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ज़ेर-ए-बहस

एक बड़े राजनीतिक बदलाव के मुहाने पर खड़ा भारत

हमारा देश भारत आज एक बड़े राजनीतिक बदलाव के मुहाने पर खड़ा है. आजादी के बाद देश में कई बड़े जन आन्दोलन हुए, जिन्होंने भारतीय समाज पर अपना गहरा असर छोड़ा. 1967 का नक्सलबाड़ी का क्रांतिकारी किसान विद्रोह, 1974 का सम्पूर्ण क्रांति आन्दोलन और 1990 का मंडल-कमंडल आन्दोलन इनमें प्रमुख रहे हैं. इन तीनों बड़े आंदोलनों ने भारतीय समाज व राजनीति पर अपना गहरा प्रभाव छोड़ा. पर आज देश में चल रहे जन आन्दोलन जिन बुनियादी मुद्दों पर खड़े हो रहे हैं और जितनी व्यापकता लिए हैं, वह भारतीय समाज के अन्दर उठ खड़े हो रहे एक नव जागरण की ओर इशारा कर रहा है.

नक्सलबाड़ी आन्दोलन ने भारतीय राज्य व्यवस्था के क्रूर सामन्ती-पूंजीवादी गठजोड़ को उघाड़ कर सामने ला दिया था. सम्पूर्ण क्रांति आन्दोलन और मंडल-कमंडल आन्दोलन के जरिये भारतीय शासक वर्ग ने उस अंतर्विरोध को ढंकने का सचेत प्रयास किया. भारत के शासक वर्ग को आधी सदी तक इस अंतर्विरोध को ढके रखने में कामयाबी भी मिली. मगर आज वही गठजोड़ विकसित होता हुआ कारपोरेट फासीवाद के रूप में आजादी के बाद निर्मित भारतीय लोकतंत्र को निगलने में लगा है.

मोदी राज में भारत ने कारपोरेट व साम्राज्यवाद की खुली पक्षधरता तथा भारतीय लोकतंत्र को नष्ट करने वाली फासीवादी नीतियों की राह अपना ली है. इसके बाद कुछ समय तो मोदी सरकार साम्प्रदायिक विभाजन व अंधराष्ट्रवाद की चादर से अपने इन कारनामों को ढकने में कामयाब रही, पर अब वह चादर तार-तार होने लगी है और देश की जनता को तार-तार होती छद्म राष्ट्रवादी चादर के पीछे छिपी इस कारपोरेट फासीवादी सत्ता की क्रूर व नग्न देह साफ़ दिखने लगी है.

इस लिए इस बार बिलकुल बुनियादी मुद्दों पर देश में आन्दोलन उठ खड़े हो रहे हैं. इन आंदोलनों में नागरिकता संशोधन कानून, लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं पर हमला, खेती व खाद्य भंडारण के कारपोरेटीकरण के तीन कानून, मजदूरों के अधिकारों को छीनने वाले चार श्रम कोड बिल, प्राकृतिक संसाधनों की कारपोरेट व साम्राज्यवादी लूट, सरकारी व सार्वजनिक संस्थानों का निजीकरण व नीलामी, नौकरियों में कमी व युवाओं का रोजगार, महिलाओं की सुरक्षा व सम्मान, शिक्षा का निजीकरण व व्यवसायीकरण, अर्थव्यवस्था की तबाही से सिकुड़ते उद्योग व कारोबार जैसे बुनियादी मुद्दे आज देश में आन्दोलन के प्रमुख मुद्दे बन कर उभरे हैं. कश्मीर में धारा 370 को हटाना, राज्यों के अधिकार हड़पते कृषि सम्बन्धी 2 कानून व जीएसटी में राज्यों को हिस्से का भुगतान न होना जैसे सवालों ने भारत के संघीय ढाँचे को ख़त्म कर एक केंद्रीयकृत राज्य ढाँचे की और बढ़ने के मोदी सरकार के मंसूबों को भी उजागर कर दिया है. साम्प्रदायिक विभाजन और अंध राष्ट्रवाद की भाजपाई राजनीति से जनता के इन मुद्दों को अप्रभावी बनाने की सत्ता की कोशिशें अब ज्यादा परवान नहीं चढ़ पा रही हैं. आज देश में किसान, मजदूर-कर्मचारी, छात्र-युवा, महिला, बुद्धिजीवी, शिक्षा व कला क्षेत्र से जुड़े लोग लगातार आन्दोलन में हैं. एक ही दौर में इतने बुनियादी मुद्दों पर समाज के अलग-अलग हिस्से एक साथ आन्दोलन कर रहे हैं और इन आंदोलनों ने राष्ट्रव्यापी स्वरूप भी ग्रहण कर लिया है. ख़ास बात यह है कि इन सभी आंदोलनों में एक दूसरे का समर्थन करता एक ढीला-ढाला समन्वय भी दिख रहा है.

