यशस्वी पाठक की कविताएं हमारी दुनिया में आसपास जो भी सुंदर था उसकी हिमायत करती है और उसके नष्ट होने की आह से अपनी एक लय बनाकर चलती है। यशस्वी ने अपनी दुनिया में भले पुरुषों को देखा है, इसलिए पितृसत्ता के भयानक अनुभव की स्मृति उनकी कविताओं में नहीं दिखती। उनके यहाँ परिस्थितियों और सामाजिक दंश को झेलता मनुष्य दिखता है जहाँ स्त्रियों को रोता हुआ न देख पाना ही काफी नहीं था, उनके दुःख को कांधे पर रखकर चलना भी था। यहां ऐसे पुरुष की जीवन गाथा मिलती है जो स्त्री विमर्श की बहस नहीं जानता लेकिन स्त्री को रोते हुए नहीं देख पाता।
ऐसा नहीं है कि कवि वहाँ जमी-जमाई पितृसत्ता की हनक नहीं देखती। वह कहती हैं कि ” वो जब घर में होते तो दम जैसे घुट के रह जाता/ इंकार की एक मौन तहरीर उनके चेहरे पर चस्पा रहती ” लेकिन कवि को वो याद आता है कि जाने क्यों खिजां अपने साथ उनकी याद लाती है। दरअसल मनुष्य का मन इसी तरह से अपनी संरचना में ढला होता है जहां उसे अच्छा बुरा सब याद रहता है। कई बार जो स्मृतियां यातना होती हैं वे भी हमारे जेहन में आती रहती हैं। इस तरह कविताओं में जीवन के विभिन्न रंगों और बदरंगों के मनुष्यता का एक नैसर्गिक वितान दिखता है जिसकी आज बेहद जरूरत है।
यशस्वी की कविता की दुनिया में जो स्त्री-पुरुष नायक हैं, उनकी जन साधारण को देखने की दृष्टि कितनी गहरी है, उसकी भी गवाही देते हैं। गौरतलब है कि वे उन्हें नायक बना देती हैं जिन्हें हम सब ने देखा है लेकिन पहचाना नहीं। लेकिन यहां उन्हें ही देखकर यशस्वी ने आजादी का सुंदर स्वप्न देखा और ये स्त्रियां कोई डिप्टी कमिश्नर या हवाई जहाज उड़ाती स्त्रियां नहीं थी लेकिन वह उसी श्रम की दुनिया की अगुआ थीं और उनका “खट के खाई थे” अपने आप में श्रम के जीवन का परचम ही नहीं था अपने आप में एक मुकम्मल आजादी का नारा भी था। सही मायने में तो श्रम का जीवन ही आजादी का यथार्थ होता है नहीं तो सेंत-मेंत में भला औरतों को कहां आजादी मिलती है। इसलिए कवि की कविता की नायिका लफुआ मर्दों को ललकार कर कहती रहती है कि ” खट के खाई थे कौनवो तोहार बाप के। ” इन्हीं खटती हुई औरतों से कवि ने जीवन सीखा है इसलिए कविता में जीवन नदी की मंथर धारा की तरह बहता रहता है।
