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दिव्य कुंभ: जाति ही पूछो साधु की उर्फ दलित संतों की अपमान गाथा  

19 फरवरी, संत रविदास की जयंती है आज और इलाहाबाद में लगे अर्ध कुंभ में माघी पूर्णिमा का प्रमुख स्नान भी । आस्था का यह पर्व आज भले ही हिंदू जागरण का पर्व बन गया हो या हिंदुत्व की राजनीति का अखाड़ा बना दिया गया हो, लेकिन इसमें शुरू से बौद्ध, कबीरपंथी, नाथपंथी, संत रविदास और संत वाल्मीकि को मानने वाले तमाम संप्रदाय आते रहे हैं ।
 यह अलग बात है कि आज उनकी आवाजें नेपथ्य में चली गई हैं और कुछ जो सनातन धर्म से अलग थे, जैसे नाथ पंथ, वे आज हिंदुत्व और सत्ता के वैभव से जगमग कर रहे हैं ।
जूना अखाड़ा
 ऐसे ही एक वैभवशाली अखाड़े जूना अखाड़े ने पहली बार एक दलित संत को महामंडलेश्वर की उपाधि से विभूषित किया है ।  उत्तर प्रदेश के जिले आजमगढ़ में पैदा हुए कन्हैया कुमार कश्यप अब महामंडलेश्वर कन्हैया प्रभुनंद गिरी हैं, जिन्होंने अपने जीवन संघर्ष, जातिभेद के अपमान, दसवीं के बाद संस्कृत पढ़ने की इच्छा लेकिन शूद्र होने के कारण नहीं पढ़ पाने और संत समाज में भी शूद्र होने की मर्मांतक पीड़ाओं का वर्णन किया है ।लेकिन इन से गुजरते हुए इस मुकाम तक पहुंचने को उन्होंने संत रविदास के 1000 वर्ष बाद खुद को उस परंपरा को पुनः स्थापित करने वाला बताया ।
 उनका कहना था कि मैं धर्म में समानता के लिए लड़ रहा था और यह हासिल हुआ है,  इसलिए हमारे वो सभी भाई जो बौद्ध, ईसाई या मुसलमान हो गए हैं, अब सनातन धर्म में वापसी करें । मैं उनके चरण धोऊँगा।
 जूना अखाड़े को सर्व समावेशी बताते हुए वे दलित समुदाय के लोगों की मेधा का गौरव गिनाते हुए वेद, पुराण, रामायण, संविधान से लेकर एकलव्य, योद्धा कर्ण, सम्राट अशोक, सम्राट चंद्रगुप्त, डॉ आंबेडकर जैसे नायकों का जिक्र करते हुए कहते हैं कि हमने मुगलों और अंग्रेजों से लड़ते हुए अपनी मेधा को प्रकट किया है और मनवाया है ।
महामंडलेश्वर जूना अखाड़े की एक हिंदू अतिवादी संगठन से जुड़े रहे, बंदूकधारी अंग रक्षकों, ढोल नगाड़े के साथ शाही स्नान करने को वह ‘धर्म में समानता’ का क्षण करार देते हैं ।
हालांकि बातचीत में वे कहते हैं कि जब मैं अपने समुदाय के लोगों से बात करने जाता हूं तो वे पहले मुझे ब्राह्मणवाद का एजेंट ही समझते हैं । वे संविधान को ही अपनी धार्मिक पुस्तक मानते हैं ।  लेकिन मैं जब अपने मिशन के बारे में समझाता हूं तो वे समझते भी हैं ।
 यह कथा तो एक दलित संत की है, लेकिन याद रखिए यह जूना अखाड़े के संत हैं, जहां आज की सत्ताधारी पार्टी के सारे नेता सर झुकाते थकते नहीं हैं । खुद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह जी कई बार न सिर्फ आ चुके बल्कि उनकी ओर से संतो-अखाड़ों के पीठाधीश्वरों को भोज, पत्रं-पुष्पम की भेंट, महंत योगी जी समेत इसी अखाड़े के प्रांगण में आयोजित होता रहा है ।आज की तारीख में सबसे ज्यादा राज सत्ता के नजदीक यही अखाड़ा दिखता है ।
लेकिन क्या करिएगा । इसी दिव्य कुंभ में अन्य दलित संप्रदायों से आने वाले संतों, संगठनों, संस्थाओं का हाल दूसरी कथा ही कहते दिखते हैं।
किन्नर अखाड़ा
