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कविता

छूटते हुए ज़रूरी प्रश्नों का कवि अंजन कुमार

बसन्त त्रिपाठी


 

सत्ता संरचना में अंतर्निहित क्रूर आकांक्षाओं को जिन युवा कवियों ने रोजमर्रा के अनुभवों से पकड़ने में अतिरिक्त रूप से सजगता दिखाई है उनमें अंजन कुमार निश्चित ही एक चिर-परिचित नाम है. अंजन कुमार की इन कविताओं में हमारे समय के उन तमाम लोगों की चिंता झलकती है जो वर्तमान से बिद्ध, अतीत के आक्रमण से हतप्रभ और भविष्य के प्रति आशंकित हैं. कल्याणकारी राज्य की आधी अधूरी परियोजनाएँ स्थगित कर दी गई हैं और इनसे सबसे ज्यादा प्रभावित और परेशान होने वाले अधिकतर लोग या तो चुप हैं या हाशिए पर ढकेल दिए गए हैं या उत्सव मना रहे हैं. आने वाले दिनों में मध्यवर्ग की स्थिति विकट होने वाली है क्योंकि कल्याणकारी राज्य की सुविधाओं का सबसे ज्यादा उपभोग करने वाला वर्ग मध्यवर्ग ही था. अब कल्याणकारी राज्य जब पीछे किया जा रहा है तो सबसे ज्यादा खुश होने वाला तबका भी यही है. क्या यह हमारे समय का अज़ीब द्वैत नहीं है ? आश्चर्य कि ये बातें अपने निकट मध्यवर्गीय से भी कही जाए तो वह बाँह चढ़ाकर, तर्क करने नहीं बल्कि लड़ने के लिए तैयार हो जाता है. अंजन कुमार की ये कविताएँ इन विकट स्थितियों से गुज़रते हुए ही लिखी गई हैं. वे महसूस करते हैं कि ‘सारे ज़रूरी प्रश्न छूटते जा रहे हैं यक ब यक’.

 

समय के इस नाजुक दौर में बार-बार यह सवाल खड़ा होता है कि ये वाकई सच है या कोई भयानक दुःस्वप्न? कहना चाहिए कि यह ऐसा दुःस्वप्न है जिसको सच करने की परियोजना में सत्ता लीन है. कवि की वर्तमान स्थिति सच और भविष्य की आशंकाओं के बीच है. दिक्कत यह है कि सिवाय देखने और बेचैन होने के, वह कुछ कर नहीं पा रहा है. अंजन ऐसी स्थितियों को बार-बार अपनी कविताओं में लाते हैं और दुःस्वप्न को सच करने की परियोजना और सत्ता के षड़यंत्रों को अपनी कविताओं में उघाड़ते हैं. उनकी भाषा एक ऐसे तनावग्रस्त मनुष्य की भाषा है जो खुद को खारिज कर दिए जाने के बावजूद कहने का जोखिम लगातार उठाता है और इसकी शिनाख्त के लिए इतिहास से उदाहरण पेश करता है. हिटलर, हत्यारे, कुत्ते, उदास चाँद, अँधेरा, तिलस्म, नंगी और मृत देह, चमकदार गुफा जैसे शब्दों और विशेषणों से इन कविताओं की भाषा निर्मित हुई है. और हमारे सामने एक ऐसा वृहत दृश्य खुलता है जो यथार्थ और फैंटेसी के बीच का है. आश्चर्य नहीं कि उनकी एक कविता का शीर्षक भी ‘स्वप्न और यथार्थ के बीच’ है.