यशस्वी की कुछ कविताओं को पढ़ना जैसे उस जीवन में लौटना है जिन्हें हम गुम नहीं करना चाहते थे लेकिन वो हमसे छीन लिया गया। प्रकृति और उसके जंतुओं में कवि का मन इस तरह घुला हुआ है कि धरती पर उगती अपनी प्रिय घासों को पशुओं को चरता देख उन्हें पशु हो जाने की क्षणिक इच्छा भी उठ जाती है। कविता में इन पंक्तियों पर मैं देर तक ठहरी रही। ख्याल आया कि यह अनुभूति विलक्षण नहीं है लेकिन कहना उतना ही कठिन पर कविता में इसे बेहद सहज और सुंदर अंदाज में कहा गया क्योंकि उस दृश्य को कवि ने जिया है, उस इच्छा में वो बार-बार उतरा है। वन्य रहन- शैली से आकर्षित हुआ है। वो कहती हैं कि ” अपराजिता की लताओं में एक घोंसला बनाने का मन करता रहा…। “
यशस्वी की यादें बाज़ार से बनी प्लास्टिक की दुनिया की यादें नहीं हैं। इसलिए वो अपने सारे कच्चेपन और धूप छाह के रंगों के साथ कविता में उतरते हैं और तब सब चटक और उमड़ी सी याद की तरह हमें छूते हैं। मकई की सूखी बालियां ,साइकिल के टायर में हवा भरने के पंप , रंग बिरंगी टूटी चूड़ियों के टुकड़े, अम्मा की धोती के किनारे में बंधी तम्बाकू की पत्तियां, चारा बालने की मशीन ,घूर पर जलता यम का दिया, बारिश के जोर से गिरे नीम के फूल की कड़वी महक और सिरके में पड़े लहसुन और आम की फांके आखिर इतनी स्मृतियां और उनकी बेसम्भार यादें क्या कोई अर्थ नहीं होता उनका। अगर कोई अर्थ नहीं होता तो हमें इस कदर याद क्यों आतीं हैं ? और ये स्मृति का जीवन आखिर क्यों और कौन हमसे छीन लेता है ? जवाब हम सब जानते हैं वही व्यवस्था जो मनुष्य की सारी नैसर्गिकता पर पहरे लगाता है।
कविता में कवि को वो छूटा हुआ जो सहज था श्रम और सामूहिकता का चहल-पहल से भरा जीवन किसी रूमान की तरह नहीं याद बल्कि खो जाने की आह की तरह याद आता हैं। उनका बिछोही हुआ मन दुनिया की तमाम छोटी बड़ी शय को याद करता रहता और वह तड़प कर कह उठता है कि आखिर न जाने कहां रहते होंगे अब वे सब। जाहिर सी बात है कि कवि की आत्मा में ये दृश्य सांस की तरह रहते हैं लेकिन फिर भी इतनी जरूरी शय और अपनी दुनिया के रंगों से उसे बेदखली मिलती है। प्रभात की कविता अपनों में न रह पाने का दुःख यशस्वी की कविता में विस्तार लेता है और उनके आत्मा के किसी हिस्से में धंसा सा दिखता है । और ये होता ही हर मनुष्य का अपना दागिस्तान होता है।
कविता बिना सवाल किए सवाल लेकर चलती है और जवाब भी इन्हीं कविताओं में मिलते रहते हैं। जीवन के उन रंगों, स्मृतियों की बात करते कवि जब ये कहता है कि मुझे रोहित वेमुला,आसिफा और मणिपुर की निर्वस्त्र स्त्रियों की भी याद आती है और दस वर्ष की उम्र में बलात गुदगुदी करते हाथ भी याद हैं। जाहिर सी बात है हमें सब याद रखना चाहिए कि नहीं तो हमारी स्मृतियों पर भेदभाव का दोष होगा। मीठे – तीते की गैरबराबरी का भी दोष। और कवि सब याद भी रखता है यहां तक वो बच्चा भी जिसके साथ छुपम छुपाई के खेल में वह अपने प्रेमी की छवि देखती है। इस कविता को पढ़ते हुए लगा कि जो पुरुष नई दुनिया के मनुष्य हैं, उन्हें इस कविता में प्रेम और सहचर्य के लिए स्त्री जिस कोमलता की सतह पर देखती है, उसे समझना होगा।
