ये चिराग जल रहे हैं

बाबू और जामुन का यह पेड़

( वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक नवीन जोशी के प्रकाशित-अप्रकाशित संस्मरणों की  श्रृंखला ‘ये चिराग जल रहे हैं’ की  आठवीं  क़िस्त  में  प्रस्तुत  है  प्रकृति  और पुरखों  के जुड़ाव  की  आत्मीय  कथा  नवीन  जोशी के  पिता  द्वारा  लगाए नीबू  के पेड़  के बहाने . सं.)

 

हर साल जून-जुलाई के महीने में हमारा जामुन खूब फलता है, हमारे घर के ठीक सामने पार्क में लगे पेड़ में. दिन भर पके जामुन टप-टप टपकते रहते हैं. कई तो जामुनी रंग बिखेरते हुए सड़क, फुटपाथ, पार्क की दीवार या छांह में खड़ी किसी कार की छत में फूट जाते हैं. जो साबुत रह जाते हैं उन्हें आते-जाते लोग बीन ले जाते हैं या हाथ से पोछ कर सीधे मुंह में धर लेते हैं. बच्चे दिन भर ढेले मार कर कच्चे-पके फल गुच्छों समेत तोड़ने की फिराक़ में रहते हैं जिन्हें कभी-कभी भगाना भी पड़ता है. किसी सुबह-सुबह कुछ लोग पेड़ पर चढ़े नज़र आते हैं पॉलीथिन की थैलियों में जामुन तोड़ते हुए. एक दिन तो चौराहे पर फल बेचने वाले पेड़ पर चढ़े दिखे. शहरों में सौ-डेढ़ सौ रु किलो के भाव तक बिकता है अब जामुन!

कभी-कभी लगता है कि इस पेड़ पर हमारा हक़ है. फिर ख्याल आता है कि कैसा हक़! बचपन में पहाड़ में सुनते थे कि पेड़ में पके फल पर सबका हक़ होता है. खैर, हमारे घर के सामने करीब एक महीना यह हलचल-हंगामा चलता है, जब तक जामुन फलते-पकते रहते है. फिर साल भर कोई इसकी ओर नहीं देखता. नहीं, मैं गलत कह गया. साल भर, खास कर लखनऊ की तपती दोपहरियों में इसकी छांह में बहुत सारे लोग बैठते हैं, ट्यूशन पढ़ने वाले बच्चों से लेकर घर-घर सामान बेचने वाली महिलाओं के जत्थे तक.

यह पेड़ बाबू का लगाया या कहिए कि बचाया हुआ है. इसे देख कर उनकी याद आती है.

( बाबू का लगाया जामुन का पेड़ , पत्रकारपुरम , गोमती नगर, लखनऊ )

हम मई 1988 में पत्रकारपुरम (गोमती नगर, लखनऊ) के इस मकान में रहने आये थे. एक सौ मकानों की कॉलोनी में हम पहले थे जो यहां रहने आये. तब कई मकान बन ही रहे थे जिनमें बिलासपुरी मज़दूर परिवार समेत अपना ठिकाना भी बनाए हुए थे. उसके अलावा ठेकेदार का चौकीदार कैलाश था जिसकी गालियों और झग़ड़ों से अक्सर कॉलोनी गूंज जाती थी, बस! सांय-भांय करती तेज़ हवा चलती और पूरा घर बालू से भर जाया करता था. आज कॉमर्सियल हो चुकी इस कॉलोनी की भीड़, शोर, बेशुमार गाड़ियों और अट्टालिकाओं को देख कर कल्पना करना मुश्किल है कि शुरू में यह कितनी शांत और सुकून भरी रिहायश थी. कितनी तेज़ी से शहरीकरण हुआ है! इस प्रक्रिया में लखनऊ के मास्टर प्लान की निर्मम हत्या करने वाले खुद लखनऊ विकास प्राधिकरण और नगर निगम ही हैं.

