विजेंद्र अनिल के कहानी संग्रह ‘फ़र्ज़’ का लोकार्पण
‘‘विजेंद्र अनिल की कहानियाँ सामाजिक-राजनीतिक दृष्टि संपन्न कहानियाँ हैं। इनमें सामंतवाद, साम्राज्यवाद, सांप्रदायिकता और जातिवाद-वर्णवाद का विरोध मिलता है। इनमें नए जनतांत्रिक समाज के निर्माण का संघर्ष और सपनों की सच्चाइयाँ हैं। ‘सफर’ कहानी में सिर्फ भोजपुर का ही यथार्थ नहीं है, वैसा ही यथार्थ पंजाब की पृष्ठभूमि पर लिखे गए जगदीशचंद्र के उपन्यास ‘धरती धन न अपना’ में है। इन कहानियों को पढ़ते हुए यह स्पष्ट वैचारिक समझ बनती है कि जातिवाद से मुक्ति से ही समाज आगे बढ़ेगा। बाबा साहब का सपना भी जातिविहीन समाज का ही था।’’
नागरी प्रचारिणी पुस्तकालय के सभागार में 28 जून 2026 को जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित प्रसिद्ध जनगीतकार और जनवादी कहानीकार विजेंद्र अनिल के तीसरे कहानी संग्रह ‘फर्ज’ के लोकार्पण और उस पर बातचीत के कार्यक्रम में कवि-आलोचक जितेंद्र कुमार ने ये विचार व्यक्त किये।
उन्होंने कहा कि आज दलित-स्त्री विरोधी, किसान-मजदूर विरोधी ताकते सत्ता में हैं, वे संविधान की मूल प्रस्तावना में व्यक्त भावना के खिलाफ काम कर रही हैं। हर स्तर पर भेदभाव, नफरत और शोषण-उत्पीड़न को बढ़ावा दे रही हैं। ऐसे में हमलोग संघर्ष से दूर नहीं हो सकते। साहित्य में जनता के मुद्दों को उठाना ही होगा। हमारा समाज के साथ कम संवाद हो रहा है, हम साहित्यकारों को यह संवाद स्थापित करना होगा।
‘फर्ज’ कहानी संग्रह विजेंद्र अनिल के निधन के उन्नीस वर्ष बाद उनके पुत्र सुनील श्रीवास्तव के प्रयास से प्रकाशित हुआ है। इस अवसर पर सुनील श्रीवास्तव ने पुस्तक प्रकाशन से संबंधित अपने अनुभवों को साझा करते हुए यह जानकारी दी कि विजेंद्र अनिल की कहानियों, कविताओं, आलोचनात्मक लेखों और डायरियों का प्रकाशन होना अभी शेष है; जिनकी संख्या लगभग 10 है।

इस कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रलेस के राज्य अध्यक्ष प्रो. रवींद्रनाथ राय, जसम के राज्य अध्यक्ष जितेंद्र कुमार, जलेस के प्रो. निलांबुज सरोज और वरिष्ठ कवि जनार्दन मिश्र ने संयुक्त रूप से की। संचालन जसम के जिला सचिव कवि सुमन कुमार सिंह ने की।
‘फर्ज’ कहानी संग्रह के लोकार्पण के बाद इसमें संकलित कहानियों पर विस्तार से बोलते हुए सुधीर सुमन ने कहा कि ग्रामीण पृष्ठभूमि की इन कहानियों में जो समस्याएं हैं वे और गंभीर रूप अख्तियार कर चुकी हैं। उनसे आज पूरा देश गुजर रहा है। ग्रामीण समाज के जनवादीकरण का संघर्ष और सत्ता पर कब्जे की लड़ाई अब पूरे देश में लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई बन चुकी है। सत्तर अस्सी के दशक में गरीब-मेहनतकशों और प्रबुद्ध लोगों के द्वारा जिस लमहर (लंबी) लड़ाई की शुरुआत की गयी थी, वह भिन्न-भिन्न तरीकों से अब भी जारी है। भूस्वामियों व सरकार-प्रशासन