जब भी मेरा सामना हुआ किसी अधम पुरुष से
वह लड़का मेरे भीतर मुंह बिसूर कर रोया
तमाम उम्र उस नाजुकी की अक्षुण्ण रखना कितना कितना जरूरी था
जिसे देख मैने जाना था
पुरुष कितने कोमल होते हैं अपने प्रारंभिक दिनों में
कवि स्मृतियों को लेकर बेहद सजग है उसे पता है कि कौन हमारी स्मृतियों को नष्ट कर रहा है।
मुझे उस जैसा , वैसा
उतना होने से बचना था
मैं अदाकारा नहीं थी
मुझे बचना था नाटक और प्रदर्शन से
मैं नहीं बच सकी ग्लानि और अपराधबोध से
नहीं बच सकी मैं डैसडीमोना की तरह कुपुत्री होने से
कवि कविता में यहीं से अपने विद्रोही होने की बात दर्ज कर देता है। रूढ़ियों को तोड़कर प्रेम करना जीवन को तलवार की शान पर रखना होता है। आप तब सुपुत्री और सुपुत्र नहीं रह जाते लेकिन नई दुनिया की कतार में आपकी ठोस जगह भी बन जाती है। माना कि वहां आपके लिए सुविधा और सुरक्षा भरा जीवन नहीं धरा है फिर भी आप उधर जाते हैं थोड़ा और मनुष्य बनते हैं थोड़ा और जीवन सीखते और समझते हैं। कवि इसी कविता में समय में अति-मनोरंजन और तात्कालिकता के बहते सैलाब से बचने की भी बात करता है
कवि सूचना संसार के मायाजाल समझ रहा है और कविता में रील्स न देखने की बात करता है। यह बात उस बड़े सवाल से जुड़ती है कि स्मृतियों से विलग होकर मनुष्य जीवन कितना उजाड़ होगा। स्मृति संस्कृति से ही जुड़ी चीज होती है हालांकि संस्कृति की अलग-अलग व्याख्या हो सकती है लेकिन स्मृतियों से वह एकदम सटी होती और स्मृतियों का एकदम खत्म हो जाना मनुष्य जीवन को खलता है और अकेला भी कर देता है ।
ख़िज़ाँ में देखना
जाने क्यों ख़िज़ाँ अपने साथ
उनकी याद लाती है
सयान होते हुए इलावा बाबा के
लड़कियों, स्त्रियों से भरे उस घर में
पच्चीस बरस के वे वाहिद मर्द थे
वे जब घर पर होते
दम घुट के रह जाता
इन्कार की एक मौन तहरीर
उनके चेहरे पर चस्पां रहती
उन्हें हँसते देखना
वृक्षों को सूरज पर जमते
तारों को ज़मीन से उगते देखना था
मैंने उन्हें दुआर बुहारते, जाले उतारते देखा
क्यारियाँ गोड़ते, साग लगाते देखा
बारिशों में खटिया बरामदे में रखते
उपलों पर तिरपाल डालते
गायों को सार में बाँधते देखा
मैंने उन्हें बरसात की एक रात
अपनी पहली साईकिल घर लाते देखा
फिर उस साइकिल से
रोज़ सुबह कचहरी जाते देखा
हस्बेमामूल हर शाम बाज़ार से
किसमी-बार लाते देखा
मैंने उन्हें देखा मेरी टाँग के पके फोड़े पर
नीम की पत्तियों का गुनगुना पानी उड़ेलते