आजाद भारत के किसान आन्दोलन में यह पहली बार है जब देश का किसान कारपोरेट पूंजी के वर्चस्व के खिलाफ लाम बंद हो गया है. कृषि सम्बन्धी तीन कानूनों को देश के किसानों ने खेती, किसानी और देश की खाद्य सुरक्षा को कारपोरेट व बहुराष्ट्रीय कंपनियों का गुलाम बनाने वाला बताकर उनके खिलाफ आर-पार का आन्दोलन छेड़ दिया है. क्या कभी कल्पना की जा सकती थी कि देश के किसान सरकारी कार्यालयों, विधान सभा भवन व संसद के बजाए मोदी सरकार के चहेते कारपोरेट घराने अम्बानी-अडानी के संस्थानों को घेरने लगेंगे? पर आज ऐसा हो रहा है. पंजाब में किसानों ने अम्बानी-अडानी के संस्थानों के आगे धरने देने शुरू कर दिए हैं. अम्बानी के जियो सिम निकाल कर फेंके जा रहे हैं. रिलायंस के पैट्रोल पम्पों से डीजल-पैट्रोल नहीं खरीदने के आह्वान हो रहे हैं. अम्बानी-अडानी की कम्पनियों को अनाज, शब्जी व फलों की आपूर्ति बंद करने की अपीलें शुरू हो गई हैं. पूरे देश के गाँवों में किसान बिल पास कराने वाले भाजपा व उसके सहयोगियों के बायकाट के बैनर लगने शुरू हो गए हैं. किसने सोचा था कि पाकिस्तान व चीनी सामान का बायकाट करने की अंधराष्ट्रवादी मुहिम की आड़ में देश के संशाधनों को कारपोरेट को लुटाने वाली नरेंद्र मोदी सरकार को अपने चहेते अम्बानी-अडानी के बायकाट के नारे सुनने पड़ेंगे? इस देश के बुद्धिजीवी पिछले 6 साल से जिसे ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ कह रहे थे, देश के किसान उसे “लुटेरे अम्बानी-अडानी का बायकाट करो!” के नारे के रूप में गाँव-गाँव तक पहुंचा दिए हैं. बहुमत के घमंड में चूर जो नरेंद्र मोदी सरकार हर हथकंडे अपनाकर अब तक विपक्ष को निगलने में लगी थी, आज किसान आन्दोलन के दबाव में उसके सबसे पुराने सहयोगी अकाली दल को सरकार व एनडीए से बाहर आने को मजबूर होना पड़ा है

