Wednesday, May 18, 2022
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सिनेमा के बाज़ार में सागर सरहदी का होना…

सन् 1980 या 81 के किसी एक रोज एक अखबार में खबर छपती है कि गल्फ देशों के उम्रदराज़, लेकिन अमीर शेख हैदराबाद आते हैं और गरीब कम उम्र लड़कियों से निकाह पढ़वाकर कुछ दिन अय्याशी करते हैं और बाद में तलाक देकर लौट जाते हैं। बंबई में यह खबर वह शख़्स पढ़ता है, जो उस दौर के सबसे चर्चित निर्माता-निर्देशक यश चौपड़ा के लिए ‘कभी-कभी’, ‘नूरी’ और ‘सिलसिला’ जैसी फिल्में लिख चुका था।

ख़बर पढ़कर वह शख़्स ज़ार-ओ-क़तार रोने लगता है। उस अखबार की कतरन काटता है और खुद में बुदबुदाता है कि यह शादी नहीं, बाज़ार है।

 

…और दुनिया के इस बाज़ार में अगर कोई सबसे सस्ती शय है तो वह है औरत। वह शख़्स तय करता है कि उसका कलम हीरोइन की आंखों और गालों की खूबसूरती लिखने के लिए नहीं है, बल्कि समाज में बरती जा रही गैरबराबरी को दर्ज करने के लिए है।

 

बंटवारे के दौरान उधर से इधर चला आया यह शख़्स गंगासागर तलवार यहां सागर सरहदी कहलाया और जब सिनेमाई कामयाबी उसके कदम चूम रही थी, उसने एक कदम पीछे हटकर पीठ फेर ली। उसने तय किया कि वह अपनी फिल्म बनाएगा। अपनी बात कहेगा। यह बहुत जोखिम भरी बात थी, जो सोच ली गई थी। जोखिम इसलिए भी कि कुछ हद तक यश चौपड़ा जैसे किसी निर्माता को छोड़ दिया जाए तो कोई सागर सरहदी की सोच के सिनेमा पर पैसा खर्च क्यों करेगा।

सागर सरहदी चूंकि यश चौपड़ा के प्रिय लेखकों में थे, इसलिए जब सागर सरहदी ने ‘बाजार’ बनाने की सोची तो यश चौपड़ा ने प्रोड्यूस करने की बात कही। सागर साब ने इनकार कर दिया, बावजूद इसके फिल्म बनने के बाद यश चौपड़ा ने इसके रिलीज में मदद की। इसके अलावा गायिका और लेखिका पामेला चौपड़ा ने बाजार फिल्म के लिए एक गीत ‘चले आओ सैंया मैं वारी रे’ गाया था। यश चौपड़ा इन्हीं पामेला के पति थे।

सागर सरहदी ने बहुत सीमित संधाधनों में जुगाड़-तुगाड़ करके जब ‘बाज़ार’ बनाई थी, उस साल बहुत बड़े-बड़े बजट की बड़ी-बड़ी फिल्में आई थीं। स्क्रीन पर नेहरूबियन सोशलिज्म को पेश करने वाले फिल्मकार राज कपूर की उस साल ‘प्रेम रोग’ आई थी, तो बीआर चोपड़ा की ‘निकाह’ भी उसी साल आई थी। यह डर लगातार बना हुआ था कि पॉपुलर सिनेमा के सामने कहीं ‘बाजार’ पिट न जाए।

‘शक्ति’ समेत अमिताभ बच्चन की 6 फिल्में उस साल आई थीं। दो फिल्में दिलीप कुमार की भी आई थीं। हालांकि सागर सरहदी के पास स्मिता पाटिल थीं, जो समानांतार सिनेमा आंदोलन का सबसे बड़ा चेहरा तो थीं ही, पॉपुलर सिनेमा में भी वे खूब पसंद की जा रही थीं। उस साल स्मिता की 11 फिल्में रिलीज हुई थीं। इनमें एक गुजराती फिल्म भी थी। वे बहुत अधिक फीस लेने वाली अदाकारा थीं।

