Tuesday, May 17, 2022
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पूंजीवाद के उदय और विकास की कहानी हदास थिएर की जुबानी

सबसे पहले वे इस झूठ का भंडाफोड़ करती हैं कि पूंजीवाद कोई स्वाभाविक या शाश्वत चीज है । जो भी लोग ऐसा मानते हैं उनका कहना है कि मनुष्य बुनियादी रूप से स्वार्थी और ऊंच नीच में विश्वास रखने वाला प्राणी होता है । वे मानव मस्तिष्क के लिए व्यापार को सबसे अनुकूल काम बताते हैं । सच यह है कि माल उत्पादन और विनिमय की यह शोषक प्रक्रिया मानव इतिहास में कुछ ही समय पहले उदित हुई है । अगर मानव इतिहास को पूरा दिन माना जाये तो पूंजीवाद की उम्र कुल तीन मिनट की है । हमारा अधिकांश इतिहास शिकारी-संग्राहक अवस्था का है जिसमें भोजन, पानी और आवास की बुनियादी समस्याओं को हल करना ही प्रमुख काम रहा । खेती अभी दूर की बात थी और रोज रोज के भरण पोषण के बाद बचता ही कुछ नहीं था । स्वामित्व साझा था और निर्णय लेने की सुविधा के लिए सदस्यों का कोई ढीला ढाला सम्पर्क तंत्र था ।  उस समाज में निजी पहल और निर्णय का भारी महत्व था इसलिए आज की धारणाओं से निर्णय के तत्कालीन तंत्र को समझना सम्भव नहीं है । जिस तरह हमारे आज के समाज में बड़ों के समक्ष समर्पण और स्वार्थ को प्रोत्साहित किया जाता है उससे अलग तब स्वायत्तता को बेहतर गुण समझा जाता रहा होगा । ऐसे समाज से चलकर हम वर्तमान स्थिति में कैसे आये इसका मोटा खाका लेखिका ने खींचने की कोशिश की है ।

उनका मानना है कि इसकी शुरुआत खेती से हुई होगी जब भोज्य सामग्री के अधिशेष के संग्रह के हालात बने होंगे । मनुष्यों के स्थायी वासस्थान बने होंगे और कुछ लोग खेती के बाहर के कामों से जुड़े होंगे । इसके बाद ही जाकर दुनिया के विभिन्न इलाकों में नगरों का निर्माण हुआ होगा । हजारों साल में इस अधिशेष के निरीक्षण और नियंत्रण की जरूरत के चलते समाज में विभिन्न स्तर बने होंगे । शुरू में तो इस इंतजाम से पूरे समूह को ही फायदा हुआ होगा, मौसम में हेरफेर के बावजूद बचे हुए संरक्षित संसाधन तक सबकी पहुंच बनती रही होगी लेकिन इसी प्रक्रिया में धीरे धीरे निरीक्षकों और संरक्षकों का अलग वर्ग बन गया होगा । स्पष्ट है कि संपदा और वस्तुओं के उत्पादन, स्वामित्व और वितरण के मामले में परस्पर विरोधी हित समूह बनने में बहुत समय लगा । यह प्रक्रिया कोई बहुत आसान नहीं रही होगी और इसका प्रतिरोध भी हुआ रहा होगा ।

