मुमताज़ अली की किताब हुक़ूक़-उल-निस्वाँ का दूसरा बाब ‘तालीम’ औरतों की शिक्षा के सवाल पर उन्नीसवीं सदी के भारतीय मुस्लिम समाज में चल रही बहसों को समझने के लिए एक अहम दस्तावेज़ है। इस लेख में मुमताज़ अली न सिर्फ़ औरतों की शिक्षा का समर्थन करते हैं, बल्कि उन समाजी और नैतिक दलीलों की भी पड़ताल करते हैं, जिनके सहारे औरतों को ज्ञान से दूर रखने की कोशिश की जाती थी।
मुमताज़ अली अपने लेख की शुरुआत ही एक ऐसे समाजी बदलाव के ज़िक्र से करते हैं, जो उस वक़्त के समाज की मानसिकता को समझने के लिए बहुत अहम है। वे लिखते हैं: “अब वह ज़माना नहीं रहा, जब औरतों की तालीम की बात लोगों को बिल्कुल नई और अनजानी लगती थी। उस वक़्त सीना-पिरोना, खाना पकाना और कातना-बुनना औरतों के क़ुदरती काम समझे जाते थे। लोगों ने इसे माना हो या न माना हो, लेकिन वक़्त के साथ औरतों को पढ़ाने का सिलसिला शुरू हो ही गया। इसलिए अब यह सवाल कि औरतों को तालीम दी जानी चाहिए या नहीं, तय हो चुका है। बच्चों की अच्छी परवरिश करना, घर-गृहस्थी को अच्छे ढंग से चलाना, अल्लाह के हुक़ूक़ और उसके बंदों के हुक़ूक़ को जानना, पढ़े-लिखे शौहरों, भाइयों और बापों की नज़रों में इज़्ज़त पाना, उदास दिल को ख़ुशी देना और तन्हाई में एक ऐसे साथी का साथ मिलना जो दिल बहलाए और सुख-दुख में साथ दे, इन सब बातों ने, या शायद तालीम को पसंद करने वाले ज़माने की देखा-देखी ने, पुराने रस्मो-रिवाज की बंदिशों, पुरानी रवायतों की ज़ंजीरों और दूसरों की सिखाई हुई आदतों की क़ैद को झटके देकर तोड़ दिया है। यही वजह है कि अब हर तबक़े की औरतों में थोड़ी-बहुत तालीम का चर्चा और उसका चलन शुरू हो गया है।”
वे औरतों की शिक्षा के समर्थन में बच्चों की अच्छी परवरिश, घर के बेहतर इंतज़ाम, मज़हबी ज़िम्मेदारियों की जानकारी और पढ़े-लिखे शौहरों की निगाह में औरतों की क़द्र बढ़ने जैसी वजहों का भी ज़िक्र करते हैं। ये सभी बातें अपने वक़्त के समाज में शिक्षा की ज़रूरत समझाने के लिए उपयोगी थीं। लेकिन अगर औरतों की शिक्षा का औचित्य सिर्फ़ इस आधार पर साबित किया जाए कि वे बेहतर माँ, कुशल गृहिणी या अपने शौहर के लिए अच्छी हमसफ़र बन सकेंगी, तो शिक्षा को औरत की अपनी इंसानी ज़रूरत के बजाय उसकी घरेलू भूमिका की उपयोगिता से जोड़ दिया जाएगा। मुमताज़ अली की ख़ासियत यह है कि वे आगे चलकर इसी सीमित समझ से आगे बढ़ते हैं और शिक्षा के पक्ष में एक बुनियादी इंसानी दलील पेश करते हैं। वे साफ़ करते हैं कि उनके लिए औरतों की शिक्षा की ज़रूरत का असल आधार न तो घरेलू कामों में उनकी कुशलता है और न ही मर्दों को उनसे होने वाला कोई फ़ायदा। इसकी बुनियाद औरतों की अपनी अक़्ली क़ाबिलियत है। मुमताज़ अली औरतों की शिक्षा को किसी बाहरी फ़ायदे से साबित करने के बजाय इंसानी दिमाग़ की क़ाबिलियत और ज्ञान हासिल करने की क्षमता से जोड़ते हैं। अगर औरतों में भी वे सभी मानसिक शक्तियाँ मौजूद हैं जो मर्दों में हैं, तो उन्हें शिक्षा से दूर रखना सिर्फ़ उनके साथ अन्याय नहीं, बल्कि समाज की आधी आबादी की बौद्धिक ताक़त को बेकार कर देना है।
