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ट्रॉल्स के महाजाल को भेदता है राजेश कुमार का नाटक ‘ खेल खतम ’

लखनऊ। राजेश कुमार राजनीतिक और ज्वलन्त विषयों पर अपने नाटक के लिए ख्यात है। उनका नया नाटक है ‘खेल खतम’। इस नाटक का पाठ उन्होंने हाल में लेनिन पुस्तक केन्द्र लखनऊ में किया। इस पाठ के बाद इस पर चर्चा भी हुई। इसका आयोजन जन संस्कृति मंच ने किया था।
राजेश कुमार का कहना था कि अल्बेयर कामू का यह कथन ‘मैं अपने देश को इतना प्यार करता हूँ कि मैं राष्ट्रवादी नहीं हो सकता ‘ आज के संदर्भ में हमारे देश में काफी चरितार्थ हो रहा है। देशभक्ति और राष्ट्रवाद के नाम पर लोगों के अंदर जिस तरह की घृणा, नफरत भरी जा रही है, देश के लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय बन गया है। जो भी बेरोजगारी का सवाल उठाता है, मजदूरों – किसानों के वाजिब हक के लिए आगे आता है, उस पर देशद्रोही का मुलम्मा जड़ दिया जाता है। एक खास राजनीति और सोच के तहत जनता को भीड़ की शक्ल में तब्दील किया जा रहा है। आम आदमी को झुंड बना दिया जा रहा है । उनके प्रतिरोध को नकारात्मकता में रूपांतरित कर दिया जा रहा है जिसका परिणाम मोब लिंचिंग के रूप में देखने को मिलता है कि भीड़ यकायक कहीं भी उतर आती है और गाय के नाम पर एक खास समुदाय को अपने निशाने पर ले लेती है। आज मुसलमान , दलित, आदिवासी लोगों को टारगेट कर जिस तरह लिंचिंग की जा रही है, नफरत की जमीन तैयार करने वालों की सोची – समझी साजिश है।
इन्हीं सब सवालों को राजेश कुमार ने अपने नए नाटक ‘खेल खत्तम‘ में उठाया है। अबराम मालिक जो एक महानगर में सॉफ्ट वेयर इंजीनियर है, मस्जिद से लौट रहे मुहर्रम अली के साथ जिस तरह कुछ लंपट लोगों ने दुर्व्यवहार किया, जबरन धार्मिक नारे लगाने के लिए विवश किया, उसके विरोध में फेसबुक में एक पोस्ट लिखा। उसके लिखने भर की देरी थी कि उसकी ट्रोल शुरू हो गयी। उसे देशद्रोही करार दिया गया, पाकिस्तान भेजने को आमादा हो गए। बात इतनी बढ़ गयी कि उसे जान से मारने तक कि धमकी दी गयी। एक नागरिक के रूप में उसे जो करना चाहिए था, किया। लेकिन ट्रोल उसके अंदर इतना आतंक भर देना चाहते हैं कि अबराम दहशत के साये में आ जाये। लेकिन अबराम ट्रोल के बिछाये महाजाल में फंसने के बजाय लगातार काटने में लगा रहता है। और अंततः ट्रोल के दुर्ग को भेदता है जो किसी राजनीति के लिए खड़ा किया गया था, जिसे सत्ता हासिल करने के लिए हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया था।
यह नाटक रंगमंच की रूढ़ परंपरा को तोड़ता है। सोशल मीडिया द्वारा जिस तरह लोगों को गलत इतिहास पढ़ाया जा रहा है, भ्रामक तथ्य परोसा जा रहा है, उसे उसी हथियार से चोट पहुंचाने की कोशिश की गई है। आज मोबाइल, लैपटॉप और मल्टी मीडिया आम जिंदगी का एक जरूरी हिस्सा बन गया है, रंगमंच इससे अछूता नहीं रह सकता है। इस नाटक में इसकी प्रमुख भूमिका है। इसमें रंगमंच और मल्टी मीडिया को आस-पास लाने का प्रयास किया गया है। तकनीक आज हर क्षेत्र में आ गया है। इससे न कोई आज परहेज कर सकता है, न खारिज।। परस्पर तालमेल बिठाने की जरूरत है।
इस नाटक पर हुई चर्चा में आर के सिन्हा, भगवान स्वरूप् कटियार, कौशल किशोर, अवनीश सिंह, कलीम खान, अतुल अन्जान, नीतीन राज आदि ने हिस्सा लिया। उनका कहना था कि ‘भीड़ हत्या’ और ‘ट्रोल’ एक नयी परघिटना है जो अत्यन्त बर्बर है तथा इसके द्वारा एक खास समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है। यह नाटक ट्रोल के असली चेहरे को सामने लाने की दिशा में एक रंगमंचीय प्रयास है जिसको तभी अनुभूत किया जा सकता है जब यह नाटक मुकम्मल तौर से मंच पर अपनी तकनीक और विचार के साथ उतरे। वक्ताओं का विचार था कि इस नाटक के अन्त पर काम करने की जरूरत है जिसे
राजेश कुमार ने भी माना और कहा कि नाटक को अन्तिम रूप देने से पहले इसका पाठ इसीलिए किया जाता है ताकि लोगों की राय सामने आये और उसमें आवश्यक सुधार व संशोधन किया जा सके।
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