बीटाडीन लगा कर पट्टी करते
मेरे स्कूल की नीली स्कर्ट सिलवा कर लाते
मैंने उन्हें एक ज़रा सी ग़लती पर
ज़हर-आलूद आँखों से मुझे घूरते देखा
और तब भी देखा जब नमनाक आँखों से
उन्होंने मुझे पहली बार शहर जाते देखा
मैंने उन्हें देखा जब वे विवाह के बाद
कुछ कुछ शर्माने और मुस्कुराने लगे
उन्हें बाप बनने की खुशी में नाचते देखा
और अपनी माँ के मरने पर रोते भी
वे उन मर्दों में से रहे जो छुप कर रोते हैं
और रसोईं की तरफ़ सिर्फ़ खाने जाते हैं
वे उन्हीं मर्दों में से रहे जिनके सब भाई
कमाने दूसरे शहर चले जाते हैं
और वे घर छोड़ कर कहीं नहीं जा पाते
वे उन्हीं मर्दों में से रहे, जो जवानी में
आला दर्जे के नास्तिक होते हैं
और पीरी में चार धाम की यात्रा करते हैं
वे उन्हीं मर्दों में से रहे
जो स्त्री-पुरूष समानता का अलिफ़ भी नहीं जानते
और स्त्रियों को रोता नहीं देख सकते
मेरी टाँग पर फोड़े का निशान अब भी है
ख़िज़ाँ में मैं उन्हें देखती हूँ
मुझे यह समझने में ज़माने लगे
उनमें जो कुछ असहनीय था
वह उनका अपना नहीं था
उन्हें यह समझने में उम्रें लगेंगीं
स्त्रियों को रोते न देख पाना ही काफ़ी नहीं होता
मिस्त्री
तुम पहली स्त्री थीं जिसे देख
मुझे पहले पहल आज़ादी के स्वप्न आने लगे थे
तुम्हारे आने की प्रतीक्षा रहती मुझे
तुम्हें मालूम हो जब तुम आँधी सी चलतीं
और एक झंकार के साथ गरज कर बोलतीं
तब मेरे अन्दर प्रसन्नता का ज्वार उठता
उस छोटे से गाँव की सम्भ्रांत स्त्रियाँ जब
चूड़ी पहनने या पायल बदलने जाती थीं बाज़ार
तुम कमांडर में ड्राइवर के बगल वाली सीट पर बैठ जाती थी
गंगा टाकीज़ अपने माशूक़ मित्थुन की फिल्में देखने
कितनी अदा,
कितनी नाटकीयता से
सुनाया करती तुम
फ़िल्म की कहानी घर की स्त्रियों को
जिन्होंने कभी नहीं देखी थी
कोई फ़िल्म सिनेमाघर में
बकरियाँ चराते फ़िल्मी गीत गातीं
कभी लम्बा घूँघट खींच,
कमर मटका कर नाच लेतीं- ‘नज़र लागी राजा तोहरे बंगले पे’
बेटी की याद में कारन काढ़ रो लेतीं
मर्द जब फब्तियाँ कसते
कैसी रोचक, स्वनिर्मित गालियों से
नवाज़तीं तुम उन्हें
सियारों की तरह वे दूर भागते तुमसे
तब कितना बौना लगता
उनका अस्तित्व तुम्हारे आगे
तुम किस मिट्टी से बनी थीं मिस्त्री
किस दुनिया से आई थीं
कौन सा तिलिस्म मिला था तुम्हें
जो मुझे अब तक न मिल सका
कितने सालों बाद मैंने पढ़ा स्त्रीवाद
तुम इतने वर्षों से उसे जीती कैसे रही थीं
तुम कोई अजूबा थीं ?
कैसी हैकड़ थीं तुम
वे जब तुम्हें निर्लज्ज कहते
तुम अपनी चौड़ी हथेली पर
तम्बाकू मसल कर कहतीं-
‘खट के खाई थे, कौनों तोहरे बाप के?’
