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आदिवासियत : एक यात्रा (दूसरी किस्त)

(अखड़ा राँची और औराविल फिल्म इंस्टिट्यूट की ओर से चौबीस दिवसीय  डॉक्यूमेन्ट्री रिट्रीट एंड वर्कशॉप “आदिवासियत” की यह रिपोर्ट केवल सिनेमा वर्कशाप की रिपोर्ट नहीं है बल्कि झारखंड के जन जीवन के विविध पहलुओं की व्यापक ग्राउंड रिपोर्ट भी है जिसे इस कार्यशाला की एक प्रतिभागी श्रद्धा ने लिखा है. रिपोर्ट की यह दूसरी किस्त है: सं.)

श्रद्धा श्रीवास्तव

वो इतवार का दिन था। प्रदीप (मेरे ठहरने वाले घर के मालिक) को काम पर नहीं जाना था। वो एक फार्म पर नाशपाती की खेती का काम करने जाते, जिससे मासिक आय मिलती थी। उस दिन प्रदीप का बाल बनाने संचित आए—ब्लेड और उस्तरे से। उसके बाद बाल रंगने का भी दिन था। स्थान सड़क का किनारा, एक पेड़ की छाँव तले। अरे, बाल बनाना भी आता है? रस्सी बना लेना , हल बना लेना … मैंने गौर किया वास्तव में सैलून या नाई की दुकान है ही नहीं यहाँ । संचित ने बताया—प्रदीप भी जानते हैं। यहाँ हर किसी को आता है बाल बनाना। हम लोग एक दूसरे के बाल बना देते हैं हम लोगों के एक सौ बीस रुपए बचते हैं।

यहाँ चर्च का अहम रोल है। संडे की सुबह सामूहिक प्रार्थना और ईस्टर पर बात थी। लोग अपने-अपने घर से छोटी-छोटी पोटली लिए जा रहे थे। पोटली में चावल और आलू थे—यह वे प्रार्थना के बाद अर्पित करते। उनका चर्च पर श्रद्धा और विश्वास है। मैं उससे परे सोच रही थी—चर्च पाप-पुण्य की जगह उनसे उनके संसाधन और उनकी क्षमता का कोई व्यावहारिक-सा काम निकाल पाता।

एक सवाल मेरे भीतर लगातार कुलबुला रहा था—
“आदिवासी तो सरना होते हैं… फिर यह कैसा गाँव है जहाँ लगभग सभी ईसाई हैं? और कब से? क्या कभी ये सरना नहीं रहे होंगे?”

मैंने सहज ही पूछ लिया। जवाब भी उतना ही सहज आया—
“हमारे दादा के दादा भी ईसाई थे… बस, तब से हैं।”

पर यह “बस” मुझे संतोष नहीं दे पाया। उस “बस” के भीतर कोई कहानी थी—और वही कहानी धीरे-धीरे खुली। बताया गया—यह उस समय की बात है जब दुबराज राजा का इलाक़े में दबदबा था। उन्हें शिकार का बड़ा शौक था, पर शिकार अकेले नहीं कर सकते थे। असुरों के बिना उनका शिकार पूरा नहीं होता था। जंगल की राह, जानवरों की चाल, सब हमीं बताते थे। तीर भी हम चलाते थे।

एक दिन शिकार पर निकले। कहते हैं, उस दिन एक मोर मारा गया। पर जब शिकार समेटने का समय आया—मोर गायब। राजा का माथा ठनका। खोज हुई। शक भी हुआ। दरअसल, असुरों ने ही उस मोर को छिपा दिया था। शायद भूख रही हो, शायद बच्चों के लिए बचाया हो, शायद बस एक छोटा-सा प्रतिरोध रहा हो—राजा के शिकार में अपनी हिस्सेदारी का एक अनकहा दावा।

लेकिन एक चूक हो गई। मोर तो छिपा लिया गया, पर उसके पंख… वे छिप नहीं पाए। कुछ लड़के उन पंखों को लगाकर घूम रहे थे, अपनी ही खुशी में। राजा की नज़र पड़ी।

और फिर वही हुआ, जो अक्सर सत्ता करती है—
उसने दंड सुनाया—“पाँच रुपये दो।”

पाँच रुपये! आज यह रकम छोटी लग सकती है, पर तब यह एक असंभव माँग थी। असुरों के पास पैसा कहाँ था? उनका जीवन तो जंगल से चलता था, सामान की अदला-बदली से।

घबराहट में वे गाँव-गाँव भटके, फिर किसी ने कहा—“चर्च के पादरी के पास चलो।”