सागर साब ने एक बार बताया था कि ‘बाजार’ के लिए स्मिता ने सिर्फ 21 हजार रुपये लिए थे। इस फिल्म के लिए नसीरुद्दीन शाह और सुप्रिया पाठक ने सिर्फ 11-11 हजार रुपये लिए थे। फारूक़ शेख ने इस फिल्म के लिए एक भी पैसा नहीं लिया था। इस फिल्म में सभी ने इस तरह काम किया था, जैसे वे कोई इंकलाब कर रहे हों।

फ़िल्म की पूरी यूनिट एक साथ ठहरी थी और खाना बाहर से नहीं आता था, बल्कि सब मिलकर बनाते थे। शबाना आज़मी की मां शौकत कैफ़ी ने इस फिल्म में एक छोटा-सा, लेकिन जरूरी किरदार निभाया था। शौकत के बारे में एक बात बताता चलूं कि कैफ़ी आज़मी जब सीपीआई के फुल टाइमर थे और चौका-चूल्हा चलाना मुश्किल था, तब मजबूरी में शौकत ने पृथ्वी राज कपूर के साथ 1951-52 में थियेटर करना शुरू किया था। वे अनट्रेंड ऐक्टर थीं, लेकिन डूबकर काम करती थीं। बंबई की इप्टा इकाई सागर सरहदी का लिखा एक नाटक ‘तन्हाई’ खेलते थी, जिसे सागर सरहदी के भतीजे रमेश तलवार डायरेक्ट करते थे।

इस नाटक में शौकत कैफी ने एक ऐसी मां का किरदार निभाया था, जिसका बेटा मर गया था। इस किरदार को निभाते हुए शौकत को अपना पहला बेटा याद आता था, जो एक साल की उम्र में बीमार होकर मर गया था और जिसके इलाज के लिए पैसे नहीं जुट पाए थे। शौकत कैफ़ी अपनी किताब ‘याद की रहगुज़र’ में लिखती हैं कि उनकी कैफियत कुछ ऐसी हो गई थी कि एक दिन कैफ़ी आज़मी रमेश तलवार के पास गए और कहा कि मेरी बीवी को माफ कर दीजिए, उससे इस प्ले में काम मत करवाइये।

तस्वीर: फ़िल्मकार अविनाश दास के कैमरे से

एक मुलाकात में जब मैंने सागर साब से इस बात का जिक्र किया तो उन्होंने कहा कि कैफ़ी साब मेरे पास भी आए थे और उन्होंने कहा था कि ‘तन्हाई’ के कारण मेरी बीवी डिप्रेशन में रहती है और वह मर जाएगी। बहरहाल, कैफी और शौकत की बात चली है तो एक बात यह भी कि ‘बाजार’ जिस कैमरे की आंख से संभव हो पाई है, वह कैमरा कैफी और शौकत के बेटे और शबाना आज़मी के छोटे भाई बाबा आज़मी का है। वे इस फिल्म के सिनेमेटोग्राफर हैं।

जब ‘बाजार’ बनकर तैयार हुई, तब सागर सरहदी ने रिलीज से पहले सिनेमा के कुछ बड़े लोगों और दोस्तों को यह फिल्म दिखाई। फिल्म देखने के बाद ‘गर्म हवा’ के डायरेक्टर और समानांतर सिनेमा आंदोलन के बहुत मकबूल शख़्स एमएस सथ्यू की प्रतिक्रया ने सागर सरहदी की नींद उड़ा दी थी। उस बात को याद करके सागर सरहदी एमएस सथ्यू के लिए एक बढ़िया-सी गाली निकालते हुए कहते हैं कि सथ्यू साब ने कहा था कि यह तुमने क्या बना दिया है। इस फिल्म को कोई नहीं देखेगा।

सागर सरहदी ने अपने सिनेमाई सफर के लिए जो सामान चुना, वह उनका अपना चयन था और उनके साथ की तमाम मुलाकातों में यह समझ आता है कि उन्हें अपने फैसले पर कभी पछतावा नहीं रहा।

बाएँ से: शायर और गीतकार स्वप्निल तिवारी, कवि अमित उपमन्यु, सागर सरहदी और फ़िरोज़ ख़ान।

