समकालीन जनमत
स्मृति

हुई नामवरी सुबह की सांझ….

हिन्दी के शीर्षस्थ शोधकार-समालोचक नामवर सिंह (जन्म: 1 मई 1927- मृत्यु: 19 फ़रवरी 2019) को युवा लेखिका अर्पिता राठौर की भावांजलि। सम्पा.

 

अर्पिता राठौर


वर्तमान ‘साहित्य और आलोचना’ के युग पुरुष ‘दूसरी परंपरा की खोज’ कर ‘हिंदी में अपभ्रंश का योग’ जता कर ‘कविता की ज़मीन, ज़मीन की कविता’ को ‘कविता के नए प्रतिमान’ प्रदान करते हैं| आज उनका जाना भले ही एक युग का अंत हो लेकिन जब तक इस ज़माने में अभिव्यक्ति का प्रश्न बना रहेगा तब तक नामवर सिंह भी हमारे बीच मौजूद रहेंगे|

समकालीन जगत के तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद भी नामवर जी की लेखनी में दृढ़ता है| एक ऐसी दृढ़ता जो अपने समय को और अपने समय के साहित्यकारों को तो चुनौती देती ही है, साथ ही उन चुनौतियों का समाधान भी लेकर आती है| या यूं कहें कि ‘अनुभूति की प्रामाणिकता’ से अस्मिता की खोज करने वाले ‘बकलम खुद’ आलोचकों के मध्य स्वयं प्रतिपक्ष खड़ा करते हैं और ‘वाद विवाद संवाद’ के ज़रिए अपने तर्क शास्त्र से साहित्य जगत को हतप्रभ कर देते हैं। एक अन्वेषी के रूप में नामवर जी की दृष्टि उन अनछुए आयामों पर भी जाती है जो साहित्य जगत में नवीन परिभाषा की मांग करते हैं। वे ‘भावबोध’, ‘तनाव’, ‘द्वंद्वात्मक प्रणाली’,  ‘बहुलतावाद’, ‘सपाटबयानी’ जैसे नए शब्द तो गढते ही हैं, पर साथ ही कुछ सामान्य शब्दों में अद्भुत रंग सम्मिश्रित कर उन्हें अपनी आलोचना का एक अहम हिस्सा बनाते हैं। इसीलिए यहां यह कहना आवश्यक है कि जिस प्रगतिशीलता और मानवतावाद की परिकल्पना हज़ारी प्रसाद द्विवेदी करते हैं, उसमें समय के साथ जो विकृतियां शामिल होती गई हैं उस पर डॉ. नामवर सिंह पहले चोट करते हैं और फिर प्रगतिशीलता के नए मुहावरे भी गढ़ते हैं।

इतिहास और आलोचना के समन्वय से निर्मित नामवर सिंह, हर युग और उसकी हर परिस्थिति को तब तक कुरेदते हैं जब तक उसका मूल कलेवर सामने ना आए। इसीलिए छायावाद के संदर्भ में नवीनतम दृष्टि लाने वाले वे पहले आलोचक बनते हैं  जो उसको परत-दर-परत खोल कर उसकी वास्तविकता को हमारे सामने प्रस्तुत कर देते हैं। जब वे कहते हैं- “छायावाद का स्थायित्व उसके व्यक्तिवाद में नहीं, उसकी आत्मीयता में है, काल्पनिक उड़ान में नहीं आत्मप्रसार में है……… दृष्टिकोण में नहीं दृष्टि में है…”1- तो यहां यह बात केवल छायावाद तक सीमित नहीं रह जाती बल्कि व्यापक अर्थ में एक ऐसा वाक्य बन जाता है जो संपूर्ण साहित्य को समझने का एक विवेक विकसित करता है, एक ऐसा विवेक जो किसी पूर्वाग्रह से रहित हो। मौखिक परंपरा को आगे बढ़ा आलोचना के नए अफसाने गढ़ने वाले नामवर सिंह यदि किसी के प्रति सबसे अधिक प्रतिबद्ध हुए हैं तो केवल और केवल अपने समय के प्रति। उस समय को ही केंद्रित करते हुए वे लेखकों और वादों के पुनर्प्रतिष्ठापन के पक्षधर रहे हैं। वे बात करते हैं ‘रिअडैप्टेशन’ की,  मांग उठाते हैं इतिहास के पुनर्लेखन की, एक ऐसा इतिहास जो पारंपरिक रूप से चली आ रही औपनिवेशिक दृष्टि से कोसों दूर हो।