पिछले चार वर्षों से जब तक देश का किसान आन्दोलन “कर्ज मुक्ति” और “लागत का डेढ़ गुना दाम” की मांगों तक सीमित था, मोदी सरकार को किसान आन्दोलन से कोई परेशानी नहीं हुई. पर कोविड दौर में कृषि सम्बन्धी तीन किसान अध्यादेश जिस रूप में लाए गए और जिस तरीके से फिर संसद में पास कराए गए, उससे किसानों को यह समझने में देर नहीं लगी कि यह सीधे-सीधे देश की खेती, किसानी और खाद्य सुरक्षा को कारपोरेट और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का गुलाम बनाने के कानून हैं. ऐसी स्थिति में आरएसएस के किसान संगठन को छोड़ देश के सभी किसान संगठन एक साथ इस लड़ाई में उतर गए हैं. देश के स्तर पर 250 किसान संगठनों के मंच “अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति” के अलावा उससे बाहर देश के सभी बड़े व छोटे किसान संगठन इस लड़ाई में कूद पड़े हैं. सभी राज्यों में कार्यरत किसान संगठनों का राज्य स्तर पर भी समन्वय बन रहा है. किसान संगठनों के साथ खेत मजदूरों, आढतियों और मंडी के मजदूरों के संगठन भी इस आन्दोलन में उतर गए हैं. इस आन्दोलन को सिर्फ पंजाब व हरियाणा का किसान आन्दोलन बताने वाली सरकार जानती है कि 25 सितम्बर के भारत बंद व प्रतिरोध कार्यक्रम में 11 हजार किसान तमिलनाडू में गिरफ्तार किए गए. पश्चिम बंगाल में लगभग 200 जगहों पर राष्ट्रीय राजमार्ग व राज्य मार्ग जाम किए गए. पंजाब व कर्नाटक में किसानों के साथ ट्रेड यूनियनों, छात्र, युवा, महिला संगठनों, बुद्धिजीवियों, लोक गायकों से लेकर फिल्म इंडस्ट्री तक के लोगों ने सड़क पर उतर कर प्रदर्शन किए. 28 सितम्बर को कर्नाटक फिर बंद रहा. 10 केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों, ज्यादातर छात्र-युवा व महिला संगठनों ने भी किसानों के इस आन्दोलन को पूरे देश में अपना सक्रिय समर्थन दिया. कनाडा और इंग्लैंड में प्रवासी भारतीयों ने भारत के किसान आन्दोलन के समर्थन में बड़ी रैलियाँ की हैं. बहुमत के घमंड में चूर जो नरेंद्र मोदी सरकार हर हथकंडे अपनाकर अब तक विपक्ष को निगलने में लगी थी, आज किसान आन्दोलन के दबाव में उसके सबसे पुराने सहयोगी अकाली दल को सरकार व एनडीए से बाहर आने को मजबूर होना पड़ा है. किसानों के आन्दोलन को भ्रमित करने के लिए कुछ फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घोषित करने के मोदी सरकार के दांव को किसानों ने पूरी तरह नकार दिया है. किसानों के वर्तमान आन्दोलन ने पहली बार बहुमत के घमंड में चूर मोदी सरकार को बेचैन कर दिया है. इस लिए आन्दोलन से घबराई सरकार पहली बार इन काले कानूनों पर किसान संगठनों को अनौपचारिक वार्ताओं के लिए बुलाने लगी है.

कोविड पूर्व भी देश साईनबाग़ आन्दोलन नाम से प्रसिद्ध ऐसे ही एक जबरदस्त राष्ट्रव्यापी लोकतांत्रिक आन्दोलन के आगोश में था. यह आन्दोलन मोदी सरकार के नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ फूट पड़ा था. देश के हजारों स्थानों पर दिसंबर 2019 से मार्च 2020 तक चले इस आन्दोलन की बागडोर मुख्यतः देश की मुश्लिम महिलाओं के हाथ में थी. जबकि देश का पूरा लोकतांत्रिक समाज इस आन्दोलन में उनके साथ खड़ा था. इस आन्दोलन में मुश्लिम महिलाओं की भारी तादात के कारण भाजपा व संघ परिवार ने इसका साम्प्रदायिककरण करने का भरपूर प्रयास किया. पर देश के संविधान व लोकतंत्र की रक्षा की शपथ लेता यह आन्दोलन लोकतंत्र व संविधानिक संस्थाओं पर मोदी सरकार के हमलों का बेहतर लोकतांत्रिक प्रतिरोध सिद्ध हुआ. यह आन्दोलन राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर के विरोध में शुरू हुआ, पर नए संशोधित नागरिकता कानून ने इसमें आग में घी का काम किया. क्योंकि पहली बार देश में धर्म के आधार पर नागरिकता देने का प्रावधान किया गया था. हालांकि देश में बढ़ते दक्षिणपंथी उभार और केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद अल्पसंख्यकों, दलितों, महिलाओं और कश्मीरियों पर बढ़ते फासीवादी हमलों और केन्द्रीय सत्ता द्वारा संवैधानिक संस्थाओं को नष्ट करने की मुहिम ने इस आन्दोलन की जमीन पहले ही तैयार कर दी थी. पर कोविड संकट के कारण स्थगित किया गया यह आन्दोलन मोदी सरकार की शातिराना साजिशों के खिलाफ फिर गोलबंद हो रहा है. मोदी सरकार द्वारा दिल्ली दंगों को आयोजित कराने में लिप्त भाजपा नेताओं को बचाने के लिए सीएए आन्दोलन के कार्यकर्ताओं को साजिशन दंगों के मुकदमे में फंसाए जाने तथा भीमा कोरे गाँव मामले में देश के बुद्धिजीवियों को जेल में डालने के खिलाफ लोकतांत्रिक जनमत आज भी एकजुट है.

