समकालीन जनमत
स्केच: भास्कर रौशन
जनमतशख्सियतस्मृति

हमारे समय का सबसे ज़िंदादिल कथाकार चला गया

मिहिर पंड्या


‘अशोक और रेणु की असली कहानी’, ‘क्या तुमने कभी सरदार भिखारी देखा है’ जैसी अनेक अविस्मरणीय कहानियाँ लिखने वाले महत्वपूर्ण कथाकार स्वयंप्रकाश जी (20 जनवरी 1947- 7 दिसम्बर 2019) का निधन हो गया।

कथाकार स्वयंप्रकाश के कथा साहित्य का पसारा साम्प्रदायिकता जैसे ज़रूरी प्रश्नों से लेकर मध्यवर्गीय जीवन को उसकी तमाम खासियतों, अंतर्विरोधों और कमज़ोरियों के साथ सामने लाता है, इतनी सहजता से कि हम उसमें अपने समाज को और ख़ुद को ठीक ठीक लोकेट कर सकते हैं। इसी निकटता के चलते आज का युवा उनकी रचनाओं से एक गहरा रिश्ता कायम कर लेता है।  मिहिर पंड्या की कलम के सहारे आइए उन्हें थोड़ा और जानते हैं! .सम्पा

मैं बीए के दिनों में स्वयं प्रकाश जी से पहली बार मिला था, जब वे उदयपुर के पास चित्तौड़गढ़ में हिन्दुस्तान ज़िंक फैक्टरी वाले मकान में रहा करते थे। उसी साल पढ़ने के लिए उदयपुर आया था। शहर से दूर एक जैसे दिखने वाले स्टाफ़ कॉलोनी के क्वार्टर मुझे तब भी घर की याद दिलाते थे।

युवाओं की टोली उनसे लम्बे साक्षात्कार के इरादे से पहुँची थी। मैं उस टोली का 12th मैन था। उमर में सबसे छोटा, जो इस साहित्यिक दौरे पर यूँ ही साथ घूमने चला गया था।

उन्होंने मुझसे खूब बातें कीं। शायद सबसे ज़्यादा। वो मुझसे वो सब कुछ नया सुनना चाहते थे, जिसका ज़िक्र किसी दूसरे उम्रदराज़ इंसान के सामने बचकाना लग सकता है। स्कूल अभी छूटा ही था और वो मेरी क्रिकेट दीवानगी के दिन थे। बातों ही बातों में उन्होंने मुझे यकीन दिला दिया कि वो भी क्रिकेट के मेरे ही जैसे शौकीन हैं, और इस अपनापे के धागे के सहारे मैं उनसे खुलता चला गया। मैं उन्हें दोस्त की तरह सचिन के समय में राहुल द्रविड़ होने की असल कीमत समझाने लगा और वो मुझे कर्नल नायडू के किस्से सुनाने लगे। यह अप्रत्याशित था। मैं महाआलसी इतना उत्साहित हुआ कि अगले दिन सुबह उनके साथ घूमने जाने के लालच में खुद ही जल्दी उठ तैयार हो गया। वो मेरे निज का हिस्सा हो गए।

जिस साक्षात्कार से मेरा कुछ लेना-देना नहीं था, उसमें मैं भी एक प्रतिभागी की तरह शौक से बैठा। और जब अपने बचपन के इंदौर की समृद्ध साँस्कृतिक दुनिया का उल्लेख करते हुए वो उस मशहूर खिलाड़ी नाम पर अटके, तो मैंने फ़ौरन याद दिलाया, “मुश्ताक अली”! हम दोनों मुस्कुराए। भीड़ भरे उस कमरे में जैसे हमने ‘अपनी दुनिया’ बसा ली थी। आज भी ‘कथादेश’ के उस पन्द्रह साल पुराने साक्षात्कार में यही दो शब्द मेरे नाम से दर्ज हैं।