बहरहाल, हमारे घर के सामने का पार्क तब ऊबड़-खाबड़ और उजाड़ था. इसे विकसित करने के नाम पर एलडीए ने कांटेदार तार से इसे घिरवा कर चारों कोनों पर एक-एक पौधा लगवा दिया था. कांटेदार तार कई जगहों से झूल गया था और आस-पास के गांवों की बकरियां और गाय-भैंसें अक्सर पार्क में घुस आतीं. बाबू ने उन्हें भगाना अपनी ज़िम्मेदारी बना ली. वे सुबह-शाम अपने नन्हे पोते को गोद में लिए कुर्सी पर बाहर बैठे रहते या टहलते. दिन में भी खिड़की से देखते रहते. ज़रूरत होने पर हांका मारते. पार्क के दूसरे कोनों में लगे पौधे पता नहीं कब नष्ट हो गये, उन्हें जानवर चर गये या कुचल गये या वे सूख गये. हमारे घर के सामने वाला पौधा बचा रहा. जानवरों के खुरों से कुचला तो वह भी गया, कभी किसी ने उस पर मुंह भी मारा ही होगा लेकिन बाबू की चौकसी से उसके प्राण बचे रहे. वे उसमें पानी डालते, कभी गुड़ाई करते. उन्होंने यहां-वहां पड़ी  ईंटें उठा कर पौधे के चारों ओर एक सुरक्षा कवच भी बना दिया था. वह धीरे-धीरे बड़ा होने लगा. जामुन के पौधे के रूप में उसकी पहचान होने लगी.

कोई दो-तीन फुट का हुआ होगा कि एक सुबह वह पूरी तरह जमीन पर बिछा दिखा. शायद बच्चों की फुटबॉल से उसके सुरक्षा कवच की ईंटें गिरने से वह औंधा हो गया था. बाबू ने देखा तो चिंतित हो उठे. गनीमत थी कि उसका नाज़ुक तना पूरी तरह अलग नहीं हुआ था. बाबू ने उसकी मरहम-पट्टी की, मतलब उसे हौले से खड़ा किया, उसकी जड़ के पास एक लकड़ी गाड़ी और डोरी के सहारे पौधे को उस लकड़ी से बांध कर खड़ा कर दिया. पौधा जी गया. एक बार और उस पौधे को ज़रूरी सहारा देना पड़ा. तब उसकी ऊंचाई ठीक-ठाक हो गई थी लेकिन आंधी से वह दोहरा हो गया था. तब बाबू ने उसे उठा कर एक रस्सी से कांटेदार तार के साथ बांध दिया ताकि वह खड़ा रहे और सीधा ऊपर को बढ़े.

पौधा बचा रहा और क्रमश: पेड़ बनता गया. आज हमारे सामने वह खूब बड़ा, घना, छायादार और फलदार पेड़ है. बाबू को दुनिया छोड़े छब्बीस वर्ष हो गये. उन्होंने इस पेड़ के जामुन नहीं चखे लेकिन उनकी वज़ह से कितने सारे लोग साल-दर-साल इसके फल खा रहे हैं. सच ही तो कहा है कि पेड़ लगाता कोई है और फल आने वाली पीढ़ियां खाती हैं. मुझे अच्छी तरह याद है, इसी कॉलोनी में रहने वाले हमारे मित्र राकेश शुक्ला बाबू से कहा करते थे कि आप इस पौधे को बचा तो रहे हैं लेकिन जब यह फल देने लगेगा तो आपके घर पर ही सबसे ज़्यादा पत्थर बरसेंगे. राकेश का इशारा पत्थर मार कर फल तोड़ने वालों से था. बाबू बस मुस्करा देते. वे बोलते बहुत कम थे मगर अपनी मुस्कराहट से बहुत कुछ कह देते थे. इन दिनों कभी-कभी हम पत्थर मार कर जामुन तोड़ने वाले लड़कों से परेशान होते हैं. तब बाबू की वह मुस्कराहट याद आ जाती है और गुस्सा काफूर हो जाता है. वह हंसी जैसे कहती है- पके फलों पर तो सबका हक़ है न! और भला, बच्चों को पत्थर उछालने से कौन रोक सका है!

