Friday, July 1, 2022
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जेएनयू पर हमला मस्तिष्क, संवाद , बहस , चिंतन, सत्य और न्याय पर हमला है

अमेरिकी दार्शनिक जैसन स्टेनले (जन्म 12 अक्टूबर 1969) की पुस्तक ‘हाउ फासिज्म वर्क्स द पॉलिटिक्स ऑफ यूएस एंड देम 2018’ का एक अध्याय एंटी इंटेलेक्चुअल है। इस अध्याय में उन्होंने अमरीकी दकियानूसी, रूढ़िवादी लेखक ‘फ्रंटपेज’ पत्रिका के संपादक डेविड होरोविट्स को 2006 में प्रकाशित ‘द प्रोफेसर: 101 मोस्ट डेंजरस प्रोफेसर इन अमेरिका’ में वामपंथी और उदारवादी प्रोफेसरों की चर्चा है जिनमें से अनेक फिलिस्तीनी अधिकारों के समर्थक थे। तीन वर्ष बाद 2009 में उनकी एक और पुस्तक ‘वन पार्टी क्लासरूम’ प्रकाशित हुई जिनमें अमेरिका में 150 अधिक खतरनाक कोर्सेज की सूची थी।

फासीवाद में संस्थाओ, उच्चतर शिक्षण संस्थाओ, प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति विरोध, प्रदर्शन आदि के लिए कोई स्थान नहीं है। जेएनयू में 5 जनवरी की शाम से जो गुंडागर्दी हुई, वह किसी भी अर्थ में सामान्य नहीं है। जेएनयू कैंपस में हुई हिंसा उस भविष्यसूचक, भविष्योदघोषी राजनीति का प्रतिबिंब है जिसे नए शत्रुओं की खोज की निरंतर आवश्यकता है – प्रताप भानु मेहता का यह कथन इंडियन एक्सप्रेस, 7 जनवरी 2020, भारत में बदलती राजनीति पर ध्यान देता है जबकि अब यह समझने की अधिक जरूरत है कि संविधान और लोकतंत्र को तार-तार किया जा रहा है। यह ध्यान देना चाहिए कि अब छात्र अपने कॉलेज परिसरों में संविधान की प्रस्तावना पढ़ रहे हैं और उसकी प्रतियां वितरित की जा रही हैं और भारतीय सांख्यिकी संस्थान – आईएसआई कोलकाता के एक प्रोफेसर ने रवीन्द्रनाथ ठाकुर की 1937 में लिखित एक कविता ‘अफ्रीका’ का, जो 1935 में मुसोलिनी द्वारा अबीसीनिया पर आक्रमण के बाद लिखी गई थी।

सभी नकाब उतर रही हैं और सरकार का असली चेहरा सामने आ रहा है। 5 जनवरी रविवार की शाम को साढ़े तीन घंटे तक जेएनयू कैंपस में 60 से अधिक नकाबपोश छात्र-छात्राओं और अध्यापकों पर पत्थरबाजी करते रहे , अनेक को पीटते रहे, हॉस्टल में घुसकर मारपीट और तोड़फोड़ करते रहे। यह सुनियोजित व्यवस्थित हमला था। जामिया और एएमयू में पुलिस ने हमला किया था। जेएनयू में पुलिस संरक्षण में यह हमला हुआ। हमले के 3 घंटे पहले जेएनयू के छात्रों ने दिल्ली पुलिस को कैंपस में मौजूद बदमाशों की मौजूदगी की सूचना दी थी पर पुलिस निष्क्रिय रही।

जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष आयुशी घोष ने दोपहर 3 बजे ही पुलिस अधिकारियों को यह सूचना दी थी कि हथियार और लाठी रोड लेकर बड़ी संख्या में छात्र प्रशासनिक भवन के पास इकट्ठे हैं और छात्रों को पीट रहे हैं। आयुशी घोष ने यह अनुरोध किया था कि उन्हें तुरंत यहां से हटाया जाए और इनके विरुद्ध कार्रवाई की जाए। 3 बजकर 7 मिनट पर यह संदेश एक पुलिस अधिकारी ने पढ़ा और सारे 4 घंटे बाद पुलिस कैंपस में आई। ढ़ाई बजे से 4 घंटे तक पुलिस कंट्रोल रूम में 50 से अधिक बार फोन किया गया। दिल्ली पुलिस ने ध्यान नहीं दिया। पुलिस के संरक्षण में नकाबपोश हमलावरों ने पथराव किया, सर फोड़ा, छात्र-छात्राओं को घायल किया, छात्रावासों के कमरों में घुस घुस कर शीशे तोड़े। यह सब अकस्मात नहीं हुआ।

हिंदी के प्रोफेसर देवेंद्र चैबे ने अपने फेसबुक पर ‘जेएनयू की एक भयावह और उदास शाम’ में यह लिखा – ‘मुंह पर गमछा और रुमाल बांधे कुछ लोग हाथों में डंडा, लाठी और क्रिकेट का बल्ला लिए छात्रों को दौड़ा दौड़ा कर साबरमती, ताप्ती हॉस्टल के गेट और ढाबों पर मार रहे थे। पुलिस गेट पर है।’ अब जब अनेक छात्र, छात्राओं और प्रोफेसरों ने इस घटना की जानकारी दे दी है इस गुंडागर्दी का अर्थ समझने की अधिक जरूरत है। दिल्ली पुलिस गृह मंत्रालय के अधीन है। अब सारे वीडियो सामने आ चुके हैं। जब हिंदू रक्षा दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष भूपेंद्र तोमर उर्फ पिंकी चैधरी ने जेएनयू में किए गए इस हमले की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली, ऐसे प्रचार का जो निराधार है, कोई अर्थ नहीं रह जाता कि दो विचारधाराओं – वामपंथी और दक्षिणपंथी के छात्रों ने आपस में मारपीट की। पिंकी चौधरी ने देश विरोधी गतिविधियां करने वालों का हश्र जेएनयू की तरह ही होने की चेतावनी दी। उनके अनुसार जेएनयू राष्ट्र विरोधी गतिविधियों का केंद्र है। शालीमार गार्डन निवासी पिंकी चौधरी ‘आप’ कार्यालय पर हुए हमले में जेल जा चुके हैं।

इन पंक्तियों के लिखे जाने तक किसी भी नकाबपोश हमलावर को पकड़ा नहीं गया है। दिल्ली पुलिस ने छात्र संघ के अध्यक्ष आयुशी घोष सहित 19 लोगों पर एफ आई आर दर्ज कर दिया है। जो वास्तविक अपराधी और गुंडे थे, उनकी पहचान अब तक नहीं हो पाई है। प्रोफेसर सुचिरता सेन और छात्र संघ अध्यक्ष आयुशी घोष का सर फोड़ा गया। अब जेएनयू में पुलिस की टीम जांच कर रही है और फॉरेंसिक टीम भी। नकाबपोश अपराधियों को न पुलिस ने रोका न सुरक्षा गार्डो ने। बेफिक्र होकर कैंपस में झुंड में हथियार हाथ में लेकर घूमते रहे। उनके प्रवेश पर, कैंपस में तोड़फोड़, मारपीट और हिंसा पर और उनके वापस लौटने तक पुलिस निष्क्रिय रही जिससे यह अनुमान किया जा सकता है कि पुलिस को अवश्य ही ऊपर से ऐसा कोई आदेश या संदेश रहा होगा।