 

अंजन कुमार की इन कविताओं के विषय लगभग एक हैं और ये एक जैसी बेचैनी में लिखी गई हैं. इनमें हमारा वह समय है जो लगातार जल रहा है. वे महसूस करते हैं कि ‘उदास चेहरों के बीच/ एक लालटेन थी/ जिसमें अँधेरा नहीं/ समय जल रहा था’. उनके लिए हमारे समय के ये तानाशाह मसखरे और नाटकबाज हैं. ठीक विगत इतिहास की तरह. और ऐसे मसखरे और नाटकबाज, जिन्होंने देश को क्रूर खेल के मैदान में बदल दिया है और क्रूरता का खेल खेलने में मसरूफ हैं. वे अपने हथियाये हुए माध्यमों से अफीम परोसते हैं जिन्हें चाटती हुई जनता नशे में पगलाई घूम रही है. ऐसे मसखरे तानाशाहों ने सारे ज़रूरी सवालों को धकियाकर चिंतन की ज़मीन से बाहर ढकेल दिया है. क्या यह हमारे समय की सबसे बड़ी चिंता नहीं होनी चाहिए कि मौजूदा समय में सत्ता-तंत्र की क्रूरता के जितने स्पष्ट चित्र दिखाई पड़ रहे हैं प्रतिरोध के स्वर उतने ही लाचार और हतप्रभ ?

 

कहना होगा कि इतिहास की निरंतरता को वर्तमान की क्रूरताओं से मिलाकर देखने की अंजन कुमार की कोशिश ही फिलहाल हमारे समय की पक्षधरता है. वे कवि की जिम्मेदारी के साथ अपने पाठकों के सामने खड़े हैं. नागार्जुन ने अपनी ‘पक्षधर’ कविता में कहा था कि ‘कलाधर या रचयिता होना नहीं पर्याप्त है/ पक्षधर की भूमिका धारण करो.’ अंजन कुमार पक्षधर की भूमिका निभाते हैं. उनकी इस पक्षधरता में ही लोकतंत्र की खुशहाली छिपी है. इसलिए यदि इन कविताओं में छिपे अंतर्निहित खतरों को नहीं सुना जाएगा तो वही होगा जिसकी आशंकाएँ बार बार संवेदनशील और ईमानदार विचारक, वैज्ञानिक कलाकार और संस्कृतिकर्मी व्यक्त करते रहे हैं.

 

अंजन कुमार की इन कविताओं को केवल कविताओं की तरह न पढ़ें. ये हमारे समय के दुःस्वप्न और उससे मुक्त होने की छटपटाहट में बहुत व्यथित और क्षोभ में लिखी गई कविताएँ हैं.

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अंजन कुमार की कविताएँ

 

1. स्वप्न और यथार्थ के बीच

कुत्तों के रूदन में
गहरी हो चुकी रात
गूंज रही है सूखे पत्तों पर

चाँद
अटका हुआ है पेड़ की शाख पर
किसी उदास गेंद की तरह
और तारें धुंध में कहीं
दूर निकल गये हैं भटककर

यह स्वप्न और यथार्थ के बीच
चूक गये समय की सर्द रात है

जहाँ  सारे जरूरी मूल्य
पेड़ पर चमगादड़ की तरह
उल्टे लटके चीख रहें हैं
और सारा शहर
चादर से बाहर निकाले पांव
एक कभी न खत्म होने वाले
स्वप्न में डूबा हुआ है

एक ऐसा रहस्यमय स्वप्न
जो जितना विराट है
उतना ही जठिल भी
जो जितना सुंदर है
उतना ही भयावह भी

नहीं है तो सिर्फ
तर्क करने की जगह
संदेह करने की वजह
आश्चर्य है कि इसमें नहीं है
कोई विराम चिन्ह भी
जहां थोड़ी देर ठहरकर
यह देखा जा सके
कि घंटे को पकड़ने के चक्कर में
मिनट के कांटे से गिरकर
सेकंड के हाथों
कैसे मारे जा रहें हैं
हम लगातार

घड़ी हाथ में बंधी है
या हाथ बंधे है घड़ी से
कि सारे जरूरी प्रश्न
छुटते जा रहें हैं यक-ब-यक
समय के अभाव में
हर चेहरा होता जा रहा है विद्रूप
दिन-ब-दिन एक भाव के अभाव में

मनुष्यता जैसे कोई पिछले जमाने की
बात हो गई हो
और अपराधबोध
कोई पुरानी दिल की बिमारी

यथार्थ से कोसो दूर
एक स्वप्न में डूबा यह शहर
बिल्कुल उस चिड़िया की तरह है
जिसे दाना तो दिखाई देता है
पर अफसोस जाल नहीं

