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साहित्य-संस्कृति

यलगार का कोरस

बीते रविवार कोरस के फेसबुक लाइव में यलगार सांस्कृतिक मंच के साथियों सिद्धार्थ प्रतिभावंत, स्वाती उथले और धम्मरक्षित ने युवाओं, महिलाओं, मजदूरों, शोषित एवं दलित तबकों के लगातार चल रहे प्रतिरोध एवं हक़ की आवाज़ को अपने जनगीतों के माध्यम से समर्थन दिया। कोरस की साथी मात्सी ने कार्यक्रम का संचालन किया ।

यलगार सांस्कृतिक मंच युवा संस्कृतकर्मियों का मंच है जो थियेटर और संगीत के माध्यम से संविधान के मूल्यों, स्वतंत्रता, समानता, न्याय और बंधुत्व को मजबूत बनाने के कार्य में लगातार सक्रिय हैं। सबसे पहले सावित्री बाई फुले को मराठी गीत के माध्यम से नमन करते हुए स्वाती उथले ने कहा कि आज उनकी ही वजह से हम शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं ,अपनी आवाज़ को बुलंद कर सकते हैं। उन्होंने अन्ना भाऊ साठे को भी याद किया जिन्होंने लोक संगीत में ईश्वर के भजन, कीर्तन के बजाय जनता से जुड़े, उनके लिए कुर्बान हुए लोगों का वंदन किया, जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी इंसानियत की रक्षा को समर्पित कर दी।

इसी क्रम में साथियों ने गौरी लंकेश को याद करते हुए कहा कि जिस संविधान के मूल्यों को लेकर वह आगे बढ़ रही थीं हम भी उसी बात को लेकर आगे बढ़ रहे हैं और इसी विश्वास के साथ हम ‘ हम अगर उट्ठे नहीं तो ‘ मुहिम को भी अपने इन्हीं पंक्तियों से बनाए हुए गीत के माध्यम से समर्थन दे रहे हैं।
हम अगर उट्ठे नहीं तो
दौरे सितम न बदलेगा
हम…दैरो हरम के नाम पर ये
मातम न बदलेगा…..
हर एक सोच बदलेगी,
तभी तो ज़माना बदलेगा
हम अगर उट्ठे हैं
तो ये ज़माना भी बदलेगा
ये मौसम भी बदलेगा
और बेशक ये मातम भी बदलेगा।

उन्होंने आगे अपनी बात रखते हुए कहा कि हमारा देश ‘ विभिन्नताओं में एकता ‘ वाला देश है, हमारा देश बहुत ही सहिष्णु है ऐसा कहा जाता है पर हमारा सवाल है कि जिस देश का धर्म हमें अछूत कहता है, हमें अपमानित करता है, क्या वो सच में हमारा देश है, हमारा धर्म है? उन्होंने बताया कि बिल्कुल यही सवाल सालों पहले महात्मा फूले के स्कूल में पढ़ने वाली छोटी सी लड़की मुक्ता साठे ने खड़ा किया था। उसने पूछा था कि जो धर्म हमें अछूत कहकर अपमानित करता है वो हमारा धर्म कैसे हो सकता है? इसी सवाल को आगे जाकर बाबा साहेब अंबेडकर ने खड़ा किया और घोषणा की कि,’ मैं हिन्दू धर्म में जन्मा जरूर हूं लेकिन मैं हिन्दू धर्म में मरूंगा नहीं।’ इस सवाल के साथ ही उन्होंने एक खूबसूरत  गीत प्रस्तुत किया –

इंसान को अछूत और गुलाम किया है,
कैसा ये धरम है, कैसा ये धरम है……

साथियों ने महिलाओं की असुरक्षा एवं शोषण, छात्रों के दमन और भेदभावपूर्ण, जातिवादी, मनुवादी व्यवस्था का भी अपने गीतों के माध्यम से प्रतिरोध दर्ज किया।

अम्बेडकर, फूले का हम गीत गाते हैं
लोगों को सच्चाई का एहसास दिलाते है…..

इसके साथ ही उन्होंने  कहा कि हम अम्बेडकर और फुले जैसे नायकों की राह चुनते हैं, इसलिए नहीं कि हम उनके अंधभक्त हैं बल्कि इसलिए कि हम उनके संविधानिक मूल्यों और इंसानियत के समानतावादी भाव को मानते हैं। हम कलाकार हैं, हम अमन चाहते हैं, मोहब्बत चाहते हैं, इसलिए हमारी तमन्ना है कि इक वो दिन भी आए जब धर्म की नफरती राजनीति करने वाले भी मुहब्बत के गीत गाएं, इस देश के लिए अमन चुनें, उनके दिलों में भी प्यार जागे। ऐसी ही सपनों और उम्मीदों को लेकर उन्होंने एक गीत भी प्रस्तुत किया।

मैं तो देखूंगा, तुम भी देखोगे
जो छूट गए थे भूले से, लौटेंगे फिर वतन को
वो दिन भी आएगा जब ऐसा होगा ये जहां….

इसी क्रम में उन्होंने संत परंपरा से संबंधित कबीर, रैदास के दोहे और प्रगतिशील, क्रांतिकारी कवियों की कविताओं के मिले जुले रूप में एक गीत ,एक नए एवम् बेहतरीन अनुभव के रूप में प्रस्तुत किया जिसमें विद्रोही जी की कविता का पाठ भी था।

मैं किसान हूँ
आसमान में धान बो रहा हूँ
कुछ लोग कह रहे हैं
कि पगले! आसमान में धान नहीं जमा करता
मैं कहता हूँ पगले!
अगर ज़मीन पर भगवान जम सकता है
तो आसमान में धान भी जम सकता है
और अब तो दोनों में से कोई एक होकर रहेगा
या तो ज़मीन से भगवान उखड़ेगा
या आसमान में धान जमेगा.

इसके बाद साथियों ने मजदूरों, सीएए, एनआरसी से जुड़ी महिलाओं और उन सभी साथियों जो कि अन्याय के खिलाफ लड़े उनको अपने गीतों के माध्यम से क्रांतिकारी सलाम किया और आह्वान किया कि छात्रों, मजदूरों, किसानों, महिलाओं और उन सभी शोषित, दमित लोगों को अब एक होकर अपनी प्रतिरोध की आवाज़ को बुलंद करना होगा और लड़ाई लड़नी होगी अपने मूलभूत अधिकारों के लिए, न्याय के लिए, समानता के लिए, लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए। उन्होंने इस पर ही फ़ैज़ का एक गीत भी प्रस्तुत किया –

आज बाजार में पा – ब – जौलां चलो…. ।

अंत में उन्होंने संत कबीर, रैदास, तुकाराम आदि लोगों के  दोहों को गीत के रूप में प्रस्तुत किया और ये पैग़ाम दिया को जब हम रोजी, रोटी के चक्कर में सड़कों पर उतरेंगे और मनुवाद, पूंजीवाद और अन्याय को खत्म करने के लिए इकट्ठे होंगे तो हम हम सबको साथ लड़ना होगा। मोहब्बत के लिए, प्यार के लिए आवाज़ उठानी पड़ेगी।

यलगार के जनगीत यहाँ सुन सकते हैं।

प्रस्तुति: शिवानी

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