देश के सरकारी व सार्वजनिक संस्थानों की सर्वव्यापी नीलामी, मजदूरों के श्रम अधिकारों को ख़त्म करने और, 12 घंटे ड्यूटी, नौकरी से हटाने सहित उद्योगपतियों को मजदूरों के शोषण की मनमानी छूट देने वाले मोदी सरकार के चार श्रम कोडों के खिलाफ देश की 10 केन्द्रीय ट्रेड यूनियनें लगातार आन्दोलन के मैदान में हैं. रेल, कोल इंडिया, रक्षा उद्योग, बैंक, बीमा, बिजली जैसे क्षेत्रों के निजीकरण के खिलाफ मजदूरों-कर्मचारियों का आन्दोलन लगातार तीखा होता जा रहा है. 6 अक्टूबर 2020 को उत्तर प्रदेश के बिजली कर्मचारियों की हड़ताल के बाद निजीकरण की मुहिम का स्थगित होना इस आन्दोलन की जीत है. यह आन्दोलन भी सरकार की कारपोरेट और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों परस्त नीतियों के खिलाफ ही केन्द्रित है. देश के लाखों स्कीम वर्कर्स अपनी सेवा शर्तों और लाखों कर्मचारी पुरानी पेंशन योजना लागू करने की मांग पर सड़कों पर उतर रहे हैं. मजदूर-कर्मचारियों के इन आंदोलनों को देश के किसानों और लोकतांत्रिक जनमत का भी समर्थन मिल रहा है. रेल कर्मचारियों के आन्दोलन में कई जगह किसान समर्थन में उतरे हैं. रेलवे के निजीकरण के खिलाफ बिहार में युवाओं का स्वतः स्फूर्त आन्दोलन अपने आप में एक अनूठा उदाहरण था. 9 अगस्त 2020 को भारत के किसान संगठनों और ट्रेड यूनियनों ने मोदी सरकार की कारपोरेट व बहुराष्ट्रीय कंपनियों की हितैषी नीतियों के खिलाफ एक साथ राष्ट्रव्यापी विरोध दिवस मनाया. उस दिन देश भर में लाखों किसान-मजदूर सड़कों पर उतरे और मोदी सरकार के पुतले तथा किसान अध्यादेश व प्रस्तावित श्रम कोड बिलों को जलाया गया. अब 26-27 नवम्बर 2020 को किसान संगठनों ने “दिल्ली चलो” का आह्वान किया है, तो 10 केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों ने भी 26 नवम्बर 2020 को ही एक दिन की राष्ट्रव्यापी मजदूर हड़ताल का आह्वान किया है. देश के मजदूर-किसान आन्दोलन में कारपोरेटीकरण के खिलाफ संघर्ष की यह स्वाभाविक एकता एक नई राजनीतिक संभावना के द्वार खोलती है.

