सब घाल-मेल है भाई

जनमत व्यंग्य

जेएनयू का मसला चल ही रहा था कि हुक्मरानों की मेहरबानी से न्यायालय, संविधान, न्यायमूर्ति, राष्ट्रपति, राज्यपाल जैसे जुमले हवा में तैरने लगे हैं. पूरा रजत पटल महाराष्ट्र, शिवसेना, भाजपा, कांग्रेस से भरा पड़ा है. जेएनयू के पक्ष में एक माहौल बन ही रहा था कि नए-नवेले मसले उठ खड़े हुए. जेएनयू, जिसके समर्थन में छोटा सा ही सही छात्रों के दिल में एक हल्का सा झुकाव बन रहा था.

यह इसलिए कह रहा हूँ कि न्यू इंडिया में इसकी चर्चा मैंने वहां सुनी जहां स्वच्छ भारत के बदबूदार मूत्रालयों के पास टी स्टाल हैं. और अगर आप को भरोसा नहीं है तो प्रयागराज के कटरा में अंडा तिराहा पर आप खुद देख सकते हैं. एक तीर से कई निशाने साधने वाले गणवेशधारी नेताओं ने न केवल महाराष्ट्र के राजनीतिक संकट को ‘संविधान सम्मत सूत्रों’ द्वारा साधने की कोशिश की बल्कि जेएनयू की ‘जेनुइन’ मांगों को भी जनता की नजरों से ओझल कर दिया. जेएनयू के लोग बस पढ़ने के अपने अधिकार की मांग कर रहे थे. जाहिर है अधिकारों की बात करना ही तो असली जुर्म है. सत्ता इतने सरल, मूलभूत अधिकार से डरती है.

जरा महाराष्ट्र संकट के जुमले पर गौर करिए. गणवेशधारी नेतागण और उनके सहपाठी शिवसेना आदि सब इस बात से चिंतित नजर आए कि महाराष्ट्र की जनता को स्थिर सरकार कैसे मिले ? दरअसल इनकी चिंता जनता के लिए नहीं थी. इनकी चिंता सत्ता की मलाईदार कुर्सी पानी थी. नहीं तो, कैसे हर मिनट पर घोटाले करने वाली घड़ी का एक कांटा, एनसीपी की घड़ी से उछल कर राष्ट्रवाद की टिक…टिक करने वाली, राष्ट्रहित के लिए कभी नहीं सोने वालों की घड़ी में फिट हो जाता ? उधर उद्धव ठाकरे ने श्रवण कुमार वाली मुद्रा बनाते हुए अपने पिता बाल ठाकरे के सपने को पूरे करने के लिए, अपने पिता को दिए गए अपने कौल की दुहाई जनता के सामने पेश की. कितना सुनहरा कौल था उद्धव ठाकरे का. काश हिंदुस्तान के किसान-मजदूर का हर बेटा अपने बाप को उद्धव ठाकरे जितना तो सुनहरा तो नहीं, फिर भी जीने-खाने लायक इंतजामात का कौल दे पाता.

अपने इन बयानों से बीजेपी-शिवसेना दोनों जनता को अपनी नेकनीयती का इलहाम कराना चाहती थीं. गो कि किसी को पता नहीं. हर जगह ये दिगम्बर बने हुए हैं. आखिर बाज़ार ही वह जगह है. जहां हर किस्म की आबरू बिकती है भला विधायक क्या चीज हैं.

महाराष्ट्र में क्या कुछ हो रहा है इसकी महाकवरेज रजत पटल पर चमक रही है. लाखों किसान जहां आत्महत्या कर रहे हैं,  बेरोजगार नौजवानों को देशद्रोही करार दिया जा रहा है, वहां सीधे राजभवन से पत्रकार लाईव है. टीवी चैनल पर एक एंकर महाराष्ट्र में बीजेपी की निर्लज्जता को उसकी गलती कह रहा है. उसका कहना है कि बीजेपी ने जिस तरह महाराष्ट्र में अपनी सरकार बनाई, वह उसकी निर्लज्जता नहीं, गलती है. यही न्यू इण्डिया है. रजत पटल से एक मुहावरा भी याद आता है – चांदी का जूता मारना. अब सवाल यही रह जाता है कि जूता ही रजत पटल हो गया है या जूता उसका अंश मात्र है.

लगेगा कि यह तो घाल-मेल है. बिल्कुल, यह घाल-मेल ही है. यह भ्रष्टाचार और बेईमानी में ईमानदारी का, अनैतिकता में नैतिकता का और विकास में विनाश का घाल-मेल है. जेएनयू वाले यही तो बताना चाहते हैं कि इस देश में घालमेल चल रहा है. आस्था को तर्क और तर्क को आस्था का नाम दिया जा रहा है.  परिभाषाएं बदली जा रही हैं। और इतिहास को फिर से लिखा जा रहा है। महाराष्ट्र में आप क्या देख रहे हैं ? आप देख रहे हैं कश्मीर का ढोल पीटने वाले के तार मुंबई धमाकों के आतंकवादियों से लेन-देन करने वालों से जुड़े हुए हैं.

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