और जी0एस0टी0 ने असंगठित क्षेत्र की कमर तोड़ दी है और सकल घरेलू उत्पाद के आकलन के तरीकों ने असंगठित क्षेत्र के महत्व को कम कर दिया है। संगठित क्षेत्र के उत्पादन के आंकड़े प्राप्त करने के तरीकों में भी परिवर्तन किये गये हैं।

अभी हाल में पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार डा0 अरविन्द सुब्रमणियन ने अपने निष्कर्ष में बताया है कि भारत के विकासदर के आकलन में 2.5 प्रतिशत का अधिमूल्यांकन किया गया है। हो सकता है कि कुछ लोग इस प्रतिशत को स्वीकार न कर पायें पर अधिमूल्यांकन की सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता। जब निजी अन्तिम खपत के व्यय और सकल पूँजीनिर्माण में गिरावट आ रही है और निर्यात में वृद्धि लगभग स्थिर है तो सरकार द्वारा दिये गये आंकड़ों को स्वीकार करना मुश्किल है। तो, नयी वित्तमंत्री के लिये अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना एक बड़ी चुनौती है।

कृषि क्षेत्र गहरे संकट में है। संरचनागत अवरोधों के चलते निर्माण क्षेत्र धराशायी है। सेवाक्षेत्र वीरान हो रहा है। जहाँतक सार्वजनिक क्षेत्र की बात है, खासतौर पर निर्माण क्षेत्र में वृद्धि अनवरत है। लेकिन उसकी सीमा आ गयी है। आर्थिक घाटे को 3.5 प्रतिशत पर रोके रखने की अनिवार्यता भी आर्थिक विस्तार को सीमित कर देती है।

श्रम मंत्रालय के श्रम ब्यूरो और सेन्टर फाॅर माॅनिटरिंग इंडियन इकोनाॅमी, मुम्बई से प्राप्त रोजगार सम्बन्धी आंकड़े पिछले तीन सालों से लगातार बेरोजगारी में वृद्धि के संकेत दे रहे हैं। लेकिन इसके जवाब में प्रशासनिक आंकड़े (ई0पी0एफ0ओ0, ई0एस0आई0सी0, मुद्रा और आयकर) और आटोमोबाइल की बिक्री के आंकड़े दिये जा रहे हैं। यहाँतक कि प्रधानमंत्री ने भी संसद में इन आंकड़ों का उल्लेख किया और बताया कि नौकरी में गिरावट हो सकती है परन्तु स्वरोजगार में वृद्धि हो रही है।

तत्कालीन वित्तमंत्री ने बहस चलायी कि जब अर्थव्यवस्था में विकासदर 7 प्रतिशत से ऊपर जा रही है तो ऐसा कैसे हो सकता है कि बेरोजगारी में लगातार वृद्धि हो रही हो। सरकार ने श्रम ब्यूरो और सेन्टर फाॅर माॅनिटरिंग इंडियन इकोनाॅमी, मुम्बई से प्राप्त रोजगार सम्बन्धी आंकडों को निरस्त कर दिया। एन0एस0एस0ओ0 के परम्परागत रोजगार-बेरोजगार सर्वेक्षण को भी निरस्त कर दिया गया। यह बताया गया कि एन0एस0एस0ओ0 के सर्वेक्षण भारत की रोजगार की स्थिति को ठीक-ठीक समझ नहीं पाते, इसलिये रोजगार सर्वेक्षण का पुनर्संशोधन किया जाना जरूरी है।

2017-18 के लिये इसका पीरियाडिक लेबर फोर्स सर्वे (पी0एल0एफ0एस0) कराया जाना तय हुआ। 18 दिसम्बर 2018 तक इन आंकड़ों को सार्वजनिक कर दिया जाना था, लेकिन ऐसा किया नहीं गया।
बहरहाल सरकार ने पिछले महीने पी0एल0एफ0एस0 की रिपोर्ट जारी कर दी। पी0एल0एफ0एस0 के आंकड़े कहते हैं कि बेरोजगारी ऐतिहासिक रूप से अपने शिखर पर है। वित्तमंत्री के पास इससे उबरने का कोई आसान जरिया नहीं है। श्रमिकों का आमेलन स्तर लगातार नीचे गिर रहा है और उच्च विकासदर के दबाव ने इसे और वीभत्स बना दिया है। अब तो रोजगार की दर बढ़ाने का एक ही विकल्प बचता है कि विकासदर से समझौता कर लिया जाय। और विकास का लाॅलीपाॅप देने वाली सरकार के लिये इसे स्वीकार करना थोड़ा मुश्किल होगा।

ग्रामीण/कृषि क्षेत्र का संकट इस समय एक स्वीकृत तथ्य है। इसके प्रारम्भिक कारण ऐतिहासिक हैं जबकि कृषिकार्य को घाटे का सौदा माना जाता था। भारतीय राजनीति की यह विडम्बना है कि ऐसा क्षेत्र जहाँसे आधे मतदाता आते हैं उसके साथ कभी इन्साफ़ हुआ ही नहीं। सभी किसान परिवारों को 6,000 रुपये सालाना दे देने से ग्रामीण संकट समाप्त हो जानेवाला नहीं है। मुद्दा है खेती में घटता हुआ मुनाफा। कृषि क्षेत्र अब मुनाफे का नहीं रहा। कृषि और ग्रामीण संकट के फ़र्क़ को समझना भी जरूरी है। ग्रामीण संकट में ग्रामीण गैर-कृषि क्षेत्र भी आता है। गैर-कृषि क्षेत्र भी संकट में है। अभी तक तो वित्तमंत्री के पास कोई तैयार हल नहीं है।

आगामी बजट में वित्तमंत्री के लिये ये तीनों संकट एक बड़ी चुनौती बनने जा रहे हैं। इसके लिये सरकार के पास एक नयी सोच होना जरूरी है जो कि दिखायी नहीं देती। इन संकटों से जूझने के लिये विकास की उच्चदर से समझौता करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। और इस सरकार के लिये यह बहुत कठिन है।

( यह लेख मूल रूप से टाइम्स नाऊ न्यूज़ में 25 जून को प्रकाशित हुआ है. लेखक बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग में प्रोफेसर हैं. अनुवादः दिनेश अस्थाना. )

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