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ज़ेर-ए-बहस

विकास, विस्थापन और आदिवासी समुदाय की चुनौतियाँ

रविवार 27  सितंबर को कोरस के लाइव कार्यक्रमों की शृंखला में ‘विकास, विस्थापन और आदिवासी समुदाय की चुनौतियाँ’ विषय पर सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बारला से समता राय ने बातचीत की। आदिवासियों की जल, जंगल, जमीन की लड़ाई में दयामनी जी लगातार संघर्षरत रही हैं।

आपने अपने कैरियर, नौकरी आदि की बजाय ये संघर्ष की राह चुनी, इसके पीछे की क्या वजहें रहीं?

मैं आदिवासी समाज से आती हूँ। जिस गाँव से मैं आती हूँ वह बहुत बड़ा है, लेकिन वहाँ सिर्फ एक परिवार था जो पढ़ा लिखा था। मेरे माँ बाप पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन उनके पास पैतृक रूप से बहुत सारी उपजाऊ जमीन जायदाद थी। एक दबंग पढ़े-लिखे परिवार ने मेरे पिता से अंगूठा लगवाकर उनकी बहुत सी जमीन हड़प ली। ऐसे में जब मेरा परिवार बिखर गया, जीवन के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा, कठिन परिस्थियों से गुजरते हुए रोटी का इंतजाम करते हुए मैंने पढ़ाई जारी रखी। इसके बाद मैं रांची चली आई। वहाँ बहुत संघर्ष किया लेकिन पढ़ाई नहीं छोड़ी। लोगों के घरों में बरतन धुले, मजदूरी की, रेज़ा का काम किया, और पढ़ाई जारी रखी। इन तमाम चीजों से गुजरते हुए मुझे लगा कि सिर्फ अपने लिए जीने की बजाय अपने समाज में जाकर अपने लोगों के लिए काम करना चाहिए। मुझे लगता है कि आदमी जितने ही संकटों से गुजरता है, उतना ही परिपक्व होता है और समाज को उतने ही करीब से जानने का उसे मौका मिलता है। आज अपने समाज के लिए लिखना, पढ़ना और बेआवाज की आवाज़ बनना अच्छा लगता है।

ऐतिहासिक तौर पर आदिवासी समाज हमेशा से हाशिये पर रहे हैं। इसे आप किस तरह देखती हैं?

आदिवासी समाज के हाशिये पर रहने के अनेक कारण हैं, जिसकी पड़ताल की जरूरत है। आज जिस विकास के मॉडल को लागू किया जा रहा है उसे भी समझने की जरूरत है। रही बात आदिवासी समाज के हाशिये पर रहने की तो पहले ऐसा नहीं था। अंग्रेजी शासन के खिलाफ लड़ाई का 1700 से 1900 तक का इतिहास अगर आप देखें तो पाएंगे कि आज़ादी की लड़ाई में आदिवासियों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। सिद्धू कान्हू, बिरसा मुंडा जैसे अनेक आदिवासी स्वतन्त्रता संग्राम में शहीद हुए, इनके नेतृत्व में जो लड़ाई लड़ी गई, जो अंग्रेजों ने आदिवासियों पर गोलियां चलाईं, हजारों आदिवासी मारे गए लेकिन आदिवासियों ने कभी भी पीठ नहीं दिखाई, हमेशा अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी। आदिवासी हमेशा सामूहिकता में जिए और मिलकर लड़ाई लड़ी। आदिवासी समाज पर्यावरण के बहुत करीब रहा है, अपने संघर्ष से जमीन को सुंदर बनाया। संविधान बनने की डिबेट में जयपाल मुंडा ने संविधान सभा में बहस किया, कहा कि हम तब तक खुश नहीं होंगे जब तक हमें बराबरी का हक नहीं मिल जाता।

