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क्या तुमने कभी स्वयं प्रकाश को देखा है ?

प्रवीण कुमार


क्या तुमने कभी स्वयं प्रकाश को देखा है ?
हाँ ! मेरा यही जवाब है . देखा है और तीन बार मुलाकात भी हुई . एक ज़िंदादिल इंसान जो लगातार नई किताबों में ना केवल रूचि लेता था बल्कि उसे पढ़कर अपनी एक निजी राय भी रखता था . आप पूछिये और सुनिए पढ़ी गईं किताबों के हर्फ़-हर्फ़ पर उनके कमेन्ट को . हैरानी होती कि ‘यह कथाकार इतना क्यों पढ़ता है ?’

कुल मिलाकर कभी नहीं लगा कि यह वही कहानीकार हैं जो बेहद सादे तरीके से कालजीवी कथाएँ रच चुके हैं -प्रेमचंद की परंपरा के अंतिम मजबूत स्तम्भ .’पार्टीशन’ के कुर्बान भाई , ‘रशीद का पजामा’ का रशीद और वह जीवट सरदार जी ‘क्या तुमने कभी सरदार भिखारी देखा है’ वाले .

हिंदी मानस इन पात्रों को शायद ही भूल पाए . ये पात्र जितनी सहजता से आये हैं कहानी में कि उनकी भीतरी मार्मिकता को देखने-दिखाने के लिए अतरिक्त शब्दों की कहीं कोई ज़रूरत नहीं और ना ही किसी जबरिया नाटकीयता की ज़रूरत है . ये कहानियाँ स्वयं प्रकाश जी की काया की तरह ही चुस्त और चर्बीमुक्त हैं .

प्रदर्शनप्रियता और नाटकीयता से बिलकुल अछूती. बिलकुल उनकी ही तरह. देह चली गई पर कहानियाँ उसी अंदाज में शाश्वत हैं .कोई कहानीकार कभी नहीं चाहता कि उसकी कहानी में त्रासदियाँ झेलने वाले पात्र और समस्याएँ शाश्वत हों . वह मानकर चलता है कि समाज में उत्पीड़न और ग़ैरबराबरी जब ख़त्म हो जाएगी तो ये पात्र और परिस्थितियाँ भी गायब हो जाएंगी .

पर क्या प्रेमचंद का ‘होरी’ कभी गायब हुआ ? रशीद , कुर्बान भाई और सरदार जी जैसे पात्रों के गायब होने की कोई हालिया संभावना दिखती है ? बल्कि अब और गाढ़े ढ़ंग से ‘पार्टीशन है कि ज़ारी है’.
स्वयं प्रकाश की कहानियाँ अपने ढ़ांचे में बहुत लम्बी नहीं हैं अलबत्ता जल्दी ख़त्म हो जाती हैं .पर ऐसा क्या है उन कहानियों में जो लगातार पाठक के मन में घुमड़ती रह जाती हैं? कुछ चुभती हुई भी या किसी पुराने राष्ट्रीय ज़ख्म की तरह जो समय के बीतने के साथ-साथ एकदम ताज़ी होती जा रही हैं.

कुछ तो है इस इक्कीसवीं सदी के हालात में कि उनकी लगभग कहानियाँ जो साम्प्रदायिकता , घेटोआईजेशन , जंगल और जीवन के दमन को लेकर लिखी तो थोड़ी पहले गईं थीं पर अब पढ़ने पर लगता है कि यह तो आज की कहानी है .बेशक अभी की . यहाँ लेखक की लेखकीय सफलता पर ख़ुश हों कि समाज के लगातार पिछड़ने पर रोएँ ?