उनकी दलील मज़हबी भाषा में व्यक्त होने के बावजूद अपने नतीजे में समाजी बराबरी की तरफ़ जाती है। वे ख़ुदा की बनाई हुई इंसानी क्षमताओं का हवाला देते हैं और कहते हैं कि औरतों को जान-बूझकर अज्ञान में रखना उस क़ुदरती क्षमता को नकारना है। उनकी यह दलील आज भी इसलिए अहम है कि यह औरतों की शिक्षा को किसी की कृपा या रियायत नहीं मानती। शिक्षा कोई ऐसी सुविधा नहीं है, जो मर्द अपनी ज़रूरत के मुताबिक़ औरतों को दे सकते हैं या उनसे वापस ले सकते हैं। यह इंसानी क्षमताओं के विकास का सवाल है। अगर किसी इंसान में सीखने और समझने की क्षमता है, तो सिर्फ़ उसके औरत होने की वजह से उस क्षमता को सीमित करने का कोई जायज़ आधार नहीं हो सकता।
इस विचार की अहमियत समझने के लिए उस दलील को देखना ज़रूरी है, जिसका मुमताज़ अली को सामना करना पड़ रहा था। उस दौर में औरतों की उच्च शिक्षा का विरोध करने वाले लोगों का एक बड़ा डर यह था कि ज़्यादा पढ़ने से औरतों का चरित्र बिगड़ जाएगा। वे मानते थे कि औरतों को इतनी शिक्षा देना काफ़ी है कि वे अपने मां-बाप और रिश्तेदारों के अधिकार पहचान लें और नमाज़-रोज़े के मसलों से परिचित हो जाएँ। इसके आगे की शिक्षा को वे ख़तरनाक समझते थे। मुमताज़ अली इस आशंका का जवाब देते हुए शिक्षा और शिक्षा के ग़लत इस्तेमाल के बीच फ़र्क़ करते हैं। वे रेलगाड़ी का उदाहरण देकर इसी बात को समझाते हैं। ड्राइवर की लापरवाही या नशे की हालत में गाड़ी चलाने से दुर्घटनाएँ हो सकती हैं, लेकिन दुर्घटनाओं के डर से रेलगाड़ी से मिलने वाले अनगिनत फ़ायदों को छोड़ देना कहाँ की समझदारी है? किसी साधन के दुरुपयोग की संभावना के आधार पर उस साधन तक किसी पूरे वर्ग की पहुँच रोक देना अन्यायपूर्ण है। शिक्षा से पैदा होने वाली संभावित बुराइयों के नाम पर औरतों को अनपढ़ रखना समस्या का हल नहीं, बल्कि समस्या को बनाए रखने का तरीक़ा है।
वे लिखते हैं: “इसमें कोई शक नहीं कि इल्म एक ऊँचे दर्जे की ताक़त है। इसका इस्तेमाल जिस मक़सद और जिस काम के लिए किया जाए, तालीम की मदद से उसे बहुत यक़ीनी तौर पर कामयाबी के साथ हासिल किया जा सकता है। एक पढ़े-लिखे इंसान के अच्छे अख़लाक़, दूसरों के हक़ों की पहचान, बड़ों की फ़रमाँबरदारी, मज़लूमों के साथ हमदर्दी, रिश्तेदारों के साथ नरमी और मुहब्बत, बच्चों की परवरिश, अच्छे इंतज़ाम और दूसरों के साथ बेहतर बर्ताव जैसी ख़ूबियाँ, एक अनपढ़ इंसान में पाई जाने वाली इन्हीं ख़ूबियों के मुक़ाबले में कहीं ज़्यादा आला, बेहतर और क़ाबिल-ए-तारीफ़ होंगी। इसी तरह, पढ़े-लिखे लोगों की बदचलनी और बुरे तौर-तरीक़े भी अनपढ़ लोगों के मुक़ाबले कई दर्जे बढ़कर हो सकते हैं। इसलिए इस तरह की दलील देकर सिर्फ़ लड़कियों की तालीम पर हमला नहीं