नामवर सिंह के साथ साथ एक नया युग अपने कदम बढ़ा रहा था। इस युग में एक ओर पंचवर्षीय योजना की विफलता झलकती है, तो दूसरी ओर यहां वैश्विक स्तर पर दो महागुटों की टकराहट की तस्वीरें है, कहीं विचारधाराओं में प्रतिस्पर्धा जारी है तो कहीं आंतरिक द्वंद्व की आहट महसूस होती है। ऐसे दौर के साथ नामवर जी हाथ तो मिलाते हैं पर उसके साथ कभी समझौता नहीं करते। वे तो उन रास्तों में पैठ बनाते तमाम अंतर्विरोधों में भी नई राहे खोजते हैं।
विचार दृष्टि अथवा प्रतिमानों के प्रति प्रतिबद्ध आलोचक उनके बाद शायद ही कोई दूसरा हुआ होगा। युगबोध और भावबोध  के बीच समन्वय करने वाले आलोचक नामवर सिंह ‘अच्छे’ या ‘बुरे’ जैसे शब्दों को साहित्य की परिधि से दूर ही रखते हैं। उनके लिए साहित्य की अपनी कुछ रूढ़ियां हैं, कुछ प्रतिमान हैं जिनके आधार पर या तो कोई रचना खरी उतरती है या नहीं। इन सब के बीच नामवर सिंह इस बात को भी स्वीकार करते हैं कि समकालीन जगत में साहित्य के प्रतिमानों में बदलाव की आवश्यकता है। समय की इस ज़ोर जरूरत के चलते नामवर जी की सफलता भी तभी है जब आज का आलोचक उस दूसरी परंपरा के मध्य में से किसी नई परंपरा का अन्वेषण करे जो अपने युगबोध के साथ  तालमेल बैठा पाए।

तमाम विरोध और समर्थन के बावजूद भी नामवर जी तटस्थता के पक्षधर रहे हैं। वे अस्मिता की खोज को अभिव्यक्ति की खोज मानते हैं जिसके चलते नई कहानी के संदर्भ में निर्मल वर्मा कृत ‘परिंदे’ को और नई कविता के संदर्भ में ‘मुक्तिबोध’ को सही ढंग से समझने और समझाने का प्रयास करते हैं। वे एक ऐसे आलोचक के रूप में हमारे समक्ष आते हैं जो लगातार अपने समय के साथ तर्क की कसौटी पर बहस करता है। ‘वाद विवाद संवाद’ में उनकी यही बात सामने आती है जहां वे समकालीन भाषा, साहित्य और आलोचना कर्म की बुनियादी समस्याओं को उजागर करते हैं। यहाँ एक ओर वे प्रगतिशील साहित्यधारा में अंधलोकवादी रुझान पर विचार करते हैं तो वहीं दूसरी ओर नव्यऔपनिवेशीकरण जैसी गंभीर समस्या के प्रति भी चिंतनशील रहते हैं। अतः नामवर सिंह एक ऐसी नवीन परंपरा का नाम है जो अपने समय के साथ संवाद स्थापित करती हुई  कॉलोनियल डिसकोर्सेज से अलग खड़ी होती है।

19 फरवरी, 2019 की सांझ सृष्टि की क्रूरता लिये हुए आई और आधुनिक हिंदी आलोचना के एक युग को लील गई,। इससे नामवरी आलोचना का ‘वाद विवाद सम्वाद’ थम-सा गया….

“नभ के नीले सूनेपन में
हैं टूट रहे बरसे बादर
जाने क्यों टूट रहा है तन !

बन में चिड़ियों के चलने से
हैं टूट रहे पत्ते चरमर
जाने क्यों टूट रहा है मन !

घर के बर्तन की खन-खन में
हैं टूट रहे दुपहर के स्वर
जाने कैसा लगता जीवन !

(नामवर सिंह)

(अर्पिता राठौर दिल्ली विश्वविद्यालय में एम. ए. हिंदी की छात्रा हैं और कविताएँ भी लिखती हैं)

 

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