वे गए। अपनी पूरी कथा सुनाई—डर, अपराध, असमर्थता सब कुछ।

पादरी ने सुना। थोड़ी देर चुप रहा। फिर कहा—
“मैं पाँच रुपये दे देता हूँ… पर एक शर्त है—तुम लोग ईशु के रास्ते पर चलोगे।”

कहानी यहीं खत्म नहीं होती—यहीं से शुरू होती है। उन पाँच रुपयों से जुर्माना भरा।

“उसने हमें राजा के अत्याचार से बचाया… हमारी जान बचाई,”—यह वाक्य जब सुनाया गया, तो उसमें कृतज्ञता थी, और कहीं बहुत भीतर एक अनकहा इतिहास भी।

तब समझ आया—यह धर्म परिवर्तन केवल आस्था का प्रश्न नहीं था, बल्कि सुरक्षा, अस्तित्व और सत्ता के दबावों के बीच लिया गया निर्णय होता है, जिसमें एक मजबूर आदमी का क्या बस। गाँव में चर्च है, प्रार्थनाएँ हैं, जातीय पहचान अब भी वही है—असुर।

तो यह बचे रहने की कहानी है।

 

गाँव में सामूहिकता व स्वावलंबन का अनूठा उदाहरण देखा गया। प्रतिदिन जंगल जाना, अपनी ज़रूरत भर का फूल, पत्ती, लकड़ी ले आना दिनचर्या में शामिल है। चटाई बनाते हुए स्त्रियों को देखना, कारपेंट्री, पक्के मकान का काम करते हुए देखना, झोपड़ी की मिट्टी छपाई—जैसे कोलाज मिलकर पूरे गाँव का दृश्य उपस्थित कर रहे थे। बच्चे स्कूल जाते हैं। गाँव में ग्रामसभा की सक्रियता की वजह से सकारात्मक बदलाव दिखा। गाँव के निर्णय सामूहिक रूप से लिए जा रहे थे। वहीं जब हम डूम्बरपाट गए तो वहाँ ग्रामसभा संगठित नहीं थी और उस वजह से बिखराव था। एक तनाव था।

देख रहे थे—सरकार की घर की योजना की वजह से मिट्टी के घर सीमेंट के घर में बदल जाएँगे तो कैसा लगेगा यह गाँव पर? क्या उनका यह सवाल ग़लत था—जब सरकार घर बनाने का पैसा दे रही है तो हम पैसा नहीं लें? डोकापाट चर्च में शाम ‘फ़िल्म गाँव छोड़ब नाहीं’, ‘ह्यूमन इन लूप’ आदि फ़िल्मों का प्रदर्शन हुआ, और जल-जंगल-जमीन व अपनी भाषा, बोली, संस्कृति बचाने पर बातचीत होती रही। एक सत्र कहानियों का भी था, जहाँ मैंने कुछ लोककथाएँ सुनाईं, कुछ कथाएँ गाँव के बुज़ुर्ग लोगों ने।

एक ग्रामसभा में हम भी उपस्थित थे। बाकायदा एजेंडा था। रजिस्टर में लोग अपना अंगूठा लगाकर उपस्थिति दर्ज कर रहे थे। लुपुंगपाट जैसे गाँवों के अनुभव में ग्रामसभा केवल एक प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि समुदाय की जीवित आत्मा की तरह उपस्थित होती है। यहाँ निर्णय ऊपर से नहीं थोपे जाते, बल्कि सामूहिक रूप से तय होते हैं—कौन-सा काम होगा, किस तरह होगा, और किसकी क्या जिम्मेदारी होगी।

ग्रामसभा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह जल, जंगल और जमीन पर समुदाय के अधिकार को जीवित रखती है। जंगल से क्या लेना है—फूल, पत्ती, लकड़ी—यह भी आवश्यकता के अनुसार तय होता है, शोषण के रूप में नहीं। इसी वजह से स्वावलंबन की एक स्वाभाविक व्यवस्था बनी रहती है। इस गाँव में सकारात्मक बदलाव दिखा—वह इसी सक्रिय ग्रामसभा का परिणाम है। बच्चे स्कूल जाएँ, बाहरी हस्तक्षेप पर कैसे प्रतिक्रिया हो, सरकारी योजनाओं को कैसे स्वीकार या अस्वीकार किया जाए—ये सब मुद्दे वहीं तय होते हैं। यही कारण है कि गाँव में एक साझी जिम्मेदारी और सहभागिता का भाव बना रहता है।