किया जा रहा, बल्कि असल में इंसान की तालीम पर हमला किया जा रहा है। इसकी वजह यह है कि तालीम से जो बुराइयाँ पैदा होने की बात कही जाती है, उनसे मर्द और औरत, यानी तमाम इंसान, बराबर तौर पर प्रभावित हो सकते हैं। तो फिर क्या वजह है कि तालीम से पैदा होने वाली इस तरह की बुराइयों का डर लड़कों की तालीम के मामले में नहीं दिखाया जाता, लेकिन लड़कियों के लिए इन्हीं ख़तरों का हवाला दिया जाता है? “
मुमताज़ अली इस आलोचना को और आगे बढ़ाते हैं। उनके अनुसार, बच्चों के नैतिक विकास के लिए सिर्फ़ मां-बाप की नसीहत काफ़ी नहीं होती; उनके अपने व्यवहार का भी गहरा असर पड़ता है। अगर बाप अपनी ज़िंदगी में ऐसे काम करता है, जिनके ख़िलाफ़ वह बच्चों को समझाता है, तो उसकी नसीहत की ताक़त कम हो जाती है। वे दो उदाहरणों के माध्यम से इस विरोधाभास को सामने लाते हैं। एक ऐसे बाप का उदाहरण, जो अपनी बीवी के रहते हुए दूसरी औरत को घर में रखता है, और दूसरे ऐसे सुधारक का, जो बहुविवाह के ख़िलाफ़ भाषण देने के बावजूद बुढ़ापे में बहुत कम उम्र की लड़की से शादी कर लेता है। इस प्रसंग का मक़सद सिर्फ़ व्यक्तिगत पाखंड की आलोचना नहीं है। मुमताज़ अली यह दिखाना चाहते हैं कि शिक्षा और चरित्र को लेकर समाज में जो चिंताएँ व्यक्त की जाती हैं, उनकी जाँच सबसे पहले उन लोगों के आचरण के आधार पर होनी चाहिए जो दूसरों के लिए नैतिक नियम बनाते हैं। अगर बच्चों के सामने घर के बड़े अपने व्यवहार से उन नियमों को तोड़ते हैं, तो फिर शिक्षा को दोष देना कहाँ तक सही है?
इसी संदर्भ में मुमताज़ अली किताबों और पढ़ने की सामग्री को लेकर भी एक दिलचस्प सवाल उठाते हैं : “लोग कहते हैं कि फलाँ किताब औरतों के सामने नहीं आनी चाहिए और फलाँ किताब घर के उस हिस्से में नहीं रखनी चाहिए जहाँ औरतें रहती हैं। हम कहते हैं कि ऐसी किताबें आखिर बैठकखाने में ही क्यों रखी जानी चाहिए, जिन्हें औरतों के सामने लाना गलत समझा जाता है? इसलिए, उन किताबों की फेहरिस्त तैयार करने के बजाय जिन्हें औरतों का पढ़ना ठीक नहीं समझा जाता, हमें चाहिए कि अपने अच्छे आचरण से अपना चरित्र इतना पाक-साफ़, मज़बूत और पक्का बनाएँ कि उनके भीतर सचमुच अच्छे अख़लाक़ का शौक़ पैदा हो, उनके दिल में नेकी की मुहब्बत और गुनाह से सख़्त नफ़रत बैठ जाए। ताकि फिर औरतों के बारे में इस तरह के शक और अंदेशे की कोई गुंजाइश ही न रहे।”
इसी सिलसिले में मुमताज़ अली औरतों की शिक्षा के लिए पाठ्यक्रम की बात करते हैं। वे यह नहीं चाहते कि औरतों को सिर्फ़ घरेलू कामकाज, मज़हबी रस्मों और मामूली पढ़ने-लिखने तक सीमित रखा जाए। वे चाहते हैं कि उन्हें ऐसा ज्ञान दिया जाए, जिससे वे दुनिया के आम विषयों को समझ सकें और शिक्षित लोगों के साथ बातचीत में हिस्सा ले सकें। वे विज्ञान, प्राकृतिक भूगोल, रसायन और खगोलशास्त्र जैसे विषयों की प्राथमिक जानकारी देने की वकालत करते हैं। उनका सुझाव है कि इन