दुनिया जिसे कामयाबी मानती और कहती है, तो उसे पाना सागर सरहदी के लिए आसान नहीं, तो बहुत मुश्किल बात नहीं थी। 1976 में जब उनकी पटकथा पर यश चौपड़ा ने ‘कभी-कभी’ बनाई, तो अमिताभ बच्चन पहली बार एक रोमांटिक हीरो के तौर पर सामने आए। वह भले ही अमिताभ बच्चन के सुपर स्टारडम वाला जमाना था, लेकिन उनकी ज्यादातर ऐक्शन और एक गुस्सैल नौजवान वाली फिल्में थीं। अमिताभ बच्चन की फिल्मोग्राफी ‘कभी-कभी’ और ‘सिलसिला’ के बगैर पूरी नहीं होती।

इन दो फिल्मों ने सागर सरहदी को भी सिनेमा का सबसे महंगा और बिकने वाला लेखक बना दिया। उनके पास उस समय तमाम फिल्मों के ऑफर आ रहे थे, लेकिन बंबई के प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े इस फिल्मकार, पटकथा लेखक, नाटककार को कोई भी लालच अपनी गिरफ्त में नहीं ले सका। अगर हिंदी सिनेमा में किसी को समाज का लेखक और फिल्मकार कहा जा सकता है, तो वह बेशक सागर सरहदी हैं।

बाएँ से: सागर सरहदी, फ़िरोज़ ख़ान और जानेमाने फ़िल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज

सागर सरहदी बेहद प्यारे इंसान थे। जिन्होंने उनको प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कुछ भी दिया, वे उन लोगों के प्रति अहसान से भरे रहते थे। ‘बाजार’ फिल्म का पहला सीन याद कीजिए। नज़मा (स्मिता पाटिल) आइने के सामने तैयार हो रही है और बैकड्रॉप में गाना बज रहा है- ‘हम हैं मताए कूचा बाजार की तरह।’ राजिंदर सिंह बेदी की फिल्म ‘दस्तक’ के इस गीत के लिए ‘बाजार’ की क्रेडिट लाइन में सागर साब बड़े-बड़े अक्षरों में बेदी साब को थैंक यू बोलते हैं।

‘बाज़ार’ पर दी गई एमएस सथ्यू की प्रतिक्रिया से वे खफा तो नहीं थे, लेकिन कुछ दुखी जरूर थे। फिल्म की कामयाबी ने सथ्यू साब की बात को झुठला दिया था, लेकिन सागर साब को सुकून तब मिला जब ‘बाजार’ के एक दर्शक ने उन्हें फोन किया। यह किस्सा सागर साब ने तीन-चार साल पहले सुनाया था और अब ठीक से याद नहीं कि वह दर्शक पाकिस्तान का था या दुबई का।

लेकिन हुआ यूं था कि एक दिन सागर साब का फोन बजता है। फोन पर कोई कह रहा था कि मैंने आपकी फिल्म ‘बाजार’ देखी है और मुझे आपसे मिलना है। सागर साब ने शुक्रिया कहा और कहा कि कभी हिंदुस्तान आएं तो मिल लेंगे। उस शख़्स ने कहा कि आपसे मिलने के अलावा हिंदुस्तान में मेरा कोई दूसरा काम नहीं है। मेरा दिल करता है कि मैं आपसे नंगे पांव मिलूं। कहते हैं कि वह शख़्स आया। वह सागर साब का हाथ थामे बैठा रहा। वह रोता था और बार-बार कहता था- शुक्रिया, मैंने ‘बाजार’ देखी है।

फ़िरोज़ ख़ान
फ़िरोज़ ख़ान कवि और पत्रकार हैं. देश की महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं और ब्लाॅग्स पर कविताएँ और सिनेमा पर कुछ लेख-साक्षात्कार प्रकाशित। इनकी कुछ कविताओं का मराठी में अनुवाद हो चुका है। नवभारत टाइम्स, बम्बई के एडिटोरियल विभाग में कार्यरत। सम्पर्क: 7303745705 ई मेल: firojwriter2013@gmail.com
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