जेएनयू में हुई यह गुंडागर्दी लोकतांत्रिक अधिकारों के खिलाफ है, संविधान और लोकतंत्र के खिलाफ है, कानून और विधि व्यवस्था के खिलाफ है। यह लोकतांत्रिक तरीके से किए जा रहे विरोध को गुंडागर्दी से दबाना है। जेएनयू के सभी प्रवेश द्वार पर सुरक्षाकर्मी रहते हैं। मुख्य गेट से बिना पहचान के प्रवेश संभव नहीं है। नकाबपोश अधिक संख्या में गुजरते रहे और सुरक्षाकर्मी खामोश रहे। यह सुरक्षा पर एक बड़ा प्रश्न चिन्ह है जो यह संकेत दे रहा है कि अब हम कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका निंदनीय है। जबसे कुलपति के रूप में जगदीश कुमार की नियुक्ति हुई है, विश्वविद्यालय को नष्ट किया जा रहा है। जिस कन्हैया कुमार को ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ का सरगना और राष्ट्रद्रोही कहा जाता रहा है अभी ‘फोब्र्स’ पत्रिका ने विश्व के 100 प्रभावशाली लोगों में उसे 12 स्थान पर रखा है। इस सूची में श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे और सऊदी अरब के युवराज मोहम्मद बिन सलमान भी शामिल हैं।

जेएनयू में हमला सरकारी संरक्षण में हुआ है। वहां का कुलपति तक काफी समय तक चुप रहा है। उसने एक ट्वीट में यह कहा कि अभाविप के छात्रों को पीटा गया जबकि पीटने वाला अभाविप का था और जिस छात्र की पिटाई हो रही थी वह वामपंथी छात्र संगठन का था। 5 की शाम को प्रोफेसरों का शांति मार्च था जिसे अशांति और उपद्रव में बदला गया। छात्रों की किसी ने नहीं सुनी। न सुरक्षाकर्मियों ने और न पुलिस ने। चैनलों से झूठी खबरें प्रसारित होती रही। जो हमला था, उपद्रव था उसे छात्रों के दो गुटों के बीच मारपीट की खबर बनाई गई। छात्र अध्यक्ष का सर फटा, प्रोफेसर का सर फटा। दोनों महिलाएं हैं। सर फोड़ना मस्तिष्क पर, चिंतन पर भी हमला है। बाहर पुलिस की संख्या लगभग डेढ़ सौ थी। जामिया में पुलिस ने हमला किया था। जेएनयू में पुलिस के संरक्षण में नकाबपोश गुंडों ने हमला किया जिससे पुलिस और गुंडों के बीच के संबंध का भी पता चलता है। यह सब बिना ऊपरी निर्देशों के संभव नहीं है। पुलिस कानून की रक्षा करती है। वह बिना ऊपरी निर्देश के शांत नहीं रहती।

गुजरात नरसंहार के समय पुलिस की भूमिका और जेएनयू में चार-पांच घंटे तक की उसकी खामोशी का एक अर्थ है। दिल्ली पुलिस की संख्या 84,536 है। पुलिस की इतनी अधिक संख्या किसी राज्य में नहीं है। जेएनयू में 8 हजार 432 छात्र हैं जिनमें 5219 पीएचडी कर रहे हैं। 40 प्रतिशत सामान्य परिवारों से आते हैं। यहां के छात्रों में असहमति, विरोध, प्रतिरोध के स्वर हैं। मामला केवल 70-75 दिनों से चल रहे फीस वृद्धि का ही नहीं है। जेएनयू सदैव अन्याय के विरुद्ध खड़ा रहा है। वर्तमान कुलपति के आगमन के पहले यह लगभग एक शांत विश्वविद्यालय था जो हमेशा देश का सर्वोच्च शिक्षण संस्थान माना जाता रहा है। दुष्प्रचार के जरिए जेएनयू की छवि खराब की गई है। अब गुंडे कैंपस में जाकर हमला कर रहे हैं। उन्हें पकड़ा तक नहीं जाता। 5 जनवरी को बाबा गंगनाथ मार्ग से केंद्रीय विद्यालय तक की रोशनी बंद थी जिससे मुख्य गेट तक पहुंचना कठिन था। गेट के बाहर भीड़ थी। ‘देश के गद्दारों को, गोली मारो सालों को’ जैसे नारे वहां लग रहे थे। तीन बार गेट के बाहर योगेंद्र यादव को प्रोफेसरों के सामने पीटा गया। पुलिस मूकदर्शक रही। डी राजा के साथ भी हाथापाई की गई। एक पत्रकार के अनुसार एम्स की इमरजेंसी तक में विरोध किया गया। प्रियंका गांधी को अभाविप के छात्रों ने वहां घायल छात्रों से मिलने नहीं दिया और दूसरी ओर भाजपा की मीनाक्षी लेखी वहां आधा घंटे तक रही। विजय गोयल और मनोज तिवारी भी वहां रहे।