जो एक रात भटककर
जा पहुँचती है किसी कमरे में
ढूंढते हुए एक सुरक्षित कोना
और अगले दिन मिलती है
मरी हुई

यह स्वप्न और यथार्थ के बीच
चूक गये समय की सर्द रात है

जहाँ रात के ब्लैकबोर्ड पर
खींचते हुए आड़ी-तिरछी लकीरें
उस नदी से बेखबर है सभी
जो खतरे की निशान से
ऊपर बह रही है।

 

2. अँधेरा हँस रहा था

उदास चेहरों के बीच
एक लालटेन थी
जिसमें अँधेरा नहीं
समय जल रहा था

अँधेरा
खड़ा हंस रहा था
उन कटे हुए हाथों पर
जो जमीन में हाथ गड़ाये
ढूंढ रहे थे अपनी घड़ी
जिसमें समय न जाने कब से
दफ्न पड़ा था

वह हँस  रहा था
उन तमाम लोगों पर
जो सायों की तरह उतरते सीढ़ियाँ
अपने घरों की
और गुम हो जाते भीड़ में
अपने खो चुके चेहरों की तरह

अँधेरा हंस रहा था
जिस उजाले पर
एक अंतहीन अंधेरे की उजली गुफा थी
एक तिलस्म अनंत इच्छाओं और भूख का
जिसकी मोहपाश में बंधें
गिरते है जहाँ, एक-एक कर
ठगे, पर फूले हुए चेहरे लिए
आश्चर्य लोक के यात्री बन सभी

उजाले के शोर में गुम
बाँधें हुए आँखों पर रंगीन चमकदार पट्टी
सब दिखते एक से
एक से भाव और उत्तेजना में लिप्त
अपने को ही उधेड़ते
खोलते आदिम वासनाओं के द्वार
भटकते रिक्तता के मरूस्थल में
उजाले की चमकती मृगमरीचिकाओं के साथ
रेत होते जीवन तक

जहाँ पाने के लिए कुछ भी नहीं
एक और नई इच्छा के सिवा
और इच्छा भी किसी इच्छाधारी सर्प की तरह
अपना रूप बदल-बदलकर डसने को तैयार
जहर बुझे तीरों की तरह आँखों को बेधती हुई
विषाक्त करती पूरे जीवन को

मैं गिरता हूँ इस उजली गुफा में
सूखी चाम पर
चूसी गई हड्डियों पर
पथराई आँखों पर
क्षत-विक्षत भूखी नंगी सैकड़ों मृत देहों पर
दबी हुई सरकारी योजनाओं के बड़े-बड़े
विज्ञापनों के नीचे
जो कभी खबर नहीं बन पायी
किसी भी अखबार की मुख्य पृष्ठ की
ना ही दिखाई गई बार-बार किसी भी टी.वी. चैनल पर
जैसे दिखा दी जाती है अक्सर
किसी माडल के अधोवस्त्र के गिरने की खबर
बार-बार लगातार पूरी रोचकता के साथ

एक उजली और चमकदार गुफा है यह
जिसमें हर बड़ा चेहरा
प्रेतआत्माओं-सा घेरे हुए
लगातार लगा हुआ है

आत्महीन
विवेकहीन
चरित्रहीन
और व्यक्तित्व विहीन
करने में हम ।

 

3. तानाशाह

तानाशाह
सबसे पहले चुनता है एक सम्बोधन
जैसे हिटलर ने चुना था फ्रेंड्स

फिर वह चुनता है वह स्थान
जो जनता की आस्था का केंद्र होता है
जैसे हिटलर ने चुना था म्यूनिख को

फिर वह चुनता है
अपना एक धार्मिक दुश्मन
जैसे हिटलर ने चुना था यूहदीयों को

फिर वह चुनता है अपने हितचिंतकों को
जैसे हिटलर ने चुना था
चरम पूंजीपतियों को

फिर वह चुनता है
अपने सहयोगी को
जैसे हिटलर ने चुना था कारपोरेट को

फिर वह बनाता है अपना संगठन
जैसे हिटलर ने बनाया था
मिलीशिया, यंग फासीवादी और नागरिक सेवा संगठन