 सेक्टर 12 , दलित अखाड़ा जहाँ से शुरू होता है, में स्थापित इस अर्धकुंभ में सर्वाधिक चर्चित किन्नर अखाड़ा, जिसने जूना अखाड़े के साथ शाही स्नान में हिस्सा लिया और जूना पीठाधीश्वर ने  इसे जूना अखाड़े का अभिन्न अंग बताया, उसी के ठीक सामने स्थित है अखिल भारतीय महर्षि वाल्मीकि साधु अखाड़ा परिषद ।2012 में दिल्ली में, ठीक 2013 के इलाहाबाद में लगने वाले कुंभ के पहले, सामाजिक गैर बराबरी विभिन्न पन्थों और अखाड़ों में दलित संतो के साथ भेदभाव से क्षुब्ध होकर इन संतों ने अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के समानांतर अपने अखाड़े का गठन किया ।
वाल्मीकि अखाड़ा के संत
इस अखाड़े के सचिव सुनील राजदान बताते हैं कि विभिन्न पंथों यथा नानक पंथ,कबीर पंथ, नाथ पंथ, शाह पंथ सभी में दलित  संत लंबे समय से भेदभाव के कारण घुटन महसूस कर रहे थे । उनकी उपेक्षा हो रही थी ।
इसलिए तकरीबन 300 से अधिक संतों ने मिलकर इसका गठन किया है । वह बताते हैं कि 2013 के कुंभ में हम लोग शामिल भी हुए ।
महर्षि वाल्मीकि अखाड़ा
एक पुरानी कथा कबीर के गुरु रामानंद जी के बारे में कही जाती है कि वह मठ में रहते थे ।लेकिन बाद में मठ छोड़ कर अलग हो गए ।कारण यही था -‘संगत साथ में पंगत अलग’ । पता नहीं यह सच है या कथा, पर आज जब दलित संत अलग अखाड़ा परिवार बना रहे हैं तो सवाल आज भी वही है कि धर्म में समानता नहीं है । यहां भी जाति देख कर ही सब चलता है । यह अखाड़ा भी इसी भेदभाव से लड़ने के लिए संगठित हो रहा है ।
राजदान जी बताते हैं कि हमारे दो महामंडलेश्वर हैं -एक दिल्ली में स्थित पँचकुइयां के आदि  वाल्मीकि मंदिर के पीठाधीश्वर (जहां से मोदी जी झाड़ू लगाकर स्वच्छता अभियान की शुरुआत करते हैं)  विद्यार्थी जी महाराज और दूसरे पंजाब के प्रगट नाथ जी महाराज जो इस अखाड़े के अध्यक्ष भी हैं ।
वह बताते हैं कि अलग अलग पंथों में गए दलित संतो से संपर्क कर उन्हें इससे जुड़ने का अभियान वे चला रहे हैं । इस अर्धकुंभ में हम लोग पूरी ताकत व श्रद्धा से शामिल होने आए थे,  लेकिन लगातार आवेदनों के बाद भी हमें पर्याप्त जमीन नहीं दी गई ।  मेला प्रशासन भी हमारे साथ जबरदस्त भेदभाव कर रहा है, जबकि मेले का क्षेत्रफल दूना कर दिया गया है ।  लेकिन दलित संंतों के लिए इनके पास जमीन नहीं है ।
वाल्मीकि अखाड़े के भीतर का दृश्य
वह दिखाते हैं कि भला इतनी छोटी जगह पर 200 से ऊपर संत  और श्रद्धालु  कैसे रह सकते हैं ।उन्होंने बताया कि हमने 50 कुर्सियां, दस रजाई गद्दे की मांग की थी । बदले में हमें 5 कुर्सी और मात्र 5 रजाई ही दी गई, गद्दा तक नहीं । 2 फरवरी को देशभर से संत आए लेकिन व्यवस्था देख कर लौट गए और 4 फरवरी के मौनी अमावस्या के स्नान का बहिष्कार कर दिया।
वे कहते हैं कि हमने अपने लोगों के लिए अपने खर्चे से टेंट लगवाए।  इस भेदभाव के खिलाफ स्वयं राजदान जी मेला अधिकारी कार्यालय के बाहर 9 फरवरी से धरने पर बैठ गए । जब 10 फरवरी तक भी उनकी बात नहीं सुनी गई तो वे 11 फरवरी से आमरण अनशन पर चले गए । अंततः 14 फरवरी की सुबह उनसे मिलने सेक्टर मजिस्ट्रेट आए न कि मेला अधिकारी ।  14 की दोपहर राजदान जी ने अनशन समाप्त किया ।
जब उस रात मैं उनसे मिला तो इस धार्मिक और प्रशासनिक भेदभाव से वे काफी आहत थे ।उन्होंने बातचीत में कहा कि पूरा प्रशासन उनकी सेवा में लगा है, उनकी सुविधाओं का ख्याल कर रहा है, जिनके सत्ता और राजनीतिज्ञों से संबंध हैं । ऐसे में मैं प्राण भी दे दूं तो भी कोई सुनने वाला नहीं है ।