जेएनयू प्रशासन सत्ता और सरकार के साथ है। उसे अपने छात्रों, छात्राओं और अध्यापकों की चिंता नहीं है। वह एक एजेंडे के तहत कार्य कर रहा है। भाजपा सरकार ने विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थाओं में अपने अनुकूल वाइस चांसलर और अधिकारियों की नियुक्तियां की है। जेएनयू को नष्ट किया जा रहा है। यह काम एक सुविचारित एजेण्डे के तहत हो रहा है। वर्तमान कुलपति ने योग्यताओं को ताक पर रखकर अपने कार्यकाल में 50 से अधिक ऐसे प्रोफेसरों की नियुक्तियां की हैं, वे आगामी वर्षों में जेएनयू की संस्कृति को पूरी तरह बदल देंगी। यह सभी अध्यापक संघ विचारधारा के हैं और इन्हें ज्ञान उन्मुख होने की कोई जरूरत नहीं है। विश्वविद्यालय ज्ञान उन्मुख ना होकर संघ उन्मुख हो रहा है। जेनयू प्रशासन की प्रेस रिलीज में नकाबपोशों पर कोई टिप्पणी नहीं है। अब जेएनयू प्रशासन, दिल्ली पुलिस, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, गृह मंत्रालय सब सवालों के घेरे में है और वर्तमान सरकार प्रश्न सुनना नहीं चाहती। वह मात्र समर्थकों की फौज चाहती है पर भारत जैसे देश में किसी सरकार और सत्ता व्यवस्था के सभी समर्थक नहीं हो सकते। विशेष रूप से युवा वर्ग और छात्र समुदाय। वे इंदिरा गांधी के भी समर्थक नहीं थे फिर मोदी- शाह के समर्थक कैसे होंगे? वह कांग्रेस के भी समर्थक नहीं थे फिर भाजपा और आर एस एस के समर्थक कैसे होंगे? जेएनयू का होना विपक्ष का होना है। जेएनयू सहित अनेक भारतीय विश्वविद्यालय विपक्ष की भूमिका में है। विपक्षी दलों ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है।

भारत का वास्तविक विपक्ष युवा वर्ग है। विश्वविद्यालयों में है। जेएनयू अपनी लड़ाई में अकेला नहीं है। सैकड़ों विश्वविद्यालयों में उनके समर्थन में प्रदर्शन जारी है। विदेशी विश्वविद्यालयों और कई भारतीय निजी विश्वविद्यालयों में भी। छात्र देश का भविष्य है और उन पर की गई हिंसा भारत के भविष्य पर आक्रमण है। लड़कियां भारत माता की बेटियां हैं और उन पर किया गया प्रहार भारत माता पर किया गया प्रहार है।

अब जेएनयू एक सिंबल है। वह देश की आवाज है। लोकतांत्रिक आवाज है। वह और देश के अनेक विश्वविद्यालय देश के वास्तविक विपक्ष हैं। भारत ‘मूकदेश’ नहीं बन सकता। जेएनयू पर हमला मस्तिष्क पर, संवाद पर, बहस पर, चिंतन पर, असहमति-विरोध-प्रतिरोध, सत्य और न्याय पर हमला है। आज देश जिस दिशा में ले जाया जा रहा है, वह देश के युवा वर्ग को स्वीकार नहीं है। उनका भविष्य देश के भविष्य से जुड़ा है। फ़ैज़ की एक पंक्ति है – ‘हमको रहना है पर यूं ही नहीं रहना है’।

रवि भूषण
लेखक वरिष्ठ आलोचक हैं.
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