ठीक इसी बिन्दू पर स्वयं प्रकाश खड़े हैं .साधारण-सी लगने वाली भाषा और शिल्प के साथ -सफ़ेद पजामे-कुर्ते में एक मध्यवर्गीय आदमी जिसकी बस इतनी-सी ख्वाहिश है कि जब वह ज़ोर देकर कहे कि” अरे कुछ नहीं सरदार जी ! कुछ नहीं होगा .तुसी मजे से बैठो. हमारे होते हुए आपका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता ” तो वह केवल कहे ही नहीं बल्कि सरदार जी की रक्षा भी कर पाए. वह बस इतनी-सी जिज्ञासा लिए हुए है अपनी कहानियों में कि दाढ़ी बढ़ा लेने भर से यदि वह मुसलमान लग रहा है और आफ़त के समय में उससे कोई पूछे कि तुम कौन हो तो उसे क्यों कहना चाहिए कि वह हिन्दू है ? आख़िर क्यों ? तुर्रा यह कि वह किसी भी कीमत पर नहीं कहना चाहता कि वह हिन्दू है और झेलता है उस यात्रा-समय को , गालियों को , उन धारदार निग़ाहों को जो उसके दाढ़ी बढ़ा लेने भर से , मुसलमान लगने भर की वजह से पैदा हुई हैं .

यह ‘चौथा हादसा’ एक लेखक का ख़ुद के धर्म-समाज के सामने प्रायश्चित है या कथा कहने की तकनीक ? क्या वह रोडवेज की बस केवल कलपुर्जे वाली बस है जिसमें एक व्यक्ति दाढ़ी बढ़ाकर यात्रा कर रहा है ? कहीं वह बस सारा हिन्दुस्तान तो नहीं जिसकी दर्दनाक यात्रा ख़त्म ही नहीं हो रही . इस नरैटिव को देखने-पढ़ने भर से नहीं पकड़ा जा सकता . लगातार परखते रहना होगा कि कहानियाँ केवल लिखी भर नहीं जातीं बल्कि अनुभव के बहुत भीतरी तह में घुसकर आत्मा की चमड़ी छिलने-उतरने की हद तक झेली भी जाती हैं . तब जाकर कोई कहानी पैदा होती है. यह स्वयं प्रकाश का अपना मानक है.

स्वयं प्रकाश को अब याद करना कुछ सवालों से उलझे बिना मुकम्मल नहीं हो सकता . जैसे सांप्रदायिकता की शिक्षा, परिस्थिति देती है या पूर्वग्रह ? इसकी निर्मिती में पक्ष दोषी होते हैं या विपक्ष ? सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का पहला सिरा कहाँ है – उसकी पहचान और यह विचार समाज के किस हिस्से में पलता है ? इसकी निस्सारता को जानने के बावजूद इसका वजूद हमारे समाज में इतना गहरा क्यों है ? यह ख़तरनाक सच्चाई मध्यवर्ग के लिए शोध और आँकड़े इकट्ठे करने की चीज है कि अनुभूति की ? इक्कीसवीं सदी के इस दूसरे दशक में तकनीक ,प्राद्योगिकी और वाणिज्य का क्षेत्रफल जितना फैला है, क्या उसी अनुपात में विभिन्न समाज और धर्मों के लोगों की सहभागिता बढ़ी है ? वह डर कहाँ से आ रहा है कि लोग लगातार पिछड़ रहे हैं ? इस डर का निदान किसके पास है ? साम्प्रदायिकता हमारी दिनचर्या के ‘टोन’ में शामिल हो चुकी है , इस ख़तरनाक सच्चाई को हिंदी पट्टी में संभवतः उसके बारीक़ रेशे के साथ स्वयं प्रकाश ने ही पहले पहल व्यक्त किया . जिसे हम आज ‘घेटोआईजेशन’ कह रहे हैं , उसकी वास्तविक शुरुआत हमारी दिनचर्या से होती है , आदतों ,हरकतों और पूर्वाग्रह में वह कैसे धीरे-धीरे घुलती गई है , इसका एहसास स्वयं प्रकाश ने हमें कराया . फिर भी स्वयं प्रकाश की कहानियाँ किसी हाहाकार को जन्म नहीं देतीं .