विषयों को आसान उर्दू में पढ़ाया जाए और इनके लिए अलग-अलग शुरुआती किताबें तैयार की जाएँ। बारिश, बादलों, चाँद ग्रहण, भूकंप, घड़ी, थर्मामीटर, बैरोमीटर और बिजली की मशीनों जैसी चीज़ों के बारे में जानकारी रोज़मर्रा की बातचीत को ज़्यादा अर्थपूर्ण बना सकती है। औरतें अपने आसपास की दुनिया को समझें, प्राकृतिक घटनाओं के कारणों के बारे में जानें और विज्ञान की बुनियादी जानकारी हासिल करें। उस दौर में औरतों की शिक्षा के लिए तैयार की जाने वाली बहुत-सी किताबें मज़हबी उपदेशों, घरेलू कामकाज और नैतिक शिक्षाओं तक सीमित थीं। वे समझते हैं कि अगर औरतों को सिर्फ़ उन्हीं विषयों की शिक्षा दी जाएगी जो पहले से उनकी घरेलू भूमिका से जुड़े हुए हैं, तो उनके ज्ञान का दायरा भी उसी भूमिका तक सीमित रहेगा। उनकी यह बात कि औरतों को प्राकृतिक विज्ञान और दुनिया के आम विषयों की जानकारी होनी चाहिए, शिक्षा को घरेलू दायरे से बाहर निकालने की दिशा में एक कदम है। वे ऐसी पढ़ी-लिखी औरत की कल्पना करते हैं, जो सिर्फ़ घर का प्रबंध करने में सक्षम न हो, बल्कि ज्ञान और विचार की बातचीत में भी हिस्सा ले सके।
वे रेल के डिब्बे में सफ़र कर रहे विश्वविद्यालय के एक शिक्षित व्यक्ति की मिसाल भी देते हैं, जो अपने सहयात्रियों में मिडिल क्लास के विद्यार्थी से बातचीत करना पसंद करेगा, भले ही उसे उस बातचीत से कोई विशेष शैक्षणिक लाभ न मिले। इसकी वजह यह है कि बातचीत का मज़ा सिर्फ़ बराबर की जानकारी से नहीं, बल्कि एक समान बौद्धिक रुचि से पैदा होता है। इसी तरह किसी शेर को सुनकर उसकी तारीफ़ करने वाला इंसान सुनने वाले को आनंद दे सकता है, भले ही उससे कोई नया ज्ञान हासिल न हुआ हो। उनके लिए मियां-बीबी का रिश्ता सिर्फ़ आर्थिक सहयोग, शारीरिक निकटता या घरेलू ज़िम्मेदारियों के बँटवारे का नाम नहीं है। वे चाहते हैं कि मियां और बीबी के बीच ऐसी बातचीत हो, जिसमें विचार, किताबें, साहित्य और दुनिया के बारे में समझ भी शामिल हो। उनके विचार में शिक्षा इस बौद्धिक निकटता को बढ़ाने का माध्यम है। वे उस समाज से बहस कर रहे थे जहाँ औरतों की शिक्षा का विरोध करना आम था। इसलिए उन्हें कई बार ऐसी दलीलें भी देनी पड़ती थीं, जिन्हें उस वक़्त के मर्द आसानी से क़ुबूल कर सकें। लेकिन इन व्यावहारिक दलीलों के पीछे उनका ज़्यादा बुनियादी तर्क यह है कि औरतों को ज्ञान से दूर रखना उनकी क्षमताओं को सीमित करना है। उनकी दलील का सबसे प्रगतिशील पक्ष इसी बुनियादी सिद्धांत में मौजूद है, न कि सिर्फ़ इस अपेक्षा में कि शिक्षित औरत अपने शौहर की बेहतर हमनवा बनेगी।