फिर वह चुनता है अपनी विचारधारा
जैसे हिटलर ने चुना था राष्ट्रवाद

फिर वह
अपने सहयोगियों और संगठनों के माध्यम से
पहले बढ़ाता है जनता की आस्था
फिर उठाते हुए उसी का फायदा
फैलाता है अंधराष्ट्रवाद, अफवाहें, भय और नफ़रत
करवाता है अपने दुश्मनों की हत्याएं
अपने संगठन के हाथों
जैसे हिटलर ने करवाया था
यूहदीयों, कम्युनिस्टों, लेखकों, कलाकारों, पत्रकारों
और तमाम अपने विरोधियों की हत्याएं
क्योंकि विरोध से डरता है वह
इसीलिए वह कभी नहीं करता संवाद
किसी भी बात पर
पूछता नहीं किसी से
केवल जारी करता है फरमान
वह भी इस तरह से
कि उसका हर निर्णय लगता है जनता को
जैसे उनके हित के लिए है

वह झूठ को इस तरह कहता है बार-बार
की लोग उसे सच समझने लगते है
और करने लगते है उसका अनुशरण
इस तरह वह जनता की आँखों में
बांधकर अंधराष्ट्रवाद की पट्टी
भेड़ों की भीड़ में कर देता है तब्दील
और जब जैसे चाहे हाँकलता रहता है

फिर तोड़ देता उन तमाम
पुराने सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक ढांचों को
जो उसकी सत्ता में बाधक है
ध्वस्त कर सारे सार्वजनिक उपक्रमों को
कर देता है इजारेदारी पूंजी के हवाले
क्योंकि वह जनता का नहीं
होता है केवल चरम पूंजीपतियों का हितैषी

इस तरह एक दिन
लोकतंत्र की हत्या करके
वह सब पर कर लेता है कब्जा
और बन जाता है
सबसे प्रभुत्वशाली तानाशाह ।

 

4. हत्यारे 

इतिहास के पन्नों पर वे कहीं नहीं थे
और थे भी तो एक बदनुमा दाग की तरह
एक हत्यारें के रूप में
क्योंकि हत्या से ही शुरू होता है उनका इतिहास

उनका इतिहास एक काला पन्ना है
उनकी टोपी की तरह
खोखली बहादुरी में बांह तक मुड़ी हुई
छक सफेद शर्ट की तरह
जिसमें एक कतरा खून तक नहीं
देश की आजादी के नाम
एक डंडा है
जो हांकलना चाहता है पूरी जनता को भेड़ की तरह
और एक निक्कर, जो प्रतीक है
हर प्रतिरोध के दमन का

दरअसल उनके पास ऐसा कुछ भी नहीं
जिसके लिए वे गर्व कर सके
और यही आत्महीनता उन्हें कुंठित और हिंसक बनाती है।
क्योंकि वे जानते हैं जिसका कोई इतिहास नहीं होता
उसका कोई भविष्य भी नहीं होता

इसलिए वे अतीत में अपनी जगह के लिए
इतने बैचेन, इतने आतुर हैं
कि इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने में लगे रहते हैं
इतिहास की नई-नई व्याख्याएं करते हैं
देश के महानायकों के नामों को कब्जियाते हैं
या उनकी कतार में अपना नाम जबरन जुड़वाते हैं
जब ऐसा नहीं हो पाता
तो उन्हें बदनाम कर अपना कद बढ़ाते हैं
सड़कों के, भवनों के, पुलों के, संस्थानों के व राज्योें आदि के नाम बदलते है

उनकी मानसिक दरिद्रता पर दया आती है
उनके अनुयायियों पर हँसी
जिससे पूछो कुछ तो बताते हैं कुछ
तोते जैसे रटा-रटाया सुनाते है कुछ
उन्हें चिल्लाने और काटने के सिवा कुछ नहीं आता
अज्ञान का खोखलापन कितना शोर मचाता है
उन्हें देख-सुनकर बहुत अच्छे से समझ आता है
दरअसल, उन्हें देशभक्त नागरिक नहीं, तोता चाहिए
क्योंकि उनकी परिभाषा में देशभक्त का अर्थ तोता होना है
जिसे सिर्फ राम राम चिल्लाना है।