ये उनका खेल था। वो अपनी पहचान की दुनिया छोड़कर कैसे बिना आवाज़ इस बेपरवाह तरुण की छोटी दुनिया में चले आए, मैं जान ही ना पाया। ऐसे ही वो कथाकार थे, जो अपने पात्रों की दुनिया को अपने अनुसार रद्दा लगाकर बदलते नहीं थे बल्कि खुद उसका ज़िन्दा हिस्सा हो जाते थे। उनके पात्रों में तमाम नकारात्मकताएं थीं, समझौते थे, सीमाएं थीं। पर कभी उन्होंने मूल्यनिर्णय देकर अपने किरदारों का साथ नहीं छोड़ा। वो सच बोलते थे, पर दोस्त की तरह।

आज संकोच से भरे नमस्कार या धीमे से उनकी ओर हाथ बढ़ाते लड़के को ‘अरे यार, गले मिलो’ कहकर गले से लगा लेने वाली उनकी आदत बहुत याद आ रही है।

उन्हें चिट्ठियाँ लिखना और पढ़ना बहुत पसंद था। तो मैं भी उस दौर में जब भी उलझन में होता, उन्हें चिट्ठियाँ लिखा करता, जो उस उमर में मेरी जितनी सी समझदारी थी उसके ही मुताबिक काफ़ी बचपने से भरी होती थीं। मैं उनसे फ़िल्मों की बात करता, वीडियो गेम्स की, कॉलेज में चल रही वाद-विवाद प्रतियोगिताओं की, अपने दोस्तों के किस्से बताता.. और वो सबका तसल्ली से लम्बा लम्बा जवाब दिया करते।

वो मेरे ही नहीं मेरे दोस्तों के भी दोस्त बन गए। मेरे ज़्यादातर इंजिनियरिंग पढ़ने वाले बचपन के दोस्त उनकी कहानियों के फ़ैन रहे। दरअसल उनकी कहानियाँ मेरा फ़ेवरिट ‘फंदा’ थीं, किसी भी गैर-हिन्दी वाले मित्र को साहित्य पढ़ने के चाव में फंसाने की। अगली बार जब चित्तौड़ जाने का मौका बना तो मेरे साथ मेरे बचपन का वो दोस्त भी था जो कोटा शहर की कोचिंग वाली दुनिया से होता साहित्य की दुनिया से बहुत दूर निकल गया था। वो आज भी मुझसे बहुत दूर है। बचपन की हमारी दुनियाएं अलग हो गईं। पर स्वयं प्रकाश की कहानियाँ आज भी हमारे साझे बचपन की सबसे उजली स्मृतियाँ हैं। हमें जोड़ती हैं।

वो हमेशा मेरे लड़कपन के साथी रहेंगे।

याद करता हूँ, एक बार मैंने उन्हें ‘दिल चाहता है’ फ़िल्म देखकर उसकी तारीफ़ में खूब लम्बी चिट्ठी लिखी। ये भी लिखा कि कैसे जब हम बचपन के दोस्तों ने वो फ़िल्म साथ में देखी थी तो वो हमारे लिए खूब हँसी वाली फ़िल्म थी, और अब उसी फ़िल्म को यहाँ दूसरे शहर में अकेले देखने पर रोना आता है। क्या बात है.. क्या फ़िल्म बदल जाती है? या हम बदल जाते हैं? या ये दुनिया बदल जाती है? जवाब में उन्होंने तमाम काम की सीरियस वाली बातों के साथ अलग से एक कागज़ पर अपनी मोती जैसी हैंडराइटिंग में लिखकर भेजा था “बताओ, इसे आखिर कित्ती बार एक ही फ़िल्म देखनी चाहिए!”

वो प्यार थे।

नीचे उनकी कुछ चुनिंदा कहानियों के लिंक दिए गए हैं जिन्हें साभार ‘हिंदी समय’, गूगल और ‘गद्य कोश’ से लिया गया है।

चौथा हादसा: स्वयंप्रकाश

नेता जी का चश्मा: स्वयंप्रकाश

अकाल मृत्यु: स्वयंप्रकाश

जंगल का दाह: स्वयंप्रकाश

स्वयंप्रकाश जी की कहानी ‘क्या तुमने कभी सरदार भिखारी देखा है’ का ऑडियो लिंक

 

संस्मरण: मिहिर पंड्या

स्केच: भास्कर रौशन

(मिहिर पंड्या और भास्कर रौशन दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं)

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