हाशिये पर तो हमें विकास की इस छद्म अवधारणा ने लाकर खड़ा कर दिया। आदिवासियों के लिए जो कानून बने उनका पूरी तरह अतिक्रमण किया जा रहा है, उनकी जमीन को जबर्दस्ती छीना जा रहा है। आज तक 5 करोड़ विस्थापितों में 80% आदिवासी हैं। विस्थापन के बाद जमीन के बदले जमीन और नौकरी देने के अपने वादों को सरकारों ने कभी पूरा नहीं किया। इस समाज को साजिशन हाशिये पर धकेल दिया गया। इसीलिए आज का हमारा नारा है- नो मोर डिसप्लेसमेंट। इस सो काल्ड डेवलपमेंट को बदलने की जरूरत है और सस्टेनेबल डेवलपमेंट की ओर जाने की जरूरत है। आदिवासी समाज हमेशा से प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर सामूहिकता की सीख देता रहा है। आज के अंधाधुंध विकास के मॉडल के कारण ही हमें अनेक प्राकृतिक दुर्घटनाओं, जल संकट, पर्यावरण संकट आदि का सामना करना पड़ रहा है।

शिक्षा के क्षेत्र में भी सरकारें अक्षर ज्ञान को ही अपनी ज़िम्मेदारी समझती हैं जबकि शिक्षा का उद्देश्य हर तरह का सशक्तीकरण होना चाहिए। आज की शिक्षा व्यवस्था, स्वास्थ्य व्यवस्था हमारे पक्ष में नहीं है। सरकार को अगर आदिवासी समाज को बचाना है तो उसके स्वस्थ्य, शिक्षा और रोजगार की व्यवस्था करनी होगी। दुर्भाग्य की बात है कि जो हमें कानूनी अधिकार मिले हैं जल, जंगल, जमीन पर और जो 5वीं अनुसूची में अधिकार मिले हैं, उन सबका उल्लंघन किया जा रहा है। भाजपा की पिछली सरकार ने ग्राम सभा के अधिकारों का उल्लंघन करके ज़मीनें हड़प ली। आदिवासियों के तमाम पारंपरिक अधिकारों को छीनकर सिंगल विंडो सिस्टम के बहाने संसाधनों को बड़ी बड़ी कंपनियों को देने का काम किया जा रहा है। अडानी अंबानी जैसे कारपोरेट घरानों को जमीन देने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर सरकार क़ानूनों में बदलाव कर रही है। 2014 से 2019 के बीच 14000 स्कूलों को बंद कर दिया गया। स्कूल कालेजों में शिक्षक नहीं हैं, अस्पतालों में डॉक्टर नर्स नहीं हैं। इस तरह देखिए तो आदिवासियों को हाशिये पर धकेल दिया जा रहा है जिससे उनके संसाधनों का इस्तेमाल किया जा सके। जब हम जल, जंगल, जमीन की लड़ाई लड़ते हैं तो हमें एंटी नेशनल, एंटी सोशल कहकर जेल में दाल दिया जाता है। हम सिद्धू-कान्हू के वंशज हैं, इतिहास कभी रुकता नहीं है। हम संघर्ष करेंगे और अंतिम दम तक संघर्ष करेंगे।

उसूली तौर पर तो संविधान और कानून में आदिवासियों को बहुत से अधिकार मिले हैं, लेकिन इनकी जमीनी हकीकत क्या है?

आज के समय में जितने भी कानून और संवैधानिक प्रावधान हैं सब धरे के धरे रह गए हैं। अगर अन्नदाता समाज को विश्व बाज़ार से बचाना है तो हम सबको एक मंच पर आकर अपनी लड़ाई लड़नी होगी। जितने भी कानूनी बदलाव और संशोधन हो रहे हैं वे आदिवासियों की बेहतरी के लिए नहीं बल्कि उनके हाथ से संसाधन छीनने के उद्देश्य से किए जा रहे हैं।

लगातार सरकारी दमन, कार्पोरेटीकरण के बावजूद वह कौन सी चीज है जो आपको अपनी लड़ाई जारी रखने की प्रेरणा देती है?