तुम सिर्फ निर्लज्ज और हैकड़ ही नहीं थीं
तुम्हारे दिल में
दुःखों का अम्बोह भी था
उसी पर पाँव रख कर
तुमने सीखा था ज़िन्दगी करना
मैं नहीं जानती तुम्हारा नाम क्या था
शायद कोई भी नहीं जानता
मेरे लिए तुम शिल्पकार थीं
तुमने ही तो गढ़ा था
मेरे कच्चे मन पर
आज़ादी का
धुंधला सा एक सुन्दर स्वप्न
दुःख के दिनों में
दुःख के दिनों में
पेड़ की सूई से
ज़मीन के धागे से
तारों के बाद शाम
चाँद के बाद रात
सूरज के बाद दिन टाँके
सहेलियों की दिलकश बातें पिरोई
दुआ की– मेरी अच्छी सहेलियों ! तुम्हें जीवन की हर खुशी नसीब हो
दुःख के दिनों में
मैं मनुष्यों के कितने करीब चली गई
उनके प्रति भी तीव्र सहानुभूति हुई
जो मुझे क्रूरतम लगे थे
उन दिनों गढ़े में गोते लगाते
मच्छर के लार्वे भी सुंदर थे मुझे
और कौवों की आवाज़ भी
पके कटहल की स्मृति भर से
लुकमें का स्वाद भला लगता था
अरवी के पत्ते पर ठहरे, शीत में सने,
आँवले के नन्हें फूल मनोरम थे कितने
कैसी-कैसी चीज़ें याद आया कीं, उन दिनों
जिन दिनों प्रेम करना ज़रा कठिन था
खूँटी पर लटकी मकई की सूखी बालियाँ
और साइकिल के टायर में हवा भरने का पम्प
जलती एक कंदील
या टॉर्च की रौशनी में
सामान टटोलता कोई हाथ
मेरा मन हल्का करते रहे
और मेरी प्रिय घासें
जिन्हें देख बाज़औकात मेरी इच्छा हुई
घास चरने वाला कोई पशु हो जाने की
अपराजिता की लताओं में
एक घोंसला बनाने का मन करता रहा
जिनमें बुलबुल के बच्चे, हर आहट पर
अपनी पीली चोंच खोल चिचियाने लगें
सफ़ेद और गुलाबी, हल्की लाल और पीली
गुलदाउदी की कलियाँ
और उनकी महक ने याद दिलाया
चाचा अब फूल-पौधों के
उतने भी दीवाने नहीं रहे
उम्र ने क्या कुछ लिया है हमसे, रफ़्ता रफ़्ता
मेरी भी दिलचस्पी नहीं रही
रंग बिरंगी टूटी चूड़ियों के
टुकड़े जमा करने में
अम्मा की धोती के कोने में बँधी
तम्बाकू की बारीक पत्तियाँ
न जाने कहाँ रहती होंगी अब
चारा बालने की मशीन,
घूर पर जलता यम का दिया
बारिश के ज़ोर से गिरे नीम के फूल
और उनसे उठती कड़वी गन्ध
सिरके में पड़ी लहसुन और आम की फाँकें
छत पर सूखती सफेद कद्दू की बड़ियाँ
इन ज़रा ज़रा सी बातों से
दुःख इतना भी सघन नहीं रहा
और प्रेम करना थोड़ा कम कठिन
बचना
मुझे बचना था
वाई-फाई और डेटा से
रीलों से बचना था मुझे
मुझे बचना था निर्मम-नुकीली ख़बरों से
मुझे बचना था—
अनुरूपण
असत्य
सघन भ्रम से
मुझे उस जैसा,
वैसा,
उतना, होने से बचना था
मुझे सभी पैमानों, सभी मानकों से बचना था
मुझे प्रशंसकों और अनुयायियों से बचना था
मुझे बचना था हॉर्मोन्स के असंतुलन से
मुझे आठ घण्टे की नींद बचानी थी
मुझे देखने की कला,
पढ़ने का सलीक़ा,
एकाग्रता का अभ्यास,
आहिस्तगी का तौर सीखना था
मैं अदाकारा नहीं थी
मुझे बचना था नाटक और प्रदर्शन से
मैं नहीं बच सकी ग्लानि और अपराधबोध से
नहीं बच सकी मैं डैसडेमोना की तरह कुपुत्री होने से
मुझे भूलने से बचना था कई सुखद स्मृतियाँ
अपना बचपन, मनुष्यता और अपनी विलक्षणता