के दलालों द्वारा गांव में खुद को ही सरकार समझने का दंभ और इसके लिए हर किस्म की नृशंसता पर उतारू होने, पुलिसिया दमन, एनकाउंटर की प्रवृत्ति तथा सांपद्रायिक नफरत और धार्मिक पाखंड के जरिए संघर्षशील जनता की एकता को कमजोर करने, प्रकृति का विनाश, शिक्षा-स्वास्थ्य तंत्र और रोजगार के अवसरों की खराब स्थिति, गांव से लेकर शहर तक के ‘सफर’ में छोटी-छोटी जरूरतों के लिए भी संघर्ष करने की विवशता तथा इस प्रक्रिया में सरकार, प्रशासन और न्याय व्यवस्था के अन्याय को झेलने की हकीकतें इन कहानियों को चार-साढ़े चार दशक बाद भी प्रासंगिक बनाती हैं।
अस्सी के दशक में सवर्ण-सामंती गांव की सार्वजनिक संपदा पर कब्जा किये हुए थीं, उसके बाद उनके साथ नवकुलकों और नवसामंतों का भी वर्चस्व कायम हुआ, आज कारपोरेट जमींदार आ गए हैं, जो देश की पूरी संपदा को सरकार और पुलिस-फौज के सहयोग से लूट रहे हैं। खेत मजदूरों, किसानों, नौजवानों और स्त्रियों के जीवन की समस्याएं और गंभीर हो चुकी हैं। महंगाई, बेरोजगारी, आर्थिक विषमता और जातिवादी-लैंगिक उत्पीड़न व हिंसा तथा अपराधी गिरोहों का वर्चस्व बढ़ा है। पहले गरीब-मेहनतकश और न्यायपसंद लोगों को गांवों में खुद को सरकार समझने वालों का ही शोषण-उत्पीड़न झेलना पड़ता था, अब कारपोरेट ताकतों और सरकारी गठजोड़ के दमन और शोषण की मार उससे भी उससे भी बड़ी आबादी को झेलना पड़ रहा है।
ऐसी परिस्थितियों में एक सच्चे लेखक-बुद्धिजीवी को जनता के हक-अधिकार के लिए चलने वाले आंदोलनों के साथ होना चाहिए, विजेंद्र अनिल की कहानी ‘फर्ज’ यही संदेश देती है।
प्रो. रवींद्रनाथ राय ने कहा कि विजेंद्र अनिल की इन कहानियों के केंद्र में मजदूर और किसान हैं। इनमें निम्न जातियाँ वर्गीय आधार पर एकताबद्ध हैं।
उनकी कहानियों में मुस्लिम चरित्रों की उपस्थिति गौर करने लायक है। वे सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन के संघर्ष में शामिल हैं। यही समग्र भारत की वास्तविक तस्वीर है। इस एकता को आज तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। आज जब कहानियों से भी मुस्लिम चरित्र गायब हो रहे हैं, तब विजेंद्र अनिल की ये कहानियां अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती हैं।
आज विजेंद्र अनिल जैसे एक्टिविस्ट रचनाकारों का अभाव है। उन्होंने किसान-मजदूरों के बीच रहकर, उनके सुख-दुख के साथ खड़े होकर कहानियां लिखी है। आज समय भले बदला है, पर समस्याएं वही हैं। आज सरकार, कारपोरेट और पुलिस का गठजोड़ जिस तरह दमन कर रहा है और प्राकृतिक संसाधनों की लूट कर रहा है, उसका प्रतिरोध भी यही वर्ग करेगा। जरूरत यह है कि विजेंद्र अनिल की तरह उसकी समस्याओं और संघर्षों के पक्ष में कहानियां लिखी जाएं।