लेकिन इसके साथ एक द्वंद्व भी है—जैसे सरकार की घर योजना, जिसमें मिट्टी के घर सीमेंट में बदल रहे हैं। यहाँ ग्रामसभा एक संतुलन साधने की कोशिश करती है—विकास और परंपरा के बीच।

यहाँ मैंने पाया—असल में ग्रामसभा उस जगह खड़ी है जहाँ लोकतंत्र केवल कागज़ पर नहीं, जीवन में घटित होता है—जहाँ हर व्यक्ति की आवाज़, चाहे वह बूढ़ा हो, औरत हो या युवा, उस सामूहिक निर्णय का हिस्सा बनती है। किसी दुकान में बीड़ी नहीं बिक रही, हँड़िया किसी चूल्हे में नहीं चढ़ती—ऐसे निर्णय भी लिए हैं। ग्रामसभा के दौरान यह भी देखा—बच्चे अपने साथ झोला भी लिए हैं, वो इसलिए कि रास्ते में और सभा के समय आसपास कदम्ब के फल बटोर लेंगे, जो उनकी बकरियों को बहुत पसंद हैं । इस सभा में यह तय हुआ कब्रस्थान की बाउंड्री बनेगी। दूसरा जो बगल के गाँव वाले उनके तरफ के पेड़ से लकड़ी काट रहे हैं, उन पर कार्यवाही करेंगे। तीसरा वन  उत्सव की तैयारी के लिए काम बंटे।

यहाँ चर्च का भी अहम रोल है। संडे की बड़ी सुबह सामूहिक प्रार्थना और ईस्टर पर बात थी। लोग अपने-अपने घर से छोटी-छोटी पोटली लिए जा रहे थे। पोटली में चावल और आलू थे। यह वो प्रार्थना के बाद अर्पित करते। उनका चर्च पर श्रद्धा और विश्वास है। मैं उससे परे सोच रही थी—चर्च पाप-पुण्य की जगह उनसे उनके संसाधन और उनकी क्षमता का कोई व्यावहारिक-सा काम निकाल पाता।

लुपुंगपाट का नाम लुपुंगपाट क्यों पड़ा यह भी हमने सुना —असुर लोग परंपरागत रूप से लोहे को गलाने का काम करते थे। उनका जीवन घुमंतू था—जहाँ-जहाँ पहाड़ और विशेष प्रकार के पत्थर मिलते, वे वहीं बस जाते और उसी पत्थर को गलाकर लोहा तैयार करते। इसी क्रम में वे इस इलाके में आए। बताया जाता है कि रुईदास भी भागकर यहाँ पहुँचे और चिचवानी गाँव में कुछ समय तक रहे। वहाँ उन्होंने एक तालाब भी खुदवाया, जो आज तक “असुर तालाब” के नाम से जाना जाता है।

समय के साथ समुदाय दो समूहों में बँट गया। एक समूह ने “करकेट्टा” नामक चिड़िया के आधार पर अपना गोत्र रखा। और एक मुंडा थे जो खेती करते थे। इसी बीच एक घटना घटी, जिसने इस पूरे इलाके की दिशा बदल दी। दुबराज नामक एक राजा का घोड़ा अरहर के खेत में चर रहा था। अँधेरे में समझ नहीं आया। उसे किसी ने हिरन समझकर मार दिया। राजा को पता चलेगा तो क्या होगा? इससे विवाद और भय की स्थिति बनी, और लोग इधर-उधर भागने लगे—अलग-अलग दिशा में।

एक समूह पूरब की ओर भागा। वे जहाँ भी जाते, पेड़ों के नीचे शरण लेते, वहीं ठहरते। इसी भटकन के दौरान उन्हें एक विशेष पेड़ के नीचे आश्रय मिला—जिसे स्थानीय भाषा में “लुपुंग” कहा जाता था। यही पेड़ उनकी शरणस्थली बना। आज उसी पेड़ को “बरेडा” या “बर्हा” कहा जाता है, जिसका उपयोग त्रिफला बनाने में भी होता है।

शुरुआत में इस जगह पर पेड़ के नीचे केवल तीन परिवार बसे थे। धीरे-धीरे यह बसावट एक गाँव में बदल गई। उस पेड़ की स्मृति, जिसने संकट के समय उन्हें आश्रय दिया था, इतनी गहरी थी कि उसी के नाम पर इस स्थान का नाम पड़ा—लुपुंगपाट, अर्थात वह पठार/स्थान जहाँ “लुपुंग” के पेड़ के नीचे जीवन ने फिर से आश्रय पाया। क्या वो पेड़ अभी भी है?—हाँ है न, सामूहिक आवाज़ आयी।