…….

बाबू की याद दिलाता एक नीम का पेड़ भी है. इसी पार्क में और जामुन के बगल में ही. उसका किस्सा भी मुझे भावुक बना देता है.

बाबू जब नौकरी में थे तो उन्हें कैनाल कॉलोनी (कैण्ट रोड पर सिंचाई भवन के पीछे) में एक क्वार्टर मिला हुआ था. कई क्वार्टरों वाला वह बड़ा अहाता था. अहाते के बीच में नीम का बड़ा पेड़ था. इसी क्वार्टर और अहाते में मैं छह से 27 साल की उम्र तक रहा. बाबू ने तो करीब 40 वर्ष वहां बिताए. बाद में किराए के मकानों से होते हुए हम गोमती नगर के पत्रकारपुरम में आ गये. बाबू अक्सर पुराने साथियों से मिलने कैनाल कॉलोनी जाया करते थे. मेरा बड़ा बेटा जब तीन-चार साल का था तो एक बार बाबू उसे भी ‘बब्बा का बचपन का घर’  दिखाने कैनाल कॉलोनी ले गये. गर्मियों के दिन थे और अहाते का नीम खूब फला हुआ था. पकी हुई निमकौरियां टपकती रहतीं और उनसे अहाता पट जाया करता था. उनकी अज़ब सी कड़वी-मीठी गंध हवा में तारी रहती. बचपन में हम पकी निमकौरियों को हौले से चूसा भी करते थे ताकि सिर्फ मीठा गूदा मुंह में आये. खैर, उस दिन जब वे लौटे तो मेरे बच्चे की मुट्ठी निमकौरियों से भरी हुई थी. उसने बाल सुलभ उत्साह के साथ हमें बताया कि इनको बोने से नीम का पेड़ निकलेगा. पुष्टि के लिए उसने बाबू की ओर देखा- ‘है ना बाबू?’ बाबू के चेहरे पर हमारी बहुत परिचित हंसी खेल रही थी और उनकी गरदन ‘हां’ में हौले-हौले हिल रही थी.

वे निमकौरियां बोयी गईं. बेटा रोज़ उसमें पानी डालता और नीम का पेड़ न निकलते देख उतावला भी होता. बाबू उसे बड़े धैर्य से समझाते कि मिट्टी के अंदर पौधा तैयार हो रहा है. अभी वह बहुत ही छोटा बच्चा है, तुमसे भी छोटा.  मिट्टी से बाहर आने में उसे डर लग रहा है. थोड़ा बड़ा होने पर वह धीरे से बाहर झांकेगा, फिर तुम्हें देख कर आराम से बाहर आ जाएगा और तुम्हारा दोस्त बन जाएगा. बेटा कुछ समझता, कुछ नहीं लेकिन बाबू की बातों पर उसे बहुत भरोसा था. एक सुबह अंकुर फूटते दिखाई दिये. मेरे बच्चे के लिए वह अद्भुत सुबह थी. उसका उत्साह उछालें मार रहा था. उसने घर के हर सदस्य को बुला कर तालियों और किलकारियों से पेड़ का जन्मोत्सव मनाया. दिन भर में कई-कई बार वह अंकुरों को देखने जाता.

ज़ल्दी ही वहां नन्हे-नन्हे पौधे निकल आए. बेटा बाबू के साथ उनको सींचता और बड़ा होते देखता रहता. दादा-पोते ने मिलकर छोटी लकड़ियों का एक सुरक्षा घेरा भी उनके लिए तैयार किया ताकि भूल से भी उन पर पैर न पड़ जाए. नीम के पौधे धीरे-धीरे बड़े होते रहे.