औरतों की शिक्षा के लिए पाठ्यक्रम और किताबों की चर्चा करते हुए मुमताज़ अली उस वक़्त उपलब्ध साहित्य की भी आलोचना करते हैं। उनके अनुसार, लड़कियों को पढ़ाने के लिए जिन किताबों का इस्तेमाल किया जाता था, उनमें से बहुत-सी किताबें सिर्फ़ इसलिए चुनी गई थीं कि उस दौर में उर्दू साहित्य का दायरा ही सीमित था। मज़हबी किस्से, नैतिक उपदेश, मज़हबी रस्मों से जुड़ी किताबें और घरेलू ज़िन्दगी पर आधारित किताबें शिक्षा का प्रमुख साधन बन गई थीं। वे इस स्थिति को अपर्याप्त मानते हैं। वे लिखते हैं: “नॉवेलों में चंद नॉवेल अच्छे भी हैं लेकिन उनमें भी एक कमी है। वह यह कि उनमें अमीर और खुशहाल परिवारों की कहानियाँ ही बयान की जाती हैं। क्योंकि ऐसे परिवारों में ऐशो-आराम और सुख-सुविधा के इतने साधन होते हैं कि उनके बारे में दिलचस्प कहानियाँ लिखी जा सकती हैं। लेकिन जब गरीब परिवारों की लड़कियाँ इन उपन्यासों में अमीर घरों की सुख-सुविधा और रहन-सहन के अच्छे ढंग देखती हैं, तो वे अपनी हालत से बहुत दुखी और परेशान हो जाती हैं। उनकी ज़िंदगी का मज़ा खत्म हो जाता है और अपने पास जो कुछ है, उसमें खुश रहने की भावना भी उनके दिल से निकल जाती है। बल्कि यह कमी हमारे मौलाना मौलवी नज़ीर अहमद साहब की किताबों में भी है। उन्होंने भी अमीर और खुशहाल परिवारों की कहानियाँ लिखी हैं। इससे लड़कियों में अपनी हैसियत से बहुत ऊँची उम्मीदें पैदा हो जाती हैं, जो उनके पारिवारिक हालात के मुताबिक नहीं होतीं। हर लड़की चाहती है कि उसका घर असग़री के घर की तरह साफ़-सुथरा और सजा-सँवरा हो, जबकि ऐसा करना उसके लिए मुमकिन नहीं होता। हर लड़की यह भी चाहती है कि उसका पति तहसीलदार या डिप्टी हो। इससे कम दर्जे की नौकरी करने वाला पति उसकी नज़रों में कोई अहमियत नहीं रखता।”
मुमताज़ अली साहित्य के प्रभाव को सिर्फ़ नैतिकता के सवाल से नहीं देखते; वे यह भी समझते हैं कि साहित्य पाठकों की इच्छाओं, उम्मीदों और जीवन के प्रति दृष्टिकोण को प्रभावित कर सकता है। वे साहित्य में दिखाई जाने वाली समाजी दुनिया और पाठकों की वास्तविक दुनिया के बीच के फ़र्क़ को लेकर चिंतित हैं। वे चाहते हैं कि किताबों की जाँच-पड़ताल हो, अच्छी पुस्तकों की पहचान की जाए और मां-बाप को ऐसी सूची उपलब्ध कराई जाए, जिससे वे अपनी बेटियों के लिए पढ़ने की सामग्री चुन सकें। इसी सिलसिले में वे लड़कियों के लिए एक अलग अख़बार निकालने की योजना का उल्लेख करते हैं। उनका इरादा था कि उसमें औरतों की शिक्षा, पाठ्यपुस्तकों, पढ़ाने के तरीक़ों और घरेलू ज़िन्दगी से जुड़े विषयों पर चर्चा की जाए। उस अख़बार की संपादक उनके अपने परिवार की कोई लड़की होगी और उसमें मर्दों के लिखे हुए लेख प्रकाशित नहीं किए जाएँगे। वे औरतों की शिक्षा के सवाल पर सिर्फ़ बहस नहीं करना चाहते, बल्कि उसके लिए संस्थागत साधन भी तैयार करना चाहते हैं। शिक्षा के लिए किताबें, पाठ्यक्रम, पत्र-पत्रिकाएँ और प्रशिक्षित शिक्षिकाएँ ज़रूरी हैं। किसी समाज में औरतों की शिक्षा का विस्तार सिर्फ़ ज़ाती इच्छा से नहीं हो सकता, उसके लिए एक ऐसी व्यवस्था की ज़रूरत होती है, जो शिक्षा को नियमित और सुलभ बनाए। अख़बार की संपादक के तौर पर अपने परिवार की किसी लड़की को चुनने का उनका प्रस्ताव