हाथरस बलात्कार व हत्या काण्ड के खिलाफ देश भर में महिलाएं और लोकतांत्रिक जनमत आज गुस्से में सड़कों पर है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तो इस आन्दोलन को विदेशी षड्यंत्र के तहत देश को अस्थिर करने वाला बताने में जुट गए हैं. पर सच्चाई यह है कि योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में कानून व संविधान के राज की जगह गुंडा-पुलिस राज स्थापित हो चुका है. एक ऐसा राज्य जहां बलात्कारियों, हत्यारों, दंगाइयों, बलवाइयों, भ्रष्टाचारियों की रक्षा के लिए राज्य खुल कर सामने आ रहा है. उत्तर प्रदेश आरएसएस व भाजपा के हिन्दू राष्ट्र की एक ऐसी नई प्रयोगस्थली बनता जा रहा है, जहां दलितों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों और अपने राजनीतिक विरोधियों के दमन के लिए राज्य खुल कर पुलिस के संरक्षण में अपराधियों को संगठित कर रहा है. बलात्कारियों को राज्य मशीनरी का खुल कर संरक्षण और बलात्कारियों के पक्ष में राजनीतिक गोलबंदी भाजपा शासित राज्यों की पहचान बनता जा रहा है. कठुवा, उन्नाव, मुज्जफ्फरपुर, चिम्यानंद जैसे कई ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं. हाथरस काण्ड में तो अपराधियों को बचाने के लिए सबूतों को नष्ट करने और मामले को हर तरह से दबाने में राज्य व जिले का पुलिस-प्रशासन अपनी हर सीमा का उलंघन कर जिस सक्रियता से लगा था, वह मुख्यमंत्री योगी के सीधे निर्देश के बिना संभव ही नहीं है. अब भाजपा नेतृत्व पुलिस के खुले संरक्षण में गाँव-गाँव में सवर्ण खासकर राजपूत जाति के बीच से अपराधियों को संगठित करने में लगी है, ताकि जातीय दंगों को संगठित कर इस मुद्दे को दफना सके और इस काण्ड के खिलाफ आन्दोलन की लोकतांत्रिक आवाज को साजिशन मुकदमों में फंसा सके. भाजपा की केंद्र सरकार का गृह मंत्रालय दिल्ली में ऐसा ही प्रयोग पहले कर चुका है. सीएए विरोधी आन्दोलन को खत्म करने के लिए भाजपा ने पहले गृह मंत्रालय के खुले संरक्षण में उत्तर पूर्वी दिल्ली में दंगे कराए, फिर सीएए विरोधी तमाम कार्यकर्ताओं को उन दंगों की साजिश रचने का आरोप लगाकर हत्या, यूएपीए और राजद्रोह जैसे मुकदमों में फांस दिया. मगर सत्ता की साजिशों और दमन ने आन्दोलनकारियों को और भी मजबूती से एकताबद्ध किया है.