बाद में उनमें से एक पौधा पार्क में जामुन के पड़ोस में रोपा गया. पड़ोसी और हमारे वरिष्ठ साथी प्रमोद जोशी जी की बिटिया के नाम पर बाबू ने उसे रिंकी-नीम कहा. एक पौधा घर की पश्चिमी चहारदीवारी के बाहर लगाया गया. उसे बेटे का नाम मिला, कंचन-नीम.  बहुत बाद तक वे रिंकी-नीम और कंचन-नीम के रूप में ही पुकारे गये.  इन पौधों को बचाने में भी बाबू की बड़ी भूमिका रही क्योंकि दातून करने के शौकीन नन्हे नीम का सिर ही कलम करने पर उतारू रहते.

उस ऊबड़-खाबड़, रेतीली, बंज़र जमीन पर, जहां यह कॉलोनी बस रही थी, पेड़ थे ही नहीं. सिर्फ कांटेदार झाड़ियां थीं. नीम के छोटे पौधों पर भी लोगों की नज़र रहती. कोई कोमल पत्तियां चबाना चाहता, किसी को दातून करने की याद हो आती. बाबू लोगों को समझाते- ‘भैया, ज़रा पौधे को बड़ा तो होने दो. फिर चाहे जितने दातून और पत्तियां ले लेना.’ लोग ‘अच्छा, बाबू जी’ कह कर शर्मिंदा हो कर चले जाते.  इस तरह नीम बचे रहे. चहारदीवारी के बाहर लगा नीम काफी बड़ा होने पर एक रोज तेज आंधी में लड़खड़ा गया. सामने के मकान पर खतरनाक ढंग से झुक आया. उसे दुखी हो कर कटवाना पड़ा. तब बाबू जीवित नहीं रहे थे और उनका पोता युवा होकर अपने सपनों की तितली के पीछे दूर परदेस में था.

पार्क में लगाया गया रिंकी-नीम अब भी आबाद है. जामुन के पेड़ से उसकी अच्छी दोस्ती लगती है. क्या दोनों बाबू को याद करते होंगे?

हां, नीम का एक पौधा बाबू ने साथी महेश पाण्डे को भी दिया था. वह भी  उनके इंदिरा नगर वाले घर के सामने पिछले वर्ष तक खूब लहलहाता था.  हम जब भी उस नीम के नीचे खड़े होते हैं तो महेश याद करना नहीं भूलते थे कि यह नीम बाबू का दिया हुआ है. पिछले वर्ष एक रात आंधी के बाद सुबह उनका फोन आया था- ‘यार, बाबू का दिया पेड़ कर रात गिर गया.’ वे देर तक दुखी होते रहे थे.

……..

मेरे बचपन की कैनाल कॉलोनी का वह अहाता अब काफी बदल गया है. वह बूढ़ा नीम भी अब वहां नहीं है. वह नीम बचपन की मेरी स्मृतियों का अभिन्न हिस्सा था. उसके नीचे बैठ कर हमने स्कूली और स्कूलेतर पढ़ाई की, उसके तने से लगाकर घरौंदे बनाये और उसकी डालों पर बंदरों की तरह उछल कूद करते हुए बड़ों की डांट भी खायी. गर्मियों की दोपहर उसकी घनी छाया में हमारी खाट पड़ी रहती और रातों को उसी की हवा हमें घमौरियों की चिनचिनाहट के बावज़ूद सुला देती. कॉलोनी के लोग अक्सर उस पर चढ़ कर पतली टहनियां दातून के लिए तोड़ते. बाबू शाम को खाने के बाद अपने साथियों के साथ उसी के नीचे बैठ कर हुक्का पीते और सुख-दु:ख कहते-सुनते थे.