जंगल, जमीन, नदी पर्यावरण को झुठलाया नहीं जा सकता, यह सच्चाई है। हम इस धरती की लड़ाई, सत्य को बचाने की लड़ाई  लड़ रहे हैं। हम कितना भी विकास कर लें लेकिन जब भूख लगेगी तो हमें अनाज ही चाहिए, प्यास लगेगी तो पानी ही चाहिए। हमारी लड़ाई यह है कि जंगल रहेगा तो सबको हवा मिलेगी, पानी मिलेगा, स्वास्थ्य मिलेगा। हम शायद यह कभी नहीं सोचते कि हमारी थाली में जो एक रोटी आती है वह कितने किसानों की मेहनत का फल है। जब मित्तल के खिलाफ हम लड़ रहे थे तो हमें बहुत धमकियाँ मिलीं। लेकिन मैं हमेशा सोचती थी कि अगर मैं इस आंदोलन से बाहर निकली तो बहुत से आदिवासियों की लड़ाई समाप्त हो जाएगी। जब भी मैं इस तरह  कभी व्यथित होती हूँ तो कोयल नदी के किनारे जाती हूँ, नदी लगातार बह रही है तो मैं कैसे रुक जाऊँ। मैं पेड़ों को देखती हूँ, चिड़ियों को चहचहाना सुनती हूँ तो वहाँ से बहुत प्रेरणा मिलती है संघर्ष की। हमारे पास एक ही विकल्प है- लड़ाई और संघर्ष। हम संघर्ष करेंगे तो नया भारत बनाने का सपना बचा रहेगा जहां कोई भूखा नहीं होगा, जहां अन्याय नहीं होगा, जहां शुद्ध पर्यावरण होगा, जल जंगल जमीन होगा।

जब भी आदिवासी समुदाय अपने अधिकारों के लिए मुखर हुआ है, उनपे सरकारी दमन हुआ है। इस पर आपकी क्या राय है ?

मैं 1995 से लगातार इस संघर्ष में हूँ। मुझे अच्छा लगता है कि झारखंड की लड़ाई लड़ते हुए मैंने पूरे भारत में लोगों के संघर्ष को बहुत करीब से देखा। लेकिन कभी हम पर देशद्रोह का आरोप नहीं लगा। लेकिन 2014 के बाद इस तरह के संघर्ष करने वालों को देशद्रोही और राष्ट्रद्रोही बताकर संघर्ष को कमजोर करने की साजिश की जाती है। आज कितने ही कार्यकर्ताओं को राष्ट्रद्रोह के नाम पर जेल में डाल दिया गया है। लेकिन अगर जंगल, जमीन बचाना राष्ट्रद्रोह है, सच कहना राष्ट्रद्रोह है तो हमें कोई कहे देशद्रोही, लेकिन हम अपना संघर्ष जारी रखेंगे।

हिंदुत्ववादी सांप्रदायिक राजनीति में आदिवासी समुदाय को भी झोंक देने की कोशिश हो रही है। सांस्कृतिक तौर पर भी हिंदुत्ववादी विमर्श इसे अपने में समाहित कर लेना चाहती है। इस पर आप क्या कहना चाहती हैं ?

आदिवासी समाज का अपना इतिहास, अपनी सामाजिक मान्यताएँ हैं। पहले आदिवासियों को धर्म संस्कृति के नाम पर नहीं लड़ाया जाता था। लेकिन इस समय आरएसएस का एजेंडा है आदिवासियों को बांटना। संविधान में सभी को अपने विवेक से धर्म को मानने का अधिकार दिया गया है तो आदिवासियों को सरना कोड क्यों नहीं दिया जा रहा है। इसीलिए कि इसका लाभ हिंदुत्ववादी ताक़तें उठाएंगी। मैं धर्म के खिलाफ नहीं हूँ, मेरा हिन्दू धर्म से कोई विरोध नहीं है लेकिन कट्टरता से विरोध है। आज विस्थापन, भूख, बेरोजगारी, न्याय सवाल नहीं बनते लेकिन धर्म सबसे बड़ा सवाल बन जाता है। हमें संविधान के रास्ते चलना होगा जो सबके लिए है। अभिवयक्ति की आज़ादी का लगातार हनन हो रहा है, जनता की आवाज़ को लगातार चुप कराया जा रहा है।

आदिवासी आन्दोलन में स्त्रियों की क्या भूमिका है ?

बिरसा के आंदोलन से लेकर जतरा भगत, संथाल आंदोलन तक अनेक स्त्रियां अग्रणी भूमिका में रही हैं। अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में  पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रहीं। आज भी आंदोलनों में आधे से ज्यादा भूमिका महिलाओं की है। हमारा समाज ऐसा है कि इतिहास लिखते समय भी स्त्रियों की भूमिका को सही तरीके से नहीं देखा गया। लेकिन हम आज भी संघर्ष की राह पर चलते समय उन महिलाओं से प्रेरणा ग्रहण करते हैं, जो अपने हक की लड़ाई लड़ते हुए शहीद हुईं।

(प्रस्तुति: रुचि )

इस पूरी बातचीत को सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें।

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