पूंजीवाद इसी तरह का एक वर्ग विभाजित समाज है जो विश्वव्यापी हो गया । मध्ययुग के यूरोप में इसका जन्म हुआ जहां सामंती समाजों का प्रभुत्व था । सामंतवाद से पूंजीवाद में संक्रमण कैसे और क्यों हुआ इन सवालों पर इतिहास में काफी विवाद है । उस पर बात करना सम्भव नहीं लेकिन पूंजीवाद की विशेषता को समझने के लिए सामंतवाद से इसके अंतर को जानना जरूरी है । सामंतवाद में बादशाही जमीन को स्थानीय मालिकों में बांटा गया था । ये मालिक अपने इलाके के निवासियों पर शासन करते थे । इलाके के भूदास इन जमीनों पर खेती करते थे । मालिक को वे या तो धन या फसल का एक हिस्सा देते या फिर सप्ताह में कुछेक दिन मालिक के खेत में मुफ़्त काम करते थे । आम तौर पर इन किसानों के पास खुद और परिवार के भरण पोषण के लिए पर्याप्त जमीन और खेतीबारी के औजार हुआ करते थे । इससे उनके जीवन यापन के लिए चाहे जितना भी कम उपार्जित होता हो उन्हें कुछ आर्थिक आत्मनिर्भरता हासिल थी । मालिक के खेत में खटने की कोई आर्थिक मजबूरी नहीं थी इसलिए उनके मालिक को उनकी मेहनत की पैदावार पर कब्जा जमाने के लिए बल का प्रयोग करना पड़ता था । इस मालिक की समृद्धि हिंसा पर टिकी हुई थी इसलिए मालिक भी हथियारों और युद्ध में अधिक ध्यान लगाता था।

जब पूंजीवाद आया तो उसने पूरी तरह नयी समाज व्यवस्था विकसित की । इसमें कामगारों को जमीन, औजार तथा संसाधनों से अलगाना जरूरी हो गया । सामंतवाद में खेती की उपज को हथियाने के लिए मालिक को बल प्रयोग करना पड़ता था लेकिन पूंजीवाद ने पगारजीवी कामगारों के नये वर्ग को जन्म दिया । इन लोगों को जिसके पास वे चाहें उसके पास काम करने की सैद्धांतिक आजादी तो थी लेकिन व्यवहार में उन्हें किसी न किसी के लिए अधिशेष का उत्पादन करना जरूरी था । तीन सौ सालों में यह संक्रमण पूरा हुआ जिसके उपरांत स्वतंत्र मजदूर के शोषण पर आधारित इस उत्पादन व्यवस्था की स्थापना हुई । यह प्रक्रिया और व्यवस्था स्वाभाविक या स्वचालित नहीं थी । एक ओर समूची संपत्ति के मालिकों और दूसरी ओर केवल अपनी मेहनत के मालिकों के बीच समाज का बंटवारा अनेक ऐतिहासिक चरणों से गुजरकर पूरा हुआ । स्मिथ जैसे पारम्परिक अर्थशास्त्री पूंजीवाद के उत्थान को श्रम विभाजन का नतीजा बताते हैं जिसमें कुछ लोग व्यापारी हुए और मेहनत तथा धन बचाने की आदत के चलते बाद में कारखानों के मालिक बन गये । मार्क्स ने इस किस्म की धारणा का मजाक उड़ाया है । उनके अनुसार पूंजीवाद के उत्थान का संबंध बचत की आदत या मुट्ठी भर लोगों की बुद्धिमानी से नहीं है । इसके लिए बेहद हिंसक उथल पुथल हुई जिसमें लोगों को उनकी जमीन और आजीविका के साधनों से जुदा कर दिया गया । इससे बने नये कामगारों को अनुशासित करने के लिए तमाम कानून बनाये गये और दमन के तरीके अपनाने पड़े । इसके बाद हुई राजनीतिक क्रांतियों ने पूंजीवाद को शासन में ला बिठाया । उसने विस्थापित लोगों के संघर्षों को कुचला, बाजार को स्थापित किया और विदेशों में लूट मचायी । इस नयी व्यवस्था के उदय के लिए जिस कदर हिंसा, दमन, कानून और उथल पुथल की जरूरत पड़ी उसी से सिद्ध है कि यह स्वाभाविक नहीं थी ।

