आलोक मिश्र
इस साल प्रकाशित हुए नए कविता संग्रहों में से जिन-जिन को पढ़ पाया उनमें ‘दूर से दिख जाती है बारिश’ अपनी तासीर और कहन में बहुत अलग और खास लगी। राजकमल प्रकाशन से आई ये किताब कवि विजय राही की पहली कृति है, किंतु अपने पहले संग्रह की कविताओं में ही उन्होंने कहने के धैर्य और शिल्प को उम्दा तरीके से साधा है। ग्रामीण व देशज अनुभूतियों को स्वर देती ये कविताएँ अपने पूरे सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश का आख्यान बेहद मार्मिकता के साथ करती हैं। इन कविताओं में स्त्री जीवन की विकटता, विकलता और विवशता को समानुभूति के स्तर तक जाकर महसूस किया जा सकता है। कविता ‘बहन’ में आक्रोश और करुणा के बड़े प्रवाह के बीच पाठक स्त्री जीवन की विवशता के बीच ख़ुद को खड़ा पाता है और कोई तात्कालिक उत्तर या उपाय उसे भी नहीं सूझता है।
विजय की कविताओं में गँवई जीवन के विविध रंग भी फाग के बहुरंगी गुलाल की तरह बिखरे हुए हैं। संग्रह की पहली कविता ‘वैशाख की एक सुबह’ हो या ‘आँधी’ और ‘बारिश’ श्रृंखला की कविताएं सबमें इन्हें पसरते और विचरते हुए महसूस किया जा सकता है। ‘याद’ कविता में कवि इतनी खूबसूरती से यादों की सौंफ और उसकी डंठलों में सिक्त और फैल रही खुशबू से करता है, कि कविता पढ़ते हुए कोई भी इस महक से अछूता नहीं रह सकता। लोक जीवन के विविध आयाम इन कविताओं में अपने पूरे रंग में उतरते हैं, फिर चाहे ये उनकी विद्रूपता हो या उनमें सिक्त मार्मिकता। कविता ‘संस्कारी’ में तीन ग्रामीण महिलाओं की आपसी बातचीत में आधुनिक महिलाओं के पहनावे, व्यवहार और रहन-सहन को ख़ूब कोसा जाता है। लेकिन कविता में आख़िर तक आते-आते पता चलता है कि वे महिलाएं ख़ुद अपनी ज़िंदगी में अच्छी बनने की तमाम कोशिशों के बाद भी प्रताड़ित हो रही हैं। विजय राही की कविताएं विडंबना भरे जीवन की गाथा बड़ी मार्मिकता से उकेरती हैं।
विजय राही रिश्तों में छिपे प्रेम, परवाह और उनमें छुपे महीन वर्चस्व को कविताओं में बार-बार लाते हैं वो भी उसकी पूरी जटिलता को साधते हुए। कविता ‘एक रोटी’ में वह अभावों से गुजरते परिवार में माँ-बेटे के बीच प्रकट होने वाले भावपूर्ण व्यवहार को बड़ी मार्मिक करुणा के साथ उकेरते हैं। बेटे के लिए बचायी गई एक ही रोटी को भी जब कुत्ता बच्चे के हाथ से झपट ले जाता है तो मां पहले तो बच्चे को ही पीटती है और फिर उसे पुचकारते हुए रोती है और कुत्ते को कोसती है। कवि पिता पर लिखी कविता में कविता के खो जाने को पिता को फिर से खो देने की पीड़ा के बराबर महसूस करता है। यद्यपि कभी-कभी उनकी कविताओं में उमड़ती मार्मिकता और रिश्तों के बीच की भावनात्मक जीवटता पाठक को कुरेदकर बिना कहीं पहुंचाए भी छोड़ देती है। ‘स्त्रियाँ ‘ एक ऐसी ही कविता है जिसमें कवि अपने जीवन में माँ, बहन, पत्नी, बेटी जैसे अलग अलग रूपों में स्त्रियों की स्नेहिल और परवाह करने वाली उपस्थिति को पूरी भावुकता और मार्मिकता से याद करता है, पर ये कविता पहुँचती कहीं नहीं है और न ही कोई नई बात कहती है।
विजय राही की का कविताएं जीवन और उसके रस की कविताएं हैं। और चूंकि जीवन ही दुखों और संघर्ष का अखाड़ा है तो इनकी कविताएं भी इन्हीं स्वरों से आबद्ध हैं। कविता ‘भँवरी देवी के लिए’ पढ़ते हुए यह अनुभव चरम पर पहुँच जाता है। कविता दर्ज़ करती है कि ‘वह तब भी अकेली थी / जब रसूखदारों ने उसकी आत्मा पर हमला किया / आज से तकरीबन पच्चीस साल पहले।’