बातचीत में मैंने राजदान जी से पूछा कि सभी पंथों के दलित संतों से बातचीत करके एक मोर्चा क्यों नहीं बनाते? उन्होंने बताया कि हम प्रयास कर रहे हैं। सबसे बात हो रही । किन्नर अखाड़े की मां भवई  नाथ से भी बात हो रही है ।
मैंने उनसे उनकी मांग पूछी तो उन्होंने कहा कि भगवान वाल्मीकि, जिन्होंने हमें रामायण दी,उनकी एक मूर्ति शहर से लेकर मेला क्षेत्र तक कहीं नहीं है, जबकि सैकड़ों मूर्तियां बनी हैं ।  आज भी भगवान वाल्मीकि के लिए कथा वाचक लोग अपशब्द का इस्तेमाल करते हैं। इस पर रोक लगनी चाहिए । हमारे साथ यह भेदभाव खत्म होना चाहिए। यह धर्म का पर्व है, यह समानता का संदेश देने वाला है, यहां भेदभाव और इसे राजनीति का अखाड़ा नहीं बनना चाहिए ।
 मैंने उनसे बात करने के बाद और फिर मिलने के बाद  जब मेले में ऐसे और हिस्सों की तरह चला तो उनकी भी एक झलक, उनकी स्थिति आप तस्वीरों में देख सकते हैं ।  वह रविदास समाज के संत और उनके कैंप हों या बौद्ध समाज के । इन्हीं के अगल-बगल देशभक्ति भी बेचने वाले बाबाओं के जगमगाते महलों जैसे कैंप की झलक आपको इन तस्वीरों में मिल जाएगी ।
रैदास अखाड़ा और आस पास जगमगाते पंडाल
सुनील राजदान जी की मांगों पर विचार करता जब मैं शहर की तरफ लौटा तो मेरी नजर शहर में नवाब युसूफ रोड स्टेशन की सिविल लाइंस वाली रोड पर बने वाल्मीकि चौराहे पर चली गई । यहां चौराहे पर एक मूर्ति शिल्प है पार्क के अंदर, हां मूर्ति नहीं है वाल्मीकि की । वह दो तरफ से उप मुख्यमंत्री जी के मुस्कुराते बैनर से आच्छादित थी । मैं उसकी तस्वीर उतार ही रहा था कि एक स्थानीय युवक शैलेश ने कहा कि जरा उसकी भी फोटो खींच लीजिए, यह जो फोकस लाइट लगी हुई है, पूरा मेला बीत चला लेकिन यह आज तक नहीं जली।  इसकी भी कोई सुध लीजिए,बाकी चौराहे तो जगमगा रहे हैं ।
वाल्मीकि चौराहा जहाँ कभी लाइट्स नहीं जलीं
मैं इस संकेत पर दुखी था या हतप्रभ, नहीं कह सकता । पर सोच रहा था, महर्षि वाल्मीकि जो आज स्वयं भगवान के अवतार हो गए, खुद ही कहते हैं कि
रामस्य चरितं कृत्स्नं कुरु त्वमि ऋषि सत्तम ।
धर्मात्मनो भगवतो लोके रामस्य धीमतः   
वह किसी ईश्वर की नहीं, इस पृथ्वी लोक के एक इंसान की कथा लिख रहे थे । यह रामायण है, तुलसीदास का रामचरितमानस नहीं । और संत रविदास अपनी मृत्यु के ठीक पहले कह रहे थे ‘जीवन चार दिवस का मेला रे
बांभन झूठा वेद भी झूठा झूठा ब्रह्म अकेला रे’।
दलित संतों से इन बातों पर बहस फिर कभी ।फिलहाल तो सवाल यह  कि  सर्व समावेशी, सत्ताश्रयी अखाड़े और इस दिव्य कुंभ की प्रायोजक हिंदुत्व की सरकार, उसके संगठन जो दलित एकता, घर वापसी, आदिवासी समागम करवा रहे हैं और वे महामंडलेश्वर जो स्वयं अपने को संत रविदास के बाद पहली बार धर्म में समानता का उद्घोष कर रहे हैं, इन दलित संतों को बराबरी का सम्मान और सामान्य सुलभ सुविधाओं के लिए इनके संघर्ष में सहयोग करेंगे या फिर साधुओं की जाति  जानकर ही उसके अनुसार व्यवहार किया जाएगा। श्रेणी क्रम बरकरार रहेगा और एक दो  दलित, महिला,किन्नर को पदवी दे कर उसका जोर शोर से विज्ञापन ही किया जाएगा

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