वे सिर्फ जनता को भटकाना जानते हैं
इसीलिए हर जरूरी सवालों को जाति, धर्म और सीमा से जोड़ देते हैं
उनके पास भटकाने के सिवा कोई चारा भी नहीं
क्योंकि किसी बेहतर भविष्य का सपना भी नहीं
है तो सिर्फ और सिर्फ झूठे जुमले
इसीलिए उन्हें पढ़े-लिखें समझदार लोगों से नफरत है
और पढ़े-लिखें मूर्खों, चापलूसों से मोह
चेतना विहीन, विवेकहीन, अंध भक्तों का दरबार
या यूँ कहें इन्हीं मूर्खों से चलती है इनकी सरकार

इसीलिए
इन्हें मानव और मानवता से कभी कोई लेना देना रहा ही नहीं
ये तो सिर्फ एक खास ग्रंथ, एक खास वर्ग, एक खास जाति और एक खास संस्कृति के वाहक हैं
या यूं कहें कि एक महाझूठ के नायक हैं
एक कपोल कल्पित कल्पना जो बहलाती है मन को
मन की बात करके

वे शून्य में पैदा हुये
जैसे पैदा होती है बिमारियां
हमारी जारूकता के अभाव में

वे पैदा हुए
क्योंकि हम आधुनिक होकर भी आधुनिक नहीं हुए
शिक्षित होकर भी अशिक्षित
वैज्ञानिक युग में भी अवैज्ञानिक
विवेक रखकर भी विवेकहीन
वे जो बोलते रहे उसे ही सच मानते रहे
हमारी अंध आस्था के तावे पर वे अपनी रोटियाँ सेंकते रहे

क्या करे विकल्पहीन समय में
झूठ बोल कर बहलाने वाला
हमारे लिए महान है
इसीलिए तो यहाँ हर ठग
साधु, संत और भगवान है।

हमारे पास दिमाग तो है
मगर अभी वह कई तरह से गुलाम है
इसीलिए
अपने वास्तविक दुश्मन से अनजान है।

 

5 . मसखरे

मसखरों का
कोई इतिहास नहीं होता
लेकिन हर इतिहास में होते हैं मसखरें
राजा, रानी, मंत्री
हर किसी को
हँसाते, गुदगुदाते, खुश रखते
मसखरे

मसखरों की मसखरी ही
उनका रोजगार होता है
उनका दाना-पानी
सो उसी के सहारे बने रहते हैं
हर दरबारों में
यहां तक कि अंतःपुरों में भी
कब, किसे, कैसे खुश रखना है
यह बहुत अच्छे से जानते हैं मसखरें

अपने स्वार्थ सिद्धि में लीन
आत्ममुग्ध मसखरें
सामाजिक सरोकारों से परे
केवल मसखरें होते हैं

न वे गंभीर होते हैं किसी के लिए
न कोई गंभीरता से लेता है उन्हें ही
हर कोई पसंद करें उन्हें
इसी में खुश रहते हैं मसखरें

नये-नये किस्से
नये-नये जुमले
नये-नये झूठ
ही इनकी संपत्ति
या यूं कहे कला होती है

ऐसे मसखरों से
भरा पड़ा है इतिहास

मगर
इतिहास कभी भी
मसखरों का रहा नहीं।

 

 

 6 . अफ़ीम

भय से घरों में कैद
लोगों के टीवी चैनलों में
परोस दी गई है अफ़ीम

जिसे चाटते हुए दिन रात
इतने आदी हो जायेगें एक दिन
कि हर समस्या का हल
हम अफ़ीम के नशे में ढूंढेंगे

तब कितना आसान हो जायेगा
सच को छुपा लेना
हर समस्या के लिए
किसी और को दुश्मन बना देना

कितना आसान हो जायेगा तब
अफीमचियों के हाथों में
संविधान की जगह
शस्त्र थमा देना ।

 