इंग्लैंड में पूंजीवाद ने सबसे पहले पैर जमाये । इसके लिए लाखों एकड़ साझा जमीन को हिंसक तरीके से दखल करके निजी संपत्ति में बदला गया, साझा जमीन पर खेती करने या जानवर चराने के पारम्परिक अधिकारों को बदला गया और जमीन के निजी टुकड़ों की बाड़ेबंदी की गयी । यह सारा काम भुगतान, चोरी या कानून बनाकर किया गया । इसी प्रक्रिया में जमीन का संकेंद्रण मुट्ठी भर लोगों के हाथों में हुआ और बहुसंख्यक जनता से आर्थिक स्वनिर्भरता के समस्त साधन छीन लिये गये । ग्रामीण जनता जबरन बेदखली के चलते भूमिहीन हो गयी । लोग इधर उधर भीख मांगकर गुजारा करने को मजबूर हो गये । जमीनों के नये मालिकों ने छोटे छोटे टुकड़ों को एक साथ जोड़कर अकूत लाभ कमाया । इन्हीं जमीनों पर बेदखल हुए किसानों को कामगार की हैसियत से काम करने को मिला । इनकी बढ़ती समूची आबादी को खेती के काम में ही खपाना सम्भव नहीं था । ये ही उदीयमान नगरों के कारखानों में सर्वहारा के बतौर पगारजीवी श्रमिक बने ।

इन नगरों में सोलहवीं से अठारहवीं सदी तक कारखानों की नयी व्यवस्था विकसित हुई । इनमें मजदूर एकत्र होकर मशीन और कच्चे माल से उपभोग्य वस्तु का निर्माण करते थे जिसके बदले उन्हें पगार मिलती थी । जिन लोगों ने इनमें धन का निवेश किया और इस व्यवस्था से लाभ बटोरा वे उदीयमान पूंजीपति थे । पूंजीपति वर्ग में वे लोग थे जो जमीन, कारखाने, औजर और सामग्री के मालिक होते थे और उत्पादन के काम में मजदूरों को लगाते थे । ये शुरुआती पूंजीपति व्यापारी थे, भूमिधर पूंजीपति बने जमींदार थे और धनी फ़ार्मर थे । इसी तरह अठारहवीं सदी में उत्तरी फ़्रांस के कई नगरों में ऊन के रेशे बनाने के लिए हजारों मजदूरों को इकट्ठा किया गया । जिस जगह पर भी यह प्रक्रिया अपनायी गयी वहां उसने उत्पादन के क्षेत्र में क्रांति कर दी । दुनिया भर में इस तरह के नये नगर उग आये ।

इस स्तर के उत्पादन से आगे बढ़ने के लिए उदीयमान पूंजिपति वर्ग को ऐसे कामगारों की जरूरत थी जिन्हें जरूरत के मुताबिक कहीं भी और कभी भी काम पर लगाया जा सके । इसके लिए इन कामगारों को दो मामलों में स्वतंत्र होना आवश्यक था । उन्हें भूदासता से आजाद होना था ताकि उनसे कहीं भी काम कराया जा सके लेकिन साथ ही उन्हें अपनी आजीविका के उत्पादन के साधनों से भी स्वतंत्र होना जरूरी था ताकि जीवन चलाने के लिए वे पगार पर ही निर्भर रह जायें । मार्क्स के अनुसार मुद्रा के पूंजी में रूपांतरण के लिए जरूरी है कि मुद्रा के मालिक को उपभोक्ता बाजार में स्वतंत्र मजदूर मिले । उसे अपनी श्रम शक्ति को बेचने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए और बेचने के लिए अन्य किसी भी वस्तु से भी उसे स्वतंत्र होना चाहिए । इस तरह स्वतंत्रता और लोकतंत्र के परदे में इस नये भूमिहीन पगारजीवी श्रमिक को अपनी श्रम शक्ति बेचने या भूखों मरने की आजादी मिली । इस नयी व्यवस्था को ही मार्क्स ने वेतन की गुलामी कहा । पुराने गुलामों को जंजीर से बांधकर रखा जाता था, यह नया गुलाम अपने स्वामी से अदृश्य बंधनों में बंधा हुआ था । उस जमाने में तमाम चिंतक, दार्शनिक और अर्थशास्त्री पूंजीवादी आदर्शों के बखान में डूबे थे और इस नयी संपदा का यह वीभत्स पहलू अनदेखा किया जा रहा था ।

