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कविता

कोरोना काल में स्त्री कविता :  ‘ये खाई सदियों पुरानी है/यह सूखी रोटी और पिज्जा के बीच की खाई है’

जहां कोरोना वायरस से निपटने के उपाय किये जा रहे हैं, वहीं इस महामारी को लेकर डिस्कोर्स भी चल रहा है। कोरोना काल में जिस तरह पर्यावरण बेहतर हुआ है। क्या आगे भी पर्यावरण को ऐसा ही बनाये रखना संभव होगा ? क्या लोभ, लाभ और लालच की संस्कृति पर अंकुश लग पायेगा ? कोरोना के बाद की  दुनिया कैसी होगी? कोरोना के समय में दुनिया में और भारत में जनतंत्र को सीमित किया गया। इससे शासकों की निरंकुशता, स्वेच्छाचारिता व तानाशाही के बढ़ने के क्या खतरे नहीं है? ऐसे बहुत सारे प्रश्न इन दिनों बहस के केन्द्र में है।

महामारी को हम निरपेक्ष तरीके से नहीं देख सकते। कोरोना अर्थनीति, कोरोना राजनीति, कोरोना संस्कृति को लेकर बहस जारी है। इस समय को हमारे रचनाकार भी देख और समझ रहे हैं। सोशल मीडिया उनके विचारों और अभिव्यक्ति का माध्यम  बना है। इन दिनों फेसबुक लाइव कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं। कविताएं बडी संख्या में लिखी जा रही हैं। सोशल मीडिया इनका मंच बना है। स्त्री  रचनाकरों की भी रचनाएं आ रही हैं।

जन संस्कृति मंच की ओर से फेसबुक पर चलाये जा रहे ‘कविता संवाद’ लाइव कार्यक्रम के तहत 26 अप्रैल को सात कवयित्रियों  की रचनाएं सुनाई गयीं। इसका संयोजन और कविताओं का पाठ कवि व मंच के प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष कौशल किशोर द्वारा किया गया।

पाठ का आरम्भ युवा कवयित्री सीमा सिंह (लखनऊ) से हुआ। ‘इन दिनों’ शीर्षक से उनकी आठ छोटी कविताएं सुनाई गयी। इनमें आज के समय की अनेक छवियां मिलती हैं। कविता में वे आम आदमी के दर्द को इस तरह व्यक्त करती हैं ‘पानी पी कर/नींद नहीं आती साहेब/आँखों  को नींद की नहीं/रोटी की जरूरत है/इन दिनों …’।

डाॅ ज़रीन हलीम (दिल्ली) महामारी की वजह से आम आदमी का जो विस्थापन हुआ उसे अपनी नज़्म का विषय बनाया। इसकी भयानक मार प्रवासी मजदूरों को झेलना पड़ा। वे उनके दर्द को  अपनी नज़्म में विस्तार देती हैं। वे कहती हैं ‘ज़ख्म तो महसूस करो साहब, मेरे पांवों के छालों का/आपके पैरों में जो जूते हैं, वह भी बनाए हैं हमने।’

मालविका हरिओम (लखनऊ) ग़ज़ल और गायिकी की दुनिया में चर्चित नाम है। उनकी ग़ज़़ल भी पढ़ी गयी जिसमें वे धर्म के आधार पर फैलायी जा रही नफरत पर चोट करती हैं। वे कहती हैं कि कोरोना अंधविश्वास के तौर-तरीकों से दूर नहीं होगा। अपनी ग़ज़ल में यह सीख देती हैं ‘थाली घंटा दुआ टोटका सब के सब इक जैसे हैं/बात पते की इतनी भैया इनसे कुछ भी ना होना’।

इस मौके पर विमल किशोर (लखनऊ)  की कविता ‘तालाबन्दी बनाम बन्दीगृह’ का पाठ हुआ। उनका कहना है कि लाॅक आउट मजदूरों के जीवन-अस्तित्व के लिए दोहरा संकट लेकर आया है। अपनी कविता में कहती हैं – ‘वे जानते थे कि यह तालाबन्दी/भूख और प्यास से पैदा हुआ बन्दी गृह है/……वे जहां थे उसके दोनों ओर खाई थी/एक ओर कोरोना था, दूसरी ओर भूख हरजाई थीं।’

प्रतिभा कटियार (देहरादून) इस खाई को और गहरा करती हैं। अपनी कविता में वे कहती हैं ‘ये खाई सदियों पुरानी है/यह सूखी रोटी और पिज्जा के बीच की खाई है’। वे मीडिया की भूमिका को आड़े हाथों लेती हैं ‘नींद नहीं आती कि उसकी जगह नहीं बची आँखों में/वो अब पाँव में रहती है…./भूख अब पेट में नहीं रहती/वो रहती है चैनलों में/एंकरों के मुंह से झाग उगलती नफरत में…’।

इस मौके पर अमिता शीरीं  (इलाहाबाद) की कविता भी सुनायी गयी जिसमें वे 5 अप्रैल को देश भर में दिये जलाये जाने की घटना का प्रतिवाद करती है। उनका कहना है कि जब दुनिया में लोग महामारी से मर रहे हों, ऐसे में हम दिवाली कैसे मना सकते हैं। पटाखें और फुलझड़ियां कैसे छोड़ सकते हैं? यह भाव कविता में कुछ यूं व्यक्त होता है ‘काले आकाश पे छूटती फुलझडियां/महज रोशनी नहीं है/ये आत्माएं हैं इस महामारी में/मरने वाले लोगों की/….जलते हुए दिए/कभी इतने बेनूर नहीं दिखे…..’। अर्पण मंजनीक (चण्डीगढ़) की कविता के पाठ से कार्यक्रम  का समापन हुआ जिसमें वे पिछले छ साल के दौरान नफरत और विभाजन की राजनीति जो देश में फलती-फूलती रही, उसका जायजा लेती हैं। अपनी कविता में प्रतिरोध रचती हुए वे कहती हैं ‘राजा, हम नहीं बनेंगे तेरे तमाशे का हिस्सा/हमें वो मशाल जलानी है/जो रोशन कर दे उन गलियो,  मकानों ,नुक्कड़ों को/जहां तेरी पक्षपाती रोशनी ने/जाने से इंकार किया है’।

 

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