उसी नीम का एक वंशज़ आज हमारे पत्रकारपुरम वाले जीवन का साक्षी बना खड़ा है. क्या बाबू ने सोच-समझ कर ही अपने पोते को कैनाल कॉलोनी से निमकौरियां लाकर इस नई कॉलोनी में बोने का खेल सिखाया होगा? क्या वे चाहते थे कि उनके साथी नीम की पीढ़ी उनकी अगली पीढ़ियों का साथ निभाये?

उन्होंने ऐसा सोच-समझ कर ही किया हो तो कोई आश्चर्य नहीं क्योंकि बाबू थे बहुत धुनी. वे ज़्यादातर चुप रहते थे लेकिन सोचते और सोचा हुआ काम करते रहते थे. उनके लगाये-बचाये पेड़ों की बात चल रही है तो एक और प्रसंग याद आ रहा है. बाबू को नीबू बहुत पसंद था, कागजी नीबू. खाते समय वे अपनी थाली में आधा नीबू ज़रूर रखते. खाने के दौरान और खाना खत्म कर के वे नीबू का टुकड़ा खूब अच्छी तरह चूसते. एक बार ऐसे ही नीबू चूसते हुए उसका रस उनकी सांस-नली में चला गया और वे बेचैनी से छटपटाते हुए बाहर भागे थे. मैं छोटा ही था, डर कर रोने लगा था. काफी देर बाद बाबू सामान्य हो पाये थे. खैर, इससे उनके नीबू चूसने के क्रम में अन्तर नहीं आया. पहाड़ जाते तो कई नीबू साथ ले जाते. वहां बड़े-बड़े नीबू (चूख, गलगल, आदि) तो बहुत होते थे लेकिन पहाड़ी गांवों में मैंने कागज़ी नीबू नहीं देखे. गांव में ईजा के बक्से में भी सूखे नीबू पड़े रहते. उसे गैस की शिकायत थी और बाबू का लाया सूखा नीबू चूसती थी. गांव के और लोग भी हारी-बीमारी में सूखा नीबू मांगने आते.  सूखे नीबू खत्म हो जाते तो ईजा अपने बक्से से अमृत धारा की नन्ही शीशी निकाल कर देती.

(नवीन जोशी के ईजा -बाबू , श्रीमती पार्वती जोशी और दिवंगत श्री हरिदत्त जोशी, 1978)

तो, एक बार बाबू ने लखनऊ में कैनाल-कॉलोनी वाले क्वार्टर में नीबू चूसने के बाद उसके बीज टिन के छोटे डिब्बे में मिट्टी भर कर बो दिये. बीजों को तो मिट्टी-पानी चाहिए, बस. टिन के उस डिब्बे में नीबू के पौधे उग आये. बाबू ने एक स्वस्थ पौधा छोड़ कर बाकी निकाल दिये और उसे बरामदे के एक उजले कोने में रख कर पालने लगे. पौधा धीरे-धीरे बड़ा होने लगा.

एक दिन मैंने पूछा था- ‘इसका क्या करेंगे?’

घर ले जाऊंगा’, उनका संक्षिप्त जवाब था. ‘घर’ वे पहाड़ के अपने गांव को कहते थे. लखनऊ में, जहां वे साल के दस-ग्यारह महीने रहते थे, तो ‘क्वार्टर’ था या ‘डेरा.’