प्रेम के बड़े साधारण संदर्भ अपनी असाधारण अनुभूतियों के साथ संग्रह की कविताओं में बिखरे दिखाई देते हैं। कविता ‘अगर तुम आओ’ में प्रेयसी का यह कहना कि ‘अगर तुम परदेस चले जाओगे/ तब मेरे लिए अमरूद कौन लाएगा’ मन को मोह जाता है। कविता ‘तुम्हारा आना’ में प्रेयसी के जीवन में आने के समय को मृतक की चिता को अग्नि देकर लौट रहे प्रियजनों के बीच अंत्येष्टि में शामिल होने की इच्छा से अचानक आए किसी आगंतुक से तुलना करना एक नया प्रयोग है। इसी तरह प्रेम में विछोह को भी कवि सलीके से साधता है। कविता ‘तुम्हारे बाद’, ‘संग-साथ’, ‘जाना’ कुछ इसी तासीर की कविताएं हैं। प्रेम, तुम्हारा प्यार, बकरियाँ चराने वाली लड़की, झाड़ू संग्रह की कुछ और खूबसूरत कविताएँ हैं।
कुल मिलाकर राजकमल प्रकाशन से आया ये काव्य संग्रह सुंदर कविताओं का संयोजन है। संग्रह को विजय राही ने कवि प्रभात को समर्पित किया है। संग्रह की कविताएँ पढ़ते हुए कवि पर प्रभात के असर को काफी हद तक महसूस किया जा सकता है। आगे उन्हें अपनी मौलिक राह बनाने के लिए इस प्रभाव से किस हद तक ख़ुद को मुल्तिबा रखना है या आज़ाद करना है, ये उनके लिए सोचने का विषय होना चाहिए। संग्रह के लिए उन्हें बधाई और भविष्य के रचनाकर्म के लिए ढेरों शुभकामनाएं।
पढ़िए संग्रह ‘दूर से दिख जाती है बारिश’ की कुछ प्रतिनिधि कविताएं –
याद
सौंफ कट चुकी है
मगर उसकी ख़ुशबू नहीं
डंठलों में भी उतनी ही ख़ुशबू है
जो अभी कुछ दिन और रहेगी हवाओं में
तुम्हारे चले जाने पर भी
तुम्हारी याद की ही तरह
यह तपेगी
जलेगी
ढह पड़ेगी
स्त्रियाँ
जब कभी चोट लगती
माँ दौड़ कर आती
हरी रूँखडी बाँटकर लगाती
रोता तो डाँटती
“रोवे मत, बेगो ठीक हो जावेगो”
कभी पैर में काँटा धँसा
माँ धूप में ही बैठ जाती
छाँह करके मेरे ऊपर
अपनी लूगड़ी के पल्लू से
मेरी एड़ी रखती अपने गोडे पर
और काँटा निकालती हुई कहती—
बेटा! नीम की तरफ़ देखते रहो
और बोलते रहो :
‘‘नीम-नीम थ्हारो पत्तो झड़े
म्हारो काँटो कड़े!’’
बीमार हुआ जब कभी तो
बहनें चौबीसों घंटे लगी रहतीं
मेरी दवा-दारू में
जब ब्याह हुआ तो
माँ और बहनों की जगह पत्नी ने ली
हालाँकि वह कभी-कभी यह ज़रूर कह देती—
“आपके छोटे से दुख का पेकणा हो जाता है”
अब मेरी बेटी रखती है मेरा ख़याल
बिल्कुल अपनी माँ की ही तरह
मैं एक बार फिर छोटा बच्चा बन गया हूँ
बहन
एक घंटे में लहसुन छीलती है
फिर भी छिलके रह जाते हैं
दो घंटे में बर्तन माँजती है
फिर भी गंदे रह जाते हैं
तीन घंटे में रोटी बनाती है
फिर भी जली, कच्ची-पक्की
कुएँ से पानी लाती है
मटकी फोड़ आती है
जब भी ससुराल आती है
हर बार दूसरी ढाणी का
रास्ता पकड़ लेती है
औरतें छेडती हैं तो चुप हो जाती है
ठसक से नहीं रहती बेमतलब हँसने लगती है
खाने-पीने की कोई कमी नहीं है
फिर भी रोती रहती है
“काँई लखण कोनी थारी बहण में”
यह सब
बहन की सास ने कहा मुझसे
चाँदी के कडूल्यों पर हाथ फेरते हुए
जब पिछली बार बहन से मिलने गया
मैंने घर आकर माँ से कहा
बहन पागल हो गई है
सास ने उसको ज़िन्दा ही मार दिया
कुएँ में पटक दिया तुमने उसे
माँ ने कहा
लूगड़ी के पल्ले से आँखें पोंछते हुए—
“तू या बात कोई और सू मत कह दीज्यो
म्हारी बेटी खूब मौज में है !”