मैं कभी नहीं भूल सकी रोहित वेमुला, आसिफ़ा बानों को
मैं कभी नहीं भूल सकी मणिपुर की निर्वस्त्र स्त्रियों को
मैं कभी नहीं भूल सकी दस वर्ष की वय में
बलात् मुझे गुदगुदी करने वालों हाथों का बल
दिल्ली की प्रदूषित हवा में
मुझे याद रखने थे बाग़ के सब वृक्षों के नाम
ऐसे समय में जब मनुष्य
अपना जीवन नहीं बचा पा रहे थे
मैं कैसी-कैसी चीज़ें बचाना चाहती थी
मैं कैसी चीज़ों से बचना चाहती थी
परन्तु ऐसे ही समय में
जब याद रखने और भूल जाने पर
हमारा वश नहीं रहा
मैं लिख कर रख लेना चाहती हूँ
एक वाक्य–
मुझे नफ़रत से बचना था,
मुझे प्रेम बचाना था।
लड़के
प्रेम और ममता से भरा मिला वह
क्षमा और शालीनता से युक्त
मुझे अच्छा लगा
उससे छिपना
उसे ढूंढना
उसे सुनना अच्छा लगा
कितनी करुणा भरी थीं उसकी बातें
कितना विराट था उसका हृदय
कितना निर्मल था उसका मन
तरंगित करती थी उसकी चपलता
मेरे वस्त्र उसे सुंदर लगे थे
मेरी अनामिका की अंगुश्तरी
उसका मन बहलाती रही
देखा किया था उसने
मेरी उँगलियों को छू-छू कर
कितना लीन था वह
कंकरियों को जोड़ कर
स्पाइडर लिली कि एक टहनी लगाने में
अपनी साइकिल की बास्केट में-
बाँसुरी,
अमरूद के फूल,
बिना रिफ़िल की पेन
सूखे नेलपेंट की एक शीशी
और एक नन्हें मोज़े की देख-रेख में
जब भी मेरा सामना हुआ
किसी अधम पुरुष से
वह लड़का मेरे भीतर
मुँह बिसूर कर रोया
तमाम उम्र उसकी नाज़ुकी को
अक्षुण्ण रखना कितना-कितना-कितना ज़रूरी था
जिसे देख मैंने जाना था—
पुरुष कितने कोमल होते हैं
अपने प्रारंभिक दिनों में
जिसे देख मैंने चाहा था—
उसके सभी गुण हों मेरे प्रेमी में मौजूद
यह कैसी सलोनी मुराद थी कि
तीन वर्ष के लड़के में मैंने
अपने प्रेमी की छवि देखी
मुझे उस लड़के का मुखड़ा
अक्सर याद आता है
रात दो
रात एक दरिया है
मैं जिसमें डूबती हूँ
मुझे तैरना नहीं आता
मुझे साँस नहीं आती
मैं इस दरिया का पानी पी रही हूँ
मैं इसी में डूबना चाहती हूँ
रात ने मुझे जान लिया
रात ने मेरी जान ली है
मैं रात में तर हूँ
मैं रात से इतर नहीं हूँ
मैं रात के प्रेम में हूँ
रात के दरिया में मैंने अपने आँसू घोले
रात के माथे पर अपने होंठ रखे
रात के क़दमों में अपना मस्तक
रात के सीने में अपने राज़
रात के हलक़ में अपनी हँसी
रात के दरिया में,
हरे पत्ते की नाव उतारी
फिर उस नाव पर सवार हो कर
दरिया के पार उतरना चाहा
असल में मैंने कभी पार उतरना चाहा ही नहीं
न रात के
न प्रेम के
मैं डूबे रहने के लुत्फ़ से वाकिफ़ थी
सो डूबती रही
रात में और प्रेम में
हिना से सजा अपना हाथ
मैंने रात दरिया के हवाले किया
दरिया अपना रंग
मेरी हथेली पर भूल गया
जिस तरह प्रेम
मेरे दर आ कर,
अपना दर
मुझे रात दरिया में डूबता देख
मेरा प्रेमी मरता रहा
मरते हुए मुझ पर मरता रहा
मैं उसे देखती
रात दरिया में डूबती रही
नायिका
वह यूँ हीं नहीं आती
जैसे आती है सूरज की कोई नर्म किरन
जैसे छा जाता है कुहासा
जैसे चल पड़ती है हवा
जैसे झरती है चाँदनी
जैसे पड़ती है ओस
वह आने से पहले