पिछले दिनों रोजगार के सवाल पर देश के युवाओं की मुहिम काफी रंग लाई है. मोदी के अच्छे दिनों के वायदे से भ्रमित बेरोजगार युवाओं के सब्र का बाँध अब टूटने लगा है. ऐसे तो रोजगार का सवाल अब देश में रोजमर्रा आन्दोलन का मुद्दा बन गया है. पर 17 सितम्बर 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्म दिन को देश के नौजवानों ने जिस तरह से “राष्ट्रव्यापी बेरोजगार दिवस” में बदल दिया वह बेरोजगारी की भयावहता का ही नतीजा है. उससे पहले भी 5 सितम्बर को नौजवानों का “5 तारीख, 5 बजे, 5 मिनट” का थाली बजाओ आन्दोलन और 9 सितम्बर को “9 तारीख, 9 बजे, 9 मिनट” का बत्ती बुझाओ-टार्च जलाओ अभियान पूरे देश में जबरदस्त सफलता पा चुका था. इधर प्रधान मंत्री के ट्वीटों और जारी वीडियो पर भी लाइक घटते जा रहे हैं और लाखों डिसलाइक होने लगे हैं. यह दिखाता है कि देश का पढ़ा लिखा नौजवान अब रोजगार की टूटती उम्मीदों के बीच रोजगार के लिए आन्दोलन में उठ खड़ा हो रहा है. देश की उच्च शिक्षा में सर्वोच्च स्थान पाने वाले जेएनयू, जामिया मीलिया और अलीगढ़ मुश्लिम विश्वविद्यालय जैसे उच्च शिक्षण संस्थानों को बदनाम कर नष्ट करने की मोदी सरकार की राजनीतिक मुहीम को एक बार फिर अपनी सर्वोच्चता को साबित कर वहां के संघर्षरत छात्रों और शिक्षकों ने बड़ा झटका दिया है. हालांकि एक नई शिक्षा नीति को लाकर यह सरकार विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को नष्ट करने और शिक्षा के पूर्ण व्यवसायीकरण की तरफ कदम बढ़ा चुकी है. यह इस देश के आम छात्रों को उच्च और रोजगार परक शिक्षा से बाहर करने का कदम है. कोरोना काल में हमारी ध्वस्त सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा की बेहतर भूमिका के बावजूद सरकार का स्वास्थ्य सेवा को पूरी तरह निजी क्षेत्र को सौपने की मुहीम के खिलाफ भी देश में गुस्सा बढ़ता जा रहा है.

ये सभी मुद्दे और उन पर जनता के तमाम तबकों का आन्दोलन बता रहा है कि भारतीय राज्य व्यवस्था आज एक गहरे संकट में जाकर फंस गई है. इन संकटों में यह व्यवस्था 30 वर्ष पहले ही फंसने लगी थी. पर उदारीकरण की साम्राज्यवाद परस्त, कारपोरेट परस्त नीतियों की चमक से उसे तीन दशक तक ढका गया. उदारीकरण की इन नीतियों को लेकर भारत के शासक वर्ग में एक वैचारिक सहमति है. विरोध उसे लागू करने के तरीके मात्र पर है. इसी लिए आप देखेंगे कि यूपीए के घटकों को एनडीए में और एनडीए के घटकों को यूपीए में, कांग्रेस वाले को भाजपा और भाजपा वाले को कांग्रेस में जाने में कोई दिक्कत नहीं है. आज के कृषि व लघु उद्योगों के संकट को बढाने में ज्यादा जिम्मेदार आयात में मात्रात्मक प्रतिबन्ध हटाने, कृषि जिंसों के लिए वायदा कारोबार खोलने के अटल सरकार के निर्णय को 10 वर्षों की मनमोहन सरकार ने भी नहीं बदला. राज्यों में कृषि मंडियों के समानांतर निजी मंडियों या मंडी के बाहर फसलों की खरीद से संबंधित अटल सरकार के कानून के खिलाफ मनमोहन सरकार राज्यों व किसानों के हित में कोई नया कानून नहीं लाई. अब इस विशाल संकट को ढक पाने लायक कोई चादर भारतीय शासक वर्ग के पास बची नहीं है. इससे आगे बढ़ने के अब दो ही रास्ते देश के सामने बचे हैं. एक रास्ता है आजादी के बाद स्थापित लोकतांत्रिक संस्थाओं का खात्मा कर कारपोरेट फासीवादी राज्य की स्थापना, जिसकी ओर भाजपा और आरएसएस के मजबूत कदम काफी आगे बढ़ चुके हैं. दूसरा रास्ता है एक नए जनवादी भारत का निर्माण. इस नए जनवादी भारत के निर्माण की छटपटाहट आज देश में चल रहे जन आंदोलनों और उनके बुनियादी मुद्दों में प्रतिबिंबित हो रही है. आने वाले तीन-चार वर्ष भारत के आगामी तीन-चार दशकों की दिशा तय करने वाले हैं. आज देश में चल रहे जन आंदोलनों के गर्भ से एक नए जनवादी भारत के निर्माण का अंकुर फूट सकता है. पर इसके लिए भारत की वामपंथी-लोकतांत्रिक शक्तियों को केन्द्रीय भूमिका में आना होगा.

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