अपनी जमीन से बेदखल होकर किसान से मजदूर बना यह श्रमिक उदीयमान पूंजीवादी व्यवस्था का अनिवार्य घटक था । इस वर्ग का निर्माण विध्वंसक प्रक्रिया से हुआ था । भूखों मरने का खतरा होने पर भी ये लोग आलस्य और निकम्मेपन से बाज नहीं आते थे । उन्हें कारखानों की अंधेरी और दमघोंटू दुनिया में कैदी की तरह काम करने के मुकाबले आजाद घूमना रास आता था । इन लोगों ने बाड़बंदियों पर हल्ला बोला, सामूहिक से निजी बनायी गयी जमीनों की हिफ़ाजत के लिए खड़ी की गयी दीवारों को ढहा दिया, बड़ी जोतों को तहस नहस कर दिया और बड़े पैमाने पर फ़साद किये । इन लोगों को काबू करने के लिए कानून बनाने पड़े जिसके तहत कोड़े मारना, कैद रखना, नाक-कान काटना, दागना और बांधकर घसीटना जायज दंड बताये गये थे । इस तरह उनसे इन नये हालात को स्वाभाविक मनवाया गया । धीरे धीरे पूंजीवादी आर्थिक संबंध कामगारों को स्वत:स्पष्ट प्राकृतिक नियम की तरह लगने लगे । राज्य की सहायता और हिंसा के सहारे यह जीत हासिल हुई । जब हमसे अपने और अपने परिवार की गुजर बशर के लिए जरूरी जमीन, औजार और तकनीक को छीन लिया जायेगा तो दूसरों के लिए खटने के अलावे हमारे पास कोई अन्य रास्ता नहीं रह जायेगा और इसे हम स्वाभाविक मानने लगेंगे ।

मार्क्स के मुताबिक पूंजीवादी समाज की आर्थिक संरचना का निर्माण सामंती समाज में हुआ था । इन दोनों समाजों के बीच का विरोध पुरानी व्यवस्था और नये कुलीनों के बीच साफ साफ टकराव के रूप में फलित नहीं हुआ । पुराने बादशाहों ने बाड़ेबंदियों में मजदूरों को काबू करने वाले कानून बनाने में मदद की । उन्होंने व्यापार को बढ़ावा दिया और शहरों में कारखाने बनाने के लिए धन मुहैया कराया । लेकिन उदीयमान पूंजीपति वर्ग की राह में इन सामंती संबंधों में बेड़ियां भी डालीं । सामंतों की रुचि ऐश्वर्य के सामान जुटाने, हथियार इकट्ठा करने और अपनी सेना बढ़ाने में थी तथा आर्थिक प्रगति की रफ़्तार को वे सुस्त बनाये रखना चाहते थे । इस तरह सामंती संबंधों का लाभ लूटने वालों और आर्थिक प्रगति के हिमायतियों में समाज बंटता गया । इसी अंतर्विरोध के कारण यूरोप में बुर्जुआ क्रांतियों का सैलाब फूट पड़ा । सोलहवीं सदी से लेकर उन्नीसवीं सदी तक चली इन क्रांतियों के सहारे राजसत्ता पर पूंजीपति वर्ग का कब्जा हुआ । इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति और फ़्रांस की राजक्रांति ने पूंजीपति वर्ग की बरतरी स्थापित कर दी । इसके साथ ही ऐसी नयी राजनीतिक विचारधारा की जरूरत पड़ी जिसके आधार पर नयी व्यवस्था के पक्ष में निम्न वर्गों को भी खड़ा किया जा सके । इसके लिए उन्होंने निजी संपत्ति के अधिकार का समर्थन किया, दासता से मुक्ति की चेष्टा की और वंशगत शासन के खात्मे का प्रयास किया ।