हमारे यहाँ घर के हर सदस्य को अपनी जगह चाहिए। अपना-अपना कमरा। मैं प्रफ्फुल और प्रदीप के घर पर रुकी थी। वहाँ मैंने पाया—उनके दोनों बच्चे सुबह बहुत जल्दी, पाँच बजे ही चूल्हा जल जाता है। चूल्हे के पास बैठकर बातें करते हैं, भात पकता रहता है। एक कोने में ही सिमट जाते हैं, क्योंकि माँ-पापा से चिपकने का यही समय है। वे एक छोटे कमरे में ही सो जाते हैं, लेकिन जानवरों के लिए बड़े-बड़े बाड़े हैं।

एक बड़ा बकरियों का, जिन्हें प्रफ्फुल सुबह साढ़े नौ बजे जंगल चराने ले जाती। शाम को वे अपने आप लौट आतीं। गाय-बैल, बछड़े के लिए अलग जगह। मुर्गियों के लिए बरामदे का एक कोना। गाँव में मैंने कई सूअरों के बाड़े भी देखे। और तो और, खरगोश और चूहों के भी अपनी जगह है। बतख के झुंड भी दिखते थे। मैंने जिस घर में चूहे देखे और पूछा—“यह नुकसान करते होंगे, क्यों पालते हैं?” जानते हैं, उन्होंने जवाब दिया—“ये हमारे घर की शोभा बढ़ाते हैं।” छोटा-मोटा नुकसान, जैसे चटाई कुतर देते हैं, तो हम सामान ऊपर आले और रस्सी पर रखते हैं।

लुपुंगपाट में गाय-बकरी के झुंड के झुंड दिखते हैं, पर उनका दूध अपने उपयोग के लिए नहीं निकालते। पूछने पर बताया—वह उनके बछड़ों और बकरी के छौनों के लिए ही छोड़ देते हैं। गाँव में दूध कोई नहीं निकालता। जब शहरों में गाय को इंजेक्शन देकर जबरदस्ती दूध निकाला जाता है, लुपुंगपाट की यह परंपरा अचरज से भर देती है। कहा जा सकता है—यहाँ पशु-पक्षी जीवन से अलग नहीं, उसी का हिस्सा हैं। घर के भीतर नहीं तो घर के आस-पास, पर बराबर के हिस्सेदार की तरह। जैसे मनुष्य और जानवर के बीच कोई दूरी नहीं, केवल सह-अस्तित्व है।

दिनांक 18 मार्च – 19 मार्च 2026

लुपुंगपाट से सीधे हम बरपाठ में पीटर बेंग दादा के घर पहुँचे। उनकी अगुआई में आस-पास घूमे। बाक्साइड खनन के लिए जमीन दिए जाने पर आदिवासियों के साथ किए अन्याय की बात हुई। अग्रीमेंट के मुताबिक मूलभूत आवश्यकताओं का न मिलना दुखदायी है। उनसे खनन के लिए जमीन दिए जाने की प्रक्रिया पर जो बातचीत हुई, वह केवल एक गाँव की कहानी नहीं, बल्कि समूचे झारखण्ड और भारत के आदिवासी अंचलों की प्रतिनिधि स्थिति को सामने लाती है।

अग्रीमेंट के मुताबिक मूलभूत आवश्यकताओं—बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा—का उपलब्ध न होना केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक अन्याय का संकेत है। यह वही विडंबना है, जहाँ खनिज-संपन्न क्षेत्र संसाधनों से भरपूर होते हुए भी स्थानीय समुदाय बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहते हैं।

पीटर दादा ने बताया कि कई बार वह ज़मीन, जो फ़ॉरेस्ट विभाग से रैयतों को मिली थी, उसे बिना बताए खनन कर छोड़ देते हैं। मैंने पूछा—इसका समतलीकरण क्यों नहीं किया? जवाब मिला—यह लीज़ पर नहीं थी। मेरा यही तो सवाल है, जब यह लीज़ पर नहीं थी, तो खुदाई क्यों की? खुदाई की और एक पैसा मुआवज़ा नहीं दिया। यह सब धोखाधड़ी ही है।

पीटर बेंग द्वारा दिखाए गए कागजात इस बात के प्रमाण हैं कि जमीन हस्तांतरण केवल आर्थिक लेन-देन नहीं था, बल्कि उसके साथ पुनर्वास, रोजगार और आधारभूत संरचना के विकास के वादे भी जुड़े थे। परन्तु खनन के बाद समतलीकरण (mine reclamation) का न होना पर्यावरणीय न्याय के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है। यह स्थिति भारत के खनन कानूनों—विशेषकर पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) और पुनर्वास नीतियों—की जमीनी असफलता को उजागर करती है।

