Author : विरूप

2 Posts - 0 Comments
जनमत

लोकतंत्र नहीं, लिंचिंग तंत्र

विरूप
‘बालवांश्च यथा धर्मं लोके पश्यति पूरुषः। स धर्मो धर्मवेलायां भवत्यभिह्तः परः।। लोक में बलवान पुरुष जिसे धर्म समझता है, धर्म-विचार के समय लोग उसी को...
जनमत व्यंग्य

सब घाल-मेल है भाई

विरूप
जेएनयू का मसला चल ही रहा था कि हुक्मरानों की मेहरबानी से न्यायालय, संविधान, न्यायमूर्ति, राष्ट्रपति, राज्यपाल जैसे जुमले हवा में तैरने लगे हैं. पूरा...

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More

Privacy & Cookies Policy