भी उल्लेखनीय है। यह उस वक़्त की उस धारणा के ख़िलाफ जाता है, जिसमें ज्ञान और लेखन के क्षेत्र को लगभग पूरी तरह मर्दों का अधिकार माना जाता था। मुमताज़ अली औरतों को सिर्फ़ शिक्षा प्राप्त करने वाली नहीं, बल्कि लिखने, विचार व्यक्त करने और दूसरे लोगों तक अपना ज्ञान पहुँचाने वाली हस्तियों के तौर पर भी देखते हैं। अगर औरतों को शिक्षा का अधिकार देना है, तो उन्हें ज्ञान के उत्पादन और प्रसार में भी जगह देनी होगी। उन्हें सिर्फ़ मर्दों द्वारा लिखी गई किताबों की पाठक बनाकर नहीं रखा जा सकता। वे ख़ुद भी लिख सकती हैं, संपादन कर सकती हैं और शिक्षा के विषयों पर अपनी राय रख सकती हैं।
मुमताज़ अली की शिक्षा संबंधी बहस का सबसे जटिल हिस्सा वह है, जहाँ वे सैयद अहमद ख़ाँ के एक पत्र को उद्धृत करते हैं : “मेरे प्यारे और मेहरबान मौलवी मुमताज़ अली साहब! आपका एक लंबा-चौड़ा ख़त कई दिनों से मेरे सामने रखा हुआ है। मैं उसका जवाब लिखने के लिए फ़ुर्सत निकाल रहा था। अब इस वक़्त उसका जवाब लिख रहा हूँ। मेरी दिल से यह ख़्वाहिश है कि औरतों को भी बहुत अच्छी, ऊँचे दर्जे की और हर तरह से मुकम्मल तालीम दी जाए। लेकिन मौजूदा हालात में कुंवारी लड़कियों को तालीम देना उनके साथ ज़ुल्म करने जैसा है, क्योंकि इससे उनकी पूरी ज़िंदगी मुसीबत में पड़ जाती है। आज के हालात में कुंवारी लड़कियाँ पूरी उम्र बिना शादी के नहीं रह सकतीं और न ही उनके लिए इस तरह ज़िंदगी गुज़ारना मुमकिन है। इसलिए उनकी शादी करना ज़रूरी हो जाता है। हमारी क़ौम के लड़कों की बेहद ख़राब हालत, उनकी बुरी आदतें, बुरे काम और अपनी बीवियों के साथ उनका बुरा बर्ताव ऐसी बातें हैं जो सूरज की तरह साफ़ हैं। इस वक़्त बड़े-बड़े शरीफ़ ख़ानदानों में भी एक ऐसा लड़का नहीं मिलता जिसे अच्छे चरित्र वाला, ख़ुश-अख़लाक़, सभ्य और पढ़ा-लिखा कहा जा सके और जो अपनी बीवी को अपना साथी और दुख-दर्द बाँटने वाला समझता हो। ख़ानदानी लड़कों का हाल यह है कि वे अपनी बीवियों को लौंडियों से भी बदतर समझते हैं। बीवियों के साथ ऐसा कोई बुरा बर्ताव नहीं है जो वे नहीं करते।”
सैयद अहमद की यह चिंता उस समाज की वास्तविकता को सामने लाती है, जहाँ औरत की आर्थिक स्वतंत्रता सीमित थी और शादी उसके समाजी जीवन का केंद्रीय आधार बना हुआ था। वे इस समाजी असमानता की वजह से पैदा होने वाली कठिनाई को क़ुबूल तो करते हैं, लेकिन उस असमानता को बदलने के बजाय औरतों की शिक्षा को रोकने की सलाह देते हैं। जबकि मुमताज़ अली शिक्षा को समाजी बदलाव के साथ जोड़ते हैं। उनका विश्वास है कि औरतों को शिक्षा देने के साथ-साथ मर्दों की शिक्षा, चरित्र और व्यवहार में भी सुधार की ज़रूरत है। वे यह नहीं मानते कि समाज के सभी मर्द पहले पूरी तरह बदल जाएँ, तभी औरतों को शिक्षा दी जा सकती है। बल्कि उनके विचारों से यह निष्कर्ष निकलता है कि शिक्षा ख़ुद उस बदलाव का एक ज़रूरी साधन है, जिसके बिना समाजी संबंधों को बेहतर बनाना मुश्किल होगा।