दरभंगा। शहीद–ए–आज़म भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु तथा क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह संधू ‘पाश’ के शहादत दिवस के अवसर पर जन संस्कृति मंच, दरभंगा के तत्वावधान में आभासी माध्यम से संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता जसम बिहार के राज्य उपाध्यक्ष डॉ. रामबाबू आर्य, संचालन समीर ने तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. संजय कुमार ने किया।
संगोष्ठी की विधिवत शुरुआत जसम बिहार के राज्य सचिव दीपक सिन्हा द्वारा पाश की सुप्रसिद्ध कविता ‘हम लड़ेंगे साथी’ के पाठ से हुई।
कार्यक्रम में बतौर विशिष्ट वक्ता लखनऊ से जुड़े सुप्रसिद्ध जनबुद्धिजीवी एवं संस्कृतिकर्मी कौशल किशोर ने ‘भगत सिंह और पाश: अँधियारे का उजाला’ विषय पर बोलते हुए कहा कि भगत सिंह केवल भारत के ही नहीं बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के नायक हैं। भले राष्ट्रीय स्वाधीनता के बाद देश का बंटवारा हो गया लेकिन भगत सिंह हमारी साझी विरासत हैं। सियासतदान लाख बांटने की कोशिश करें हमें लेकिन वे हमें पुल की तरह जोड़ते हैं। जिस तरह भारत में भगत सिंह को शहीद–ए–आज़म कहा जाता है, पाकिस्तान में वे मिट्टी के लाल (सन ऑफ स्वायल) कहे जाते हैं। पाकिस्तान के 40 से अधिक संगठन उन्हें वहां का सर्वोच्च पुरस्कार ‘निशान–ए–हैदर’ देने की माँग कर रहे हैं। भगत सिंह और उनके साथियों पर केंद्रित नाटक ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ के पाकिस्तान में 5 हजार शोज़ हो चुके हैं, यह बतलाता है कि वहाँ की अवाम में भगत सिंह की कितनी स्वीकार्यता है।
उन्होंने आगे अपने व्याख्यान में कहा कि हमारे लिए भगत सिंह का सर्वाधिक महत्व इसलिए है कि उन्होंने क्रांतिकारी आंदोलन का वैचारिक नेतृत्व किया। महज 7 वर्ष के अपने राजनीतिक जीवन में उन्होंने एक लम्बी यात्रा तय की। उन्होंने भारत के स्वशासन की मांग तो की ही साथ–साथ भविष्य का भारत समाजवादी हो, इस स्वप्न को साकार करने की रूपरेखा तैयार की। क्रांतिकारी आंदोलन को यह भविष्य दृष्टि दी उन्होंने कि समाजवादी भारत बनाने के लिए वे निरन्तर संघर्ष करें। भगत सिंह के विचारों की अनुगूंज आज भी सीएए–एनआरसी के विरोध में हुए आंदोलनों में, किसान आंदोलनों आदि में स्पष्टतः सुनी जा सकती है। वास्तव में भगत सिंह ने भारत का एक नया मॉडल पेश किया। भगत सिंह के स्वप्न को पाश ने अपने साहित्य के माध्यम से आगे बढ़ाया। पाश ने भगत सिंह के सपनों का समाज बनाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। भारत की इस धरती पर दोनों नायक उजाले की तरह प्रकट होते हैं। बल्कि कहिए इस आसमान में चमकते रहते हैं। भगत सिंह और पाश राजनीति और संस्कृति के बीच एकता की अनूठी मिसाल हैं। हमें इन अमर शहीदों के सपनों को जिलाए रखना होगा!
‘कोई क्यों बनता है भगत सिंह!’ विषय पर बोलते हुए कार्यक्रम के विशिष्ट वक्ता कवि व जनबुद्धिजीवी शंकर प्रलामी ने कहा कि भगत सिंह युगों में पैदा होते हैं इसलिए वे हमारे लिए शहीद–ए–आज़म हैं। वे क्रांति के साथ–साथ निर्माण, पुनर्निर्माण की बात करते हैं। भगत सिंह ने समाज की जो पुनर्कल्पना प्रस्तुत की अपने लेखों, पत्रों, भाषणों से; वह उनके महान भविष्यद्रष्टा होने का प्रमाण है। वास्तव में यह भविष्य–दृष्टि उन्होंने सुचिंतित वैचारिक आत्मसंघर्ष से अर्जित की थी। हमें इसकी झलक उनके लेखों में देखने को मिलती है। 17 वर्ष की आयु से उन्होंने गूढ़ से गूढ़ सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक विषयों पर लिखना शुरू कर दिया था। वे अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी चिंतन–धारा में एक प्रौढ़ चिंतक और लेखक के रूप में उभरते हैं। वास्तविक आजादी का सवाल उनके चिंतन के केंद्र में था। भगत सिंह तत्कालीन राजनीति की धुरी बन चुके थे। उनकी शहादत के बाद देश–दुनिया के प्रायः सभी बड़े राजनेताओं ने उन पर टिप्पणियां लिखी। सबने उन्हें असाधारण नेता बताया। भगत सिंह का मकाम शहादत से भी कहीं ऊंचा उठ चुका था। उनकी फांसी के 16 वर्षों बाद ब्रिटिश हुकूमत दफ्न हो गई। लेकिन यह कहना जरूरी है कि आजादी मिल जाने के बाद भी भगत सिंह के सपने आज तक अधूरे हैं। इन्हें पूरा करने की जिम्मेदारी हम सब पर है।
विषय–प्रवेश कराते हुए जसम के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रो. सुरेन्द्र प्रसाद सुमन ने कहा कि भगत सिंह और पाश के सपने एक थे। इसलिए मैं 23 मार्च को शहीदी मिलन दिवस मानता हूँ। भगत सिंह ने शोषण मुक्त देश–दुनिया का सपना देखा था। आज उन स्वप्नों पर साम्राज्यवादी ग्रहण लग चुका है। अमेरिका पूरे दुनिया को युद्ध की जद में धकेलने पर आमादा है। देश के भीतर भी अल्पसंख्यकों, दलितों–वंचितों का जीवन संकटग्रस्त है। यही समय है कि हम भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु और पाश के सपनों को पूरा करने की जिम्मेदारी उठाएं और सामाजिक–राजनीतिक रूपांतरण का हिस्सा बनें।
अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. रामबाबू आर्य ने कहा कि आज भगत सिंह, सुखदेव राजगुरु और पाश के सपनों को नई पीढ़ी के बीच ले जाने की नितांत आवश्यक है।
इस मौके पर डी.एम.मिश्र, अशोक श्रीवास्तव, सईदा सायरा, डॉ.अजय कुमार, दुर्गानंद ठाकुर, चंद्रशेखर आजाद, रूपक कुमार, राजकुमार, दीपक कुमार, खुशी कुमारी, लक्ष्मण कुमार, डॉ.संतोष यादव, मिथिलेश कुमार, अमरेन्द्र कुमार, आस्था पांडेय, बेबी कुमारी, कंचन रजक, जयप्रकाश, सुभद्रा कुमारी सहित उत्तर प्रदेश और बिहार से अच्छी संख्या में श्रोतागण जुड़े हुए थे।