और सचमुच, असौज (आश्विन) के महीने में जब वे महीने भर की छुट्टी लेकर गांव जाने लगे तो एक भारी होल्डॉल, तेल का एक कनस्तर और एक बड़े थैले में भरे सामान के अलावा इस बार उनके साथ बड़े जतन से संभाला हुआ टिन के डिब्बे में उगाया नीबू का वह पौधा भी था. बाबू हर साल असौज के महीने ही लम्बी छुट्टी पर घर जाते थे ताकि वहां खेती-बाड़ी के कठिन काम में ईजा का हाथ बंटा सकें. वे लखनऊ से घर के लिए तरह-तरह का सामान ले जाते थे, जैसे- मिट्टी का तेल, सरसों के तेल का टिन, भुना चना, कपड़े-लत्ते तो खैर होने ही वाले ठहरे. हल्द्वानी से इसमें गुड़ की चंद भेलियां भी शामिल हो जातीं. इतना सामान लखनऊ से पहाड़ के सुदूर गांव तक ले जाना आसान नहीं होता था. रात भर बैठे-बैठे (रिजर्वेशन कराने का सवाल ही नहीं होता था) ट्रेन का सफर, दूसरे दिन भर कुमाऊं मोटर्स यूनियन लिमिटेड की खचड़ा बस में हल्दवानी से बागेश्वर तक की थकाऊ-उबाऊ लम्बी यात्रा, तीसरे दिन फिर बागेश्वर से काण्डा तक दो घण्टे का बस का सफर और उसके बाद 10 मील का चढ़ाई-उतराई वाला कठिन पहाड़ी रास्ता. तो भी बाबू ने नीबू का वह पौधा घर तक सकुशल पहुंचा दिया.

मैंने तो अगली गर्मी की छुट्टियों में गांव जाने पर घर के सामने बाड़े (क्यारी) में उसे लगे देखा. ईजा ने बताया कि तेरे बाबू ने नीबू के पौधे को टिन के डिब्बे समेत बाड़े में रोप दिया. क्यों, डिब्बे से निकाल कर क्यों नहीं लगाया? इस डर से कि डिब्बे से निकालने में कहीं पौधे को कोई नुकसान न हो जाए. इतनी मेहनत, धैर्य और जतन से पाला और सैकड़ों मील पहुंचाया जो था!

इस संकल्प के सामने टिन के मामूली डिब्बे की क्या बिसात थी जो वह पौधे को बढ़ने से रोक पाता! मिट्टी के भीतर बढ़ते पौधे की जड़ों ने उसे फाड़ा होगा, मिट्टी और नमी ने भी टिन को कुछ गलाया होगा और इस तरह बाबू का वह नीबू का पौधा हमारे बाड़े में खूब पला-बढ़ा, फला-फूला. बाबू और हम तो परदेसी ठहरे, ईजा ही चिट्ठी में लिखती थी कि कैसे उसके फलों से लदी डालियां जमीन तक झुक आईं हैं, कि ढेर सारे पके नीबू सुबह-सुबह बाड़े में गिरे मिलते हैं, कि गांव के किस-किस को बीमारी में नीबू ने फायदा पहुंचाया और यह भी कि दूर-दूर के गांवों से लोग नीबू मांगने आते रहते हैं, वगैरह. एक बार ईजा जाड़ों में लखनऊ आयी तो एक झोला भर कर वही नीबू साथ लायी थी. उसी डेरे में वह संतति-नीबू चूसे गये जिसके बरामदे में एक मातृ-बीज से उनका फलना-फूलना रचा गया था.

(नवीन जोशी का घर -गाँव , रैंतोली , पिथौरागढ़ )

बाबू चले गये. ईजा अशक्त होने पर पहाड़ छोड़ कर हमारे साथ लखनऊ आ गयी. गांव का पुश्तैनी घर धीरे-धीरे खण्डहर हो रहा है लेकिन नीबू फलता रहा. गांव में बच रहे लोग बताते थे कि आपके बाड़े का नीबू अब भी फलता है और लोगों के बहुत काम आता है.

बाबू रिटायर हो कर अपने ‘घर’ लौट जाना चाहते थे. उस घर को बनाये रखने के लिए ही वह लखनऊ में नौकरी कर रहे थे. उनका यह सपना पूरा नहीं हो सका लेकिन नीबू के फलदार पेड़ के रूप में वे वहां मौज़ूद रहे.

प्रकृति हमें अपने पुरखों से और अपनी मिट्टी से कितने अद्भुत माध्यम से जोड़े रखती है!

 

(सभी तस्वीरें नवीन जोशी के संग्रह से ) 

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