‘दस्तक’ पत्रिका के संपादक कहानीकार रामयश अविकल ने कहा कि गांवों में दलित-पिछड़ों का जो दमन हो रहा था, उसके प्रतिरोध में उभरे संघर्ष की चेतना से विजेंद्र अनिल की कहानियाँ रची गयी थीं। उन्होंने ‘अमन-चैन’, ‘फर्ज’ और ‘जगरम’ कहानी की विशेष रूप से चर्चा करते हुए कहा कि कहानी ‘अमन-चैन’ की शुरुआत ही हरिजन टोले में आगजनी से होती है, जिसमें वहां के लोग और उनके जानवर जलकर मर जाते हैं। उस आगजनी के जिम्मेवार लोग अपने-अपने गांवों के राजा की तरह ही हैं। ‘जगरम’ कहानी में रात में राहगीरों को अपने घर में पनाह देने वाले अब्दुल दादा की शख्सियत को उन्होंने आज के दौर के लिए अत्यंत प्रासंगिक बताया, जो निर्भीकता के साथ एक अपराधी सत्तार मियां और उसके गिरोह से प्रतिरोध करने को तत्पर नजर आते हैं।
प्रो. निलांबुज सरोज ने कहा कि ‘फर्ज’ संग्रह की कहानियां दस्तावेजी कहानियां हैं। इन कहानियों को पढ़ते हुए उन्हें लगा कि वे नक्सलवादी आंदोलन के इतिहास की कोई किताब पढ रहे हैं। ये कहानियाँ नक्सलबाडी आंदोलन को प्रासंगिक सिद्ध करती हैं। आज सत्ता अपने से असहमत आवाजों को ‘अर्बन नक्सल’ कहती है। सच तो यह है कि पहले दलितों की झोपड़ी जल रही थी, आज बुलडोजर चल रहा है। ऐसे समय में बुद्धिजीवियों की भूमिका क्या होनी चाहिए, इसे ‘फर्ज’, ‘खून’ और ‘कॉमरेड लाल के संस्मरण’ जैसी कहानियां स्पष्ट करती है। उन्होंने विजेंद्र अनिल की कहानियों के स्त्री चरित्रों की भी चर्चा की।
वरिष्ठ कवि जनार्दन मिश्र ने कहा कि विजेंद्र अनिल का संपूर्ण जीवन संघर्षमय रहा। उनकी कहानियों में एक स्वार्थी वर्ग है, जो बेहद क्रूर है, जिसके खिलाफ गरीब-मजदूर जनता वर्गीय संघर्ष करती है।
कवि संतोष श्रेयांश ने कहा कि विजेंद्र अनिल की कहानियों में सामंती प्रवृत्ति के खिलाफ प्रतिरोध मिलता है। ‘सफर’ कहानी यह बताती है कि समाज में कैसे कोई विद्रोही चरित्र पैदा होता है।
रंगकर्मी इश्तेयाक अहमद ने विजेंद्र अनिल से जुड़े संस्मरण सुनाए और बताया कि कैसे वहां के स्थानीय सामंत के गुर्गों ने उनका हाथ तोड़ दिया था, लेकिन उन्होंने जनसंघर्षों के पक्ष में लिखना बंद नहीं किया।
संचालक सुमन कुमार सिंह ने कहा कि विजेंद्र अनिल की कहानियाँ भोजपुर के मजदूर-किसान आंदोलन की प्रक्रिया को उजागर करने वाली कहानियाँ हैं। जो भी गरीबी-बेरोजगारी को झेल रहे हैं, जो भी लोकतंत्रपसंद लोग हैं, उन सबके पक्ष में ये कहानियाँ लिखी गयी हैं।
कार्यक्रम के दौरान सूर्य प्रकाश, अमित मेहता और धनंजय ने विजेंद्र अनिल के जनगीत ‘लिखने वालों को मेरा सलाम, पढने वालों को मेरा सलाम’ और ‘रउरा शासन के बडु़ए ना जवाब भाई जी’ का गायन किया।
धन्यवाद ज्ञापन रंगकर्मी सूर्यप्रकाश ने किया। इस अवसर पर यतींद्रनाथ सिंह, कथाकार अखिलेश कुमार, कृष्ण यादव ‘कृष्णेंदु’, कवि सुनील कुमार चौधरी, धनंजय कटकैरा, किशोर कुमार, शमशाद प्रेम, रामनिवास राम, विक्रांत, बबलू कुमार गुप्ता, शिवजी राम आदि भी मौजूद थे।
रपट
सुधीर सुमन