बुर्जुआ क्रांतियों ने पूंजीवादी राजसत्ता की स्थापना की । राजसत्ता ने इस वर्ग के हितों का पक्षपोषण किया तथा उनकी ताकत को देश और विदेश में फैलाने में मदद की । इसमें अफ़्रीकी जनता के बड़े हिस्से को गुलाम बनाने और नयी गुलामी ने निर्णायक भूमिका निभायी । इस गुलाम व्यापार की अमानवीय क्रूरता पर पर्याप्त चर्चा हुई है । उनकी जानवरों की तरह खरीद बिक्री, उनकी संख्या बढ़ाने की कोशिश और माता-पिता से संतान को तथा पति से पत्नी को अलग कर देना इस व्यापार में आम बात थी । इस प्रथा में मनुष्य को अधिकतम निम्न स्तर पर रखा जाता और उनके साथ हरेक किस्म की बर्बरता जायज समझी जाती थी । अफ़्रीका से अमेरिका लाये जाने की उस यात्रा में अधिकतर गुलाम या तो मर जाते या आत्मघात कर लेते थे । उनको लाने वाली जहाजों को कसाईबाड़ा भी कहा जा सकता है । इस तमाम क्रूरता की बदौलत मुट्ठी भर लोगों के पास अकूत दौलत जमा होती थी । उनकी मेहनत से पैदा होने वाले कपास ने अमेरिका की आर्थिक हैसियत को मजबूत किया । कताई और बुनाई के मामले में तकनीकी प्रगति ने व्यापार और उद्योग की दुनिया को प्रतिष्ठित कर दिया । पूंजीवादी अर्थतंत्र के विस्तार के लिए इन गुलामों के सस्ते श्रम का भारी महत्व था । यूरोप की औद्योगिक क्रांति में इस व्यापार और दास प्रथा का योगदान असंदिग्ध है । गुलाम व्यापार से हासिल नकदी तथा उनकी मेहनत से उपजे कपास और चीनी से ब्रिटेन के बैंकों को ठोस आधार मिला । जेम्स वाट के भाप के इंजन को गुलाम व्यापार से अर्जित धन की सहायता मिली । गन्ने के दूर दूर तक फैले खेतों के मालिकों ने इन इंजनों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया । गुलाम व्यापार ने लोहा उद्योग को भी लाभ पहुंचाया । जंजीरों, तालों और बेड़ियों का भारी उत्पादन हुआ और गुलामों को नियंत्रित करने में इनकी खपत हुई । बंदूकों की बिक्री में इजाफ़ा हुआ और समुद्री जहाजों में लोहे का उपयोग किया गया । रुई से बनने वाली वस्तुओं के व्यापार ने सूती वस्त्र उद्योग में जान डाल दी और चीनी बनाने के कारखाने इंग्लैंड भर में खुल गये । इंग्लैंड का लगभग प्रत्येक नगर गुलाम व्यापार और गुलामों के श्रम से पैदा होने वाली चीजों का कर्जदार है । इन गुलामों को जिन जमीनों पर काम करना था वे भी चुरायी गयी थीं । अमेरिका के मूलवासियों को हिंसक तरीकों से बेदखल करके उनकी जमीनों को हथियाया गया था । उनकी बेदखली के इस क्रूर काम को केवल जनसंहार कहा जा सकता है । इन तथ्यों को न जानने से हमें पूंजीवाद के विकास की उसी कहानी पर आंख मूंदकर भरोसा करना होगा जिसे उनके समर्थक दुहराते रहते हैं ।

(फीचर्ड इमेज में चित्तोप्रसाद की पेंटिंग गूगल से साभार।)

गोपाल प्रधान
प्रो. गोपाल  प्रधान अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में प्राध्यापक हैं. उन्होंने विश्व साहित्य की कई महत्वपूर्ण पुस्तकों का अनुवाद , समसामयिक मुद्दों पर लेखन और उनका संपादन किया है
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