वे
मैं बचपन में उनके घर के पास से निकलता था
पहले फटे कपड़ों में निकलता था
फिर तुरपाई लगे कपड़ों में निकलने लगा
प्यास लगती तो नाके से पानी पी लेता
जो उनके नहाने-धोने का बचा होता
भूख लगती तो कोठी के आसपास घूमता
बेर, कैरी, खजूर सरीखे फल खा लेता
फिर मैं बस्ता लेकर निकलने लगा
वे सब मिलकर हँसी उड़ाते थे मेरी
एक बार उनकी औरतों ने मिलकर
मेरे कपड़े फाड़ दिए थे होली के दिन
और हँसती रही ठहाके लगाकर
मैं अपनी जान छुड़ाकर खेतों में भागा
बुरशट से बदन छुपाए आँसू पोंछते हुए
उन्होंने मेरे सामने कपड़े बदले कई बार
उत्तेजक आहें भरी और हँसी मुद्राएँ बनाई
लेकिन मैं उनके लिए हमेशा नाकाम रहा
एक दिन मैं उसी रास्ते मोटर साइकिल से निकला
उनको खटका कि यह मेरी नहीं चोरी की है
जबकि उनके पास मोटर साइकिल बरसों से थी
फिर एक दिन मैं कार से निकला
तो उनका मुँह उतर आया
नज़रें फेरकर उन्होंने न देखने का बहाना बनाया
आख़िर उनमें से एक ने मुझे गाली दी
मैंने आँखों में आँखें डालकर कारण पूछा
उन्होंने दोबारा मेरे समुदाय को गालियाँ दी
मेरा सफेद कुर्ता-पायजामा उनको चुभ रहा था
मेरे पैरों में जूते उनसे देखे नहीं जा रहे थे
उनकी आदत तो मुझे हमेशा
फटी जेब और नंगे पैर देखने की थी
और वे अपनी यह आदत कभी बदलना नहीं चाहते थे
झाड़ू
पक्षियों के पास होती हैं पंख की झाड़ू
पशुओं के पास होती हैं पूँछ की झाड़ू
आसमानों की झाड़ू हैं बादल
और धरती की झाड़ू हैं आँधियाँ
कुदरत के पास कितनी ही
दृश्य और अदृश्य झाड़ू हैं
काश मेरे पास भी होती कोई ऐसी झाड़ू
जिससे बुहार पाता अपनी आत्मा को
प्रिय कवि का घर
वह कोई अनुपम नहीं होगा
और न ही बिल्कुल अलहदा
लेकिन मेरी कल्पना में वह ऐसा ही था
कभी वह हरी-भरी घाटियों बीच
नज़र आता मुझे
कभी एक झरने के बगल में
चट्टान पर खड़ा
बाँहें फैलाकर पुकारता
कभी किसी गाँव के कोने में
संकोच के साथ दिखता मुझे
कभी शहर के आस-पास
जैसे उसे गाँव आया ही नहीं हो रास
कभी मैं उदास होता
उदासी के प्रतिरूप में खड़ा करता उसे
एक बियाबान में अकेले तपते हुए
किसी रेगिस्तानी पेड़ की तरह
यह मेरे प्रिय कवि का घर था
जहाँ मैं कभी नहीं गया
मुक्ति
शहर के कवियों ने
उसकी मृत्यु पर कविताएँ लिखीं
और मुक्ति पाई
(आलोक मिश्रा उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जनपद के रहने वाले हैं। डाइट-केशवपुरम, एससीईआरटी-दिल्ली में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। कविता, कहानी और समसामयिक मुद्दों पर लेखन। अब तक पाँच पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। जिनमें एक बाल कविता संग्रह- ‘क्यों तुम सा हो जाऊँ मैं’, एक शैक्षिक मुद्दों से जुड़ी कविताओं का संग्रह- ‘मैं सीखता हूँ बच्चों से जीवन की भाषा’, एक शैक्षिक लेखों का संग्रह- ‘बच्चे मशीन नहीं हैं’, एक कहानी संग्रह- ‘दूध की जाति और अन्य कहानियाँ’ और नव प्रकाशित काव्य संग्रह ‘पोटली के दाने’ (सेतु प्रकाशन) शामिल हैं। संपर्क -मोबाइल नंबर- 9818455879, alokkumardu@gmail.com)