वह हिंदुस्तान का वह नक्शा धीरे-से सामने रख देती हैं जहाँ इन सवालों और जीवन-स्थितियों का बड़ा सिरा खुल जाता है जिसकी नोटिस बहुत देर से हमारे बुद्धिजीवियों ने ली . वे दिखाते हैं कि राष्ट्रवाद अपनी अनिवार्य परिणति में किस तरह सदियों का संचित ज्ञान , सहनशीलता ,सहअस्तित्व और साझा रागात्मक संस्कार में घुन की तरह घुस गया है . वह लगातार अपना काम कर रहा है और हम बेपरवाह रहे, बल्कि आज भी हैं .

इधर की कहानियाँ अब लगातार लम्बी हो रही हैं .कहानीकारों का मानना है कि जीवन जटिल से जटिलतर होता जा रहा है ,ज़िंदगी इतनी परतदार हो गई है कि कहानी के किसी छोटे ढ़ांचे में वह समा नहीं पाती इसलिए लम्बी हो रही हैं . ऐसे में थोड़ा ठहरकर स्वयं प्रकाश की कहानियों की पड़ताल करने पर पाएंगे कि जटिल और परतदार जीवन-स्थितियों की कहानियाँ उनके यहाँ कम नहीं . पर जिस भाषा और शिल्प का निर्वहन स्वयं प्रकाश ने किया उसको साधना सबके बस की बात भी नहीं.

अपनी प्रतिबद्धता और पक्षधरता में स्वयं प्रकाश जहाँ खड़े हैं , एक दुविधाहीन भाषा के साथ , वहां लेखक को अलग से कुछ कहने की ज़रूरत नहीं बल्कि कहानी ही सबकुछ कह जाती है . क्या अब की कहानियों में ऐसा संभव हो पाता है, जहाँ कहानी और लेखक इतने आसपास हों कि संदेह पैदा हो जाए कि असली कौन है.

पहली बार उनसे दिल्ली में पल्लव जी ने मिलवाया . जुलाई या अगस्त का महीना रहा होगा . खद्दर का पजामा-कुर्ता पहने थे वे. मैंने पैर छुए तो टोक दिया “अरे यार इतना भी बुढ़ा मत बनाओ”. फिर ढ़ेरों क़िताबों और पत्रिकाओं पर बात हुई .याद है कि अशोक कुमार पाण्डेय की ‘कश्मीरनामा’ पूरी पढ़ चुके थे और अपनी बेबाक टिप्पणी भी करते जा रहे थे .मेरी कहानी संग्रह को देखकर कहा “एक कहानी तो मैंने तद्भव में पढ़ी थी ,अच्छी लगी.. पर यह क्या ?

ख़ुद की कहानियों की प्रामाणिकता के लिए किसी बड़े कहानीकार की टिपण्णी की क्या ज़रूरत ? कोई कहानीकार कहेगा तब ही कोई दूसरा कहानीकार बढ़िया कहलाएगा ?” थोड़े तन-से गए थे वे . उनकी इस साफ़गोई पर मैं चुप ही रहा . फिर मैंने उनके साथ एक फ़ोटो भी क्लिक करवाई. वह फोटो आज भी मेरे पास है . सोफ़े पर चुस्त देह के ऊपर चमकती हुई आँखें और उनके पीछे थोड़ा झुककर खड़ा मैं . आज भी वह तस्वीर देखी तो लगा कि फिर बेबाकी वही बात बोलेंगे “तुम्हारी कहानियों में कहने के लिए कुछ ख़ास नहीं है पर दिखाने के लिए बहुत कुछ नया और ख़ास है. ” तब से परेशान रहा हूँ कि कैसे कहन का नया तरीका खोजूं ? एकाध बार सोचा कि फोन करके कहन की तकनीक पर उनसे बात करूँ . पर मैं ऐसा कर नहीं पाया और इधर बातचीत की संभावनाओं के तमाम दरवाजे बंद हो गए .

ओह! अलविदा स्वयं प्रकाश !

(प्रवीण कुमार चर्चित युवा कहानीकार और दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं)

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