झारखण्ड राज्य बनने के बाद कुछ समुदायों को ST से OBC में वर्गीकृत किए जाने की बात भी गहरे राजनीतिक-सामाजिक खेल की ओर संकेत करती है। यह केवल एक प्रशासनिक पुनर्वर्गीकरण नहीं, बल्कि संसाधनों, आरक्षण और अधिकारों की पुनर्संरचना का प्रश्न है, जो आदिवासी अस्मिता को प्रभावित करता है।

बरपाठ से लेकर डूम्बरपाठ तक एक समान पैटर्न उभरता है—खनन के लिए जमीन अधिग्रहण, वादों का अधूरा रह जाना, पर्यावरणीय क्षति (समतलीकरण का अभाव, जल स्रोतों का प्रदूषण) और अंततः मजबूरन पलायन।

इन आदिवासी समुदायों का यह पलायन नया नहीं है—चाय बागानों, अंडमान और अब महानगरों (विशेषतः दिल्ली) की ओर घरेलू श्रम के रूप में उनका जाना एक लंबी औपनिवेशिक और उत्तर-औपनिवेशिक प्रक्रिया का हिस्सा है। यह श्रम-प्रवास दरअसल विकास मॉडल की असफलता का सामाजिक परिणाम है।

नेतरहाट पाट इलाके जैसे पकरीपाट, अमटीपानी, कोरकोपाट में सैनिकों के तोप-चालन अभ्यास को स्थानीय भाषा में चांदमारी कहा जाता है। एक तरफ पीटर दादा से दस्तावेज़ और उनके संघर्ष की कहानी चल रही थी, दूसरी तरफ मैंने चांदमारी की गवाह रही दादी लोगों से जो सुना, उसकी सिहरन आज भी बदन में महसूस हो रही है। किताबों में जरूर पढ़ा था कि ऐसे समय औरतों पर कैसी मार पड़ती है, पर यहाँ वह पढ़ा हुआ सच सामने खड़ा था।

दादी ने बताया—चांदमारी के समय हम लड़की थे और सैनिक हमें नोट दिखाकर बुलाते थे—“आओ।” तो “आओ” कहने पर आप जाती थीं?—“हट! मैं नहीं गयी, पर हमारी कुछ सहेलियाँ चली भी जाती थीं…” इसके आगे कुछ कहने की जरूरत नहीं रह जाती। सैनिकों द्वारा छेड़खानी और बलात्कार होते रहे होंगे—यह अनुमान नहीं, उस डर और चुप्पी में दर्ज इतिहास है। वह आज भी उस दहशत में जी रही हैं—कान से स्कार्फ नहीं उतारतीं, मानो किसी भी क्षण तोप-चालन फिर शुरू हो सकता है।

लाल टोपी पहने लोग आते थे और कहते थे—गाँव खाली करो। अभ्यास कभी भी हो सकता था। 1964 से 1993 तक हर गर्मी में यही होता रहा। लोग अपने घर छोड़कर चले जाते—अपने जानवरों को साथ लेकर, खाने-पीने का अनाज बाँधकर। घर छोड़कर खुले आसमान के नीचे वक्त गुजारते। वापस जाते तो कुछ न कुछ नुक़सान हुआ रहता, घर वैसे नहीं मिलते जैसे छोड़कर जाते। मुआवज़ा मिलता था क्या? पूछने पर जवाब मिला—डेढ़ रुपया! गोला फटने से फसल बर्बाद हो जाती थी, कुछ लोगों के हाथ-पैर भी टूट जाते थे।

तो क्या सुनवाई नहीं होती थी? दादी ने सीधा कहा—“थाना उनका, उनके सिपाही… हमारा कौन सुनता?”

 

(इस रिपोर्ट की आखिरी किस्त आने वाले शुक्रवार को प्रकाशित होगी )

श्रद्धा श्रीवास्तव -जनवरी 1971 को रीवा मध्यप्रदेश में जन्म.  केंद्रीय विद्यालय संगठन से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति. कथादेश, नया ज्ञानोदय,आजकल, हंस, अन्विति जैसी पत्रिकाओं में कहानियाँ प्रकाशित और चर्चित रहीं हैं. लद्दाख में स्टोरी टेलिंग फेलोशिप प्राप्त, भोपाल में निवास.

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