7 . नाटकबाज

कोई भी नाटक
बहुत देर तक नहीं चलता
पर्दा गिर ही जाता है
एक समय के बाद

तमाम्
बने-बनाये जुमले
जब तालियों में पीट जातें हैं
तब नाटकबाज
अपनी सत्ता बचाने
बुनता है नये-नये जुमले
मन ही मन
मकड़ी के जालों की तरह

नाटकबाज
मदारी तो होता नहीं
लेकिन मदारी की तरह
बजाता रहता है सिर्फ
शब्दों की डुगडुगी

क्योंकि
नाटकबाज जानता है
बंदरों के बिना
उसका गुजारा नहीं।

 

8 . हितैषी

कितने महान हो तुम
कितना उत्तम व्यक्तित्व है तुम्हारा
कि तमाम् घृणाओं और नफरतों के बावजूद
तुम ऐसे मिल लेते हो हँसते हुए
कि जैसे तुमसे बड़ा कोई हितैषी ही नहीं

कभी-कभी तो
ईश्वर की तरह लगते हो
अजर-अमर
ईश्वर भी हो जाता है
तुम्हारे सामने छोटा
बहुत छोटा
बौना

तो याद आता है मुझे
राजाओं और चाटुकारों का
एक लम्बा इतिहास
क्षमा कीजिएगा
पर जो अब नहीं है

जिन्हें भी यही मुगालता था
कि सफलता का रास्ता
सत्ता की बाजारू गलियारों से होकर जाता है
चाटुकारिता की आत्मनिर्लज्जता को धारणकर

जिनके नाम और तमगे
आज भी इतिहास के पन्नों पर
दमकते हैं किसी बदनुमा दाग़ की तरह
और जिनकी संतानें
अपने कलंकित इतिहास का बोझ ढोती है
हर क्षण
अपमानित होते हुए।

9. अलगाव

अनगिनत चीखें
गिर रही हैं मेरे भीतर
मैं चुप्पियों से भर गया हूँ

मैं कहाँ किस चुप्पी के नीचे
दबा हुआ हूँ
यह खुद भी नहीं जानता

मैं कब निकल गया था
यहाँ से चुपचाप
यह भी मुझे याद नहीं

याद है तो सिर्फ वह घोषणाएं
जिसमें हर बार मेरी
सजा बढ़ा दी गई

कोई कैसे रह सकता है भला
इस तरह इतने दिन
साथ अपने

वैसे मैं अकेला नहीं था
अपने सीने पर
कई पैरों के छाले लिए

मैं पसरे हुए सन्नाटे से
कह आया हूँ
जब चीखें गाने लगे
और चुप्पियां जाग जाये

मैं खुद-ब-खुद चला आऊँगा
अपनी देह में।

 

 

 

(कवि अंजन कुमार, जन्मतिथि 09/10/1976। शिक्षा – एम.ए.(हिन्दी), बी.एड., एम.फिल, नेट, सेट, पी. एच. डी.। शोध कार्य – पाब्लो नेरूदा और शमशेर बहादुर सिंह की रचनाओं का तुलनात्मक विवेचन

संप्रति – सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, कल्याण स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सेक्टर-7, भिलाई नगर, जिला-दुर्ग, (छ.ग.), पिन-490006

प्रकाशन – विभिन्न राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं एवं समीक्षाएं प्रकाशित।

अन्य – कोरस नाट्य संस्था में लम्बे समय तक रंगकर्म में सक्रिय।

ई मेल: [email protected])

 

(कवि बसंत त्रिपाठी, 25 मार्च 1972 को भिलाई नगर, छत्तीसगढ़ में जन्म. शिक्षा-दीक्षा छत्तीसगढ़ में ही हुई। महाराष्ट्र के नागपुर के एक महिला महाविद्यालय में अध्यापन के उपरांत अब इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी अध्यापन. कविता, कहानी और आलोचना में सतत लेखन. कविता की तीन किताबें, कहानी और आलोचना की एक-एक किताब के अलावा कई संपादित किताबें प्रकाशित.

सम्पर्क: 9850313062, ई-मेल [email protected]

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