इस पत्र के बाद मुमताज़ अली शिक्षा के लिए उपयुक्त विवाह-संबंधों और लड़कों की परवरिश पर ध्यान देने की ज़रूरत भी बताते हैं। वे चाहते हैं कि लड़कियों की शादी के लिए ऐसे लड़कों की तलाश की जाए, जिन्हें बचपन से अच्छी शिक्षा और प्रशिक्षण मिला हो और रिश्तों का दायरा सिर्फ़ अपने खानदान तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
मुमताज़ अली की शिक्षा संबंधी योजना का एक और अहम पहलू महिला विद्यालयों और शिक्षिकाओं की व्यवस्था है। लड़कियों की शिक्षा के लिए सिर्फ़ व्यक्तिगत प्रयास काफ़ी नहीं हैं। इसके लिए ऐसी संस्थाओं की ज़रूरत है जो पाठ्यपुस्तकों, पढ़ाने के तरीक़ों और विद्यालयों के संचालन पर विचार कर सकें। वे इस काम के लिए एक परिषद या समिति बनाने की ज़रूरत बताते हैं। उनकी राय में महिला विद्यालयों की स्थापना ऐसे प्रतिष्ठित घरों के किसी हिस्से में की जा सकती है, जिनकी समाजी प्रतिष्ठा, अच्छे आचरण और ईमानदारी पर भरोसा हो। वे शिक्षिकाओं को उचित पारिश्रमिक देने की भी वकालत करते हैं, समाज के हित के लिए बिना किसी आर्थिक आधार के किए जाने वाले काम अक्सर अधूरे रह जाते हैं। इसलिए शिक्षिकाओं को उनकी सेवा के अनुरूप सम्मानजनक मेहनताना मिलना चाहिए। मुमताज़ अली शिक्षा के क्षेत्र में श्रम और संसाधनों की भूमिका को पहचानते हैं। मुमताज़ अली शिक्षा की बहस को समाजी सत्ता की बहस बना देते हैं। वे दिखाते हैं कि औरतों को अनपढ़ रखने के पीछे सिर्फ़ शिक्षा के प्रभाव को लेकर कुछ आशंकाएँ नहीं हैं, इसके पीछे मर्दों के अधिकार, घरेलू सत्ता और समाजी प्रतिष्ठा से जुड़ी धारणाएँ भी काम करती हैं। शिक्षा इन धारणाओं को चुनौती दे सकती है, क्योंकि वह औरतों को दुनिया समझने, अपने अनुभवों पर विचार करने और अपने अधिकारों को पहचानने की क्षमता देती है।
आज इस अध्याय को पढ़ते हुए यह सवाल फिर सामने आता है कि शिक्षा का उद्देश्य क्या है। क्या शिक्षा का मक़सद किसी इंसान को पहले से तय समाजी भूमिकाओं के लिए तैयार करना भर है, या उसे अपनी क्षमताओं का विकास करने, दुनिया को समझने और अपनी ज़िन्दगी के बारे में निर्णय लेने की योग्यता देना भी है? मुमताज़ अली की दलीलें इस दूसरे रास्ते की तरफ़ संकेत करती हैं। वे भले ही हर जगह अपने वक़्त की सीमाओं से बाहर नहीं निकल पाते, लेकिन वे उस बुनियादी सिद्धांत को स्थापित करते हैं कि औरतों को ज्ञान से दूर रखने का कोई न्यायसंगत आधार नहीं हो सकता। ‘तालीम’ सिर्फ़ औरतों की पढ़ाई पर लिखा गया एक पुराना लेख नहीं है। यह उस समाजी व्यवस्था के बारे में भी एक दस्तावेज़ है, जिसमें शिक्षा, विवाह, नैतिकता और मर्दों के अधिकार आपस में जुड़े हुए थे। मुमताज़ अली का लेख अपने वक़्त के तालीमी ढाँचे को चुनौती देने की एक ऐतिहासिक कोशिश है। ऐसी कोशिश, जिसकी उपलब्धियों और सीमाओं, दोनों पर विचार करना आज भी उतना ही ज़रूरी है।