पैदा करती है इंतज़ार
खूब कराती है बेकली की मश्क़
अपने आने का, शाम के हाथों भेजती है पयाम—
आऊँगी तब, जब मुझसे भी न रहा जाएगा
जिन दिनों वह आने को होती है
हवाओं की बेचैनी बढ़ने लगती है
जाते हुए सूरज का कलश लुढ़क जाता है
और आसमान तड़प कर केसरिया हो जाता है
वह तब आती है जब उसके बिना रहना
लगभग दुश्वार हो जाता है
वह तब आती है जब उसके आने की
सब तैयारियाँ पूरी हो चुकी होती हैं
धरती का चेहरा धूल में खेले बच्चा सा पियासा
और थका-थका हो जाता है
कोयलें अपने साथी चुन चुकी होती हैं
मोर अपना क़याम तय कर चुके होते हैं
चीटियाँ अपने अंडे सुरक्षित स्थानों पर पहुँचा चुकी होती हैं
अनाज कट चुके होते हैं
मेहंदी के पौधे गझिन होने लगते हैं
छतों और टालियों की मरम्मत होने लगती है
मोगरे, चम्पा, कनेर और रातरानी कलियों से भरने लगते हैं
आम और जामुन पकने लगते हैं
केलों के फूल खुलने लगते हैं
बाबा धान की बेरन डाल देते हैं
इंसान सर उठा-उठा कर बादलों की रंगत देखने लगते हैं
दरख़्त उससे नाराज़ होने को होते हैं
जब सब हिरासने को होते हैं
तब उसकी पालकी नज़र आती है
वह अपने केशों के बंद खोलती है
और पत्ते घुँघरू बांध लेते हैं
मोर अपनी गर्दन लचका कर पिहूँकने लगते हैं
उसके अर्दली उसके आने की उद्घोषणा करते है
वह जानती है उसे किस रूप
किस धज से उतरना है
कि मन बस माइल हो जाए
फिर वह बूँदियाँ बरसाये
या डाले झीसी
यूँ ही बेमन सी झटक दे चूनर
या टले ना दिनों-दिन
सब उसके सजदे करेंगे
सब उसकी अटखेलियाँ सहेंगे
सूक्ष्म
और अधिक आँखें
और अधिक चाह
चोट एक ज़रा सी
बहुत सी परछाइयाँ
धूप और अँधेरा मिलते हुए
बूँदे और अलसी फिसलती हुई
छत और पतंग बहते हुए
गीत और रंग घुलते हुए
आँसू और हँसी उलझते हुए
जिह्वा और त्वचा पिघलती हुई
पाँव और शीत सुलगते हुए
बोली और पशु समानांतर
परिवार और झूठ पर्यायवाची
समीप और मन दूर-दूर
भागना और जीना अडिग-अटल
पर्वत और पानी सलामत रहें
बाँस और मृत्यु बढ़ते रहें
जंगल और हृदय का विस्तार हो
दूरी और कपास पास हों
ऊब और चौकी मिलती रहे
कला और चेतना जगाती रहे
पात्र और स्मृति सुरक्षित रहें
आकृति और दिशाएँ बदलती रहें
खेत और बगुला हमराज़ हों
मेड़ और कर्णफूल आबाद रहें
ऐनक और चरी सदा साथ रहें
आत्म और निर्वाण उद्दीप्त हों
देह और प्राण इसी क्रम में छूटें
यशस्वी पाठक -हिन्दी की नई पीढ़ी की कवि-लेखक हैं। वह सुल्तानपुर (उत्तर प्रदेश) से हैं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में परास्नातक किया है। उनकी कविताएँ ‘सदानीरा’, ‘वनमाली कथा’, ‘कृति बहुमत’ में प्रकाशित हो चुकी हैं। वह ‘ऑडनारी’ और ‘द प्रिंट’ जैसे मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के लिए काम कर चुकी हैं। ‘रामा मेहता लेखन अनुदान’ वर्ष 2026 से सम्मानित। संपर्क-yashasvi22001@gmail.com।
रूपम मिश्र- कवि-लेखक रूपम मिश्र के दो कविता संग्रह प्रकाशित हैं। सामाजिक-राजनीतिक व सांस्कृतिक प्रश्नों पर लगातार लिखती हैं।

